गंगा की सौगंध: गंगाजल पीने, नहाने और खेती लायक भी नहीं

By: | Last Updated: Friday, 3 July 2015 1:58 PM
Ganga Ki Saugandh_

नई दिल्ली: गंगा की वर्तमान दयनीय स्थिति किसी से छिपी नहीं है. लेकिन गंगा के किसी भी घाट पर आपको गंगा मैया की महिमा का बखान करते भक्त मिलेंगे. हरिद्धार हो या कानपुर, इलाहाबाद हो या वाराणसी. कहीं भी गंगा को सिर्फ नदी की तरह नहीं देखा जाता, गंगा को मोक्षदायिनी माना जाता है. गंगा जीवनदायिनी है क्योंकि ये करीब पचास करोड़ लोगों की जीवनरेखा है. बावजूद इसके एबीपी न्यूज़ ने अपनी पडताल में हर जगह गंगा को गंदगी से पस्त पाया.

 

पर जो आंखों से दिखता है क्या वो विज्ञान के पैमाने पर सच है? श्रीराम सेंटर इंस्टीट्यूट फॉर इंड्रस्ट्रियल रिसर्च के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर 2010 से एबीपी न्यूज गंगा का वैज्ञानिक तरीके से आकलन करने में जुटा है और इस बार 8 जून से 12 जून के बीच 7 शहरों में 10 जगह से नमूने लिए गए.

 

पानी के सभी नमूने चौबीस घंटे के अंदर लिए गए. हर तीन घंटे में पानी के नमूने लिए गए ताकि ये पता लग सके कि गंगा की हालत कब सबसे ज्यादा बिगड़ी. हर पानी के सैंपल पर 35 तरीके के टेस्ट किए गए. जिससे किसी भी तरह की अशुद्धि का पता लग सके.

 

  • जैसे देखा गया कि पानी में किस तरह के खनिज या धातु मिली?

  • क्या पानी में बीमार करने वाले बैक्टीरिया हैं?

  • क्या पानी में कीटाणुनाशक मिले हैं?

  • क्या पानी में हानिकारक रसायन मिले हैं?

 

ये आंकड़े बताएंगे कि क्या गंगाजल खेती के लायक है या फिर क्या गंगाजल इतना शुद्ध है कि उसे पिया भी जा सके? 

 

गंगा पर गाया गया गाना ‘गंगा तेरा पानी अमृत’ मान्यताओं में है लेकिन जांच में सामने आया है कि गंगा का पानी आपको बीमार कर सकता है.

 

गंगा में मुख्यतौर पर जो अशुद्धियां मिली है उनमें पहली है (Turbidity) यानी गंदलापन. सभी 7 शहरों के नमूनों में गंगाजल इस टेस्ट में फेल हुआ है. गंगाजल सभी जगह इतना गंदला है कि आप इसे नजदीक से देखकर ही महसूस कर सकते हैँ. अधिकतम सीमा है पांच नेफलोमैट्रिक टर्बिडिटी यूनिट. ऐसी कोई जगह नहीं मिली जहां गंदलापन इस सीमा के अंदर हो. ऋषिकेश में 14 तो हरिद्वार में इसे 20 नापा गया.
 

  • कानपुर में दाखिल होते वक्त 25 तो निकलते वक्त 22.

  • इलाहाबाद में दाखिल होते वक्त गंदलापन 24 जबकि निकलते वक्त 42 निकला.

  • वाराणसी में दाखिल होते वक्त गंदलापन 10 जबकि निकलते वक्त 14 निकला.

  • पटना में गंदलापन 29 था जबकि हावड़ा में सबसे ज्यादा 127.  

 

गंगा की इससे भी बड़ी समस्या है जैविक गदंगी. इसकी वजह से पानी में बैक्टीरिया हो जाते हैं

आपको बता दें कि ऋषिकेश से हमारी जांच की शुरूआत हुई. जांच में हमें 100 मिली ग्राम पानी में 3500 बैक्टीरिया मिले. इसके अलावा मल से उत्पन्न होने वाले बैक्टीरिया की तादाद 221 थी. यहां पानी में ई कोली भी मिला. ऋषिकेश में गंगा की हालत कुछ सुधरी जरूर है पर गंगाजल यहां अब भी पीने लायक नहीं है.

 

हमारी पड़ताल के दौरान हरिद्धार में हमें आस्था में डुबे भक्त खूब मिले लेकिन यही भक्त गंगा को मैला करने के दोषी भी दिखे. जांच में हमें 100 मिली ग्राम पानी में 11000 बैक्टीरिया मिले. इसके अलावा मल से उत्पन्न होने वाले बैक्टीरिया की तादाद 1600 थी. यहां पानी में ई कोली भी मिला.

 

हरिद्वार: हरिद्वार के आंकड़े बताते हैं यहीं से गंगा की हालत बिगड़नी शुरू हो जाती है. आंकड़ों में हालत कुछ सुधरी जरूर है पर इतनी नहीं कि यहां डुबकी भी लगाई जा सके.

 

 

कानपुर: एबीपी न्यूज की पड़ताल में कानपुर में प्रदूषण की वजह कैमरे में कैद हुई. वैज्ञानिक जांच इसी सच की पुष्टि कर रही है.

कानपुर में दाखिल होते वक्त बैक्टीरिया की तादाद एक लाख दस हजार थी जो निकलते वक्त एक लाख सत्तर हजार हो गई. सिर्फ 100 मिलीग्राम पानी में. इसी तरह मल से उत्पन्न होने वाले बैक्टीरिया भी 5400 से बढ़कर 14000 हो गए. हर साल की तरह फिकल कोलीफॉर्म भी मिला. साफ है ये पानी आपकी ही नहीं बल्कि फसलों की सेहत खराब कर सकता है.

 

इलाहाबाद: गंगा बढ़ती है इलाहाबाद की तरफ. संगम की नगरी. श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी यहां भी हालात अलग नजर नहीं आए. रसूलाबाद घाट से जहां गंगा इलाहाबाद में दाखिल होती है हमारी जांच में बैक्टीरिया मिले 17000 जबकि संगम पर हमें मिले 22000.

 

इसी तरह मल से उत्पन्न होने वाले बैक्टीरिया हमें मिले 1800 जबकि बाहर निकलते वक्त बैक्टीरिया की तादाद थी 1100. ई कोली यहां भी मौजूद था. अब तक 6 सालों में यहां बैक्टीरिया की तादद हमें सबसे कम मिली. लेकिन अब भी इलाहाबाद का पानी पीने छोड़िए खेती लायक भी नहीं है.

 

वाराणसी: नरेंद्र मोदी की अग्निपरीक्षा होनी है वाराणसी में. वाराणसी में घाटों पर सफाई का काम तो चल रहा है पर गंगाजल कितना सुधरा है. हमारी पड़ताल में बहुत ज्यादा फर्क पड़ता नजर नहीं आया.

वाराणसी में दाखिल होते वक्त 100 मिलीग्राम पानी में 17000 बैक्टीरिया थे जबकि बाहर निकलते वक्त 28000. इसी तरह मल से उत्पन्न होने वाले बैक्टीरिया अस्सी घाट पर 1100 थे जबकि निकलते वक्त राजघाट पर 1400. ई कोली यहां भी मिला है.

 

पटना: पटना के गांधी घाट से लिए नमूनों में 100 मिलीग्राम पानी में एक लाख चालीस हजार बैक्टीरिया मिले. जबकि मल से उत्पन्न होने वाले बैक्टीरिया की तादाद 11000 थी. ई कोली यहां भी मिला.

लिहाजा ये पानी भी किसी लायक नहीं. आंकड़ों के लिहाज से पिछले साल के मुकाबले ये सुधरा है लेकिन अब भी भयानक स्तर तक प्रदूषित है पटना की गंगा.

 

हावड़ा के आंकड़े भी यही कहते हैं. पिछले साल के मुकाबले सुधरी है गंगा लेकिन अब भी 100 एमएल पानी में 22000 बैक्टीरिया मिले जबकि सिर्फ दस की अनुमति है. मल से उत्पन्न होने वाले बैक्टीरिया की तादाद 1800 मिली. ई कोली हर जगह मिला. जांच में शामिल किसी भी शहर का गंगाजल इस टेस्ट में पास नहीं हुआ है.
 

गंगा की सौगंध: गंगा ना बन जाए गंदा नाला

पानी को चार श्रेणियों में विभक्त किया जाता है. A यानी पीने लायक, B यानी नहाने लायक, C यानी खेती लायक और D यानी खेती लायक भी नहीं. शोध का नतीजा ये कि गंगा का पानी D श्रेणी में आ रहा है. यानी किसी काम का नहीं.

 

यह भी पढ़ें-

एबीपी न्यूज स्पेशल गंगा की सौगंध: क्या बांधों से मर जाएगी गंगा?  

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