सेंट स्टीफेंस में माली के बेटे ने रचा इतिहास, हिन्दी बोल कर बना छात्र संघ का अध्यक्ष

By: | Last Updated: Monday, 25 August 2014 12:06 PM
Gardner son create history

नई दिल्लीः जिस कॉलेज में अंग्रेजियत और इलीटिसिज्म का माहौल हो. देश विदेश के नामी और रईस घरानों के बच्चे अपना भविष्य बनाने आते हों. जहां से पढ़ना हर किसी का सपना हो वहां एक माली के बेटे ने नया इतिहास रच दिया. देश के सबसे सबसे प्रतिष्ठित कॉलेज में शुमार सेंट स्टीफेंस में माली के बेटे रोहित कुमार यादव ने छात्रसंघ का चुनाव जीत कर ये इतिहास बनाया है.

 

रोहित की जीत में सबसे खास बात ये रही कि जहां हर कोई अंग्रेजी में बात करता है वहां रोहित ने हिन्दी में अपनी बात रख कर सबका दिल जीत लिया.

 

21 अगस्त को हुए प्रेसीडेंशियल स्पीच में हजारों स्टूडेंटस के सामने रोहित ने साफ शब्दों में जब ये कहा कि मेरा एजेंडा वही है जो आपकी जरूरत है… तो तालियों की गड़गड़ाहट ने उनकी जीत पक्की कर दी. रोहित सेंट स्टीफेंस के इतिहास में पहले स्टूडेंटस हैं जिन्होंने हिन्दी के सहारे चुनाव जीता है.

 

रोहित बीए थर्ड ईयर के स्टूडडेंट हैं. यह चुनाव कई मायनों में काफी प्रतिष्ठित माना जाता है, क्योंकि देश और दुनिया के कई बड़े लोगों ने यहां से अपनी पढ़ाई की थी. सेंट स्टीफेंस दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत आता है, लेकिन इस कॉलेज का चुनाव यूनिवर्सिटी के चुनाव से पहले होता है.

 

कैसे सेंट स्टीफेंस पहुंचे रोहित?

आपके मन में ये सवाल उठ रहा होगा कि जिस कॉलेज में दिल्ली के टॉपर सार्थक अग्रवाल का नाम वेटिंग लिस्ट में था वहां एक साधारण सा लड़का कैसे पहुंच गया. 

 

रोहित ने इलाहाबाद के स्वामी विवेकानंद इंटर कॉलेज से 12वीं पास की. बीए के बाद रोहित की चाह थी कि वो बड़े कॉलेज में पढ़ें और उनका ये सपना सच हो गया. दरअसल, सेंट स्टीफेंस कॉलेज  में रोहित के पिता हरीश माली का काम करते हैं. इसी के चलते उसके 65 फीसदी नंबर होने के बावजूद उनसे यहां एडमीशन मिला. सेंट स्टीफेंस कॉलेज अपने यहां काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों को प्राथमिकता देता है.

 

क्या कहा अपनी जीत पर –

रोहित ने अपनी जीत पर अपने साथियों और प्रिंसिपल का शुक्रिया अदा किया. जहां स्टूडेंट ने इनकी बात सुनी वहीं प्रिंसिपल ने इनका हौसला बढ़ाया था. रोहित के कैंपन में इनके दोस्तों ने काफी मदद की और इनके कहे गए हर बात को इंग्लिश में ट्रांसलेट भी किया करते थे.

 

इतना ही नहीं रोहित के पीछे बीए थर्ड ईयर की एक टीम थी, जिसने सेंट स्टीफेंस कॉलेज के तमाम स्टूडेंट के जेहन को बदलने का काम किया.

 

सुल्तानपुर के सेंट्रल स्कूल से पढ़े वैभव, मुंबई की श्रेया सिन्हा, लखनऊ की फालगुनी तिवारी और अशोक वर्द्धन जैसे स्टूडेंटस ने रोहित की मदद की. रोहित के दोस्त वैभव मानते हैं कि रोहित के खिलाफ लड़ रहे कुछ लोगों ने उसके हिन्दी बोलने और गरीब परिवार को मुद्दा बनाया. लेकिन उसके काम को देखते हुए कॉलेज ने इस बदलाव की बयार के साथ बहना मंजूर किया. खुद श्रेया सिन्हा कहती हैं कि कॉलेज के प्रिंसीपल थंपू सर ने भी रोहित का आत्म विश्वास बढ़ाया.

 

रोहित कुमार यादव जैसे छात्र का चुनाव जीतना कईयों को ये भरोसा देता है कि नई पीढ़ी धर्म-जाति, अमीरी-गरीबी के फर्क को अब नहीं मानती और सबके समान तरक्की की हिमायती है.