रिश्वत मामले में 29 साल बाद बरी हुए दो सरकारी कर्मचारी

By: | Last Updated: Saturday, 22 August 2015 2:57 PM

 

मुम्बई : बम्बई उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार के दो कर्मचारियों को 1100 रूपये रिश्वत लेने का आरोप लगने के करीब तीन दशक बाद बरी कर दिया है. अदालत ने निचली अदालत द्वारा उन्हें दोषी ठहराने के फैसले को दरकिनार कर दिया है.

न्यायमूर्ति साधना जाधव ने हाल में रवींद्र जोशी और नारायण माणे को इस आधार पर बरी कर दिया कि अभियोजन उनके खिलाफ मामला साबित करने में असफल रहा.

न्यायाधीश ने यह फैसला जोशी और माणे की ओर से सत्र अदालत के 1994 में दिये आदेश को चुनौती देते हुए दायर याचिका पर सुनवायी करते हुए दिया. सत्र अदालत ने अपने उस आदेश में दोनों को भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत दोषी ठहराते हुए उन्हें पांच वर्ष की सजा सुनायी थी.
 

 

अभियोजन का मामला यह था कि शिकायतकर्ता रमेश गौरव ने अगस्त 1986 में सोलापुर जिले में उजनी नगर उप मंडल की नहर परियोजना का एक ठेका लिया था. उसने अपना काम पूरा किया और उजनी नहर उप मंडल के तत्कालीन इंजीनियर जोशी और तत्कालीन जूनियर इंजीनियर माणे से सम्पर्क किया. शिकायतकर्ता ने दोनों से काम का निरीक्षण करने और बिल तैयार करने का आग्रह किया ताकि सरकार से भुगतान लिया जा सके.

आरोप है कि जोशी और माणे ने काफी विलंब के बाद बिल तैयार किया और उसे वित्त विभाग को अग्रेषित किया. जब गौरव अपना चेक लेने के लिए पहुंचे तो उन्हें पता चला कि वह कम राशि का है. जब वह दोनों के पास गए और वास्तविक राशि के चेक की मांग की तो जोशी और माणे ने रिश्वत की मांग की

गौरव भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो :एसीबी: के पास पहुंचे और उसने जाल बिछाया और दोनों को रिश्वत के साथ पकड़ लिया. यद्यपि दोनों ने एसीबी अधिकारियों को बताया कि धनराशि रिश्वत नहीं बल्कि उस रिण की राशि थी जो गौरव ने उनसे लिया था और वह उन्हें वापस लौटा रहा था.

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