ग्राउंड रिपोर्ट: कौन जीतेगा सीतामढ़ी का संग्राम?

By: | Last Updated: Wednesday, 2 September 2015 2:48 PM

नई दिल्ली: जगत जननी मां सीता की जन्म धरती है सीतामढ़ी. पटना से करीब सवा सौ किलोमीटर दूर नेपाल से सटा उत्तर बिहार का एक जिला. सीतामढ़ी में विधानसभा की 8 सीटें हैं. 2010 के चुनाव में जब बीजेपी और जेडीयू का गठबंधन था तब इस जिले में लालू गठबंधन का खाता तक नहीं खुला था.

 

जेडीयू और बीजेपी को तब 4-4 सीटों पर जीत मिली थी. आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे जिले की परिहार सीट से पिछले साल हार गए थे. बाजपट्टी की विधायक रंजू गीता अभी नीतीश सरकार में मंत्री हैं. पूर्व मंत्री और सुरसंड के विधायक शाहिद अली खान अब जेडीयू को छोड़कर हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के साथ हैं. सीतामढ़ी, परिहार, रीगा और बथनाहा की सीट बीजेपी के कब्जे में है.

 

बाजपट्टी, सुरसंड, रुन्नी सैदपुर और बेलसंड की सीट जेडीयू के कब्जे में है. बीजेपी की सीटिंग सीटों को छोड़ दें तो जेडीयू के कब्जे बाली चार सीटों को लेकर एनडीए में घमासान है. सुरसंड से हम के शाहिद अली खान सीटिंग विधायक हैं लिहाजा उनका हम से लड़ना तय माना जा रहा है. बाजपट्टी से आरएलएसपी के रवींद्र शाही और रुन्नी सैदपुर से पंकज मिश्रा प्रमुख दावेदार हैं.

 

सीतामढ़ी संसदीय सीट पर आरएलएसपी का कब्जा है लिहाजा पार्टी कम से कम दो सीटें लेने का दावा करेगी. ऐसे में रुन्नी सैदपुर को लेकर पेंच फंस सकता है. सैदपुर से एलजेपी भी दावेदारी कर रही है. एलजेपी से आलोक कुमार चौधरी टिकट के दावेदार हैं. बीजेपी के विधान परिषद सदस्य देवेश चंद्र ठाकुर भी अपने परिवार के लिए इस सीट से टिकट का प्रयास कर रहे हैं. लेकिन एनडीए में सबसे मजबूत दावेदारी आरएलएसपी के प्रदेश महासचिव पंकज मिश्रा की है.

 

पंकज मिश्रा समता पार्टी के जमाने से प्रदेश अध्यक्ष सांसद अरुण कुमार के करीबी हैं. पंकज भूमिहार बिरादरी से आते हैं. माना जा रहा है कि अरुण कुमार पंकज के टिकट के लिए अड़ सकते हैं. टिकट नहीं मिलने पर पंकज अगर निर्दलीय लड़ने का फैसला करते हैं तो फिर एनडीए के लिए परेशानी बढ़ जाएगी. हाल ही में पंकज ने सम्मेलन करके सैदपुर की सियासत में अपनी ताकत का एहसास कराया है. बेलसंड सीट को लेकर बीजेपी की मजबूत दावेदारी है.

 

ठाकुर धर्मेंद्र, अखिलेश कुमार सिंह सहित कई दावेदार अभी से क्षेत्र में सक्रिय हैं. पड़ोसी जिले की शिवहर सीट पर अगर ठाकुर रत्नाकर राणा को टिकट नहीं मिला तो फिर बेलसंड के लिए उनके नाम पर पार्टी विचार कर सकती है. वैसे एलजेपी के भी कई दावेदार बेलसंड में बैनर, पोस्टर, होर्डिंग लगाकर अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं. चर्चा ये भी है कि एलजेपी का दबाव ज्यादा होने के बाद पार्टी बथनाहा सुरक्षित सीट छोड़ सकती है.

 

सीतामढ़ी शहर से पूर्व पर्यटन मंत्री और बीजेपी विधायक सुनील कुमार पिंटू का लड़ना तय है. पिछली बार लालू गठबंधन ने एलजेपी के खाते में ये सीट दी थी. पिंटू के खिलाफ महागठबंधन में सीतामढ़ी से किस पार्टी का उम्मीदवार होगा ये अभी साफ नहीं है. आरजेडी, जे़डीयू के साथ कांग्रेस का भी इस सीट पर दावा है. महागठबंधन से अगर कोई मुस्लिम उम्मीदवार उतरता है तो फिर चुनावी लड़ाई ध्रुवीकरण की ओर चली जाएगी. पहले के चुनावों में ऐसा होता रहा है. सूत्र बता रहे हैं कि महागठबंधन किसी वैश्य जाति के उम्मीदवार पर विचार कर सकता है. परिहार से रामचंद्र पूर्वे का आरजेडी से लड़ना तय है.

 

परिहार से बीजेपी के मौजूदा विधायक रामनरेश यादव चुनाव नहीं लड़ सकते इसलिए इस सीट एलजेपी और आरएलएसपी में से किसी एक को दी जा सकती है. बाजपट्टी से रंजू गीता जेडीयू की उम्मीदवार होंगी. रुन्नी सैदपुर से गुड्डी चौधरी अभी विधायक हैं. आरजेडी अगर दावा नहीं करता तो फिर गुड्डी की उम्मीदवारी का रास्ता साफ है. बेलसंड से राणा रंधीर सिंह चौहान की पत्नी सुनीता सिंह चौहान विधायक हैं.

 

जेडीयू के खाते में सीट रही तो सुनीता को टिकट मिलना तय है. वैसे आरजेडी से पूर्व विधायक संजय प्रसाद भी कोशिश में जुटे हैं. सुरसंड सीट से हम के शाहिद अली खान के खिलाफ कांग्रेस का मजबूत दावा है. कांग्रेस के जिला अध्यक्ष विमल शुक्ला यहां से उम्मीदवार हो सकते हैं. ऐसे हुआ तो फिर पूर्व विधायक जयनंदन यादव आरजेडी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं.

 

महागठबंधन में टिकट का बंटवारा इसलिए भी चुनौती का काम है क्योंकि जेडीयू की जो चार जीती हुई सीटें हैं उनमें से चारों सीटों पर 2010 में मुकाबला आरजेडी के उम्मीदवारों से ही था. सीतामढ़ी, रीगा, बथनाहा पर जीत बीजेपी की हुई थी और मुकाबला एलजेपी (तब लालू के साथ ) से हुआ था. लिहाजा बीजेपी की जीती हुई इन तीन सीटों पर तो जेडीयू-आरजेडी में ज्यादा विवाद नहीं होगा लेकिन जेडीयू के कब्जे वाली 4 सीटों पर उम्मीदवारों के चयन में पेंच फंसेगा. हो सकता है जेडीयू के कुछ विधायकों का पत्ता भी साफ हो जाए.

 

सीतामढ़ी जिले का सामाजिक और राजनीतिक समीकरण पहले से बिल्कुल अलग हो चुका है. इस चुनाव में खास बात ये भी है कि जिले के तीन दिग्गज नेता पूर्व मंत्री रघुनाथ झा, पूर्व सांसद नवल किशोर राय और पूर्व सांसद अनवारुल हक अब मुख्य धारा की राजनीति से अलग थलग हो चुके हैं.

 

आरजेडी के पूर्व सांसद सीताराम यादव का भी कद पहले वाला नहीं रह गया है. एनडीए की राजनीति को देखें तो अब विधान परिषद के सदस्य देवेश चंद्र ठाकुर, पूर्व मंत्री सुनील कुमार पिंटू जिले के सबसे मजबूत नेता हो चुके हैं. नेपाल से सटा सीतामढ़ी बाढ़ ग्रस्त इलाका है. जिले में नक्सली भी अहम समस्या है.

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Web Title: ground report who will win sitamani fight
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