ब्लॉग: मुस्तैदी के साथ इंतजार करता हचिको देता है वफादारी का संदेश

By: | Last Updated: Monday, 6 July 2015 11:41 AM
Hachiko_

नई दिल्ली: हचिको आज भी मुस्तैद है. उसी रौब के साथ जैसे वो आज से 90 साल पहले रहा करता होगा. हचिको के बारे में मुझे जापान जाने से पहले कुछ पता नहीं था. जैसे ही लोगों ने सुना कि मैं जापान के पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था पर कार्यक्रम बनाने आया हूं वहां के लोगों ने कहा कि पहले शिबुया स्टेशन  जाइये. शिबुया स्टेशन पर आपको हचिको मिलेंगे. उनके बगैर जापान के पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था की समझ पूरी नहीं हो सकती है. 

 

“रामराज्य” सीरीज के सिलसिले में जापान जाने का अवसर मिला था. जापान में हम राजधानी टोक्यो की यातायात व्यवस्था को परख रहे थे. इस सोच के साथ कि क्या टोक्यो जैसी यातायात व्यवस्था दिल्ली, मुंबई, चेन्नई जैसे शहरों में लागू नहीं हो सकती.

 

हम क्यों पटना जाने के लिए 12 से 20 घंटे तक का ट्रेन सफर करते हैं? हम क्यों नहीं चार पांच घंटे में हजारों किलोमीटर का सफर पूरा कर सकते हैं ?  क्यों दिल्ली के एक कोने से दूसरे कोने में जाने के लिए हम पब्लिक ट्रासंपोर्ट का इस्तेमाल करने से कतराते हैं ?  जबकि दुनिया का सबसे अमीर और मंहगा शहर टोक्यो के बाशिंदे पब्लिक ट्रांसपोर्ट के अलावा कोई सवारी के बारे में बिरले ही सोचते हैं.  

 

इन सवालों का जवाब हमें टोक्यो में ढूढ़ना था लेकिन हमारे जानकार हमें शिबुया स्टेशन भेज रहे थे. आखिरकार, हम टोक्यो से शिबुया स्टेशन पहुंच गये. स्टेशन से बाहर एक पेड़ की छांव में हचिको नजर आये. हचिको के साथ लोग सेल्फी खींच रहे थे. कुछ लोग उसके पास बैठे थे. लेकिन हचिको शांत भाव से मुस्तैद बैठे थे. जल्द ही पता चल गया कि जापान की यातायात व्यवस्था को जानने समझने के लिए हचिको को जानना पहचाना जरुरी है .

 

दरअसल , हचिको , जापान के सबसे प्रसिद्द कुत्ते का नाम है. हचिको की मौत 1935 में हुई लेकिन उसकी कहानी जिंदा है. हचिको संबंधो में वफादारी का जापान में सबसे बड़ा प्रतीक है.

 

बात 1925 की है. आज के टोक्यो यूनिवर्सिटी और तब के इंपीरियल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर इज़ॉबुरो उइनो पढाते थे. वो रोज शिबुया स्टेशन आया करते थे. जहां से ट्रेन ले कर वो यूनिवर्सिटी जाया करते थे. उनके साथ रोज उनका कुत्ता हचिको स्टेशन तक आता था. प्रोफेसर इज़ॉबुरो उइनो यूनिवर्सिटी चले जाते थे और हचिको वापस घर.  हचिको दिन के तीन बजे दोबारा लौटता था. क्योंकि उसी समय एक ट्रेन आया करती थी जिससे प्रोफेसर इज़ॉबुरो उइनो लौटा करते थे. तब दोनों साथ घर लौटते थे. 

 

21 मई 1925 का दिन था. दिन के तीन बजे. हचिको शिबुया के प्लैटफार्म पर अपने मालिक का इतंजार कर रहा था. लेकिन प्रोफेसर इज़ॉबुरो उइनो उस ट्रेन से नहीं लौटे. वो लौटते भी कैसे. उन्हे अचानक ब्रेन हैमरेज हुआ. जिससे उनकी मौत हो गई थी.

 

हचिको अपने मालिक और दोस्त का इंतजार करता रहा. इस बात से बेखबर कि प्रोफेसर इज़ॉबुरो उइनो वापस नहीं लौटेंगे. उसके इस इंतजार की चर्चा धीरे धीरे होने लगी. हचिको से मिलने लोग खास तौर पर शिबुया स्टेशन आते थे. अगले 9 साल , 9 महीने , 15 तक रोज दोपहर तीन बजे स्टेशन पहुंच जाता था. और एक रोज ठीक उसी जगह वो मृत पाया गया जहां वो रोज प्रोफेसर का इतंजार किया करता था . 

 

मौत के बाद हचिको की प्रसिद्दी और फैल गई. लोगों ने उसकी याद को हमेशा जिंदा रखने की पहल शुरु की. पैसा इकट्ठा किया गया. और तब के मशहूर मूर्तिकार, ताकेशी अंडो ने उसकी हचिको की मूर्ति बनाई. मूर्ति को वहीं स्थापित किया गया जहां वो प्रोफेसर का इंतजार करता था. लेकिन इस मूर्ति को जल्द ही पिघला दिया गया. क्योंकि जापान विश्वयुद्द में लगा था. युद्द में कारतूस बनाने के लिए पीतल की जरुरत थी. युद्द  खत्म होने के बाद ताकेशी अंडो के बेटे ने दोबारा हचिको की मूर्ति 1948 में बनाई.

तब से लेकर अब तक हचिको की उसी मूर्ति को जापान में वफादारी और भरोसे का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है. चूंकि 7 मार्च को हचिको की मौत हुई थी इसलिए उसी दिन हर साल “चुकेन हचिको मातसूरी” यानी “वफादार हचिको फेस्टीवल” मनाया जाता है.  

 

टोक्यो के लवबर्ड्स के लिए हचिको खास मायने रखते हैं. हचिको प्वाइंट आज टोक्यो का सबसे खास मीटिंग प्वाइंट है. दर्जनों लोगों को हमने हचिको प्वाइंट पर इंतजार करते हुये देखा. इसमें कई नौजवान थे. हमने वहां लोगों को इंतजार करते हुये देखा. वफादारी की कसमें भी यहां खाई जाती हैं. साथ- साथ जीने-मरने की बातें यहां होती है.

 

अब सोचिए, मेरे जानकारों ने हमें शिबुया स्टेशन हचिको से मिलने क्यों भेजा. शायद मुझे ये बताना चाहते थे जो साधन भरोसमंद न हो उस पर लोग एतबार नहीं कर सकते. हचिको के मालिक की ट्रेन कभी लेट नहीं होती थी. इसीलिए वो रोज समय से वहां पहुंचा करता था. 1925 में जापान एक-एक मिनट का ध्यान रखता था …आज तो 2015 है. 

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