आखिर क्या है हाशिमपुरा का सच?

By: | Last Updated: Tuesday, 31 March 2015 3:35 PM

नई दिल्ली: हाशिमपुरा नरसंहार में 42 मुस्लिमों की हत्या कर दी गई थी.. 28 साल तक नरसंहार का मुकदमा चला लेकिन आखिर तक ये पता नहीं चला कि हत्या किसने की. आखिर हाशिमपुरा का सच क्या है. 28 साल पहले 22 मई की दोपहर को क्या हुआ था?

 

पुराने मेरठ की संकरी गलियों में बसा है हाशिमपुरा. मेरठ का वो मोहल्ला जिसका नाम 28 साल से कानून की फाइलों में दबा हुआ धूल चाट रहा था. 28 साल बाद धूल छंटी और कोर्ट का फैसला भी आ गया. लेकिन कोर्ट के फैसले ने 42 मुस्लिम परिवारों के जख्म को हरा कर दिया है. 28 साल में कानून व्यवस्था इस बात का पता नहीं लगा पाई कि 42 मुस्लिमों की हत्या किसने की थी?

 

आरोप है कि मेरठ के हाशिमपुरा में 22 मई 1987 को सेना के जवानों, पीएसी और पुलिस ने मिलकर मुस्लिम समुदाय के लोगों को उनके घरों से उठाया था. तस्वीरें पत्रकार प्रवीण जैन खींचीं थी जब करीब 2 हजार मुस्लिम इकट्ठा किए गए और अलग-अलग ट्रकों मे लाए गए थे आरोप है कि इनमें से 40 से ज्यादा मुस्लिमों को पीएसी के जवानों को सौंपा दिया गया था जो पीले रंग के एक ट्रक में इन्हें लेकर गाजियाबाद की तरफ गए.

 

पीड़ितों के परिवारवालों के मुताबिक इनको यही लगा था कि इन्हें जेल भेजा जा रहा है लेकिन आरोप है कि 42 लोगों गोली मार दी गई थी जिनके शव गंगनहर में मिले थे. इस मामले में पीएसी के 19 लोगों को आरोपी बनाया गया था जिनमें से तीन लोगों की सुनवाई के दौरान मौत हो गई जबकि बाकी 16 लोगों को तीस हजारी कोर्ट ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया.

 

हाशिमपुरा नरसंहार की जांच सीबीसीआईडी की टीम को सौंपी गई थी और आरोपियों के खिलाफ सबूत जुटाने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की थी लेकिन राज्य सरकार तो मारे गये सभी लोगों के नाम तक नहीं बता पाई . पीड़ितों की वकील रेबेका जॉन का दावा है कि मौत की वो गाड़ी ही आरोपियों के खिलाफ पुख्ता सबूत बन सकती है .

 

हाशिमपुरा के कई घरों में आज भी जख्म हरे हैं निशान दिल पर भी हैं और जिस्म पर भी. हाशिमपुरा उस खौफनाक दर्द की गवाही दे रहा है लेकिन सबूत के अभाव में कानून दोषियों को सजा नहीं दे पाया.

 

हाशिमपुरा के रहने वाले जमालुद्दीन के बेटे कमरुद्दीन भी उन 42 लोगों में शामिल थे जिनकी हत्या हुई थी. उस वक्त कमरुद्दीन की उम्र महज 21 साल थी और उनकी शादी को सिर्फ तीन महीने हुए थे. उस दिन की बात कर आज भी कमरुदीन का परिवार सिहर उठता है. जमालुद्दीन का कहना है कि बच्चों और बूढ़ों को सेना ने छोड़ने का आदेश दिया था लेकिन उन्हें छोड़ा नहीं गया उनमें से 40-50 ऐसे लोगों को चुना गया जो मजबूत कद काठी के थे. उनमें से कमरुद्दीन भी था.

 

ज़ेबुन्निशा को उसी दिन बेटी हुई थी पर उनके शौहर मोहम्मद इकबाल अपनी बेटी को देख पाते उससे पहले ही उन्हें घसीट ले जाया गया.

 

मौत के लिए सिर्फ मजबूत युवाओं को चुना गया था लेकिन 60 साल के अब्दुल कदीर को सिर्फ इस लिए चुन लिया गया क्योंकि उनकी कद काठी मजबूत थी.

 

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Web Title: hashimpura massacre
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