क्यों महिला नौसैनिक अधिकारियों को 14 साल बाद घर भेज दिया जाता है: कोर्ट

By: | Last Updated: Wednesday, 9 September 2015 4:43 AM
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नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने पूछा है कि क्यों प्रशिक्षित महिला नौसैनिक अधिकारियों को सेवा के 14 साल बाद घर भेज दिया जाता है जबकि उनके पुरुष समकक्ष 60 साल तक नौकरी कर सकते हैं. कोर्ट ने कहा कि अगर यह लैंगिक भेदभाव नहीं तो और क्या है.

 

कोर्ट ने कहा कि पिछली गणतंत्र दिवस परेड में सरकार महिला शक्ति को दिखाकर गर्व महसूस कर रही थी लेकिन हकीकत में तस्वीर बिल्कुल जुदा है क्योंकि महिला अधिकारियों को अब भी लड़ाकू यूनिट में शामिल होने की अनुमति नहीं है, जबकि इस्राइल और अमेरिका में स्थिति इसके विपरीत है.

 

कोर्ट ने कहा, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत ने महिलाओं को सशस्त्र बलों के लिए आवेदन करने की अनुमति देकर बड़ा कदम उठाया लेकिन देश सैन्य इकाइयों की कमान में महिलाओं को रखने के मामले में अब भी कई देशों से पीछे है.’ कोर्ट ने कहा, ‘‘यह उचित समय है कि हम महिलाओं के प्रति अपने रवैये में बदलाव करें.’’

 

न्यायमूर्ति कैलाश गंभीर और न्यायमूर्ति नजमी वजीरी की पीठ ने कहा, ‘‘इन याचिकाकर्ताओं (17 महिला नौसैनिक अधिकारी) के साथ पुलिस अधिकारियों ने इसी तरह का प्रशिक्षण लिया था और 14 साल तक सेवा दी लेकिन स्थायी कमीशन नहीं दिया जबकि उनके पुरुष साथियों  और बैच के साथियों को स्थायी कमीशन दिया गया क्योंकि वह पुरष हैं इसके अलावा उनके पक्ष में कोई विशेष बात नहीं है. अगर यह लैंगिक भेदभाव नहीं है तो और क्या हो सकता है.’’

 

पीठ ने कहा, ‘‘14 साल तक काम करने के बाद उन्हें स्थायी कमीशन से वंचित करने का कोई कारण नहीं था. अगर हम किसी महिला को 14 साल तक एक खास पद पर काम करने, वेतन पाने और गैर लड़ाकू क्षेत्र (साजो-सामान) या किसी अन्य शाखा में पदोन्नत कर सकते हैं तो क्यों हम 14 साल बाद उन्हें घर भेजें जबकि उनके पुरुष समकक्ष 60 साल तक काम कर सकते हैं.’

 

महिला नौसैनिक अधिकारियों को बड़ी राहत देते हुए हाई कोर्ट ने शुक्रवार को बल में स्थायी आयोग की मांग करने वाली कई याचिकाओं को विचारार्थ स्वीकार कर लिया था. कोर्ट ने कहा था कि लैंगिक पूर्वाग्रह और सेवा पूर्वाग्रह को महिलाओं की प्रगति को बाधित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी.

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