वक़्त की दौड़ में हार गईं एचएमटी घड़ियां, जल्द होंगी बंद!

By: | Last Updated: Thursday, 11 September 2014 8:48 AM
HMT loses race against time, to be shut soon

नई दिल्ली: दुनिया का दस्तूर है…  वक़्त की रेस को जीतना होगा… लेकिन अपनी दौड़ बरकरार रखना कभी-कभी मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी होता है और यही रेस एचएमटी घड़ियों पर भारी पड़ रही हैं. कभी इन घड़ियों का ऐसा जलवा था कि हज़ारों हाथों पर सजकर न सिर्फ समय बताती थी, बल्कि पहने वाले का मान-सम्मान बढ़ाती थीं, लेकिन अब जल्द ही ये इतिहास बन जाएगी.

 

सरकार ने एचएमटी घड़ियों का उत्पादन बंद करने का फैसला किया है. सरकार ऐसा इसलिए करने जा रही है क्योंकि साल 2000 से ही  ये कंपनी घाटे में चल रही है. कंपनी की हालत इतनी खराब है कि अब वे अपने कर्मचारियों की तनख्वाह भी नहीं दे पा रही है.

 

आपको बता दें कि साल 1961 में एचएमटी जापानी कंपनी कंपनी सिटिज़न वॉच की मदद से खड़ी की गई थी. लेकिन वक़्त की मार ऐसी पड़ी कि साल 2012-13 में कंपनी का घाटा 242.47 करोड़ तक पहुंच गया. अब आलम ये है कि कंपनी करीब 700 करोड़ के नुकसान का सामना कर रही है.

 

एचएमटी के एक बड़े अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “सरकार ने एचएमटी वॉच और एचएमची चिनार वॉच लिमिटेड को बंद करने का फैसला किया है. बोर्ड ऑफ रिकंस्ट्रक्शन ऑफ पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज ने इसकी सिफारिश की है और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने अपनी सहमति जताई है.”

 

अधिकारियों का कहना है कि कंपनी के बंद करने काम तेज़ी से आगे बढ़ रहा है.

 

घाटे की शुरुआत

 

साल 2000 में एचएमटी वॉच बिजनेस ग्रुप की एचएमटी वाचेज लिमिटेड के रूप में पुनर्सरचना की गई, लेकिन इससे काम नहीं चला और कंपनी थोड़े दिनों बाद ही घाटे में चलने लगी. इसके बाद पुनरूद्धार कार्यक्रम शुरू किया गया. फिर भी बात नहीं बनी और घाटे बदस्तूर जारी रहे.

 

एचएमटी वाचेज की चार यूनिट हैं इनमें से दो कर्नाटक के बेंगलुरू और टुमकुर में है जबकि एक अन्य उत्तराखंड के रानीबाग में हैं. साल 2013 के अंत तक कंपनी में 1105 स्टाफ थे. 

 

एचएमटी चिनार की दो यूनिट है और ये जम्मू और श्रीनगर में है.

 

क्या है एचएमटी में खास

 

जब 1961 में एचएमटी की घड़ी बाज़ार में उतारी गईं तो इसकी जबरदस्त मांग थी. साल 1990 तक देशभर में इसका ये जलवा था कि हर आम-व-खास को ये घड़ियां तोहफे में दी जाती थीं. इस घड़ी ने अपने ग्राहकों से ऐसा रिश्ता कायम किया कि बहुत से लोग इसके दीवाने हो गए.

 

एचएमटी घड़ियों को लेकर गांवो में अनेक किस्से भी मशहूर हुए. एक ज़माने में भारत के गांव-गांव में ये किस्से खूब मशहूर रहे कि दुल्हे को खुश रखना है तो तोहफे में एचएमटी घड़ी जरूर दें. लेकिन एक सच तो जरूर है कि 1961 से लेकर 1990 तक जहां भी शहनाई बजी होगी या मंडप सजा होगा.. अगर बात घड़ियों की हुई होगी तो इन घड़ियों के बिना वो अधूरी रही होंगी.

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