IB के पूर्व अधिकारी पर मुकदमा चलाने की मंजूरी देने से गृह मंत्रालय का इंकार

By: | Last Updated: Monday, 8 June 2015 2:50 PM

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने गुजरात के चर्चित इशरत जहां फर्जी मुठभेड मामले में खुफिया ब्यूरो (आईबी) के पूर्व अधिकारी राजेन्दर कुमार और उनके तीन सहयोगियों पर मुकदमा चलाने की केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की मांग को मानने से इंकार कर दिया है. इससे मामले की जांच पर ‘ब्रेक’ लग सकता है. चारों ही अधिकारियों पर आपराधिक साजिश का आरोप है.

 

कुमार और तीन अन्य आरोपियों के लिए यह राहत की खबर है क्योंकि केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने आज कहा कि 11 साल पुराने इस मामले में तथ्यों, हालात और उपलब्ध रिकाडो’ एवं दस्तावेजों की जांच के बाद मुकदमा चलाने की मंजूरी नहीं दी गयी. सीबीआई ने कुमार पर हत्या का आरोप भी लगाया था.

 

गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा, ‘‘तथ्यों, हालात और मामले के संबंध में मंत्रालय को उपलब्ध दस्तावेजों की विस्तृत जांच के बाद मंजूरी नहीं दी गयी.’’ सरकारी सूत्रों ने बताया कि सीबीआई केवल हालात से जुडे साक्ष्यों पर निर्भर कर रही थी और मुकदमा चलाने की मंजूरी देने के लिए इसे आधार नहीं बनाया जा सकता.

 

कुमार रिटायर्ड विशेष निदेशक हैं. वह और आईबी के तीन अन्य अधिकारी इशरत जहां तथा तीन अन्य की हत्या के पीछे की साजिश में कथित तौर पर शामिल थे. इशरत की मां का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील ने कहा कि सरकार के फैसले को चुनौती दी जाएगी.

 

इशरत की मां शमीमा कौसर की ओर से पेश हुए वकील आईएच सैयद ने अहमदाबाद में कहा, ‘‘वकील वृन्दा ग्रोवर नहीं है. उनके लौटने के बाद मैं आगे की कार्रवाई के बारे में तय करूंगा. लेकिन सामान्य तौर पर इसे चुनौती दी जाएगी.’’ सैयद के मुताबिक केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने चूंकि सीबीआई को मंजूरी नहीं दी है इसलिए राजेन्दर कुमार, एम के सिन्हा, टी मित्तल और राजीव वानखेडे के खिलाफ आरोप नहीं तय किये जा सकते.

 

सीबीआई ने इस मामले में अपनी अंतिम रिपोर्ट गृह मंत्रालय को दो साल पहले सौंप दी थी. गृह मंत्रालय ही आईबी अधिकारियों का नियंत्रक मंत्रालय है. सूत्रों ने बताया कि सीबीआई और गृह मंत्रालय के बीच कई दौर की बातचीत के बाद हाल ही में अंतिम फैसला किया गया.

 

आईबी के पूर्व निदेशक आसिफ इब्राहिम ने अपने कार्यकाल के दौरान उक्त अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के किसी भी कदम का विरोध किया था. इब्राहिम का कार्यकाल पिछले साल दिसंबर में समाप्त हो गया था.

 

अहमदाबाद के बाहरी इलाके में 2004 में मुठभेड के दौरान मुम्ब्रा कालेज की 19 वर्षीय छात्रा इशरत और तीन अन्य के मारे जाने के मामले में कुमार और तीन अन्य पर मुकदमा चलाने की मंजूरी नहीं देने के फैसले के बारे में गृह मंत्रालय की ओर से सीबीआई को अवगत करा दिया गया है.

 

कुमार 1979 बैच के आईपीएस अधिकारी थे. वह दो साल पहले ही रिटायर हुए हैं. वह अहमदाबाद में उस समय आईबी में संयुक्त निदेशक पद पर तैनात थे, जब कथित मुठभेड़ हुई थी, जिसमें इशरत मारी गयी थी. आईबी के पूर्व अधिकारी से सीबीआई ने उनकी कथित भूमिका को लेकर दो बार पूछताछ की.

 

इस बीच कांग्रेस नेता और पूर्व गृह राज्य मंत्री आरपीएन सिंह ने गृह मंत्रालय के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए इसकी आलोचना की है. उन्होंने कहा कि इससे आम आदमी को न्याय देने की प्रक्रिया पर सवाल खडे होते हैं.

 

एक अन्य कांग्रेस नेता शक्तिसिंह गोहिल ने भी फैसले की आलोचना की है.पिछले साल फरवरी में सीबीआई ने मामले में दूसरा आरोपपत्र दाखिल किया था, जिसमें कुमार और उनके तीन सहयोगियों पर हत्या और साजिश का आरोप तय किया गया था.

 

कुमार पर हत्या, आपराधिक साजिश, हत्या के इरादे से अपहरण और अवैध ढंग से किसी को बंधक बनाने के आरोप लगे थे. आम्र्स एक्ट के तहत भी उन पर आरोप तय किये गये थे. कुमार के बाकी तीन साथियों पर हत्या को छोड अन्य धाराओं में आरोप तय किये गये थे. आरोपपत्र अहमदाबाद की विशेष सीबीआई अदालत में दाखिल किया गया था.

 

सीबीआई सूत्रों का कहना था कि उनके पास इस बात के साक्ष्य हैं कि कुमार उन अधिकारियों में से एक थे, जिन्होंने इशरत से उस समय पूछताछ की थी, जब गुजरात पुलिस ने उसे कथित रूप से अवैध हिरासत में लिया था. खबर है कि कुमार से लंबी पूछताछ की गयी थी.

 

रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी पर आरोप है कि उन्होंने यह खुफिया खबर दी थी कि लश्कर आतंकवादियों का एक समूह गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को निशाना बनाने के लिए अहमदाबाद आ रहा है.

 

लगभग सभी आरोपियों को अदालत से जमानत मिल गयी है. आईपीएस अधिकारी डी जी वनजारा और पीपी पाण्डेय को फरवरी में जमानत दी गयी. एक अन्य आरोपी एन के अमीन को गुजरात के गृह विभाग ने बहाल कर दिया है.

 

मुठभेड में इशरत जहां, उसका मित्र प्राणेश पिल्लै उर्फ जावेद शेख तथा दो संदिग्ध पाकिस्तानी अमजद अली राणा और जीशान जौहर को गुजरात पुलिस की अपराध शाखा के अधिकारियों ने मार गिराया था. उस समय अपराध शाखा का दावा था कि चारों लश्कर ए तय्यबा के सदस्य थे, जो मुख्यमंत्री मोदी को मारने के इरादे से गुजरात आये थे.

 

आईबी अफसरों पर मुकदमे से गृह मंत्रालय की ना को चुनौती दे सकता है इशरत का परिवार

 

इशरत जहां का परिवार कथित मुठभेड़ मामले में चार आईबी अधिकारियों पर मुकदमा नहीं चलाने के केंद्रीय गृह मंत्रालय के फैसले को चुनौती दे सकता है.

 

इशरत की मां शमीमा कौसर की तरफ से वकील आई एच सैयद ने पीटीआई से कहा, ‘‘मैं वृंदा ग्रोवर से बात करने के बाद फैसला करंगा. लेकिन मूल रूप से इसे चुनौती दी जानी चाहिए.’’

 

वह केंद्र सरकार द्वारा आईबी के चार अधिकारियों पर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं देने के संबंध में पूछे गये सवाल का जवाब दे रहे थे. ये अधिकारी कथित तौर पर इशरत जहां और तीन अन्य की हत्या की साजिश में शामिल थे.

 

सैयद के मुताबिक चूंकि गृह मंत्रालय ने जांच एजेंसी को अनुमति नहीं दी, इसलिए अधिकारियों के खिलाफ आरोप तय नहीं किये जा सकते. इन अधिकारियों में राजेंद्र कुमार, एम के सिन्हा, टी मित्तल और राजीव वानखेड़े शामिल हैं.

 

उन्होंने कहा, ‘‘सीआरपीसी की धारा 197 के तहत अनुमति नहीं दी गयी है इसलिए आरोपियों के खिलाफ आरोप तय नहीं किये जा सकते.’’ सीबीआई द्वारा जमा किये गये दस्तावेजों को पढ़ने के बाद गृह मंत्रालय ने आज पहले आईबी अधिकारियों पर मुकदमे की एजेंसी की अर्जी को खारिज कर दिया था.

 

सीबीआई ने मामले में अपनी अंतिम रिपोर्ट दो साल पहले गृह मंत्रालय को सौंप दी थी जो आईबी कर्मियों के लिए कैडर नियंत्रण वाला मंत्रालय है.

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