व्यक्ति विशेष:  मैं हूं शार्ली

By: | Last Updated: Saturday, 10 January 2015 4:42 PM
I am Charlie Hebdo

ग़म और मायूसी के साथ हर तरफ गुस्सा है. हर चेहरे पर आक्रोश है. हर आंख में सवाल है. हर हाथ में कलम है और हर ज़ुबान पर हैं बस तीन लफ्ज – मैं हूं शार्ली

 

‘शार्ली एबदो’ के कार्टून प्रकाशित करने वाले जर्मन अखबार की इमारत पर हमला  

 

”मैं घुटनों के बल जीने के बजाए खड़े होकर मरना पसंद करूंगा’ . दो साल पहले स्टीफन शार्बोनियर ने एक इंटरव्यू में यह कहा था. वो जानते थे कि एक पत्रकार के तौर पर जो काम वो कर रहे थे उसका अंत उनकी मौत हो सकता है. वही हुआ. एक सुबह रोज की तरह अपने दफ्तर में काम करते हुए फ्रांसीसी व्यंग्य पत्रिका शार्ली एबदो के संपादक स्टीफन शार्बोनियर और उनके 9 साथी आतंकवादियों की गोली का शिकार बन गये. इनमें पत्रिका के मशहूर कार्टूनिस्ट जॉर्ज वोलिंस्की, बर्नर्ड टिग्नोस और ज़ीन कैबू भी शामिल हैं. यह पत्रकार अपने कार्टूनों के ज़रिये दुनिया को हंसाने की कोशिश करते थे लेकिन कुछ सिरफिरों को उनका यह तरीका पसंद नहीं था इसलिए उन्होने न सिर्फ उनकी हंसी बल्कि उनकी जिंदगी भी छीन ली. 

 

पेरिस में मशहूर पत्रिका शार्ली एब्दो के दफ्तर पर आतंकी हमले ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया. दो नकाबपोश आतंकी हथियारों के साथ दफ्तर में दाखिल हुए और चुन-चुन कर बेरहमी से पत्रकारों की हत्या कर दी.

 

गोलियों के शोर ने 10 पत्रकारों की आवाज को हमेशा के लिए खामोश कर दिया. उस सुबह बाहर पेरिस में हड्डी जमा देने वाली सर्दी थी . और मशहूर साप्ताहिक पत्रिका शार्ली एब्दो के दफ्तर के अंदर काम की शुरूआत ही हुई थी. उसी वक्त बाहर, काले कपड़ों और काला मास्क पहने हुए दो आतंकी हथियारों के साथ शार्ली एब्दो के दफ्तर की तरफ बढ़ रहे थे. उनके पास रॉकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड लॉन्चर और राइफल थी. आतंकी एक काले रंग की कार में आए..दो आतंकी बाहर निकले जबकि तीसरा कार में ही था.

 

कार को बीच रास्ते में छोड़कर आतंकी पत्रिका के दफ्तर का पता पूछने लगे. वहां काम कर रहे दो मजदूरों से उन्होंने पता पूछा. पता मिलने के बावजूद आतंकियों ने मजदूर को गोली मार दी.

 

पत्रिका के दफ्तर में दाखिल होने के लिए आतंकी गेट नंबर दस पर पहुंच चुके थे लेकिन ऊपर जाने के लिए गेट पर सिक्योरिटी लॉक था. पत्रिका में काम करने वाली कोरिने रे दफ्तर जाने के लिए गेट के पास अपनी छोटी बच्ची के साथ मौजूद थीं. आतंकियों ने रे से चार अंकों वाला सिक्योरिटी कोड डलवाया और महिला और बच्ची के साथ दफ्तर में दाखिल हो गए. अंदर पहुंचते ही रे अपनी बच्ची के साथ एक टेबल के नीचे छिप गईं.

 

आतंकी पत्रिका के 47 साल के संपादक स्टीफन शारबोनिए को ढूंढ रहे थे. शार्ली एब्दो पत्रिका पैंगबर मुहम्मद के कार्टून छापने को लेकर विवादों में रही है. पत्रिका के संपादक स्टीफन को मारने के लिए 2013 में अल कायदा ने इनाम भी रखा था.

 

आतंकी जब स्टीफन के पास पहुंचे तो दफ्तर में साथी पत्रकारों के साथ एडिटोरियल मीटिंग चल रही थी. वो मीटिंग रूम में पहुंचे और चिल्लाने लगे. शार्ब कहां है. शार्ब कहां है. इसके बाद उन्होंने संपादक समेत पत्रिका के चार कार्टूनिस्टों की हत्या कर दी. आतंकी नाम पूछ-पूछकर गोली चला रहे थे, पत्रिका में काम करने वाली कोरिने रे के मुताबिक वो फ्रेंच में बात कर रहे थे और कह रहे थे कि वो अलकायदा से हैं.

 

गोलियों की आवाज सुनकर जिन्हें भागने का मौका मिला वो छत की तरफ भागे. करीब 20 मिनट तक अंधाधुंध गोलियां बरसाकर 10 पत्रकारों को मारने के बाद आतंकी अल्लाह ओ अकबर और मुहम्मद का बदला ले लिया ये चिल्लाते हुए ऑफिस से बाहर निकल गए.

 

आतंकी जिस कार से आए थे उसमें दोबारा सवार हुए और इस रास्ते से होते हुए भागने की कोशिश करने लगे. रास्ते में पुलिस वैन थी. पुलिस की गाड़ी देखते ही अंधाधुंध फायरिंग करने लगे.

 

आतंकियों ने एक निहत्थे पुलिस अफसर की गोली मारकर हत्या कर दी थी. आतंकी कार से बाहर निकले. यहां जमीन पर एक घायल पुलिस वाला पड़ा हुआ था जो शायद गोली ना चलाने की प्रार्थना कर रहा था लेकिन आतंकियों ने उसके सिर में गोली मार दी.

 

आतंकी दोबारा कार में सवार हुए और तेज रफ्तार में भागते वक्त एक राहगीर को टक्कर मार दी जो गंभीर रूप से घायल हो गया. करीब 3 किलोमीटर आगे जाने के बाद आतंकियों ने अपनी कार छोड़ दी और रेनाल्ट कार को हाइजैक करने के बाद फरार हो गए.

 

गोली चलाने वाले दोनों आतंकियों की पहचान शरीफ काउशी और सईद काउशी के तौर पर हुई है. 34 साल का सईद और 32 साल का शरीफ काउशी दोनों भाई हैं.

 

सईद और शरीफ काउशी की आंतकवादी कार्रवाई यहीं नहीं थमी . शार्ली एबदो पत्रिका से शुरु हुआ आंतकी हमलों का दौर तकरीबन 55 घंटे बाद जा कर थमा . आंतकी भाईयों का ये जोड़ा पेरिस से करीब 80 किलोमीटर दूर एक प्रिंटिग प्रेस जा छुपे . इस दौरान उन्होंने एक  महिला को बंधक बना लिया था .  पुलिस और फ्रांस की सेना के विशेष दस्ते ने Dammartin-en- Goele( डामार्टी ए- गोल) की घेराबंदी कर दी . ये कार्रवाई फ्रासं की अब तक सबसे बड़ी आंतकवाद विरोधी कार्रवाई बन चुकी थी . इस घटना ने पूरी दुनिया को सोचने पर मजबूर कर दिया था . भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस पर ट्वीट कर चिंता जताई .

 

फ्रांस के राष्ट्रपति  फ्रांस्वा ओलांद ने राष्ट्रीय एकजुटता की अपील करते हुए कहा है, हाल के हफ्तों में कई आतंकवादी हमलों को नाकाम किया गया है. अमेरिका ने हमले की सख्त शब्दों में निंदा की जबकि ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने इसे घिनौना करार दिया.

 

 

सईद और शरीफ काउशी भाइयों ने जिस कार्रवाई को अंजाम दिया और जिस तरह से वो  दहशत फैला रहे थे उनमें वो अकेले नहीं थे . इसी दौरान आंतकियों की दूसरी जोड़ी एमदी कॉलीबेल और हयात बॉमद्दीन ने पूर्वी पेरिस के कोशर सुपरस्टोप में 14 लोगों को बंधक बना लिया . हयात बॉमद्दीन , अमिदी कॉलिबली की पत्नी है . अपुष्ट रिपोर्ट के मुताबिक वो मौके से फरार हो गई थी . दोनों आंतकी जोड़ों के तार आपस में जुड़े थे या नहीं इस पर अभी पुख्ता जानकारी नहीं है . लेकिन 14 लोगों को बंधक बनाने वाला आंतकवादी, काउशी भाइयों के समर्थन में बयान देता रहा . उसने काउशी भाइयों के खिलाफ कार्रवाई होने पर अपने बंधकों को मारने की धमकी भी दी . ये भी माना जाता है इन चारों को एक आंतकी ने ब्रेनवाश किया है . फ्रांसीसी अखबार ली मोंडे के मुताबिक कॉलीबेली, शऱीफ और सईद का ब्रेनवाश करने वाला आंतकी जमान वगेल है . 

 

इस घटना ने दुनिया भर के लोगों को आंतकवाद के खिलाफ एकजुट कर दिया था . एक तरफ काउशी भाइयों के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी चल रही थी और दूसरी तरफ आंतकवाद के खिलाफ लोग खड़े हो रहे थे. अभिव्यक्ति की आजादी के लिये खड़े हो रहे थे . इनमें हर धर्म के लोग थे . दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी ने नेता और पूर्व मंत्री हाजी याकूब कुरैशी ने शार्ली एबदो के हमलावारों को 51 करोड़ का इनाम देने का एलान कर दिया . याकूब कुरैशी के बयान की भारत में कड़ी निंदा हुई . दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश की पुलिस ने कुरैशी के खिलाफ एफआईआऱ दर्ज कर लिया है .

 

लेकिन जैसा की अक्सर होता है . आंतक का अंत पेरिस में भी हिंसक हुआ . पुलिस और फ्रांस की पुलिस के विशेष दस्ते ने Dammartin-en- Goele( डामार्टी ए- गोल) की घेराबंदी कर रखी थी . फ्रेंच विशेष दस्ते ने अपनी कार्रवाई शुरु की . पूरा इलाका छावनी में तब्दील हो चुका था . आसमान में हेलीकॉप्टर मंडरा रहे थे और जमीन पर. इमारतों की छतों पर पुलिस का विशेष दस्ता स्नाइपर राइफलों के साथ तैनात था . शाम ढली . और कार्रवाई शुरु हुई . आंतकी भाइयों को सरेन्डर करने को कहा गया . वो माने नहीं ..और अंधाधुध फायरिंग करते हुये बाहर निकले . पुलिस की तरफ से जवाबी कार्ररवाई हुई . दोनों भाई पुलिस की गोलियों से मारे गये . 

 

ऐसा ही अंत अमिदी कॉलिबली का भी हुआ . पुलिस कार्रवाई में एमदी मारा गया . लेकिन गोली बारी में उसके चार बंधकों की भी मौत हो गई .   

 

अब सवाल ये है कि काउशी भाई जिनकी परवरिश फ्रांस जैसे देश में हुई उन्हें कट्टरता की घूंट किसने पिलाई. दोनों भाइयों का जन्म अल्जीरियाई मूल की दंपत्ति से पेरिस मे हुआ था . हलांकि बाद में उनका पालन पोषण उत्तर फ्रांस के एक अनाथालय में हुआ था . 32 वर्षीय शरीफ़ को 2008 में जेल हुई थी और पुलिस उन्हें लंबे समय से चरमपंथी इस्लामी गतिविधियों के लिए जानती थी . शरीफ़ को अबू इसेन के नाम से भी जाना जाता था और वह बट्स-साउमॉट नेटवर्क से जुड़ा था .यह नेटवर्क इराक़ में अल-क़ायदा के लिए जिहादी भेजने का काम करता है . शरीफ़ फ्रांस के पश्चिमी शहर रेनेस के अनाथालय में पले बढ़े थे जहां वह एक फिटनेस कोच के रूप में ट्रेन्ड था .

 

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक वह अपने बड़े भाई के साथ रहने लगे और पिज़्ज़ा डिलिवरी ब्वॉय के रूप में काम करते थे .पुलिस ने 2005 में शरीफ को उस वक़्त हिरासत में लिया था जब वह सीरिया जाने वाले थे .उस वक़्त इराक़ में अमरीकी फ़ौज के ख़िलाफ़ जिहादियों के भर्ती होने का यही रास्ता था .फ्रांसीसी अख़बार ‘ली माँड’ की रिपोर्ट के मुताबिक़ शरीफ़ को जनवरी 2005 से 2006 तक जेल में रखा गया था जिस दौरान वह पहली बार जमाल बेग़ाल के संपर्क में आए .बेग़ाल को पेरिस में अमरीकी दूतावास पर बम लगाने की योजना बनाने के कारण 10 साल की सज़ा हुई थी. 2008 में शरीफ़ को चरमपंथियों को इराक़ भेजने के मामले में तीन साल की सज़ा हुई थी लेकिन उनकी 18 महीने की सज़ा निरस्त हो गई थी. फ्रांस के आतंकरोधी पुलिस के मुताबिक़ शरीफ़ का नाम 2010 में एक अन्य इस्लामी कट्टरपंथी समीन एत अली बल्कासम को जेल से बाहर निकालने की योजना बनाने से भी जुड़ा था . इस मामले में उनके भाई 34 साल के सईद क्वाशी का नाम भी शामिल था लेकिन सबूतों के अभाव में दोनों भाइयों को अभियुक्त नहीं बनाया गया.

 

34 साल के बड़े भाई सईद काउशी साल 2011 में अल- कायदा का गढ़ माने जाने वाले देश यमन गया था. उसने वहां कई महीने गुजारे थे . इस दौरान वह अल कायदा में शामिल हो गया था और ट्रेनिंग भी ली थी .

 

फ्रांस को निशाना क्यों बनाया गया . शार्ली एबदो के बहाने साजिश रचने वाले क्या हासिल करना चाहते थे . ये एक बड़ा सवाल है . काउशी बंधुओं ने खुद को अल-कायदा का सदस्य बताया था . अल कायदा अरसे से फ्रांस के मुस्लमानों में घुसपैठ करने की कोशिश करता रहा है . लेकिन आंतकवाद तो दूर फ्रांस के ज्यादातर मुसलमान राजनीति से भी दूर रहते हैं . फ्रांस में तकरीबन 50 लाख मुसलमान हैं . जिनमें ज्यादातर तरक्की पसंद और सेक्यूलर मानसिकता के लोग हैं . जानकारों के मुताबिक अल-कायदा इन हमलों से फ्रांस के इन मुस्लमानों के खिलाफ लोगों को उकसाना चाहता है . आतंकी हमलो के बाद आम फ्रांसिसी , मुसलमानों पर हमले करें . परेशान करे और उसके बाद हिंसा –प्रतिहिंसा का दौर शुरु हो . 

 

फ्रांस में पिछले कई दशकों में यह सबसे बड़ा आतंकी हमला था. 12 लोगों की हत्या सिर्फ इसलिए की गयी क्योंकि आतंकी उनके विचारों से सहमत नहीं थे. लेकिन क्या विचारों की जंग, बंदूकों और गोलियों से लड़ी जायेगी ? जाहिर है कोई भी इसे सही नहीं ठहरा सकता. शार्ली एबदो पत्रिका इसी मानसिकता के खिलाफ लड़ रही थी.  

 

व्यंग्य और कार्टूनों के लिए मशहूर साप्ताहिक पत्रिका है शार्ली एबदो हर बुधवार को छपती है. ये पत्रिका अपने कार्टूनों के जरिये हर तरह के कट्टरपंथ का विरोध करती रही है. उस पर विवादित कार्टून छापने के आरोप पहले भी लगे. फिर चाहे वो किसी भी धर्म से जुड़ा ही क्यों न हो. जिस दिन आतंकियों ने इसके दफ्तर पर हमला किया उस दिन भी सुबह मैगजीन के ट्विटर पर आईएस के सरगना बगदादी का कार्टून पोस्ट किया गया था.

 

शार्ली एब्दो पत्रिका की शुरूआत 1969 में हारा किरी एबदो के नाम से हुई थी. लेकिन 1970 में देश के पूर्व राष्ट्रपति की मौत पर व्यंग करने की वजह से सरकार ने इस पर रोक लगा दी. उसके बाद ही पत्रिका ने अपना नाम बदलकर शार्ली एबदो कर लिया. 1981 में पाठकों की गिरती संख्या की वजह से इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा. करीब 11 साल तक बंद रहने के बाद 1982 में एक बार फिर शार्ली एबदो का प्रकाशन शुरू हुआ. उसके बाद धीरे धीरे यह फ्रांस की सबसे लोकप्रिय व्यंग्य पत्रिका बन गई.

 

अपने जन्म के साथ ही विवादों से जुड़ी यह पत्रिका पहली बार तब आतंकियों के निशाने पर आयी जब इसने डेनमार्क की मैगजीन में छपे पैगंबर मोहम्मद के कार्टून को छापा. यही नहीं नवंबर 2011 में इसने अपना विशेष संस्करण शरिया एबदो के नाम से निकाला जिसके बाद इसके दफ्तर के बाहर हमला हुआ. जब पत्रिका के दफ्तर पर हमला हुआ था. पेट्रोल बम फेंककर आग तक लगा दी गई थी. लेकिन इसके बाद भी किसी ने हिम्मत नहीं हारी.

 

पैगंबर मोहम्मद का कार्टून प्रकाशित करने के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति जैक शिराक ने इसकी निंदा की थी लेकिन पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने तब भी पत्रिका का समर्थन किया था. 2011 में भी फ्रांस के प्रधानमंत्री ने पत्रिका पर सेंसर लागू करने से इंकार कर दिया था. लेकिन 2013 में अलकायदा ने पत्रिका के पत्रकारों को जान से मारने की धमकी दी. इसके बावजूद पत्रिका के संपादक और कार्टूनिस्ट अपने काम में लगे रहे.

 

इतने बड़े हमले के बाद भी पत्रिका के बचे हुए पत्रकार बंदूक के आगे अपनी कलम झुकाने के लिए तैयार नही हैं. पत्रिका ने अगले बुधवार के अंक को प्रकाशित करने का फैसला किया है. शार्ली एबदो के कॉलमिस्ट पैट्रिक पैलोक्स ने एक बयान में कहा कि यह बहुत मुश्किल है. हम सभी दुखी हैं, डरे हुए हैं, लेकिन हम इसे इसलिए छापेंगे क्योंकि बेवकूफी जीत नहीं सकती.

 

इस आतंकी हमले ने बड़ा सवाल ये भी खड़ा किया है कि धर्म के नाम अधर्म कब तक होगा. क्या अब ऐसे कत्लेआम से लोकतंत्र का चौथा खंभा कहे जाने वाले मीडिया की आवाज को रोका जाएगा.

 

दूसरी तरफ शार्ली एबदो आ्रंतकवाद के खिलाफ . हर जोर जुल्म के खिलाफ . लड़ाई का प्रतीक बन गया है .  बोलने की आजादी ..लिखने की आजादी ..के लिये कलम के सिपाही साथ खड़े है . कलम की स्याही . गोलिय़ों के डर से सूखी नहीं है . इन बातों का सबूत खुद शार्ली एबदो के पत्रकार दे रहे हैं .शार्ली एबदो का दफ्तर हमले में जल गया था तो फ्रेंच समाचार पत्र लिबरेशन ने शार्ली एबदो को अपनी जगह पत्रिका चलाने के लिये दे दी है. शार्ली एबदो अपनी अगली प्रति बुधवार को प्रकाशित करने जा रहा है . इसे सर्वाइवर इश्यू का नाम दिया गया है . आमतौर पर इस पत्रिका की 60 हजार प्रतियां प्रकाशित होती थीं. लेकिन इस बार दस लाख प्रतियां प्रकाशित होने जा रही हैं . अगले अंक के प्रकाशन में लगे पत्रकारों का साथ देने खुद फ्रांस के प्रधानमंत्री मानुएल वाल्स और कल्चर मिनिस्टर पत्रिका के अस्थाई दफ्तर पहुंच गये . ताकि आंतकवाद के खिलाफ लड़ाई को अकेला महसूस ना करे .

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