‘FIR दर्ज कराने के लिए अदालत जाना पड़े तो ये शर्मनाक है’

By: | Last Updated: Thursday, 16 April 2015 1:55 AM
if one has to go to the court for an fir, it’s shameful

फ़ाइल फ़ोटो: राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया

मेरठ: राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया ने कहा कि प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कराने के लिए लिए अगर पीड़ित को आयोग या न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़े इससे बड़ी शर्म की बात है और कोई नहीं हो सकती. पीएल पुनिया यहां मेरठ मंडल से संबधित दलित उत्पीड़न के मामलों की समीक्षा करने के बाद संवाददाताओं से बातचीत कर रहे थे.

 

पुनिया ने कहा कि कई जगह उत्पीड़न के मामलों को लेकर ऐसी शिकायतें सामने आई कि पुलिस ने पीड़ित की एफआईआर दर्ज नहीं की. उन्होंने पूछा कि एफआईआर के लिए भी क्या आयोग को आना पड़ेगा .

 

उन्होंने कहा कि नियम है कि पहले एफआईआर दर्ज हो फिर विवेचना. लेकिन पुलिस विवेचना की बात कह कर पीड़ित को थाने से टरका देती है जिससे पीड़ित को आयोग या अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर होना पड़ता है.

 

उन्होंने कहा कि ऐसे मामले बेशक कम हैं लेकिन जितने भी हैं संबंधित थाने के लिए काला धब्बा होते हैं. पुनिया ने आरोप लगाया कि गुंडा एक्ट का दुरूपयोग होता है और पुलिस बीट कांस्टेबल की रिपोर्ट के आधार पर ही किसी भी शरीफ व्यक्ति पर गुंडा एक्ट लगा देती है.

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Web Title: if one has to go to the court for an fir, it’s shameful
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