IN DEPTH: औरंगजेब फिर दफन!

By: | Last Updated: Thursday, 3 September 2015 5:35 PM
in depth about aurangzeb road

नई दिल्लीः दिल्ली की पहचान इंडियागेट के करीब से गुजरने वाली औरंगजेब रोड का नाम एपीजे अब्दुल कलाम रखने के फैसले साथ ही एक बहस खड़ी हो गई है और एक बड़ा विरोध भी. अब आसिफ मोहम्मद खान ने जामियानगर से कालिंदीकुंज जाने वाली रोड का नाम औरंगजेब रोड रख दिया है, ऐसी प्रतिक्रिया इसलिए आई है क्योंकि अंग्रेजी हुक्मरानों के नाम वाली सड़कों का नाम तो पहले भी बदला जाता रहा है लेकिन ये पहला मौका है कि जब दिल्ली में किसी मुगल शासक के नाम वाली सड़क को नया नाम दिया गया है. क्या दिल्ली की सड़कों के नाम का इतिहास से वाकई कोई लेना-देना है. एबीपी न्यूज ने की इस मुद्दे की पड़ताल-

 

राजधानी दिल्ली की पहचान इंडिया गेट से निकलने वाली 6 सड़कों में से एक औरंगजेब रोड हुआ करती थी लेकिन इसका नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड कर दिया गया है.

 

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की तमाम सड़कों, चौराहों, गलियों, कॉलोनियों और पार्कों का नामकरण भारत सरकार के गृह मंत्रालय के उन दिशानिर्देशों से बंधा हुआ है जो 1975 में जारी किए गए थे.

 

नामकरण के दिशानिर्देश 13022/34/74 में साफ तौर पर लिखा है कि गलियों/ सड़कों के नाम में बदलाव ना सिर्फ जनता और पोस्ट ऑफिसों के लिए भ्रम पैदा करता है बल्कि लोगों के बीच इतिहास की समझ को कम करता है. इसलिए ये फैसला किया गया है कि गलियों/सड़कों के मौजूदा नाम नहीं बदलने चाहिए.

 

सरकार का इंकार और इंकार की वजह बनने वाला ये नियम बार-बार आड़े आता रहा. तब भी जब साल 2014 के दिसंबर महीने में बीजेपी ने एनडीएमसी को एक चिट्ठी लिखकर औरंगजेब रोड का नाम बदलकर गुरु गोविंद सिंह रोड रखने की मांग की. और तब भी जब दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने औरंगजेब रोड का नाम बदलकर गुरु तेग सिंह बहादुर मार्ग रखने की मांग की. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ.

 

पूर्वी दिल्ली सीट से बीजेपी सांसद महेश गिरी ने मोदी सरकार से औरंगजेब रोड का नाम एपीजे अब्दुल कलाम रोड रखने की प्रार्थना की और चंद हफ्तों में ही औरंगजेब रोड का नाम एपीजे अब्दुल कलाम रोड कर दिया गया. औरंगजेब रोड का नाम बदलने की मांग के पीछे दिया गया तर्क भी जान लीजिए

 

वह दमनकारी और क्रूर था और अत्याचारों में लिप्त था. उसके नामकरण से भावी पीढ़ियों में गलत संदेश जाएगा. कलाम के सम्मान में सड़क का नाम बदलने से इतिहास की एक गलती को सही में बदला जा सकेगा.

 

नई दिल्ली क्या वाकई इतिहास से कोई गलती हुई थी? इस अचानक हुए बदलाव का मकसद क्या वाकई किसी ऐतिहासिक भूल को सुधारना था. एक बड़ा सवाल है और जवाब बहुत उलझे हुए. लेकिन एक बात जान लेनी बेहद जरूरी है वो ये कि दिल्ली के जिस हिस्से में वो सड़क मौजूद है उसका इतिहास महज 104 साल पुराना है. उसी इतिहास की एक सुलझी हुई तस्वीर आपको जवाब के करीब ले जाएगी.

 

सोलहवीं शताब्दी से 19 वीं शताब्दी के बीच मुगल शासकों के इतिहास में जिस दिल्ली का जिक्र होता है वो दरअसल पुरानी दिल्ली है. जिसकी पहचान है लाल किला और उसके आसपास का इलाका. पुरानी दिल्ली का नाम था शाहजहांनाबाद और इसे वॉल्ड सिटी कहा जाता था. मुगल शासक शाहजहां ने 1638 में लालकिला बनवाया और मुगल सल्तनत का तख्तोताज आगरा से दिल्ली ले आया गया. अंग्रेजों की गुलामी का दौर शुरू होने के बाद 1857 में आजादी की पहली लड़ाई छिड़ी. मुगल शासक अपनी सत्ता और सत्ता के केंद्र लालकिले को अंग्रेजों के हाथों हार गए.

 

लेकिन तब भी अंग्रेज हुकूमत ने दिल्ली और दिल्ली के तख्त लालकिला को जेल में तो बदल दिया, राजधानी नहीं बनाया. करीब 54 साल बाद दिल्ली को अंग्रेजी हुकूमत की राजधानी बनाने का फैसला हुआ. लेकिन पुरानी दिल्ली में नहीं बल्कि आज से 104 साल पहले एक नई दिल्ली बसाई गई.

 

साल 1911

दिल्ली शहर की हदें महज इस पुरानी दिल्ली तक ही सिमटी हुई थीं. चांदनी चौक इस शहर की जान हुआ करता था. सिविल लाइंस, कश्मीरी गेट और दरियागंज में शहर के अमीर लोग रहते थे और पुरानी दिल्ली के चारों ओर अगर कुछ था तो सिर्फ घनघोर जंगल.अंग्रेज शासकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कम से कम समय में वायसराय और सरकार चलाने और बनाने के लिए काउंसिल हाउस बनाने की.

 

नए शहर को बनाने के लिए ब्रिटिश सरकार को बड़ी तादाद में जमीन की तलाश थी. ब्रिटिश सरकार की नजर पुरानी दिल्ली से कई कोस दूर अरावली की पहाड़ियों के बीच बसे एक गांव पर पड़ी- नाम था रायसीना.

 

जंगलों के बीच बसा रायसीना एक गांव था तब यहां घने जंगल में भेड़िये, चीते घूमते थे और सावन में मोर बोलते थे.

नई दिल्ली बसाने के लिए शहर के प्लानर को रायसीना की पहाड़ियों से बेहतर कोई और जमीन नजर नहीं आई. रायसीना की पहाड़ियों पर कई छोटे-छोटे गांव बसे थे जिनमें मालचा, टोडापुर, अलीगंज, पिल्लंजी, जयसिंहपुरा और  कुशक अहम थे. रायसीना की पहाड़ी पर बसे गांवों की जमीन का अधिग्रहण किया गया और उसी पर खड़ी हुई सिटी प्लानर लुटियन और हर्बर्ट बेकर की नई दिल्ली. नई दिल्ली बसी लेकिन उजड़े रायसीना की पहाड़ी पर बसे गांव के लोग.

 

ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियन ने एक नया शहर बसा दिया था. उस दौर में इसका केंद्र था अंग्रेज हुक्मरान यानी वायसरॉय का घर यानी वायसरॉय हाउस और उनकी सत्ता का प्रतीक सेक्रेटेरिएट और कौंसिल हाउस.

 

वॉयसराय हाउस के सामने जाने वाले रास्ते को किंग्सवे कहा जाता था और इसके ठीक सामने एक छतरी के नीचे ब्रिटेन के बादशाह किंग जॉर्ज पंचम की मूर्ति लगाई गई थी.

 

साल 1917 में प्रथम विश्व युद्ध में मारे गए लोगों की याद में ऑल इंडिया वॉर मेमोरियल बनाया गया. साल 1931 में इसका उद्घाटन किया गया. इन सभी अहम इमारतों के बीच योजनाबद्ध तरीके से सड़कों का जाल बिछाया गया

 

अंग्रेज हुक्मरानों ने उस दौर में अपने लिए नई दिल्ली को बसाया था लेकिन दिल्ली के इतिहास से जुड़े हर पन्ने को गुलाम भारत की राजधानी नई दिल्ली में जगह देने से परहेज नहीं किया. दिल्ली पर शासन करने वाले हर हुक्मरान को किसी ना किसी तरह याद रखा गया. सबसे अहम तरीका था सड़कों, गलियों, चौराहों और इमारतों का नामकरण.

जरा इतिहास को समेटने की ये कोशिश देखिए

 

  • 268 से 232 ईसा पूर्व मौर्य वंश के शासक अशोक मौर्य के नाम पर सड़क

  • 12 वीं सदी के हिंदू शासक पृथ्वीराज चौहान के नाम पर सड़क

  • 1325 से 1351 तक शासन करने वाले तुगलक वंश के मुहम्मद बिन तुगलक के नाम पर सड़क

  • 1540 से 1545 के बीच महज 5 साल शासन करने वाले शेरशाह सूरी के नाम पर सड़क

  • 1526 में बाबर से मात खाने वाले लोधी वंश के आखिरी सुल्तान इब्राहिम लोधी के नाम पर सड़क बनाईं गईं

 

शेरशाह सूरी का दौर छोड़ दें तो 1526 से ही भारत पर मुगलिया सल्तनत पर कब्जा हो गया था. ये सिलसिला 1857 में अंग्रेजों के हाथों सत्ता गंवाने वाले आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर तक चलता रहा. अंग्रेजों ने मुगलों से सत्ता के लिए सीधी लड़ाई लड़ी थी लेकिन इसके बावजूद अंग्रेजों ने अपनी नई दिल्ली की पहचान से जुड़े मुगल बादशाहों के नाम से नफरत नहीं की.

 

  • 526 से 1530 के बीच पहले मुगल बादशाह बाबर

  • 1556 तक दूसरे मुगल बादशाह रहे हुमायूं

  • 1556 से 1605 के बीच तीसरे मुगल बादशाह अकबर के नाम पर भी सड़कों के नाम रखे गए

 

अकबर ने अपने शासनकाल में दिल्ली को छोड़ दिया और फिर आगरा को मुगलिया सल्तनत की नई राजधानी बनाया जिसे उनके बेटे जहांगीर ने कायम रखा लेकिन इसके बाद अकबर के पोते शाहजहां ने एक बार फिर दिल्ली को अपनी राजधानी बना लिया था.

 

अंग्रेजों की बसाई नई दिल्ली में दिल्ली के लालकिले से शासन करने वाले शाहजहां के नाम पर और फिर उनके बेटे आलमगीर उर्फ औरंगजेब के नाम पर भी सड़कों का नामकरण किया गया.साल 1947 में आजादी मिली और नई दिल्ली को अंग्रेजी हुकूमत के साये से निकलने का मौका. नई दिल्ली की तस्वीर तो वही रही लेकिन नाम बदल दिए गए.

 

वायसरॉय का घर आजाद भारत में राष्ट्रपति भवन कहा जाने लगा. सेक्रेटेरिएट और कौंसिल हाउस को देश की संसद का नाम दिया गया. वॉयसराय हाउस के सामने जाने वाले रास्ते को किंग्सवे को राजपथ का नया नाम मिला.

 

बादशाह किंग जॉर्ज सप्तम की मूर्ति को हटा दिया गयासाल 1917 में प्रथम विश्व युद्ध में मारे गए लोगों की याद में बना ऑल इंडिया वॉर मेमोरियल इंडिया गेट के नाम से मशहूर हो गया. लेकिन ये पहली बार हुआ है जब अंग्रेज हुक्मरानों से जुड़ी निशानियों का नाम बदलने का ये सिलसिला अब एक मुगल शासक तक आ पहुंचा है. औरंगजेब वो पहला शासक है जिसकी धार्मिक कट्टरता की कहानियों का सहारा लेकर ऐतिहासिक भूल सुधारने की बात हो रही है.

 

सवाल ये है कि क्या महज एक सड़क पर लगे बोर्ड से मुगल शासक औरंगजेब का नाम मिटा देने से दिल्ली का वो इतिहास भी बदला जा सकता है जिस पर 70 साल तक औरंगजेब का नाम दर्ज है. आखिर ऐसे बदलाव से क्या मिलता है?

 

SPECIAL: औरंगजेब फिर दफन 

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