IN DEPTH: योगी से डरें या इंतजार करें ?

By: | Last Updated: Monday, 20 March 2017 10:21 PM
IN DEPTH INFORMATION YOGI Adityanath

नई दिल्ली: आदित्यनाथ योगी के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही घंटे बाद देश की राजनीति में नई बहस नेताओं ने तेज कर दी. ये मुद्दा छेड़ा जाने लगा कि क्या योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से उत्तर प्रदेश के मुसलमान को डरना पड़ेगा ?

क्या योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने से यूपी का मुस्लिम डर रहा है ? क्या जानबूझकर योगी के नाम पर विरोधी मुस्लिम को भ्रम में फंसाकर डरा रहे हैं ? या फिर लोकतांत्रिक तरीके से मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ को लेकर विपक्षी जनादेश का अपमान कर रहे हैं ?

आखिर योगी आदित्यनाथ पांच बार जनता के चुने हए सांसद हैं. जिन्होंने उत्तर प्रदेश में पौने दो सौ रैलियां चुनाव के दौरान की. जिन्हें पार्टी ने विधायकों ने लोकतांत्रिक तरीके से अपना नेता चुना, सीएम बनाया, उनके नाम का हौव्वा खड़ा करके क्या विरोधी लोकतंत्र का अपमान नहीं कर रहे हैं ?

आज लखनऊ में जिस वक्त मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के आला अफसरों के साथ विकास के एजेंडे पर अहम बैठक कर रहे थे. तब दिल्ली में यूपी चुनाव हार चुके नेता क्या बयान दे रहे थे ?

मायावती ने कहा कि जो योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया है, वो एक महंत है, वो विकास की बात कर रहे हैं, विकास विकास कुछ नहीं, इनको महंत को आगे करके आरएसएस का एजेंडा लागू करेंगे. भययुक्त वातावरण बनाएंगे.

यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष राज बब्बर ने कहा कि हर आदमी का एक कैरेक्टर होता है, उसकी पहचान उसी से होती है, मेरे चरित्र की पहचान क्या है, कुछ लोगों की पहचान उनके वेशभूषा, करनी, कथनी से पहचान बनती है. माहौल में सवाल तो खड़ा हुआ हुआ. योगी आदित्यनाथ की छवि कट्टर हिंदूवादी छवि थी.

सीपीआई नेता डी राजा ने कहा कि वो कट्टर हिंदुवादी छवि के लिए जाने जाते रहे हैं, हम सबको एक होकर सोचना होगा कि कैसे लोकतंत्र को बचाया जाए.

दिग्विजय सिंह ने कहा कि जिनके खिलाफ जहर उगलते रहे, उनमें विश्वास करने की चुनौती है. इन बयानों को जानकर आपको भी लगा होगा, कि हो सकता है ऐसा ही हो, क्योंकि अब तक योगी आदित्यनाथ की जो छवि रही है, वो भड़काऊ बयान देने की रही. ये बात ठीक है. लेकिन अब तस्वीर कैसे बदली है, ये भी तो विरोधियों को देखना होगा. लखनऊ में मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने जो पहला बयान दिया. अब जरा उसे पढ़िए.

योगी आदित्यनाथ ने कहा कि लोककल्याण के प्रति समर्पित ये सरकार, सभी वर्गों के लिए काम करेगी, इसके लिए शासन प्रशासन को संवेदनशील, जवाबदेह बनाया जाएगा. आज जब अपने अफसरों के साथ मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने बैठक भी की तो बाहर निकले अफसरों के हाथ में बीजेपी का वही लोक कल्याण पत्र दिखा. जिसके आधार पर सबका साथ सबका विकास का सौ दिन का एजेंडा बनाने का निर्देश दे दिया गया है. योगी पहले जो भी कहते रहे हों, लेकिन अब उनका एजेंडा यही माना जा रहा है कि राजनीति अब अल्पसंख्यक के साथ बहुसंख्यक का विकास नहीं बल्कि बहुसंख्यक आबादी के साथ अल्पसंख्यक के विकास पर आधारित हो.

मतलब ये कि जो योजनाएं लागू हों, वो मुस्लिम तुष्टिकरण से जुडे वोटबैंक को ध्यान में रखकर ना चले. एक सरकारी योजना जितना हिंदुओं का ख्याल रखें, उतना ही मुस्लिमों का भी.

अब ये जानने की जरूरत है कि क्यों योगी आदित्यनाथ के नाम पर भय की बात की जा रही है. क्या इसकी वजह पूर्वाग्रह है. वो इमेज जो आप किसी एक के बारे में बना लेते हैं, तो फिर वक्त के साथ हुए बदलावों के बाद भी खुद की सोच नहीं बदल पाते. क्या योगी आदित्यनाथ विरोधियों के पूर्वाग्रह के कारण निशाने पर हैं ?

याद करिए 2014 से पहले के वक्त का. नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन रहे थे. तभी से विरोधी लोकतंत्र को खतरा बताने लगे थे. मोदी पीएम बने तब भी हिंदू राष्ट्र से लेकर राम मंदिर, मुस्लिमों को डर ना जाने कितने खौफ विरोधियों ने पैदा किए. अब दोबारा वैसा ही पूर्वाग्रह योगी आदित्यनाथ को लेकर विरोधियों ने अपना लिया है. योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री रहते अभी कोई ऐसा बड़ा फैसला भी नहीं लिया. विरोधी फिर भी डर दिखा रहे हैं.

सेक्युलरिज्म के नाम पर अब तक बीजेपी को रोकने के लिए जो दल आपस में लड़कर भी एक होते रहे, ऐसी हर पार्टी क्या राजनीति में आए बदलाव को समझ नहीं पा रही है.

उत्तर प्रदेश के चुनाव में बहुत सारे मिथक टूटे हैं. यूपी की 86 आरक्षित विधानसभा सीटों में से इस बार बीजेपी को 69 सीटें मिल गई हैं और मायावती को सिर्फ 2 मिलीं. यादव बेल्ट कहलाने वाले इटावा, ऐटा, औरैया, मैनपुरी, फिरोजाबाद, कन्नौज जैसे जिलों में समाजवादी पार्टी का सफाया हो गया. राजनीति के जानकार कहते हैं कि यूपी में बीजेपी ने दलित, मुस्लिम, यादव वोटबैंक पर आधारित राजनीति को तोड़कर बहुसंख्यकों के वोटबैंक वाली सियासत को जन्म दे दिया है. और इस बात का इशारा ऐतिहासिक जीत मिलने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कर चुके हैं.

ऐसे में सिर्फ 19 सीट पाने वाली मायावती और यूपी में अपना दल से भी कम सीट पाने वाली देश की राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस भले नई सियासत को ना भांप पा रहे हों लेकिन समाजवादी पार्टी संभल गई है. कहती है कि योगी आदित्यनाथ को पहले मौका दिया जाए. फिर फैसला लेंगे. रामगोपाल यादव ने कहा कि हम 6 महीने तक कुछ नहीं कहेंगे.

दरअसल रामगोपाल यादव समझ रहे हैं कि जनता के मूड के खिलाफ जाकर बात कही तो सिर मुंडाते ओले गिर सकते हैं. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जनता ने जिसे चुना है, उसके काम पर सवाल उठाना विपक्ष की जिम्मेदारी है. लेकिन सिर्फ पूर्वाग्रह के आधार पर मुख्यमंत्री योगी को कठघरे में खड़ा कर देना जल्दबाजी भी होगा. सकारात्मक राजनीति के खिलाफ भी.

पूरी दुनिया की राजनीति में एक सच है, वो ये कि जब आप किसी विचारधारा को लगातार खारिज करते हैं. घृणा की दृष्टि से देखते हैं. तब संभव है कि आप वैचारिक, सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों में आ रहे बदलाव को भांप ना पा रहे हों. कुछ ऐसा ही अब यूपी में योगी को लेकर विरोधियों की स्थिति है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर भय का भ्रम दिखाने वाले विरोधियों को आज अटल बिहारी वाजपेयी का एक बयान अब सुनना चाहिए. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में कहा था कि अगर आप चाहें तो फैसला कर सकते हैं कि हमने एक दूसरे को गालियां दी होंगी, चलो छोड़ो आज तो सबको मिलकर बीजेपी को गाली देना है, अगर ये सामूहिक निर्णय है तो मुझे कुछ नहीं कहना, लेकिन ऐसा निर्णय नकारात्मक होगा, ऐसा निर्णय प्रतिक्रियात्मक होगा, इस तरह का निर्णय सिर्फ हमें आने से रोकने के लिए होगा और ये लोकतंत्र को स्वस्थ बनाने वाली परंपरा को नहीं डालेगा, और आज ये मैं आपको चेतावनी देना चाहता हूं.

दो दशक पहले संसद में सिर्फ सेक्युलरिज्म के नाम पर बीजेपी के विरोध पर एकजुट हो गए विपक्ष को ये चेतावनी अटल बिहारी वाजपेयी ने दी थी. इस चेतावनी का परिणाम आज उत्तर प्रदेश में दिख रहा है. जहां सेक्युलरिज्म की अपनी परिभाषाओं के तहत पैदा किए गए बीजेपी विरोध ने ही विरोधियों को हाशिए पर खड़ा कर दिया है.

संघ विचारक एम जी वैद्य ने कहा कि सेक्युलर का मतलब हमारे यहां मुस्लिमों की खुशामद करना होता है, जो पूरे हिंदू समाज का विचार करता है, वो कम्युनल बन जाता है. जो खुद को सेक्युलर समझते हैं, उन्हें आश्चर्य लगना स्वाभाविक है.

संघ के विचारक एम जी वैद्य जो बात कह रहे हैं, ऐसा नहीं कि उसे हर विरोधी पार्टी समझ नहीं पा रही. जैसे कांग्रेस के दिग्गज नेता जनार्दन द्विवेदी कहते हैं कि बीजेपी ने बहुसंख्यक वोटबैंक के आधार पर योगी को सीएम बनाने का जो फैसला लिया है वो बड़ा प्रयोग है.

जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि मैं मानता हूं कि असमान्य निर्णय है, उनकी दृष्टि से साहसिक निर्णय है, इसकी सफलता, असफलता परिणामों पर निर्भर करेगी. सबका साथ, सबका विकास का पालन होता है, तो मैं समझता हूं, इस प्रयोग को असफल नहीं कहा जाएगा.

लेकिन जनार्दन द्विवेदी की पार्टी के दर्जनों नेता जनादेश के खिलाफ सिर्फ योगी के नाम पर सवाल उठा रहे हैं. जिस गोरखपुर से पांच बार योगी आदित्यनाथ सांसद रहे हैं, अगर वहां का मुस्लिम योगी योगी करता है. तो फिर सिर्फ विरोध के नाम पर विपक्षी डर का जाल क्यों फैला रहे हैं. भारत का लोकतंत्र जनादेश और संविधान से चलता है. जनादेश योगी के साथ है. और संविधान के मुताबिक चलने की शपथ योगी ने ले ली है.

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