IN DEPTH: सियासी भाषणों का 'लाइ डिटेक्टर टेस्ट'

By: | Last Updated: Friday, 17 February 2017 10:46 PM
IN DEPTH: POLITICAL LEADER’S SPEECH

नई दिल्ली: जनता के वोटों की कृपा पाने के लिए नेता जितने मुंह उतनी बातें कर रहे हैं. ऐसा ही एक मुद्दा उत्तर प्रदेश में अपराध का है. जहां आज आपको पता चलेगा कि क्या प्रधानमंत्री यूपी में अपराध के मुद्दे पर गलत आंकड़े दे रहे हैं ? क्या बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह आंकड़ों को तोड़-मोड़ कर वोट मांग रहे हैं ?

सियासी भाषणों के लाइ डिटेक्टर टेस्ट में सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का चुनावी रैली में किया गया ये दावा पढ़िए. प्रधानमंत्री मोदी ने जनसभा में कहा कि एक दिन में 24 मां-बेटियों पर बलात्कार होता है यूपी में 24 घंटे में 21 मां-बेटियों पर रेप का प्रयास होता है.

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी कहा कि यूपी में हर रोज 24 बलात्कार होते हैं, रेप होते हैं. 21 बलात्कार के प्रयास होते हैं. 161 फीसदी बलात्कार की वृद्धि समाजवादी पार्टी के शासन में हुई है.

अब बारी थी इन बयानों को सच पता करने की. आपको बता दें कि देश में हुए अपराधों का संपूर्ण और विश्वसनीय डाटा बताने वाली संस्था नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो है. जो केंद्र सरकार के अधीन आती है. राज्यों में दर्ज क्राइम को इकट्टा करके पूरे देश में अपराध का एक एक आंकड़ा नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ही हर साल जारी करता है. तो क्या अमित शाह और प्रधानमंत्री ने इसी सरकारी एजेंसी के आंकड़ों के आधार पर विरोधियों को घेरा है. ये जानने के लिए पहले हम बीजेपी के बड़े नेता शाहनवाज हुसैन से मिले. शाहनवाज हुसैन ने कहा कि NCRB के डाटा से ही हम फीगर देते हैं.

शाहनवाज हुसैन ने ये बात कन्फर्म कर दी कि चाहे बीजेपी के प्रवक्ता हो या पार्टी अध्यक्ष या प्रधानमंत्री अपराध के मुद्दे पर वो NCRB के आंकड़ों को ही आधार बनाकर वार करते हैं. लेकिन जो बयान आपने पहले सुने वो इस आधार पर सच नहीं हैं. क्योंकि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो अपराध दर को प्रति एक लाख लोगों पर दर्ज करती है. ना कि प्रति दिन कितना अपराध हुआ, इस आधार पर. फिर किस आधार पर प्रधानमंत्री और बीजेपी अध्यक्ष यूपी में रोज बलात्कार के 24 मामलों की बात कह रहे हैं ? किस आधार पर प्रतिदिन यूपी में 21 रेप के प्रयासों की बात मोदी-अमित शाह ने कही ?

10pm 2उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था बिल्कुल बड़ा मुद्दा है. लेकिन क्या इसका मतलब ये हो जाता है कि आंकड़ों की हेराफेरी करके जनता का वोट मांगा जाए. अगर यूपी में पूरे साल हुए बलात्कार के मामलों को 365 दिन के हिसाब बांटकर उसे प्रति दिन के खाके में भी डाल दिया जाए तो जो दावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह यूपी में रेप के मामलों में कर रहे हैं. वो भी सच से कोसों दूर मिलता है.

प्रधानमंत्री का दावा है कि यूपी में रोज 24 बलात्कार होते हैं. जबकि केंद्र की एजेंसी NCRB के मुताबिक यूपी में 2015 में बलात्कार के 3025 केस दर्ज हुए. यानी करीब 8 रेप प्रतिदिन. यानी प्रधानमंत्री अपने चुनावी भाषण में यूपी में रेप की प्रति दिन वारदात को तीन गुना ज्यादा बढ़ाकर बता रहे हैं. इसी तरह मोदी-अमित शाह का दावा है कि यूपी में रोज बलात्कार की कोशिश के 21 मामले होते हैं. लेकिन NCRB के मुताबिक यूपी में 2015 में 422 मामले दर्ज हुए. यानी सरकारी आंकड़ा कहता है कि यूपी में रोज रेप के प्रयास का करीब एक मामला ही हुआ. यानी पीएम और अमित शाह चुनावी भाषण के दौरान यूपी में रेप के प्रयासों की प्रतिदिन वारदात को 21 गुना बढ़ाकर बता रहे हैं.

अब प्रधानमंत्री का वो बयान पढिए जहां उत्तर प्रदेश में कत्ल के मामलों पर आंकड़ें सुनाकर वोट मांगा गया. पीएम मोदी ने कहा कि यूपी में एक दिन में 13 हत्याएं होती हैं. एक दिन में 13 हत्याएं, एक दिन में 33 अपहरण होते हैं, एक दिन में यूपी में 19 दंगे होते हैं. एक दिन में 136 चोरी की घटनाएं घटती हैं.

और जब प्रधानमंत्री के इस बयान का सच हमने जाना तो पता चलता है कि 2015 में कत्ल की वारदातों पर अपराध की दर के हिसाब से देश में 22वें नंबर पर था उत्तर प्रदेश. 2015 में अपहरण की वारदातों में 19 राज्य यूपी से ज्यादा बदनाम रहे. 2015 में दंगों के वारदातों की दर यूपी से ज्यादा 16 और दूसरे राज्यों में थी.

ये बात बिल्कुल सच है कि अपराध हुआ है. लेकिन अपराध के उन आंकड़ों को तोड़ मरोड़ कर, बढ़ा चढ़ाकर जनता के बीच में कहना. और फिर उसे भावनात्मक रूप से जोड़कर वोट हासिल करना. क्या ये सही है ? ऐसा करने वाले नेता सिर्फ एक पार्टी में नहीं, बल्कि हर दल में पाए जाते हैं.

देश में सियासत इस बात का फायदा उठाती है कि कैसे किसी सच को आंकड़ों के अंधेरे में रखकर उसे अपने हिसाब से वोटों के मुनाफे का जरिया बनाया जाए. देश में ऐसी ही सियासत का आज हमने आपके लिए सच से सामना कराया है. जिसमें डिंपल से लेकर प्रियंका तक और राहुल गांधी से लेकर आजम-केजरीवाल तक की गुमराह करने वाली राजनीति शामिल है.

दो दिन पहले डिंपल यादव ने मोदी सरकार के मंत्रियों के प्रचार में हेलीकॉप्टर के इस्तेमाल की बात करते हुए वार किया था. क्योंकि नरेंद्र मोदी ने समाजवादी परिवार की कारों पर सवाल उठाया था. जिसका आधार था मुलायम के दूसरे बेटे प्रतीक का पांच करोड़ वाली लैंम्बोर्गिनी कार. यहां सीधी सी बात ये है कि विरोधी अगर हेलिकॉप्टर से प्रचार कर रहे हैं तो उसका किराया भी देना होगा. लेकिन उसकी तुलना समाजवादियों की पांच करोड़ की कार से करके क्या डिंपल मतदाता को भ्रम में नहीं डाल रहीं हैं? भ्रम का मायाजाल फैलाकर जनता को वोट के लिए गफलत में डालने वाली ऐसी ही सियासत कांग्रेस भी कर रही है. प्रियंका गांधी कहती हैं कि क्या रायबरेली अमेठी में विकास नहीं हुआ? बिल्कुल विकास हुआ. लेकिन राजीव गांधी के वक्त हुआ होगा. लेकिन दो दशक में क्या हुआ, ये प्रियंका छिपा लेती हैं.

उनके भाई और मां के संसदीय़ क्षेत्र में दर्जनों औद्योगित इकाइयां अब खंडहर में बदल चुकी हैं. हजारों करोड़ की योजनाएं रायबरेली-अमेठी में अब भी शुरुआत का इंतजार कर रही हैं. प्रियंका जैसे सच छिपा ले गई. उसी तरह उनके भाई भी हैं. जिन्होंने सरकार को घेरने के नाम पर ऐसा खुलासा करने की बात कही, जिससे भूकंप आने का दावा था. लेकिन उसका क्या हुआ

राहुल गांधी ने जनता को खुलासे के नाम पर बरगलाया ही कहेंगे, क्योंकि जिस कागज के आधार पर राहुल गांधी खुलासा करने का दावा करते हैं. उसे प्रशांत भूषण ने जब सुप्रीम कोर्ट में पेश किया तो अदालत ने उस जांच के लायक भी नहीं माना था.

बयानों का ऐसा ही भ्रमजाल फैलाकर अपना काम बनाने और जनता का काम लगाने की महारत आजम खान को भी हासिल है. मुस्लिम वोटर को बरगलाने वाला बेसिरपैर का बयान देकर वोट और तालियां बंटोरने वाले आजम खान उसी सरकार के मंत्री हैं, जो ना तो रोजगार दे पाई और ना ही बेरोजगारी भत्ता ही देने में पूरी तरह कामयाब हुई.

बयानों की ऐसी बाजीगरी तो सियासत में खुद को सत्यता का पितामह शो करने वाले केजरीवाल भी करते हैं. जिनके दावे उन्हीं के पुराने साथी योगेंद्र यादव खोलते हैं. योगेंद्र यादव के मुताबिक केजरीवाल का दावा है कि शिक्षा बजट 106 फीसदी बढ़ाकर डबल कर दिया. लेकिन योगेंद्र यादव का आरोप है कि शिक्षा बजट में ‘नियोजित’ अंश 106 फीसदी बढ़ाया गया. लेकिन खर्च सिर्फ 37 फीसदी हुआ.

कुल मिलाकर कहानी यही है कि देश में नेता अपने पूरे फायदे के लिए आधा सच ही बोल रहे हैं. एबीपी न्यूज़ संवाददाता आशीष कुमार सिंह जब चुनाव आयोग के पूर्व पर्यवेक्षक के जे राव के पास पहुंचे तो उन्होंने हमें दिखाया कि कैसे आदर्श आचार संहिता में लिखा गया है.

किसी भी पार्टी और कार्यकर्ता की आलोचना झूठे आरोपों और बेबुनियाद आंकड़ों के आधार नहीं कर सकते. इसके बाद चुनाव आचार संहिता को बेहद करीब से समझने वाले के जे राव ने हमें इस पूरे नियम का मतलब भी समझाया.

अब सवाल था कि अगर नेता झूठे आंकड़ें देकर वोट हासिल करने की कोशिश करते हैं तो क्या कार्रवाई हो सकती है. मतलब ये कि चुनाव आयोग चाहे तो देश में गुमराह करने वाली राजनीति को बढ़ावा दे रहे दलों की मान्यता तक रद्द कर सकता है. उन्हें चुनाव लड़ने से रोक सकता है. लेकिन फिलहाल ऐसे सभी नियमों को तोड़कर वोट हासिल करने की सियासत देश में जारी है.

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