IN DEPTH STORY: जमीन कानून का सच क्या है?

By: | Last Updated: Wednesday, 25 February 2015 4:40 PM
IN DEPTH STORY truth about land acquisition bill

नई दिल्ली: अन्ना हजारे दिल्ली में हैं. इस बार वह जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं. उनका कहना है कि सरकार किसानों की जमीन हड़पने की साजिश कर रही है और इससे उनका नुकसान होगा. आखिर जमीन की ये लड़ाई दरअसल है क्या? कानून क्या है और इसका नफा–नुकसान क्या है?

 

देश का कानून संसद बनाती है. देश चलाती है संसद. संसद की इस भव्य इमारत को अंग्रेजो ने साल 1911 में तब बनवाना शुरू किया था जब दिल्ली को भारत की राजधानी घोषित कर दिया गया था. लेकिन भवन बनाने के लिए जमीन चाहिए थी. जिस जमीन पर आज संसद की ये इमारत खड़ी है वहां तब मालचा नाम का एक गांव हुआ करता था. जमीन सिर्फ गांव वालों से ही मिल सकती थी. गांववालों से जमीन ले ली गई और तब जाकर साल 1929 में तैयार हुआ संसद भवन.

 

अगर संसद भवन ना होता और इसके आसपास के ढेरों सरकारी दफ्तरों के लिए जमीन ना होती तो क्या होता?  2 हजार 272 रुपये के कुल मुआवजे देकर मिली थी जमीन. सरकार को एक कानून के तहत किसानों की जमीन का देश के हित में इस्तेमाल करने का अधिकार था. वो कानून ना होता शायद संसद भवन की वो भव्य इमारत भी ना होती. वो कानून ना होता तो अंग्रेज देश के एक सिरे से दूसरे सिरे को जोड़ने के लिए रेलें भी नहीं दौड़ा पाते. आज 7 हजार से ज्यादा रेलवे स्टेशन और 64 हजार किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय करने वाली ट्रेनें नहीं होतीं. वो कानून ना होता गांव और शहरों से जमीनें ना मिलतीं और आपकी गाड़ियों को दौड़ने के लिए सड़कें ना मिलतीं

 

बिजली बनाने वाले कारखाने ना होते, नदियों का पानी आप तक लाने वाली नहरें ना होतीं. ये लिस्ट और भी लंबी हो सकती है. जरा ऐसे में अपनी और अपने देश की हालत बारे में सोचिए. जिस कानून का जिक्र हो रहा है वो था देश का पहला भूमि अधिग्रहण कानून यानी जमीन का कानून जो आजादी से पहले बना था. दरअसल ब्रिटेन में मशीनों के जरिए उत्पादन शुरू हो गया था और वो भारत में भी मशीनी क्रांति लाना चाहते थे. ऐसे में उन्हें जमीन चाहिए थी और इसके लिए उन्होंने बनाया कानून. जमीन पर कब्जा करने वाला कानून. साल 1894 में बने उस कानून के जरिए उद्योगों के लिए सड़कें और रेल जैसी सुविधाओं के लिए उन्होंने जमीनें लीं और बुनियादी ढांचा खड़ा किया.

 

फिर वही सवाल जमीन ना मिलती तो क्या होता?  आज जिस विकास की पटरी पर देश दौड़ रहा है वो वही जमीन है जो पहले अंग्रेज सरकार ने और फिर हमारी अपनी सरकारों ने हमसे और आपसे ली है. लेकिन अब जो फर्क आया है उसे समझने से पहले देखिए 120 साल से चले आ रहे उस जमीन कानून में क्या था.

 

1894 के जमीन कानून में क्या था?

अंग्रेज सरकार जमीन लेने का फैसला करती थी. फैसला सरकारी गजट में छाप दिया जाता था. जमीन पर कब्जे का काम जिले का कलेक्टर करता था. किसी अदालत में अंग्रेज सरकार को चुनौती नहीं दी जा सकती थी.

 

लेकिन वक्त के साथ देश की सरकारों को लगा कि जमीन पर कब्जे का अंग्रेजी कानून अन्याय से भरा हुआ था. एकतरफा फैसला ले लिया जाता था और जिनकी जमीने सरकार लेती थी उन्हें मुआवजा भी ठीक से नहीं मिलता था. नतीजा होता था मुकदमे और काम ठप्प. ऐसे में जरूरत थी नए कानून की.

 

पिछले दो सालों में दो बार नया जमीन कानून आया. अध्यादेश की शक्ल में. अध्यादेश यानी वो सरकारी आदेश जो कानून बनने से पहले सरकार लागू कर देती और बाद में संसद इस पर कानून बनाती है. इन कानूनों में आपके लिए क्या था ये भी बताएंगे लेकिन पहले ये तो समझ लीजिए क्यों लेती है सरकार आपकी जमीन.

 

सरकार आपके गांव को जोड़ने के लिए सड़क की योजना बनाती है. नक्शे के मुताबिक सड़क आपके खेत से होकर बननी है. पहला विकल्प ये है कि वो सड़क बनाना बंद कर दे ताकि आपकी जमीन आपके पास ही रहे. दूसरा विकल्प ये है कि वो आपसे आपकी जमीन ले और सड़क को पूरा बनाए . ताकि आपका गांव सड़क के रास्ते पूरी दुनिया से जुड़ जाए.

 

जाहिर है गांव का विकास करने के लिए सड़क बनाना जरुरी है. ताकि आप शहर पहुंच सकें, डॉक्टर आप तक पहुंच सकें, आपका अनाज और सब्जियां शहर में बिकने जा सकें. लेकिन इसके बदले आपको अपनी जमीन देनी होगी. तो क्या रास्ता है. यही रास्ता बताता है नया जमीन कानून. इस कानून के तहत अगर किसी की जमीन सरकार देश के हित में लेती है तो इसमें मौजूद ढेरों नियम आपका नुकसान होने से बचाएंगे.

 

देश की जरूरत पूरी करने और आपके भी हितों की सुरक्षा के दावे के साथ मोदी सरकार सबसे ताजा जमीन कानून लेकर आई है लेकिन इसके खिलाफ सड़क से लेकर संसद तक बवाल उठ खड़ा हुआ है. दरअसल ये बवाल इसलिए उठ खड़ा हुआ है क्योंकि मोदी सरकार ने पिछले साल लागू हुए यूपीए सरकार के जमीन कानून में कुछ बदलाव कर दिए हैं. इन बदलावों की जरूरत पर भी चर्चा करेंगे लेकिन पहले समझते हैं कि दोनों कानूनों में क्या फर्क है.

 

1

यूपीए के जमीन कानून में

जमीन के बाजार भाव से 4 गुना तक मुआवजे का प्रावधान था

मोदी के जमीन कानून

में भी बाजार भाव से 4 गुना तक मुआवजे का इंतजाम है

 

2

यूपीए के जमीन कानून में

सिर्फ बंजर भूमि का अधिग्रहण हो सकता था

लेकिन मोदी के जमीन कानून में

सिंचाई और फसल देने वाली जमीन भी ली जा सकती है

 

3

यूपीए के जमीन कानून में

सरकारी अधिग्रहण के लिए 80 फीसदी जमीन मालिकों की मंजूरी जरूरी थी और पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप प्रोजेक्ट्स के लिए 70 फीसदी मालिकों की मंजूरी जरूरी थी

लेकिन मोदी के जमीन कानून में

अब जमीन मालिकों, पंचायतों और ग्रामसभाओं से मंजूरी की कोई जरूरत नहीं होगी

 

4

यूपीए के जमीन कानून में

किसी विवाद की स्थिति में कानून की मदद ली जा सकती थी

लेकिन मोदी के जमीन कानून में

अब कोई मुकदमेबाजी नहीं की जा सकेगी

 

5

यूपीए के पिछले कानून में

अगर पांच साल मे जमीन का इस्तेमाल नहीं हुआ तो वो जमीन सरकार को वापस करनी होगी

लेकिन मोदी के कानून में

अगर जमीन के इस्तेमाल की समय सीमा को हटा दिया गया है यानी अब जमीन वापस नहीं होगी

 

पहली नजर में ऐसा लगता है कि किसानों और दूसरे जमीन मालिकों के अधिकार को नए जमीन कानून ने एक बार फिर सीमित कर दिया गया है. यही आरोप लगा रहे हैं अन्ना हजारे.

 

लेकिन वित्त मंत्री अरुण जेटली के मुताबिक मुकदमे रोकने और लोगों की मंजूरी लेने के प्रावधान इसलिए हटाए गए हैं ताकि देश की तरक्की की रफ्तार बढ़े. अगर मुकदमे होंगे या फिर लोगों की मंजूरी नहीं मिल पाएगी तो नए उद्योगों और आम लोगों के लिए सरकारी प्रोजेक्ट पर लग जाएगा ब्रेक. ऐसे में सरकार का कहना है कि मुआवजा मिलेगा लेकिन विकास की राह में आने वाली बाधाओं को दूर करना भी जरूरी है.

 

विपक्ष का कहना है कि मोदी का जमीन कानून किसान विरोधी है. लेकिन खेती के आंकड़े कुछ और कह रहे हैं. आजादी के बाद जिस खेती का जीडीपी में योगदान 52 फीसदी था. वो अब घटकर 2012-13 में 14 फीसदी रह गया था. दस साल पहले यानी 2004-05 में भी ये सिर्फ उन्नीस फीसदी ही था.

 

ऐसे में अगर विकास चाहिए तो देश को उद्योगों के सहारे आगे बढ़ाना है. खुद मोदी इसकी वकालत करते रहे हैं. लेकिन मोदी जिस फार्मूले को इस्तेमाल करना चाहते हैं उसे यूपीए के जमीन कानून से पूरा करना मुश्किल दिखता है. देखिए आँकड़े

 

Centre for Monitoring Indian Economy (CMIE) की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2013 में अक्टूबर से दिसंबर के मुकाबले साल 2014 में अक्टूबर से दिसंबर के बीच फंसे हुए प्रोजेक्ट में 55 फीसदी की कमी आई है यानी मोदी सरकार के राज में प्रोजेक्ट ने रफ्तार पकड़ी है. 2013 की तीसरी तिमाही में देश में 2 लाख 50 हजार करोड़ के करीब 155 प्रोजेक्ट फंसे हुए थे. जबकि साल 2014 की तिमाही में रफ्तार पकड़ने के बाजवूद भी 1लाख 20 हजार करोड़ के 128 प्रोजेक्ट फंसे हुए हैं. अकेले भूमि अधिग्रहण की समस्या की वजह से साढ़े 26 हजार करोड़ के 11 प्रोजेक्ट अटके हुए हैं.

 

जाहिर है यूपीए के जमीन कानून के कुछ ढीले पेंच विकास की मशीन को ठीक से काम नहीं करने दे रहे हैं. नया कानून उन्हीं ढीले पेंचों को कसने की कोशिश की तरह भी देखा जा रहा है.

 

यूपीए सरकार ने पुराने कानून में सिर्फ उन कंपनियों को जमीन देने का प्रावधान किया था जो कंपनी एक्ट के तहत रजिस्टर्ड हों लेकिन मोदी सरकार ने इसका दायरा बढ़ाकर इसमें प्रोपराइटरशिप, पार्टनरशिप फर्म समेत एनजीओ को भी शामिल किया है ताकि सामाजिक विकास की रफ्तार भी तेज हो सके.

 

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