अंतरिक्ष में एक और छलांग, स्वदेशी जीपीएस की तरफ बढ़ते कदम

India a step closer to ‘Desi-GPS’ with latest Satellite Launch

नए साल में भारत ने अंतरिक्ष के क्षेत्र एक और छलांग लगाई है . अमेरिका आधारित ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) जैसी क्षमता हासिल करने की दिशा में एक और कदम बढ़ाते हुए इसरो ने अपने पांचवे नेवीगेशन सैटेलाइट आईआरएनएसएस-1ई का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण कर दिया. इसरो ने यह प्रक्षेपण श्रीहरिकोटा के अंतरिक्ष केंद्र से अपने विश्वसनीय पीएसएलवी-सी31 के माध्यम से किया. 44.4 मीटर ऊंचे और 320 टन वजनी पीएसएलवी रॉकेट ने 19 मिनट बाद ही खुद को आईआरएनएसएस-1 ई से अलग कर लिया और इसे कक्षा में स्थापित किया. इसका संचालन शुरू हो जाने के बाद देश और क्षेत्र में लोगों को स्थिति की सटीक सूचना मिल सकेगी, जिसका दायरा करीब 1,500 किलोमीटर क्षेत्र में फैला है. भारत का आईआरएनएसएस अमेरिका के ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस), रूस के ग्लोनास, यूरोप के गलीलियो जैसा है.
इस कामयाबी के साथ ही भारत का अपना न केवल उपग्रहों का जाल तैयार हो जाएगा बल्कि देश के पास अपना जीपीएस शुरू हो जाएगा. अब जीपीएस के लिए भारत को दूसरे देशों पर निर्भर रहना नहीं पड़ेगा. यानी ये कामयाबी बहुत खास है. भारतीय अरमानों को पंख लगाने वाला इसरो का ये कार्यक्रम अंतरिक्ष अनुसंधान के इतिहास में भारत का गौरव बढानें वाला साबित होगा. इस मिशन की कामयाबी के साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों की जमात में शामिल हो गया है जिनके पास नेविगेशन प्रणाली है. इस तरह की तकनीक अभी अमेरिका और रूस के पास ही है . यूरोपीय संघ और चीन भी 2020 तक इसे विकसित कर पायेंगे, लेकिन भारत उससे बहुत पहले यह कामयाबी हासिल कर लेगा . यह अभियान देश के अंतरिक्ष कार्यक्रमों को नई दिशा प्रदान कर रहा है . इससे देश का नेवीगेशन सिस्टम मजबूत होगा जो परिवहनों तथा उनकी सही स्थिति एवं स्थान का पता लगाने में यह सहायक सिद्ध होगा . इस प्रक्षेपण से देश इंडियन रीजनल नेविगेशनल सैटेलाइट सिस्टम आईआरएनएसएस शुरू करने के लिए तैयार हैं क्योंकि भारत ने सात उपग्रहों के समूह में से पाँच उपग्रहों को उनकी कक्षा में स्थापित कर दिया है.

नेवीगेशन सिस्टम के लिए आत्मनिर्भरता किसी भी देश के लिए काफी मायने रखती है . एक रिपोर्ट के अनुसार देशी नेवीगेशन सिस्टम आम आदमी की जिंदगी को सुधारने के अलावा सैन्य गतिविधियों, आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी उपायों के रूप में यह सिस्टम बेहद उपयोगी होगा . खासकर 1999 में सामने आयी कारगिल जैसी घुसपैठ और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से इसके जरिये समय रहते निपटा जा सकेगा. कारगिल घुसपैठ के समय भारत के पास ऐसा कोई सिस्टम मौजूद नहीं होने के कारण सीमा पार से होने वाले घुसपैठ को समय रहते नहीं जाना जा सका. बाद में यह चुनौती बढ़ने पर भारत ने अमेरिका से जीपीएस सिस्टम से मदद मुहैया कराने का अनुरोध किया गया था. हालांकि तब अमेरिका ने मदद मुहैया कराने से इनकार कर दिया था. उसके बाद से ही जीपीएस की तरह ही देशी नेविगेशन सेटेलाइट नेटवर्क के विकास पर जोर दिया गया. और अब भारत ने खुद इसे विकसित कर बड़ी कामयाबी हासिल की है .

आईआरएनएसएस 1 ई नेविगेशनल, ट्रैकिंग और मानचित्रण सेवा मुहैया कराएगा और इसका जीवन 10 वर्षों का होगा. एक बार सभी उपग्रह प्रक्षेपित होने के बाद आईआरएनएसएस अमेरिकी जीपीएस नेवीगेशनल प्रणाली के समकक्ष होगा. फिलहाल आईआरएनएसएस सिस्टम काम कर रहा है क्योंकि चार उपग्रह आईआरएनएसएस का काम शुरू करने के लिए पर्याप्त होते है , बाकी तीन उपग्रह उसे और सटीक एवं कुशल बनाएंगे. आईआरएनएसएस प्रणाली को इस वर्ष तक पूरा करने की योजना बनायी गई है जिस पर कुल 1420 करोड़ रूपये का खर्च आएगा. इसके जरिये स्थलीय और समुदी नेविगेशन, आपदा प्रबंधन, वाहन ट्रैकिंग और बेड़ा प्रबंधन, पर्वतारोहियों और यात्रियों के लिए दिशासूचक सहायता तथा गोताखोरों के लिए दृश्य एवं आवाज नेविगेशन सुविधा मुहैया करायी जाएगी. इससे पहले इस श्रृंखला के चार उपग्रहों आईआरएनएसएस-1ए को पीएसएलवी-सी22 ने जुलाई 2013, आईआरएनएसएस-1बी को पीएसएलवी-सी24 ने अप्रैल 2014, आईआरएनएसएस-1सी को पीएसएलवी-सी26 ने अक्टूबर 2014 और आईआरएनएसएस-1 डी को पीएसएलवी सी 27 ने मार्च 2015 में प्रक्षेपित किया था.

आईआरएनएसएस प्रणाली दो तरह की सेवाएं मुहैया कराएगा जिसमें एक मानक पोजीशनिंग सेवा जो कि सभी उपयोगकर्ताओ के लिए उपलब्ध होगी तथा सीमित सेवा जो कूट सेवा होगी एवं केवल अधिकृत उपयोगकर्ताओं को ही मुहैया होगी. भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली इंडियन रीजनल नेविगेशनल सैटेलाइट सिस्टम (आईआरएनएसएस) इसरो की एक महत्वाकांक्षी योजना है. इसरो ने आइआरएनएसएस का विकास इस तरह किया है कि न सिर्फ यह अमेरिका के ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम जीपीएस के समकक्ष खड़ा हो सके बल्कि भविष्य में उससे भी बेहतर साबित हो सके .

आइआरएनएसएस के तहत भारत अपने भौगोलिक प्रदेशों तथा अपने आसपास के कुछ क्षेत्रों तक नेविगेशन की सुविधा रख पाएगा. इसके तहत भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा कुल 7 नेविगेशन सैटेलाइट अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किए जाने है, जोकि 36000 किमी की दूरी पर पृथ्वी की कक्षा का चक्कर लगाएंगे. यह भारत तथा इसके आसपास के 1500 किलोमीटर के दायरे में चक्कर लगाएंगे. जरूरत पड़ने पर उपग्रहों की संख्या बढ़ाकर नेविगेशन क्षेत्र में और विस्तार किया जा सकता है. आइआरएनएसएस दो माइक्रोवेव फ्रीक्वेंसी बैंड एल 5 और एस पर सिग्नल देते हैं. यह स्टैंडर्ड पोजीशनिंग सर्विस तथा रिस्ट्रिक्टेड सर्विस की सुविधा प्रदान करेगा. इसकी स्टैंडर्ड पोजीशनिंग सर्विस सुविधा जहां भारत में किसी भी क्षेत्र में किसी भी आदमी की स्थिति बताएगा, वहीं रिस्ट्रिक्टेड सर्विस सेना तथा महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालयों के लिए सुविधाएं प्रदान करेगा .

कैसे काम करता है जीपीएस?

जीपीएस (ग्लोबल पॉजिशनिंग सिस्टम) एक उपग्रह प्रणाली पर काम करता है. जीपीएस सीधे सेटेलाइट से कनेक्ट होता है और उपग्रहों द्वारा भेजे गए संदेशो पर काम करती है. जीपीएस डिवाइस उपग्रह से प्राप्ता सिंगनल द्वारा उस जगह को मैप में दशार्ती रहती है. वर्तमान में जीपीएस तीन प्रमुख क्षेत्रों से मिलकर बना हुआ है, स्पेस सेगमेंट, कंट्रोल सेगमेंट और यूजर सेगमेंट. जीपीएस रिसीवर अपनी स्थिति का आकलन, पृथ्वी से ऊपर रखे गए जीपीएस सेटेलाइट द्वारा भेजे जाने वाले सिग्नलों के आधार पर करता है. प्रत्येक सेटेलाइट लगातार मैसेज ट्रांसमिट करता रहता है. रिसीवर प्रत्येक मैसेज का ट्रांजिट समय नोट करता है और प्रत्येक सेटेलाइट से दूरी की गणना करता है. ऐसा माना जाता है कि रिसीवर बेहतर गणना के लिए चार सेटेलाइट का इस्तेमाल करता है. इससे यूजर की थ्रीडी स्थिति (अंक्षाश, देशांतर रेखा और उन्नतांश) के बारे में पता चल जाता है. एक बार जीपीएस की स्थिति का पता चलने के बाद, जीपीएस यूनिट दूसरी जानकारियां जैसे कि स्पीड, ट्रेक, ट्रिप, दूरी, जगह से दूरी, सूर्य उगने और डूबने के समय के बारे में जानकारी एकत्र कर लेता है.

जीपीएस से बेहतर साबित हो सकता है आइआरएनएसएस
भारतीय आइआरएनएसएस अमेरिकन नेविगेशन सिस्टम जीपीएस से बेहतर साबित हो सकता है. मात्र 7 सैटेलाइट के जरिए यह अभी 20 मीटर के रेंज में नेविगेशन की सुविधा दे सकता है, जबकि उम्मीद की जा रही है कि यह इससे भी बेहतर 15 मीटर रेंज में भी यह सुविधा देगा. जीपीएस की इस कार्यक्षमता के लिए 24 सैटेलाइट काम करते हैं, जबकि आईआरएनएसएस के लिए मात्र सात सैटेलाइट जरूरी है लेकिन यहाँ यह ध्यान रखना जरूरी है कि जीपीएस की रेंज विश्व व्यापी है जबकि आईआरएनएसएस की रेंज भारत और एशिया तक ही सीमित है . सुरक्षा एजेंसियों और सेना के लिए सुरक्षा की दृष्टि से भी आइआरएनएसएस काफी बेहतर है . नेविगेशन सैटेलाईट आईआरएनएसएस के अनुप्रयोगों में नक्शा तैयार करना, जियोडेटिक आंकड़े जुटाना, समय का बिल्कुल सही पता लगाना, चालकों के लिए दृश्य और ध्वनि के जरिये नौवहन की जानकारी, मोबाइल फोनों के साथ एकीकरण, भूभागीय हवाई तथा समुद्री नौवहन तथा यात्रियों तथा लंबी यात्रा करने वालों को भूभागीय नौवहन की जानकारी देना आदि शामिल हैं. आईआरएनएसएस के सात उपग्रहों की यह श्रृंखला स्पेस सेगमेंट और ग्राउंड सेगमेंट दोनों के लिए है. आईआरएनएसएस के तीन उपग्रह भूस्थिर कक्षा जियोस्टेशनरी ऑर्बिट के लिए और चार उपग्रह भूस्थैतिक कक्षा जियोसिन्क्रोनस ऑर्बिट के लिए हैं. सातों उपग्रह इस साल के अंत तक कक्षा में स्थापित कर दिए जाएंगे और तब आईआरएनएसएस प्रणाली ठीक ढंग से शुरू हो जाएगी.

साधनों के बजाय प्रतिभाओं की बहुलता
मंगल यान की कामयाबी के बाद इसरों का लोहा पूरी दुनिया मान चुकी है. चांद पर पानी की खोज का श्रेय भी चंद्रयान 1 को ही मिला था . भविष्य में इसरों उन सभी ताकतों को और भी कडी टक्कर देगा जो साधनों की बहुलता के चलते प्रगति कर रहा है, भारत के पास प्रतिभाओं की बहुलता है. आईआरएनएसएस-1 डी का सफल प्रक्षेपण एक बड़ी कामयाबी है जिससे भारत अपना खुद का नेवीगेशन सिस्टम बनाने की दिशा में सफलतापूर्वक बढ़ रहा है जोकि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है क्योंकि ऐसी प्रणाली विश्व के सिर्फ कुछ ही देशों के पास है .

लेखक
शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च), मेवाड़ यूनिवर्सिटी

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Web Title: India a step closer to ‘Desi-GPS’ with latest Satellite Launch
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