भारत, आस्ट्रेलिया ने ऐतिहासिक परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए

By: | Last Updated: Saturday, 6 September 2014 3:43 AM

नई दिल्ली: भारत और आस्ट्रेलिया ने आज ऐतिहासिक असैन्य परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए जिससे कैनबरा अब नई दिल्ली को यूरेनियम की आपूर्ति कर सकेगा. इसके साथ ही दोनों देशों ने सुरक्षा और व्यापार के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने का फैसला किया.

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके आस्ट्रेलियाई समकक्ष टोनी एबोट के बीच बैठक के बाद परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए गए . दोनों नेताओं ने इराक एवं यूक्रेन की स्थिति सहित द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा की.

 

समझौते पर हस्ताक्षर का स्वागत करते हुए मोदी ने कहा कि यह द्विपक्षीय संबंधों में ‘ऐतिहासिक आयाम’ है.

 

उन्होंने एबोट के साथ साझा प्रेस वार्ता में कहा, ‘‘यह हमारे संध में परस्पर विश्वास और भरोसे के नए स्तर को प्रदर्शित करता है तथा इससे हमारे द्विपक्षीय संबंधों में नए अध्याय की शुरूआत होगी.

 

यह भारत को स्वच्छ उर्जा के साथ विकास करने के उसके प्रयासों में मदद करेगा और उसके विकास में कार्बन की उपस्थिति को कमतर करेगा.’’ भारत और आस्ट्रेलिया ने 2012 में यूरेनियम की ब्रिकी को लेकर बातचीत शुरू की थी.

 

इससे ठीक पहले आस्ट्रेलिया ने नयी दिल्ली को यूरेनियम के निर्यात पर लगे दीर्घकालीन प्रतिबंध को हटाया था ताकि भारत की महत्वाकांक्षी परमाणु कार्यक्रम की जरूरत पूरी हो सके.

 

यूरेनियम के भंडार के मामले में आस्ट्रेलिया दुनिया का तीसरा प्रमुख देश है और वह एक साल में करीब 7,000 टन यूरेनियम का निर्यात करता है.

 

इस करार का मकसद परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देना है. इस समझौते में यह स्वीकार किया गया कि भारत सतत विकास और अपनी उर्जा सुरक्षा की जरूरत को पूरा करने के लिए परमाणु उर्जा का इस्तेमाल करेगा और इसको लेकर वह प्रतिबद्ध है.

 

भारत और आस्ट्रेलिया के बीच हुए समझौते में कहा गया है, ‘‘आस्ट्रेलिया भारत को यूरेनियम की दीर्घकालीन आपूर्ति की भूमिका निभा सकता है. इसके तहत यूरेनियम की आपूर्ति, रेडियो आइसोटेप्स का उत्पादन, परमाणु सुरक्षा और सहयोग के दूसरे क्षेत्रों में सहयोग करना है.’’

 

आज के समझौते की खासी अहमियत है क्योंकि भारत के परमाणु संयंत्र करीब 4680 मेगावट बिजली पैदा करते हैं जिसमें से 2840 मेगावाट का उत्पादन स्वदेशी यूरेनियम से होता है, जबकि 1840 मेगावाट का आयात किए हुए ईंधन से होता है.

 

दोनों प्रधानमंत्रियों ने निर्देश दिया कि वार्ताकार परमाणु समझौते से जुड़े प्रशासनिक प्रबंधों को जल्द पूरा करें.अधिकारियों के अनुसार आस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम की पहली खेप मिलने में दो साल का समय लग सकता है.

 

आस्ट्रेलिया के साथ रिश्तों को प्रगाढ़ बनाने की भारत की इच्छाओं का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘‘भारत के विकास में आस्ट्रेलिया बहुत महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है. भारत सीमित संसाधनों वाला देश है और ऐसे में वह अपनी जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आस्ट्रेलिया से पूरा कर सकता है.’’

 

उन्होंने कहा, ‘‘उत्पादन और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं. आने वाले वषरें में भारत बेहद कुशल मानव संसाधन के एक बड़े स्रोत के रूप में उभर सकता है.’’ मोदी ने कहा, ‘‘मैंने जी-20 शिखर बैठक के बाद आस्ट्रेलिया का दौरा करने के प्रधानमंत्री एबोट के आमंत्रण को स्वीकार कर लिया है. हम हर संभव अवसर पर एक दूसरे से मिलने का प्रयास करेंगे.’’

 

असैन्य परमाणु समझौता दोनों देशों के बीच हस्ताक्षरित चार समझौतों में से एक है. तकनीकी व्यवसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण, जल संसाधन प्रबंधन और खेल के क्षेत्रों में भी समझौते हुए हैं.

 

दोनों देशों ने उर्जा, जल, विज्ञान, शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ाने पर सहमति जताई है.साझा बयान में कहा गया है, ‘‘दोनों प्रधानमंत्रियों ने मंत्री स्तरीय संवाद के जरिए उर्जा सुरक्षा पर दोनों देशों के बीच सहयोग प्रगाढ़ बनाने पर सहमति जताई है. उन्होंने कोयला, एनएलजी, अक्षय उर्जा एवं यूरेनियम तथा लौह अयस्क, तांबा, सोने जैसे संस्थानों में सहयोग को बढ़ाने पर भी सहमति जताई.’’

 

एबोट ने कहा कि आस्ट्रेलिया को भारत से वादा मिला है कि उससे मिले यूरेनियम का इस्तेमाल भारतीय परमाणु हथियारों में नहीं होगा.

 

उन्होंने कहा, ‘‘निश्चित तौर पर भारत का त्रुटिहीन अप्रसार का रिकॉर्ड रहा है और भारत एक आदर्श अंतरराष्ट्रीय नागरिक है.’’ मुलाकात के दौरान मोदी और एबोट ने रणनीतिक और आर्थिक साझीदारी को प्रगाढ़ बनाने के उपायों पर भी चर्चा की.

 

एबोट ने कहा, ‘‘हमें भारत के साथ व्यापार और निवेश संबंधी रिश्ते को लेकर प्रयास के लिए अधिक समय देने की जरूरत है.’’ आस्ट्रेलियाई नेता ने कहा कि द्विपक्षीय व्यापार 15 अरब डॉलर है, लेकिन इस आंकड़े में काफी इजाफे की जरूरत है.

 

उन्होंने कहा कि भारत ने साबित किया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, स्वतंत्र अदालतों और सरकार पर लोकतांत्रिक निगरानी एवं संतुलन के साथ आर्थिक बदलाव संभव है.

 

उन्होंने कहा, ‘‘नई सरकार के चुनाव ने दोनों देशों के लिए नयी संभावनाएं पैदा की हैं. आस्ट्रेलिया व्यापार के लिए तैयार है. प्रधानमंत्री मोदी भी ‘कम, मेक इन इंडिया’ के लिए पूरी दुनिया को आमंत्रित कर रहे हैं.’’

 

मोदी और एबोट की मुलाकात के बाद जारी साझा बयान के अनुसार दोनों नेताओं ने कहा कि आस्ट्रेलियाई और भारतीयों ने आतंकवाद की पीड़ा झेली है. दोनों ने आतंकवाद विरोधी अभियान से जुड़े संयुक्त कार्यसमूह के काम की सराहना की.

 

समुद्री आयाम के महत्व का उल्लेख करते हुए दोनों नेताओं ने आधिकारिक स्तर पर निरस्त्रीकरण एवं अप्रसार संवाद में समुद्री सुरक्षा पर हुई चर्चा का स्वागत किया.

 

शांतिपूर्ण, समृद्ध और स्थिर एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए अपनी इच्छा प्रकट करते हुए मोदी और एबोट ने सहयोगात्मक व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया. इसके साथ ही दोनों ने समुद्री क्षेत्र में निकटवर्ती सहयोग से संबंधित अपने हितों पर भी जोर दिया भारत और आस्ट्रेलिया के बीच परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद अब देश के स्वदेशी परमाणु बिजली रिएक्टरों को यूरेनियम मिल सकेगा जिससे बिजली के उत्पादन की क्षमता में इजाफा होगा.

 

 

साझा बयान में कहा गया है, ‘‘आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्रियों की ओर से एबोट ने प्रधानमंत्री मोदी को 2015 में गैलीपोली की 100वीं वषर्गांठ के कार्यक्रम में शामिल होने का न्यौता दिया.’’

 

दोनों नेताओं ने भारतीय समुद्री क्षेत्रीय संघ :आईओआरए: में और अधिक व्यवहारिक सहयोग की दिशा में ठोस कदमों का उल्लेख किया और कहा कि भारत एवं आस्ट्रेलिया इस संगठन को मजबूती देने के लिए मिलकर काम करेंगे.

 

मोदी और एबोट ने जी-20 को भी सुदृढ़ बनाने के महत्व पर चर्चा की. एबोट ने मोदी को इस साल की जी20 बैठक की मेजबान के तौर पर आस्ट्रेलिया की प्राथमिकता बताईं और भारत के साथ मिलकर काम करने में आस्ट्रेलिया के हित का उल्लेख किया.

 

साझा बयान में कहा गया है कि मोदी ने जी 20 में आस्ट्रेलिया की अध्यक्षता की सराहना की और वैश्विक अर्थव्यवस्था के मजबूत, सतत एवं संतुलित विकास में जी 20 के सफल योगदान के प्रति भारत की प्रतिबद्धता प्रकट की.दोनों नेताओं ने पूर्वी एशियाई शिखर सम्मेलन के महत्व को भी स्वीकार किया.

 

मोदी और एबोट ने आसियान, एशिया यूरोप बैठक एवं कुछ दूसरी क्षेत्रीय निकायों में सहयोग को स्वीकार किया.एबोट ने एशिया प्रशांत आर्थिक सहयोग मंच में भारत की सदस्यता का समर्थन किया.

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