मातृभाषा दिवस: भोजपुरी-मैथिली पर हुई परिचर्चा

By: | Last Updated: Sunday, 22 February 2015 7:26 AM
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नई दिल्ली: भारतीय भाषाओं की लड़ाई, किसी एक भाषा की स्वतंत्र लड़ाई नहीं है बल्कि ये सभी भारतीय भाषाओं की साझा लड़ाई है. भारत की हर एक भाषा को सबसे ज्यादा खतरा ये है कि वो तेजी से आयात हो रहे अंग्रेजी के बेजा शब्दों पर नियंत्रण नहीं प्राप्त कर पा रही है.

 

अगर भाषा के मूल शब्द ही न संरक्षित हों, न सुरक्षित हों तो भला उस भाषा को कैसे बचाना संभव हो पायेगा. ये बातें मातृभाषा दिवस पर इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित परिचर्चा में वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने कहीं.

 

परिचर्चा को संबोधित करते हुए भोजपुरी-मैथिली अकादमी के उपाध्यक्ष अजीत दुबे ने कहा कि हिंदी  देश के बाहर जहां-जहां भी गयी है, वहां-वहां भोजपुरी की पीठ पर सवार होकर गयी है. भोजपुरी को जो मान्यता मिलनी चाहिए वो नहीं मिल पा रही है. जबकि भोजपुरी २० करोंड़ लोगों की भाषा है.

 

21 फरवरी को अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर भोजपुरी-मथिली अकादमी द्वारा ‘सोशल मीडिया एवं भोजपुरी-मैथिली’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया. परिचर्चा में भोजपुरी की तरफ से बतौर वक्ता शिवानन्द द्विवेदी सहर, उत्पल कुमार एवं विनय कुमार द्वारा सोशल मीडिया पर भोजपुरी की उपस्थिति आदि को केंद्र में रखते हुए बहुआयामी विचार रखे गये.

 

अपनी बात के क्रम में उत्पल कुमार ने कुछ तथ्यों के साथ भाषाई चिंता को मंच पर रखा तो वहीँ शिवानन्द सहर ने भोजपुरी को महज भाषा नहीं बल्कि भोजपुरी को माँ जैसा बताया एवं उसकी उपेक्षा पर चिंता व्यक्त की.  वहीँ मैथिली की तरफ से बतौर वक्ता संजीव सिन्हा, आलोक कुमार एवं परमेन्द्र मिश्र ने मैथिली एवं सोशल मीडिया की वर्तमान स्थिति का विश्लेषण किया.

 

संजीव सिन्हा ने अपने संबोधन में कई मैथिली के साहित्यकारों का उद्धरण देते हुए ये कहने का प्रयास किया कि मैथिली में बहुत कुछ लिखा गया है, जिसे अभी सोशल मीडिया के मंच की दरकार है. विषय और सवाल जवाब के क्रम में पंकज झा, अमरनाथ झा सहित कई लोगों ने अपने सवालों से विमर्श को आगे बढाया. बीच-बहस में यह मुद्दा भी उठा कि आखिर भोजपुरी को आंठ्वी अनुसूची से महरूम क्यों रखा गया है?

 

गौरतलब है कि संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को जगह दी गयी है. लेकिन लगभग 20 करोंड़ लोगों की भाषा भोजपुरी को अभी भी इस सूची में जगह नहीं मिली है. आश्चर्य की बात है कि भोजपुरी को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान तो मारीशस की राजकीय भाषा के रूप में मिल गयी है लेकिन अपनी ही जमीन और अपने देश में भोजपुरी संवैधानिक मान्यता तक से महरूम है.

   

परिचर्चा में डॉ सौरभ मालवीय, प्रवीण शुक्ल, सहित तमाम बुद्धिजीवी शामिल रहे. कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने की तो वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय बतौर मुख्य अतिथि शामिल रहे. सभा में भोजपुरी-मैथिली अकादमी के सचिव राजेश सचदेवा जी भी उपस्थित रहे.

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