जासूसी कांड: इंडियन एक्सप्रेस का दावा पेट्रोलियम मंत्रालय में टाइपिस्ट था सुभाष चंद्रा

By: | Last Updated: Sunday, 22 February 2015 4:23 AM
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नई दिल्ली: पेट्रोलियम मंत्रालय जासूसी कांड से देश में सनसनी मची हुई है. चपरासी, क्लर्क से लेकर कई कंपनियों के बड़े अधिकारी गिरफ्तार किये जा चुके हैं. अब नया खुलासा हुआ है. अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने दावा किया कि जासूसी कांड में जिस सुभाष चंद्रा नाम के कॉरपोरेट एक्जीक्यूटिव को गिरफ्तार किया गया है, वो कभी पेट्रोलियम मंत्रालयम में टाइपिस्ट हुआ करता था.

 

उसे जुबिलिएंट एनर्जी कंपनी ने पेट्रोलियम मंत्रालय के टाइपिस्ट से 20 गुना ज्यादा वेतन देकर अपने यहां नौकरी दी थी. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक सुभाष चंद्रा 2008 से 2011 तक पेट्रोलियम मंत्रालय में एक अंडर सेक्रेटरी के पीए के यहां टाइपिस्ट की नौकरी करता था. इसकी तनख्वाह 8 हजार रुपये महीना था. 2011 में इसने पेट्रोलियम मंत्रालय की नौकरी छोड़ी और 1 लाख 50 हजार रुपये महीने के वेतन पर जुबिलिएंट एनर्जी ज्वाइन की.

 

एक्सप्रेस के मुताबिक सुभाष चंद्रा 2008 से लगातार मंत्रालय के गोपनीय दस्तावेज कई कॉरपोरेट एजेंट को मुहैया करा रहा था. सुभाष चंद्रा ने पूछताछ के दौरान दिल्ली पुलिस को बताया है कि इसी दौरान इन्हीं कॉरपोरेट एजेंट् ने उसकी कई लोगों से दोस्ती कराई और उसे जुबिलिएंट एऩर्जी में नौकरी मिली. जासूसी के आरोप में पकड़े गए पूर्व पत्रकार शांतनु सैकिया ने दावा किया है कि ये दस हजार करोड़ का घोटाला है.

 

कैसे होती थी जासूसी ?

पुलिस के मुताबिक मंत्रालय में जासूसी के इस काम में मल्टी टास्किंग कर्मचारी आसाराम और ईश्वर सिंह शामिल थे. ये दोनों ललता प्रसाद और राकेश कुमार को दस्तावेज चुराने में मदद करते थे. दोनों भाई मंत्रालय में अस्थाई कर्मचारी के तौर पर काम कर चुके हैं.

 

मल्टी टास्किंग कर्मचारी वो होते हैं जो दफ्तर में पानी पिलाने से लेकर फोटोकॉपी कराने, फाइल पहुंचाने और दरवाजे पर बैठने का काम करते हैं. इन एमटीएस कर्मचारियों की अहम दस्तावेजों तक पहुंच थी.

 

आशाराम और ईश्वर सिंह लंबे अरसे से शास्त्री भवन में काम कर रहे थे आशाराम के रिटायरमेंट में एक साल और ईश्वर सिंह के रिटायरमेंट में चार साल बाकी थे इन्हे पता था कि सीसीटीवी कैमरे कहां से आन आफ होते है उस कमरे की डूप्लीकेट चाबी बनवा कर सीसीटीवी आफ कर देते थे.

 

ईश्वर के बेटों ललता और राकेश ने इसी के जरिये जासूसी शुरू की गई. तीसरा शख्स राजकुमार चौबे है जो ड्राइवर था. ये सभी जानकारी निकालकर कंपनियों, थिंक टैंक और लॉबिस्टों तक पहुंचाते थे.

 

कैसे पकड़ी गई जासूसी ?

 

सरकार को इस बात की भनक लग चुकी थी कि मंत्रालय के गलियारों में दलाल घूम रहे हैं लिहाजा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने कैबिनेट सचिव को चिट्ठी लिखकर सचेत भी किया था. और पेट्रोलियम मंत्रालय में हो रही धांधली की तरफ आईबी की भी नजर थी और दिल्ली पुलिस को पहली जानकारी वहीं से मिली थी.

 

बुधवार की रात पुलिस ने जाल बिछाकर जासूसों को तब गिरफ्तार किया जब वे इंडिगो कार से शास्त्री भवन परिसर में दाखिल हुए थे. दो जासूस दफ्तर में गया था. तीसरा कार में ही बैठा रहा. दो घंटे बाद उनके दफ्तर से निकलने पर पुलिस ने गिरफ्तार किया. मंत्रालय में घुसने के लिए जासूसों के गैंग ने फर्जी दस्तावेज बनवा रखे थे. उनकी कार पर फर्जी सरकारी स्टिकर भी लगा था.

 

शक है कि जासूसी का ये खेल कम से कम 15 साल से चल रहा था. पुलिस ने गिरफ्तार लोगों से दफ्तर की डुप्लीकेट चाबियां मिली हैं. इनका इस्तेमाल दफ्तर में घुसने के लिए होता था. फर्जी पहचान पत्र और पास भी मिले हैं. इंडिगो पर भारत सरकार का कार स्टिकर लगा था. वह भी फर्जी था.

 

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