व्यक्ति विशेष: तांगेवाला कैसे बना अरबपति?

By: | Last Updated: Thursday, 23 October 2014 10:15 AM
Inspiring Personalitie: Mahasay Dharmapal

कहते है समय बहुत बलवान होता है. क्योंकि, वक्त का पहिया जब घूमता है तो राजा को रंक और फकीर को बादशाह बना देता है. ऐसी ही एक दास्तान एक तांगा चलाने वाले की भी है. वक्त ने जब करवट ली तो वह तांगे वाला देखते ही देखते मुकद्दर का सिंकदर बन गया और उसकी जिंदगी लोगों के लिए बन गई एक मिसाल. ये दास्तान उन दिनों की है जब देश अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ था. दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर तांगा चला कर दो आना सवारी कमाने वाला ये शख्स आज अरबपति बन चुका है. हैरान कर देने वाली कामयाबी की ये कहानी देश के मशहूर उद्योपति महाशय धर्मपाल की है. जो आज देश के बड़े दौलतमंद हैं और 92 साल की उम्र में सेहतमंद भी हैं.  

 

कैसे 92 साल की उम्र में आज भी महाशय धर्मपाल अपनी जिंदगी में भर रहे हैं जवानी के रंग. साथ ही आपको ये भी बताएंगे कि कभी तांगा चलाने वाले धर्मपाल क्यों और कैसे बन गए मसालों के किंग.

 

जमीन से आसमान के सफर की ये दास्तान उस दौर में शुरु होती है जब भारत पर अंग्रेजों का राज था. देश को आजाद होने में अभी 24 साल बाकी थे. गुलाम और अविभाजित भारत के सियालकोट में 1923 में धर्मपाल गुलाटी का जन्म हुआ था. पाकिस्तान के शहर सियालकोट के मोहल्ला मियानापुरा में . महाशय चुन्नीलाल गुलाटी का पांच बेटियों औऱ तीन बेटों का भरा पूरा परिवार रहता था. सियालकोट के बाजार पंसारिया में धर्मपाल के पिता चुन्नीलाल मिर्च मसालों की एक दुकान चलाते थे जिसका नाम महाशियां दी हट्टी था. और यही महाशियां दी हट्टी आज मसालों की दुनिया में एमडीएच के नाम से एक बड़ा ब्रांड बन चुकी हैं.

 

उद्योगपति महाशय धर्मपाल ने बताया कि सियालकोट में सब में ऐसा प्यार था. हर आदमी प्यार से मिलता था प्यार से काम करता था. रहा सवाल मेरी जिंदगी का बहुत लंबी जिंदगी कट गई मेरी तो. मैं पांचवी क्लास में जब गया स्कूल पहले तो स्कूल चलो तो रोते थे नहीं जाना, नहीं जाना, नहीं जाना. उस समय जब बच्चा स्कूल जाता था तो माता पिता बताशे चीनी के जो होते हैं बांटते थे. अब समय है भाई अब तो टॉफियां बटंती हैं समय की बात है ये तो. तो स्कूल में जाना तो हम रोते थे नहीं जाना, नहीं जाना, नहीं जाना .आहिस्ता आहिस्ता माहौल सा बनता गया बस स्कूल चले गए.

 

सात साल के धर्मपाल का मन पढ़ाई में कम पतंगबाजी और कबूतरबाजी में ज्यादा रमता था. पढाई से दूर भागने वाले महाशय धर्मपाल को पहलवानी का भी शौक था लेकिन साथ ही साथ धर्मपाल का बालक मन बड़ा आदमी बनने का ख्वाब भी देखता था. दरअसल उसका ये ख्वाब अपने पिता से बडे आदमियों की कहानियां सुन-सुन कर पैदा हुआ था.

 

महाशय धर्मपाल कहते हैं कि उस जमाने में जब मैं पांचवीं क्लास तक आया तब सवाल जवाब होने लगे थे. हमारे जो मास्टर जी थे पृथ्वीराज तो उन्होंने कहा सुनो, i have advised and i can see  तो बोल दिया तो वो बोलना आया नहीं तब उन्होंने यहां मेरे जोर से दबाया कि मेरा खून जम गया बस तब से मैंने स्कूल जाना बंद कर दिया. पांचवीं क्लास का मैंने इम्तिहान दिया ही नहीं. रहा सवाल माहौल का बहुत प्यार था आहिस्ता आहिस्ता काम करते गए जब मैं और कुछ बड़ा हुआ स्कूल छोड़ दिया मैंने. बेटा अब क्या करेगा, पढ़ना पडेगा तो क्या पढ़ना, छोडों पढ़ाई बाद में करेंगे. मेरा बेटा अनपढ़ है एक काम करते हैं बढई का, लकड़ी का, मकान बनाने का. बढई बनेगा, वो ठेकेदार बन जाएगा काम सीख जाएगा तो. आठ महीने मैने बढई का काम किया.

 

धर्मपाल पांचवी क्लास भी पास ना कर सका. पिता चुन्नीलाल ने बेटे को हर तरह के रोजगार में खपाने की कोशिश की. कभी धर्मपाल को साबुन की फैक्ट्री में काम पर लगाया गया, तो कभी चावल की फैक्ट्री में. कपड़े से लेकर हार्डवेयर की दुकान तक धर्मपाल ने 15 बरस की उम्र तक कई पापड़ बेले लेकिन जब धर्मपाल का मन कहीं नहीं रमा तो पिता चुन्नी लाल ने उसे मसालों के अपने पुश्तैनी कारोबार में लगा दिया.

 

महाशय धर्मपाल ने कहा कि पिताजी मेरे गांव से आए थे तो बेटा मेरा अमीर बन जाएगा अपनी दुकान पर बिठा दिया फिर उसके बाद हार्डवेयर का काम किया. एक दिन यहां चोट लगी फिर हार्डवेयर का काम छोड़ दिया. फिर मुझे अपनी दुकान पर बैठना पड़ा. मैने दो दो पैसे की मेंहदी, सब वहां मुस्लमान रहते थे गर्मियों के दिनों में मैने पुड़िया बांधी दो दो पैसे की और रेहड़ी ली. आओ जी भाई मेहंदी ले लो मेहंदी. दो दो पैसे की पुडिया. खैर. करते करते आहिस्ता आहिस्ता काम बढ़ता गया.

 

ये वो दौर था जब देश में चारों तरफ आजादी का आंदोलन पूरे उफान पर था. इसी बीच 18 बरस के धर्मपाल का लीलावती के साथ विवाह करा दिया गया. शादी के बाद नई जिम्मेदारी के अहसास ने धर्मपाल की जिंदगी को अब पूरी तरह से बदल कर रख दिया था यही वजह थी कि वो अब मौज मस्ती छोड़कर मसालों के अपने पुश्तैनी धंधे में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगा था.

 

महाशय धर्मपाल ने कहा कि उस समय ऐसा था हम पेशावर से मिर्चिया लाते थे. अमृतसर से हल्दी आती थी सारा किराने का सामान अमृतसर से आता था. बड़ी मंडिया थी मसालों की. हम अपने हाथ से मिर्चियां कूटते थे. फिर पीसते थे. फिर हमने क्या किया. दुकान के नीचे चक्की लगा रखी थी पिसी हल्दी. दो रुपये की पुड़िया बांध दी. दो आने की, एक आने की, आधा सेर ऐसी पुड़िया बांध कर बेचते थे. जिसका माल बढिया होता है ग्राहक आहिस्ता आहिस्ता आ जाता है. पब्लिसिटी नहीं मैं अच्छा हूं मेरा माल अच्छा है तो मैं अच्छा बन जाता हूं.

 

सियालकोट के बाजार पंसारिया में चुन्नीलाल की मसालों की दुकान जम चुकी थी. पूरे सियालकोट में उनकी देगी मिर्च की धूम थी. लेकिन जब देश आजाद हुआ तो बंटवारे का दर्द चुन्नीलाल के परिवार को भी सहना पड़ा. सियालकोट में जहां चुन्नीलाल का परिवार रहता था उसके एक तरफ हिंदुओं का मोहल्ला था तो दूसरी तरफ मुस्लमानों की आबादी थी. जब ये तय हो गया कि सियालकोट पाकिस्तान में ही रहेगा तो यहां के हिंदू समाज में खलबली मच गयी और असुरक्षा की इसी भावना ने चुन्नीलाल को भी सियालकोट छोड़ने पर मजबूर कर दिया. और इस तरह सियालकोट का ये संपन्न परिवार 20 अगस्त 1947 के दिन शरणार्थी बन चुका था.

 

महाशय धर्मपाल ने बताया कि उधर से आवाज आती है अल्ला हु अखबर , हर हर महादेव, श्रीमान जी पेशावर में हमारे रिश्तेदार थे. रावलपिंडी में रिश्तेदार थे काफी वहां से आए हैं ऐसे ही मारे जा रहे हैं . लड़कियां भागी होती हैं. गाडियां आ रही हैं पिताजी ने देखा गाड़ियां आ रही हैं. पिताजी मसाला भेज रहे थे गोदाम में , महाशय जी अगर हमारे पैसे छीन लें तो , हम जाएंगे ही नहीं , छोड़ दिया. फिर ऐसा समय आ गया स्ट्रेन छीड़ गई वहां. लकड़ी की लाल वाली छोटी लकड़ी की. मैंने कहा श्रीमान जी कुछ पूछो मत. बात ये है समय बीतता जा रहा है पहली गाड़ी से हम आए हैं , ट्रेन में बैठ गए सहपरिवार . किसी तरह हमने पार किया , बरसात का मौसम था बरसात बहुत हो रही थी. मत पूछो यार रोना आ जाएगा.

 

महाशय धर्मपाल बताते हैं कि सियालकोट के रिफ्यूजी कैंप में कुछ दिन गुजराने के बाद जब गुलाटी परिवार ने पाकिस्तान से पलायन किया तो डेरा बाबा नानक बॉर्डर उनके परिवार का पहला पड़ाव बना था. और यही से पाकिस्तान की सरहद पार करके उन्हें अगले दिन अमृतसर पहुंचना था. लेकिन पलायन की वो रात गुलाटी परिवार पर कयामत की तरह गुजरी थी. रात में जब महाशय धर्मपाल का परिवार सड़क के किनारे सो रहा था तब एक ट्रक धर्मपाल के चाचा की टांग कुचलता हुआ गुजर गया. महाशय धर्मपाल आज भी उन दिनों को याद कर के सिहर उठते हैं.

 

महाशय धर्मपाल ने बताया कि भाई रोड़ पर मत सो, यहां मत सो, ट्रक आ रहे हैं ट्रक आ रहे हैं, चच्चा सोया, रात को ट्रक गया टांग टूट गई, चच्चा जी की. सुबह उनको लेकर गया सेवा अस्पताल में. आहिस्ता आहिस्ता मेरे को समज में आ गया. मेरी जेब में 1500 रूपये था. मैं , मेरा भाई धर्मवीर बड़ा , मेरा एक और भाई तीनों आदमी बस हम चल दिए. हम ढाई बजे आए लाशे ही लाशे पड़ी हुई है , बरसात हो रही है , हड़बड़ी से हम वहां से निकल पाए. पैदल चले फिर लुधियाने में आ गए , एक ट्रक खाली पड़ा हुआ था एक रात हम वहां ठहरे , उसी में बैठ कर हम दिल्ली आए . आहिस्ता आहिस्ता हम लोग दिल्ली पहुंच गए सुबह.

 

15 अगस्त 1947 . भारत आजाद हो चुका था. लेकिन ये आजादी अपने साथ मुल्क के बंटवारे का असहनीय दर्द भी साथ लेकर आई थी. देश के विभाजन से लाखों परिवारों की जिंदगियां बर्बाद हो चुकी थी. वक्त का मारा ऐसा ही एक परिवार धर्मपाल का भी था. रोजगार की तलाश में सियालकोट से सैकड़ों मील का सफर तय करके जब धर्मपाल अपने रिश्तेदारों के साथ दिल्ली पहुंचे तो करोलबाग में अपनी बहन के घर पर ठहरे थे. करोलबाग में ही एक खाली प्लाट पर कब्जा करके धर्मपाल ने दिल्ली में अपना पहला आशियाना बनाया था लेकिन अब रोजगार की चुनौती उसके सामने खड़ी थी. उन दिनों धर्मपाल की जेब में 1500 रुपये ही बाकी बचे थे. पिता से मिले इन 1500 रुपये में से 650 रुपये का धर्मपाल ने घोड़ा और तांगा खरीद लिया औऱ इस तरह वो बन गया टांगेवाला. 

 

महाशय धर्मपाल ने बताया कि चांदनी चौक चला गया कुछ लोग टांगे बेच रहे थे भाई साहब मियां तो कितने का , 800 रूपये का खैर मैंने 650 का तांगा ले लिया और मैं आया गांव लेकर कहते हैं ना बेकार से कार अच्छी . बड़ी मुश्कील से खरीदा , तांगा मुझे पता ही नहीं था आहिस्ता आहिस्ता मैंने तांगा बांधा , सुबह उस घोड़े को मालिस कर दी , टांगे मल दी. फिर मैं पहुंच गया करोलबाग , वहां दो बारात फिर तांगा खड़ा किया करोलबाग पर देखा मैंने जैसा लोग जैसा सवाल वैसी गाली निकालना था, नहीं आप नहीं कर सकते छोड़ दिया गंदा काम था. फिर मैंने कहा क्या करें भाई अपना काम शुरू किया फिर मैंने . हम दुकानदार थे इतना काम कौन करता छोड़ दिया.

 

कोचवान धर्मपाल की ये दास्तान सन 47 की हैं. धर्मपाल का तांगा उन दिनों दिल्ली के कुतुब रोड पर दौड़ा करता था. ये सिलसिला करीब दो महीने तक यूं ही चलता रहा और एक दिन अचानक धर्मपाल को ये अहसास हुआ कि तांगा चलाना उसके बस की बात नहीं है. लेकिन मिर्च मसालों के काम के अलावा उसे दूसरा कोई काम आता भी नहीं था लिहाजा धर्मपाल और उनके परिवार ने मसालों के अपने पुराने धंधे की तरफ ही कदम बढाने का फैसला कर लिया.

 

महाशय धर्मपाल ने बताया कि  मैं, मेरे पिताजी, मेरा बड़ा भाई. चले गए. तांगा हमने लोगों को दे दिया कि तु लेले भईया. छोड़ दिया. वहां हमने देखा क्या करेंगे काम तो था साग का काम था फिर हमने अपना काम शुरू कर दिया. मसाले तैयार करने लगे , खोखा बना दिया मैंने , 14 फुट का खोखा लकड़ी का बनाया. कमाल है मसाला यार कमाना है, हद हो गई हल्दी 5 की, दाल चने की दाल 100 की सेर, मिर्ची क्या भाव थी दो , इतना सस्ता समान था. बदाम 3 रूपये सेर आज क्या भाव है कोई हिसाब ही नहीं है . मसाले रखी, दालें रखी आहिस्ता आहिस्ता काम शुरू कर दिया हमने.

 

10 अक्टूबर 1948 में धर्मपाल ने अपना तांगा और घोड़ा बेच दिया. और करोलबाग की अजमल खां रोड पर ही एक छोटी सी दुकान यानी खोखा बनवा लिया. सियालकोट की एक बडी और भरी पूरी दुकान से उठ कर अब धर्मपाल का पूरा परिवार एक छोटे से खोखे में आ पहुंचा था. लेकिन आगे चल कर धर्मपाल ने मिर्च मसालों का जो साम्राज्य स्थापित किया उसकी नींव इसी छोटे से खोखे पर रखी गई थी. अखबारों में विज्ञापन के जरिए जैसे-जैसे लोगों को पता चला कि सियालकोट की देगी मिर्च वाले अब दिल्ली में है धर्मपाल का कारोबार तेजी से फैलता चला गया. 60 का दशक आते-आते महाशियां दी हट्टी करोलबाग में मसालों की एक मशहूर दुकान बन चुकी थी. 

महाशय धर्मपाल ने बताया कि बात ऐसी है सबसे बड़ी बात ये है की हम माल बहुत बढ़िया बनाते हैं फर्स्ट क्लास, रही बात माल कमाई का , माल बढ़िया वहां ऐसा ऐसा काम बढ़ता गया.. बढ़ता गया.. बढ़ता गया, फिर मैंने क्या किया एक दुकान ली मैंने पंजाब बाग में दुकान नंबर 10. वह दुकान बनाने के लिए मैंने जगह ले ली , जो वो बन गई काम और बढ़ गया, फिर मैंने खाड़ीपड़ी में दुकान ली, गढ़ा बेचकर मैंने, वहां दुकान फिर मैंने बनाई.

 

महाशय धर्मपाल के परिवार ने छोटी सी पूंजी से कारोबार शुरु किया था लेकिन कारोबार में बरकत के चलते वो दिल्ली के अलग – अलग इलाकों में दुकान दर दुकान खरीदते चले गए. गुलाटी परिवार ने पाई–पाई जोड़कर अपने धंधे को आगे बढ़ाया और मिर्च – मसालों की बिक्री जब ज्यादा होने लगी तो उनकी पिसाई का काम घर की बजाए अब पहाड़गंज की मसाला चक्की में होने लगा था लेकिन एक दिन जब महाशय धर्मपाल अपने मसालों की जांच करने मसाला चक्की पर पहुंचे तो वहां मसालों में हो रही मिलावट को देख कर सन्न रह गए थे.

 

महाशय धर्मपाल बताते हैं कि बाबू लाल ने मशीन में दाल डाल दी हल्दी में ओहो, मैं कहा अब क्या भाई, फिर वहां गया मैं पहाड़गंज में, बाबु जी आपने ये क्या किया देखो आप तो बड़े शरीफ आदमी थे बड़े अच्छे आदमी थे. चने डाल दिए हल्दी का दाम मंहगा था. इल्जाम लगाते हो आप जी ऐसा बोला. दुकान में हमने हाथ जोड़ लिया.

 

सियालकोट के दिनों से ही मसालों की शुद्धता गुलाटी परिवार के धंधे की बुनियाद थे यही वजह थी कि धर्मपाल ने मसाले खुद ही पीसने का फैसला कर लिया. लेकिन ये काम इतना आसान नहीं था. वो भी उन दिनों में जब बैंक से कर्ज लेने का रिवाज नहीं था लेकिन महाशय धर्मपाल की ये मुश्किल ही उनकी कामयाबी की वजह बन गई. गुलाटी परिवार ने 1959 में दिल्ली के कीर्ति नगर में मसाले तैयार करने की अपनी पहली फैक्ट्री लगाई थी. 93 साल के लंबे सफर के बाद सियालकोट की महाशियां दी हट्टी आज दुनिया भर में एमडीएच के रुप में मसालों का ब्रैंड बन चुकी है.  

 

महाशय धर्मपाल बताते हैं कि मैंने सीखा छह बातें ईमानदार बनना, मेहनत करना और मीठा बोलना, कृपा होती है परमात्मा की, आशीर्वाद माता पिता का, प्यार सारी दुनिया का. आपसे प्यार से कितना काम बढ़ गया. फिर मैंने क्या शुरू किया वहां से फिर मैंने एक फैक्ट्री और लगाई राजस्थान में, इंदौर मे, मेथी काम शुरू किया, काम वहां बढ़ गया. और लड़के अच्छे ईमानदार थे अब आज चार फैक्ट्री वहां बन गई, वहां मसाले पीस रहे हैं, मसाले वहां आ रहे हैं, मेथी वहां से आ ही जाती है , मेथी दाना आता है, सरसो आती है वहां से बड़ा काम बढ़ गया . इतना काम बढ़ता गया बढ़ता गया आहिस्ता आहिस्ता हमने दुबई शुरू किया काम. लंदन में शुरू किया. सारे पंजाब में एजैंसी बना दी स्टाकिस्ट बना दिए.

 

92 साल के धर्मपाल मसालों की दुनिया में आज बेमिसाल हैं. उनकी कंपनी सालाना करोडों रुपयों का कारोबार करती है लेकिन एक तांगे वाले से अरबपति बनने की उनकी ये अदभुत कामयाबी 60 सालों की कड़ी मेहनत और लगन का नतीजा है. दौलत के ढेर पर बैठ कर आज भी महाशय धर्मपाल ईमानदारी, मेहनत और अनुशासन का पुराना पाठ भूले नहीं है. यही वजह है कि आज उनके मसाले दुनिया के सौ से ज्यादा देशों में इस्तेमाल किए जाते हैं और इसके लिए उन्होंने देश औऱ विदेश में मसाला फैक्ट्रियों का एक बड़ा साम्राज्य खड़ा कर दिया है.  

 

मार्केटिंग प्रमुख एमडीएच राजेंद्र कुमार बताते हैं कि हमारा लंदन में वेयरहाउस है लंदन में ऑफिस है हमारा , दुबई में हमारी फैक्ट्री है शारजाह में ऑफिस भी है हमारा , यूएस में भी ऑफिस है तो एक MDH के जो डिस्ट्रिब्यूटर हैं पूरी दुनिया में हैं. हमारा मसाला 100 से ज्यादा देशों में जाता है पूरे यूएस में आपको सभी स्टोर में MDH मसाला मिलेगा. कनॉडा में आपको बहुत मिलेगा , यूके में हर स्टोर में आपको मिलेगा , यूरोप में  MDH के मसाले मिलेंगे.  पूरे गल्फ देशों में आपको मसाले मिलेंगे. नीचे ऑस्ट्रेलिया चले जाएं , साउथ अफ्रीका चले जाएं, न्यूजीलैंड चले जाएं,हांगकांग, सिंगापुर यहां तक चीन चले जाएं, जापान चले जाएं,  जो MDH है उनके इंडिया में तकरीबन हजार के करीब डिस्ट्रिब्यूटर हैं. हमारे 40 सुपर स्टॉक हैं पूरे इंडिया में और 1000 डिस्ट्रिब्यूटर और हम लोग हर महीने छह लाख आउटलेटस को केटर करते हैं हमारी जो मार्केटिंग रहती है एक तो मैंने आपको बताया क्वालिटी , दूसरा हमारे डिस्ट्रिब्यूटर से हमारे जो केटरर्स हैं उनसे हमारा डाइरेक्ट लिंक रहता है. तीसरा महाशय जी जहां भी जाते हैं एक चलती फिरती एडवरटाइजमेंट हैं.

 

टेलीविजन पर अक्सर अपने मसालों के विज्ञापन में नजर आने वाले महाशय धर्मपाल को जमाना पहचानता है लेकिन उनकी जिंदगी की हकीकत को शायद कम ही लोग जानते हैं. महाशय धर्मपाल की उम्र अब 92 साल हो चली है बावजूद इसके वो आज भी बिना थके, बिना रुके 12 से 14 घंटे तक काम करते हैं. लेकिन उनकी शख्सियत का एक दूसरा पहलू और भी है. 

 

एमडीएच स्कूल जनकपुरी के मैनेजर गोविंद राम अग्रवाल बताते हैं कि मेरे जीवन में 92 वर्ष की आयु का ये अकेला ऐसा व्यक्ति है जिसको सब पता है की कहां क्या हो रहा है, कहां की क्या आवश्यकता है, कौन व्यक्ति क्या कर रहा है, कोई उनके पास लेखा जोखा नहीं है परंतु इतने बड़े व्यवसाए को देखने के बाद भी जितने स्कूल महाशय जी के चल रहे हैं उन सब स्कूलों के प्रत्येक व्यक्ति की तरफ उनका ध्यान है. मुझे नहीं मालूम है कभी भी हमें जाकर कहना पड़ा हो कि महाशय जी स्कूल की ये आवश्यकता है.

 

एमडीएच इंटरनेशनल स्कूल जनकपुरी की प्रिंसिपल मिशेल मोरिस बताती हैं कि हम यही युवाओं को बोलना चाहेंगे की अगर महाशय जी के जैसे बनना चाहेंगे तो उनकी बातों को ध्यान में रखना चाहिए जैसे की महाशय जी हमेशा कहते हैं खूब मेहनत करो , ईमानदार बनो, माता पिता की आशिर्वाद लो , भगवान को हमेशा याद रखो, ये सब चीजें हमेशा हमें महाशय जी सिखाते रहते हैं. और जब भी स्कूल आते हैं और बच्चों से बात करते हैं तो हमेशा ये ध्यान में बच्चों को याद रखते हैं.

 

दिल्ली के हरिनगर, द्वारका और जनकपुरी के ये वो स्कूल है जो महाशय धर्मपाल के ट्रस्ट के जरिए चलाए जाते हैं. जनकपुरी का ये माता चानन देवी अस्पताल भी महाशय धर्मपाल ने अपनी मां की याद में बनवाया है. इस अस्पताल में सभी के लिए मुफ्त इलाज की व्यवस्था तो नहीं है लेकिन यहां डॉक्टरों की फीस से लेकर दवाइयों और मरीज के इलाज में भारी रियायत जरुर दी जाती है. जिसका फायदा यहां दूर- दूर से लोग आकर उठाते हैं. 

 

माता चानन देवी अस्पताल की मेडिकल सुपुरिंटेंडेंट डॉ निधि शरीन बताती हैं कि महाशय जी का जो एक मकसद था ये हॉस्पिटल बनाने का. उन्होंने हॉस्पिटल सेवा भाव के उद्देश्य से बनाया था. ये शुरूआत हुआ था एक आई केयर हॉस्पिटल. लेकिन उनको था की मैं सोसायटी की सेवा करूं इसलिए उन्होंने ये हॉस्पिटल इतना एक्सपैंड करवाया. हम लोग फ्री बहुत करते हैं, ओपीडी में आईपीडी में भी बहुत फ्री करते हैं. हमने बड़ा नॉर्मल फीस रखा हुआ है ओपीडी का.

 

स्कूल और अस्पताल से लेकर गौशाला और अनाथ आश्रमों तक महाशय धर्मपाल के सामाजिक कामों की लिस्ट काफी लंबी है. लेकिन सबसे खास बात ये है कि 92 साल की उम्र में भी महाशय धर्मपाल संघर्ष के अपने दिन भूले नहीं है यही वजह है कि ये जज्बा उनके कामों, उनकी बातों और उनके व्यवहार में आज भी झलकता है. 

 

माता चानन देवी अस्पताल के डायरेक्टर एम लाल बताते हैं कि मेरा जो उनके साथ संबंध है तकरीबन 20-25 साल से हो गया है मैंने ये देखा है उनका मोटो ही ये है कि जो खिलाने में मजा है वो खाने में नहीं जिंदगी में तु किसी के काम आना सीख ले. उसी परिस्तिथि में टलते हैं और कहते हैं जो भी मैं कमाता हूं वो अपने लिए नहीं कमाता हूं कई बार मैंने कहा ख्याल रखो अपनी सेहत का कोई ऐसी गड़बड़ ना तो कहते हैं मैं कहीं नहीं जाऊंगा. मेरे को इतनी दुआएं लोगों की मिलती हैं की दुआएं और लोग मुझे मरने नहीं देंगे. तो मतलब उनका जो मोटो है वो सेवा ही सेवा है हर साइड पर सेवा ही करते हैं.

 

दिल्ली में महाशय धर्मपाल का ये वो आशियाना है जहां घड़ी जब सुबह के साढे चार बजाती है तो उनकी ये कोठी अलार्म की आवाज से गूंज जाती है और इसी के साथ शुरु हो जाती है महाशय धर्मपाल की थका देने वाली दिनचर्या.

 

92 साल की उम्र में भी महाशय धर्मपाल में जवानों वाला जोश बरकरार है और उनकी इस फिटनेस का राज उनके कड़े नियमों, अनुशासित और संयमित जिंदगी में ही छुपा हुआ है. वह सुबह पौने पांच बजे बिस्तर छोड देते हैं. और पांच बजकर पांच मिनट पर सैर के लिए घर से निकल पड़ते हैं. सूरज की पहली किरण फूटने से पहले ही महाशय धर्मपाल पास के पार्क में सैर के लिए पहुंचते हैं फिर चाहे मौसम सर्दी का हो गर्मी का या फिर बरसात का उनकी सैर का ये सिलसिला सालों से इसी तरह चला आ रहा है. सैर के दौरान ही महाश्य धर्मपाल योगा और वर्जिश करने से भी कभी नहीं चूकते हैं.

 

पार्क में सैर के बाद जब महाशय धर्मपाल वापस अपने घर लौटते है तो सबसे पहले बादाम के तेल से हल्की मालिश करना वो कभी नहीं भूलते. जिंदगी को अपने बनाए नियमों पर सख्ती से चलाने वाले धर्मपाल, संतुलित भोजन और संयमित जीवन को ही अपनी फिटनेस का राज बताते हैं.

 

92 साल की बडी उम्र में भी महाशय धर्मपाल जोश से लबरेज नजर आते हैं. उनकी ये कामयाब जिदंगी हर उस शख्स के लिए आज एक जीती जागती मिसाल बन चुकी हैं जो जिंदगी में कुछ कर गुजरना चाहता है लेकिन महाशय धर्मपाल की जिंदगी से जुड़ा एक सच अभी और बाकी है. और वो सच है हवन. दरअसल सुबह काम पर निकलने से पहले महाशय धर्मपाल अपने घर में हवन करना भी कभी नहीं भूलते है. मसालों के कारोबार की तरह हवन का ये काम भी उन्हें उनके पिता चुन्नीलाल से विरासत में ही मिला है.

 

महाशय धर्मपाल की बहू ज्योति गुलाटी ने बताया कि मेरे को भी इस घर में आए 25 साल हो गए हैं. तो मैं शुरू से ही देख रही हूं उनको टाइम से उठते हुए और टाइम पर हवन करते हुए. और कभी उन्होंने कभी कहीं जाना भी हो तो तब भी वो अपने नियम से चाहे थोड़ी देर पहले ही हवन करके जरूर जाते हैं. ये बहुत अच्छी क्वालिटी है उनमें तो. शादी से पहले तो मैंने कभी हवन किया भी नहीं था. ये मैंने शादी के बाद ही पिताजी से ही सिखा है . मंत्र भी मैंने उनसे ही सिखें हैं. हवन करना, मंत्र वगैरह सब मैंने उनसे सिखा है. तो बहुत इस्पाएरिंग हैं मेरे लिए ये.

 

महाशय धर्मपाल की ये कहानी एक जर्रे के आसमान बनने की दास्तान है. दो आने कमाने वाला एक शख्स कैसे मेहनत करके अरबों रुपये का साम्राज्य खड़ा कर सकता है इसकी जीती जागती मिसाल हैं  महाशय धर्मपाल. लेकिन बड़ी कामयाबी हासिल करने वाले महाशय धर्मपाल ने जिंदगी में उतने ही बड़े सदमें भी सहे हैं. 1992 में जब उनकी पत्नी लीलावंती का निधन हुआ तो इसके ठीक डेढ महीने बाद ही अचानक उनका छोटा बेटा संजीव गुलाटी भी चल बसा. लेकिन ये डबल सदमा भी उन्हें अपनी राह से डिगा ना सका. दरअसल महाशय धर्मपाल का वो बुलंद हौसला ही है जिसने उन्हें कामयाबी की राह पर हमेशा आगे बढाया है और उनके मजबूत दिल ने 92 साल की उम्र में आज भी उन्हें जवान बनाए रखा है.

 

महाशय धर्मपाल बताते हैं कि जिंदादली इसी का नाम है, मुर्दा क्या खाक जिया करते हैं , हम जिंदा रहेंगे आपके प्यार से, अच्छा काम करो मरने के बाद भी इंसान जिंदा हो जाता है.

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20 महीने पहले ही 2019 के लिए अमित शाह ने रचा 'चक्रव्यूह', 360+ सीटें जीतने का लक्ष्य
20 महीने पहले ही 2019 के लिए अमित शाह ने रचा 'चक्रव्यूह', 360+ सीटें जीतने का लक्ष्य

नई दिल्ली: मिशन-2019 को लेकर बीजेपी में अभी से बैठकों का दौर शुरू हो गया है. बीजेपी के राष्ट्रीय...

अगर लाउडस्पीकर पर बैन लगना है तो सभी धार्मिक जगहों पर लगे: सीएम योगी
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लखनऊ: कांवड़ यात्रा के दौरान संगीत के शोर को लेकर हुई शिकायतों पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ...

मालेगांव ब्लास्ट मामला: सुप्रीम कोर्ट ने श्रीकांत पुरोहित की ज़मानत याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा
मालेगांव ब्लास्ट मामला: सुप्रीम कोर्ट ने श्रीकांत पुरोहित की ज़मानत याचिका...

नई दिल्ली: 2008 मालेगांव ब्लास्ट के आरोपी प्रसाद श्रीकांत पुरोहित की ज़मानत याचिका पर सुप्रीम...

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