इंटरसेप्टर मिसाइल देश के लिए के लिए बड़ी कामयाबी

By: | Last Updated: Wednesday, 25 November 2015 9:17 AM
Interceptor missile test is a big achievment for India

नई दिल्ली : एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए भारत ने किसी भी बैलेस्टिक मिसाइल हमले को बीच में ही नाकाम करने में सक्षम  इंटरसेप्टर मिसाइल का सफलतापूर्वक परीक्षण कर लिया है. मल्टी लेयर बैलेस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम विकसित करने के प्रयासों के अंतर्गत भारत ने ओडिशा के बालासोर तट से स्वदेश निर्मित सुपरसोनिक इंटरसेप्टर मिसाइल का परीक्षण किया.

 

इस परीक्षण में  इंटरसेप्टर  के फ्लाईट मोड़ के दौरान विभिन्न आयामों की जांच की गई. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन  द्वारा निर्मित इस मिसाइल को एडवांस्ड एयर डिफेंस मिसाइल (एडीडी) के नाम से भी जाना जाता है. इंटरसेप्टर मिसाइल ने हवा में 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर इलेक्ट्रॉनिक लक्ष्य को सफलतापूर्वक भेद दिया. परीक्षण के दौरान एक इलेक्ट्रोनिक तरीके से तैयार टारगेट तय किया गया था. ट्रेकिंग राडारों से सिग्नल मिलते ही इंटरसेप्टर ने अब्दुल कलाम आइलैंड (वीलर आइलैंड ) से उड़ान भरी और तय रास्ते पर आने वाली हमलावर मिसाइल को हवा में ही ध्वस्त कर दिया .यह परीक्षण स्वदेशी रूप से विकसित उच्च गति की इंटरसेप्टर मिसाइल के प्रभावशीलता के निरीक्षण करने के लिए किया गया.

 

इस परीक्षण के दौरान मिले डेटा के आधार पर इसकी मारक क्षमता के असर का अध्ययन किया जा रहा है जिसे बाद में अपग्रेड भी किया जा सकता है. एक अनुमान के मुताबिक फिलहाल मिसाइल 2000 किलोमीटर  तक हवा में मार कर सकती है. साढ़े सात मीटर लंबी एडीडी इंटरसेप्टर मिसाइल एक एकल चरण ठोस रॉकेट चालित मिसाइल है जोकि इनीर्सियल नेविगेशन प्रणाली से लैस है. इसे एक हाईटेक कंप्यूटर, एक इलेक्ट्रो –मैकेनिकल एक्टीवेटर से लैस किया गया है .इसका अपना अलग मोबाइल लांचर ,इंटरसेप्सन के लिए सिक्योर डेटा लिंक ,स्वतंत्र  ट्रेकिंग  क्षमता  और अत्याधुनिक राडार भी है.

 

राडार  आधारित इस प्रणाली में लक्ष्य को खोजने का कार्य उससे मिलने वाले डाटा से किया जाता है. पृथ्वी के वातावरण से मिसाइल के बाहर जाते ही हीट शील्ड निकलती है और इंफ्रारेड सीकर खुल जाता है, जिससे लक्ष्य को निशाने पर लिया जाता है. एंटी मिसाइल सिस्टम में संवेदनशील राडार की सबसे ज्यादा अहमियत है. ऐसे राडार बहुत पहले ही वायुमंडल में आये बदलाव को भांप कर आ रही मिसाइलों की पोजिशन ट्रेस कर लेते हैं. पोजिशन लोकेट होते ही गाइडेंस सिस्टम एक्टिव हो जाता है और आ रही मिसाइल की तरफ इंटरसेप्टिव मिसाइल दाग दी जाती है. इस मिसाइल का काम दुश्मन की मिसाइल को सुरक्षित ऊंचाई पर ही हवा में नष्ट करना होता है. इसे ट्रेस कर, पलटवार करने की प्रक्रिया में महज कुछ सेकेंड का ही अंतर होता है.

 

मिसाइल कवच के बारे में पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के समय में अधिक जिक्र हुआ। रीगन ने शीतयुद्ध के समय में स्ट्रेटेजिक डिफेंस इनिशियेटिव (एसडीआइ) प्रस्तावित किया. यह एक अंतरिक्ष आधारित हथियार प्रणाली थी,जिसके सहारे इंटरकांटीनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (आइसीबीएम) को अंतरिक्ष में मार गिराने की बात की गयी थी. लेजर लाइट से लैस इस हथियार को मीडिया ने स्टार वार का नाम दिया था.

 

भारत के लिए यह मिसाइल रक्षा कवच बहुत जरूरी हो गया था क्योंकि चीन और पाकिस्तान लगातार अपने मिसाइल कार्यक्रमों को बढ़ावा दे रहें है . चीन के पास बैलेस्टिक मिसाइलों का अम्बार लगा हुआ है ऐसे में अपनी सुरक्षा के लिए यह जरूरी हो गया था कि दुश्मन की मिसाइल को हवा में ही नष्ट करने का सिस्टम विकसित किया जाए.

 

1962 के युद्ध में हम चीन से हार चुके हैं और पाकिस्तान से तो दो बार सीधी जंग हो चुकी है. लेकिन, अब यदि जंग की आशंका बनती है तो युद्ध पहले की अपेक्षा बिल्कुल दूसरे ढंग से लड़ा जायेगा. इसमें परमाणु बमों से लैस मिसाइलों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है. जिस तरह आजकल परमाणु हथियारों और मिसाइलों के आतंकवादियों के हाथों में पड़ने की आशंका जतायी जा रही है, उससे भी चिंतित होना स्वाभाविक है. अमेरिका, रूस,इस्राइल जैसे देशों के पास ये तकनीक हैं. लेकिन यदि भारत पर इस तरह के हमले होते हैं तो ऐसी स्थिति में हमारे पास बचने का उपाय नहीं रहता. नतीजतन, इन सभी पहलुओं को देखते हुए भी भारत का एंटी मिसाइल सिस्टम से लैस होना बहुत जरूरी था. 

 

आज महानगरों की घनी आबादी को देखते हुए इस तरह का एंटी मिसाइल सिस्टम हमारी सख्त जरूरत बन चुका है. इस मिसाइल कवच के विकसित होने से हमारे ऊर्जा स्रोतों मसलन, तेल के कुएं और न्यूक्लियर प्रतिष्ठानों की सुरक्षा सुनिश्चिलत की जा सकेगी.

 

कोई मिसाइल या रॉकेट अपने लक्ष्य को निशाना बनाये, उसके पहले ही उसे मार गिराने का विचार सबसे पहले द्वितीय विश्वकयुद्ध के दौरान आया. र्जमन वी-1 और र्जमन वी-2 प्रोग्राम इसी तरह के थे. हालांकि, ब्रिटिश सैनिकों के पास भी यह क्षमता थी और द्वितीय विश्व्युद्ध के दौरान उन्होंने दुश्मन देशों के कई ऐसे मिशन को नाकाम किया. बैलिस्टिक मिसाइल के इतिहास में र्जमन वी-2 को पहला वास्तविक बैलिस्टिक मिसाइल माना जाता है. इसे एयरक्राफ्ट या अन्य किसी युद्धक सामग्री से नष्ट करना असंभव था. इसे देखकर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी सेना ने र्जमन तकनीक की मदद से एंटी मिसाइल तकनीक पर काम करना शुरू किया. लेकिन व्यापक सफलता 1957 में सोवियत संघ द्वारा इंटर कांटीनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल विकसित करने के बाद ही मिली.

 

दुनिया के कई देशों द्वारा मिसाइल परीक्षण करने के कारण इनसे बचाव की जरूरत सभी को महसूस होने लगी है.  यही कारण है कि विकसित देश अब मिसाइल सुरक्षा कवच विकसित करने पर अधिक ध्यान दे रहे हैं. अभी फिलहाल यह सिस्टम दुनिया के चुनिंदा देशों के पास ही है. एंटी बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम फिलहाल अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, जापान और इजराइल के पास ही है. अब भारत भी इन देशों की श्रेणी में आ गया है, जिसके पास एंटी बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम है.

 

हालांकि, हर देशके पास इससे संबंधित अलग-अलग तकनीक हैं. मसलन, अमेरिका और रूस के पास इंटर कांटीनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल को भी मार गिराने की तकनीक है, जबकि अन्य देशों के पास अभी यह तकनीक नहीं है. भारत के एंटी मिसाइल विकास कार्यक्रम में इस्राइल का अहम योगदान है जिसके ग्रीनपाइन राडार की बदौलत एडवांस्ड एयर डिफेंस (एएडी) मिसाइल प्रणाली के अब तक कई परीक्षण किए गए हैं. चीन और पाकिस्तान के अलावा अब आतंकवादी संगठनों से मिसाइल हमलों के खतरों को देखते हुए मिसाइल रोधी प्रणाली की जरूरत पैदा हुई है.

 

हाल ही में हमास और इजराइल के बीच लड़ाई के दौरान इजराइल की ऐसी ही रक्षा प्रणाली ऑयरन डोम काफी कारगर साबित हुई थी. ऑयरन डोम ने गाजा पट्टी से इजराइल पर दागे गए 300 से अधिक रॉकेटों को हवा में ही नष्ट कर दिया भविष्य में यदि भारत पर इस तरह का कोई मिसाइल या रॉकेट हमला होता है तो हमारी अपनी बनाई हुई यह प्रणाली बहुत अहम साबित होगी.

 

एक अनुमान के अनुसार भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन(डीआरडीओ) 2016 तक पांच हजार किमी मारक क्षमता वाली मिसाइलों से बचाने की क्षमता वाला मिसाइल रक्षा कवच (मिसाइल डिफेंस शील्ड) बना लेगा. डीआरडीओ के अनुसार बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा कवच अब परिपक्व है और इसका पहला चरण पूरी तरह तैयार है. इसकी खासियत है कि इसे बहुत कम समय में तैनात किया जा सकता हैं. पहले चरण के तहत यह कवच देश में दो जगहों पर तैनात किया जा सकता है, जहां आधारभूत ढांचा उपलब्ध हो। देश को दुश्मनों से सुरक्षित करने के लिए इंटरसेप्टर मिसाइल का सफल परीक्षण देश के लिए बड़ी सफलता है.

 

स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए इंटरसेप्टर मिसाइल द्वारा दुश्मन देश की मिसाइल को हवा में ही नष्ट करनें की क्षमता हासिल करना देश के प्रतिरक्षा तंत्र को बहुत मजबूत करेगा.

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