कश्मीर के पंडितों का ये दर्द आपकी रूह को कंपा देगा

investigates story of kashmiri pandits being displaced since 26 years

नई दिल्ली: आज ही के दिन ठीक 26 साल पहले जम्मू कश्मीर से पंडितों का विस्थापन शुरू हुआ था. कश्मीरी पंडितों को जेहादी कट्टरपंथियों ने घर छोड़ने को मजबूर कर दिया था. करीब 26 साल से अपने ही वतन में विस्थापितों की तरह जिंदगी जीने को मजबूर हैं कशमीरी पंडित. आखिर किस हालात में रह रहे हैं कश्मीरी पंडित?

जिस कश्मीर को जन्नत कहा जाता है वो जमीन 26 साल पहले कश्मीरी पंडितों की बर्बादी के निशान बना दिये गए. ठीक 26 साल पहले आज ही के दिन कट्टरपंथियों और जेहादियों ने कश्मीरी पंडितों को घर बार छोड़ने पर मजबूर कर दिया. 1947 तक जिस कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की आबादी 15 फीसदी थी, उस कश्मीर में आज 808 परिवारों के सिर्फ 3 हजार 445 कश्मीरी पंडित ही बचे हैं. अपने ही देश में विस्थापितों की ज़िंदगी जी रहे कश्मीरी पंडितों को किस हालात में रहना पड़ रहा है उसकी पड़ताल की है एबीपी न्यूज ने.

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दिल्ली में रह रहे विजय टिक्कू हैं. जेहादियों के विरोध के बाद किसी तरह जान बचाकर इनका परिवार दिल्ली चला आया. 38 साल की उम्र में इन्हें अपनी बसी बसायी जिंदगी छोड़ने को मजबूर कर दिया गया. विजय की उम्र अब 63 साल हो चुकी है. अपनी बर्बादी के इनके पास लंबी दास्तां है.

कमल हाक…. श्रीनगर के लाल चौक से करीब 4 किलोमीटर की दूरी पर इनका राइनवारी में घर था. 21 अप्रैल को ये दिल्ली चले आए. तीन दिन तक इन्हें दिल्ली में फुटपाथ पर सोना पड़ा. मुश्किल से नौकरी मिली. श्रीनगर की बसी बसाई जिंदगी को छोड़ने के बाद कमल को दिल्ली में नए सिरे से सब कुछ शुरू करना पड़ा.

अजय चरुंगू…. पनुन कश्मीर के चेयरमैन हैं. पनुन कश्मीर कश्मीरी पंडितों की संस्था है जिसका मक़सद वापस कश्मीर लौटना है. 26 साल बाद आज भी इन्हें याद है कि किस तरह उन्हें अपने ही घर से निकाल दिया गया था.

अग्निशेखर…60 साल के अग्निशेखर . 34 साल की उम्र में इन्हें अपनी वादी छोड़ कर दिल्ली भागना पड़ा. जेहादी इनकी जान के पीछे पड़ गए थे. इनकी आंखों के सामने ही लोगों को जिंदा जला दिया गया था.

यह है जम्मू से करीब 30 किलोमीटर दूर राज्य सरकार की बनाई गई विशेष जगती कॉलोनी. इस कॉलोनी में करीब 4200 कश्मीरी पंडित अपने परिवारों के साथ विस्थापितों की जिंदगी जीने को मजबूर हैं. रोशन लाल ने जवानी के दिनों में कश्मीर का आतंकवाद और उसके बाद विस्थापन का दर्द झेला है. 26 साल बाद भी रोशन लाल अपनी घर वापसी का सपना देख रहे हैं.

रविंदर रैना ने अपनी जिंदगी विस्थापन में काटी है. इनका आरोप है कि सरकार ने इनके लिए कुछ भी नहीं किया. रविंदर को एक परेशानी यह भी सता रही है कि उन्होंने तो जैसे-तैसे अपनी उम्र काट ली लेकिन अब उनके बच्चों का क्या होगा.

कश्मीर से विस्थापित हो चुके पंडित आज “विस्थापना दिवस” मना रहे हैं. वहीं वो कश्मीरी पंडित जिन्होंने खराब हालात के बावजूद कश्मीर घाटी में ही रहे आज अपने आप को ठगा महसूस कर रहे हैं. इन कश्मीरी पंडितों की शिकायत ये है कि सरकार इन्हें भूल गयी है.

श्रीनगर के पुराने शहर का हब्बा कदल का इलाका. संकरी गलियों वाले इस इलाके में 1990 तक सबसे ज्यादा कश्मीरी पंडित रहते थे. आज भी चुनाव आयोग के मुताबिक इस चुनाव क्षेत्र में 30 हज़ार से ज्यादा कश्मीरी पंडित वोटर हैं लेकिन सब के सब विस्थापित हैं. हब्बा कदल में आज रह रहे दस परिवारों में से एक है भूषण लाल का परिवार. 65 साल के भूषण लाल का कहना है कि इनका परिवार आज सरकार की अनदेखी का शिकार बन कर रह गया है.

परिवार का आरोप है कि केंद्र और राज्य सरकार की प्राथमिकता सिर्फ कश्मीर से पलायन कर चुके कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास पर टिकी है. घाटी में रह रहे पंडित उपेक्षित महसूस कर रहे हैं.

कश्मीरी पंडित परिवारों की पूरी कश्मीर घाटी में यही कहानी है. शिक्षा विभाग में लेक्चरर रह चुके मोती लाल धर का परिवार भी पिछले 26 सालों में कश्मीर घाटी में घटी हर घटना को अपनी आंखों से देखा और दिल से महसूस किया है. श्रीनगर के गावकदल में रह रहे इस परिवार की कहानी भी सभी कश्मीरियों की तरह ही संघर्ष भरी है.

रूपा धर 26 साल के खून खराबे और हिंसा के बावजूद कश्मीर में अपने पति और परिवार के साथ रह रही हैं. इन्हें कभी अपने मुस्लिम पड़ोसियों से परेशानी नहीं हुई.

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कश्मीरी विस्थापितों के पुनर्वास के नाम पर भी कुछ अच्छा सलूक नहीं हुआ ये शिकायत भी है उन लोगों की जो सरकारी पुनर्वास पैकेज पर वापस लौटे. श्रीनगर से 22 किलोमीटर दूर शेखपूरा में जम्मू और बाकी देश में बसे विस्थापितों के पुनर्वास के लिए कॉलोनी बनायी गयी. सैकडों की संख्या में पुनर्वास के नाम पर कश्मीरी पंडितों को सरकारी नौकरी दी गयी. कॉलोनी में रहने के लिए घर दिया गया लेकिन पुनर्वास नहीं हुआ.

37 साल के साहिल. सरकारी पैकेज के तहत पांच साल पहले घाटी में वापस आए. आज इनके पास नौकरी है, घर है लेकिन अकेले रहने पर ये मजबूर हैं. आज भी साहिल अपने घर में नहीं रह सकते हैं और ना ही अपने पड़ोसियों के साथ मेल मिलाप बढ़ा सकते हैं.

ये कहानी साहिल की ही नहीं इस कॉलोनी में रहने वाले सभी वापस लौटने वाले विस्थापितों की है जो आज भी सामान्य जीवन को तरस रहे हैं.

आंकड़ों के मुताबिक 1990 के बाद करीब 7 लाख कश्मीरी पंडित विस्थापित होने को मजबूर हुए. इस समय घाटी में पंडितों के मुश्किल से कुछ सौ परिवार ही रह रहे हैं. श्रीनगर 142 गांदरबल 26 बडगाम 85 बारामूला 65 अनंतनाग 121 कुलगाम 61 शोपियां 50 पुलवामा 125 बांडीपोरा छह कुपवाड़ा सात.

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Web Title: investigates story of kashmiri pandits being displaced since 26 years
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