एबीपी न्यूज़ की पड़ताल: दाल में आखिर काला क्या है?

By: | Last Updated: Wednesday, 21 October 2015 3:48 PM
investigation on pulse rate hike

नई दिल्ली: वित्त मंत्री कह रहे हैं कि आने वाले दिनों में दाल की कीमत घटेगी लेकिन सच ये है कि दालों की नई फसल आने तक दालों की किमतों से लोगों को बड़ी राहत मिलना मुश्कील है. लोगों को दिवाली में भी दालों के बढते दामों से कोई राहत नहीं मिलने वाली. देश में दालों की किमते आसमान छु रही है.

 

आपके अपने चैनल एबीपी न्यूज की पड़ताल में सामने आया है की दाल की किमते दिसंबर तक और रुलाएंगी. इस पड़ताल में कई चौकाने वाली बाते सामने आई है और पता चला है कि कैसे दाल उत्पादक देश भारत की दाल की कमजोर नीती का फायदा उठा रहै हैं.

 

आप लोगों ने सुना होगा कई लोग कहते है, दाल में कुछ काला है, आम तौर पर ये ही कहा जाता है लेकिन आज पुरे देश में दाल की किमतें जो आसमान छु रही है, क्या इस में भी कुछ काला है? कहीं ऐसा तो नहीं कि दाल के कारोबारियों ने कालाबाजारी कर दाल के दाम बढा दिए, और मुनाफा बटोर रहे हैं. या फिर दाल के दाम बढने की कुछ और वजहें भी है? आज इसकी पड़ताल करते है की क्या है ये दाल का ये खेल.

 

महाराष्ट्र के मराठवाडा का एक जिला है लातूर. इस शहर की पहचान महाराष्ट्र के लिए कोई नई नहीं है. देश में दालों की बढती किमतों की पड़ताल करने हम पहूंचे लातूर. भले ही देश के लोग इस शहर को ज्यादा ना जानें लेकिन म्यानमार, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीकन देशों की नजर इस शहर और आसपास के इलाके पर हमेशा बनी रहती है. ऐसा क्या है इस शहर में और जो इतने देश इस शहर पर नजर रखते है. दाल के खेल को जानने के लिए इस शहर को और आसपास के कर्नाटक और आंध्रा के इलाके को जानना पहचानना जरुरी है.

 

देश की सबसे बडी दाल की मंडी माहाराष्ट्र के लातूर में ही है. लगभग पुरे देश के तूअर दाल के भाव यहीं से तय होते है. यहां जब तुअर 14 हजार पर क्वींटल में बिकती है तब ये मार्केट में रिटेल में लोगों के घरों तक पहूंचेगी तो इसका दाम 180 से 185 रुपया प्रति क्विंटल होगा. इसमें प्रोसेसींग फीस तीन हजार रुपया है.

 

देश की तूअर दाल की सबसे बडी मंडी है लातूर, इस मंडी में महाराष्ट्र के अलावा कर्नाटका और आंध्रा से माल आता है. इसी वजहसे इस शहर में करीब 100 दाल मिले है. 

 

दाल के आड़ती बालाजी दासरे का कहना है, ”लातूर एक ऐसा मार्केट है, इंडिया में सबसे ज्यादा कच्चा माल यहां आता है, इसलिए दाल मिल यहां बहुत ज्यादा है, दाल मिल ज्यादा होने से यहां बड़े व्यापारी हैं, तुअर का भाव यहीं से निकलता है”

 

इस मंडी पर म्यानमार, कैनडा, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रिकन देशों की नजर क्यों होती है ये आपको आगे बताएंगे लेकिन उससे पहले समझ लेते है की आखिर क्यों देश में दालों के दाम आसमान छुने लगे.

 

इंडिया पल्सेस एन्ड ग्रेन असोशिएशन के अध्यक्ष प्रवीण डोंगरे बताते हैं, ”पिछले दो सालो से तूअर दाल का उत्पादन कम हूआ है, महाराष्ट्र और कर्नाटका में बारिश 30 से 40 फिसदी कम हूई. बर्मा और अफ्रिका में भी उत्पाद कम हूवा जहां से भारत इंम्पोर्ट करता है.”

 

लेकिन आखिर क्या इतना कम उत्पाद हूआ इस साल जिसकी वजह से दाल के दामों ने डबल सेंचुरी पार कर ली? दाल के दाम आसमान छुने लगे. पहले समझने की कोशीश करते हैं कि आखिर इस साल देश में दालों का कितना कम उत्पाद हूआ. विश्व में भारत दालों की पैदावार और खपत करने वाला सबसे बडा देश है.

 

हर साल देश में 22 मिलियन मीट्रिक टन दालों की खपत होती है जबकी भारत में दालों का उत्पाद 18 से 19 मिलियन मेंट्रीक टन पर अटका है. इसलिए हर साल देश में दालों का आयात करना पडता है. लेकिन इस साल इससे भी कम उत्पाद हूआ केवल 17.4 मिलियन मीट्रिक टन और दालों की कमी हो गई.

 

दाल कारोबारी अशोक अग्रवाल का कहना है, ”सरकार को देखना चाहिए था कि इस साल जब दालों का उत्पादन कम है तो स्टॉक में नियंत्रण लाना चाहिए था. एनसीडेक्स से पल्सेस को निकाल देना चाहिए था जब माल की कमी हो जाती है तब सट्टा खेलने वाले सटोरिए इसपर हावी हो जाते है और भाव बहुत बढ़ा देते है. इस पर सरकार ने ध्यान दिया नहींं इसलिए भाव में इतनी तेजी आई है, उत्पादन कम भी हूआ तो भी इतने भाव इतिहास में कभी नहींं बढ़े .”

 

अशोक अग्रवाल दाल के बडे कारोबारी हैं. वो मानते है की सरकार ने बडी कंपनीयो को दाल के कारोबार के लायसेंस दिए है. उनके पास दाल का स्टॉक हो सकता है छोटे व्यापारियों के पास नहीं है. तुअर दाल की बात कि जाए तो तूअर दाल के भाव में 5 अक्तूबर से 15 अक्तुबर तक करीब 50 रुपए का उछाल आया.

 

10000 रुपए पर कुंतल की तूअर दाल के भाव 16000 रुपए पर कुंतल तक पहंच गए. -कारोबारीयों के मुताबिक ये वही वक्त था जब अफ्रीका से इंम्पोर्ट तूअर दाल देश में आ रही थी. दालों की महंगाई को लेकर सब तरफ सरकार की आलोचना होने लगी और प्रदर्शन भी.

 

जाहिर सी बात है की तूअर और उड़द की कमी का फायदा सबने उठाय़ा और दाम बढा दिए वो सटोरिए हो या कुछ कारोबारी. लेकिन बस क्या इतना ही है दाल का खेल. जी नहींं दाल के इस खेल में कई देश भी शामिल है. जो भारत में दालों की कमी का सोच समझकर फायदा उठा रहे है.

 

इंडिया पल्सेस एन्ड ग्रेन असो. के वाइस प्रेसीडेंट बिमल कोठारी ने कहा, ”इस साल शॉर्टेज ज्यादा है इसलिए इंर्म्पोर्ट भी ज्यादा हूआ डिमांड और सप्लाई के हिसाब से टोटल ट्रेड इंर्म्पोर्ट करता है.”

 

दालों का उत्पाद कम है इसलिए हर साल देश में दालों को इंर्पोर्ट किया जाता है. इस साल देश में दालों की कमी का फायदा उठाकर जहां से हम दालों का इंर्पोर्ट करते है उन देशो ने जिसमें कैनडा, म्यानमार, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया ने दाम बढा दिए.

 

बिमल कोठारी बताते हैं, ”भारत में दाम बढे इसलिए वहां भी दाम बढे, ये तो बिजनेस है, वहां से डिमांड है तो मै दाम बढाके दूं, जैसे एक महीना पहले वहां मसूर का दाम 750 था अब वो बढकर 900 डॉलर हो गया, क्योंकि इंडिया से बहुत डिमांड है.”

 

म्यानमार में तूअर के भाव 1100 डॉलर पर टन थे वो भारत में मांग बढने पर 2000 से 2100 डॉलर पर टन हो गए. अफ्रीकन देशो में तू्अर के भाव 850 डॉलर पर टन थे वो भारत में मांग बढनेपर 1500 डॉलर पर पहूंच गए.

 

जाहिर सी बात है कि हमारे यहां दालों की कमी का फायदा विदेशी भी उठा रहे हैं और बढे हूए दामों पर हमें दाले बेच रहे हैं. हमने आपको पहले ही बताया था कि लातूर जैसी दाल मंडी पर इन देशों की नजर होती वो इसीलिए. लातूर के दाल के कारोबारी तो यहां तक बताते हैं कि तूअर दाल का भाव लातूर में क्या खुला इसकी खबर देश के सारे व्यापारियों तक पहूंचने से पहले म्यानमार पहूंच जाती है, क्योकि म्यानमार हमें तूअर इम्पोर्ट करता है.

 

भारत में पड़ रहा सूखा हो या कम हो रही बारिश इस पर इन देशों की नजर इस सब पर रहती है. अब जरा सुन लीजिए इसको देखते हूए इन देशो ने क्या किया.  बिमल कोठारी आगे बताते हैं कि 2 साल पहले चना यहां पर 27 रुपया किलो बिक रहा था इसलिए किसी ने इंर्पोर्ट नहीं किया लेकिन इस साल चने का भाव 50 रुपए किलो है. जो प्रोड्युसिंग कंट्री है ऑस्ट्रेलिया उसका पिछले साल का प्रॉडक्शन 4 लाख टन था इस साल 10 लाख टन क्योंकि इंडिया में डिमांड है.

 

कनाडा में पिछले साल मसूर 11 से 12 लाख टन हूई थी. इस साल 17 लाख टन है क्योकि वो देख रहे है कि इंडिया में डिमांड ज्यादा है. यानी हमारी यहां दाल की मांग को देखते हूए दुसरे देशों ने दालों का उत्पादन दोगने तक बढा दिए वो एक ही साल में, और यही देश हमें ये दाले बेचेंगे उनके दामों पर. चिंता की बात तो आगे है.

 

रामप्रसाद भंसाली लातूर के पास एक गांव में रहते है. राम प्रसाद ने 10 एकड़ इनकी खेती में 2 एकड में तूअर लगाई थी लेकिन वो केवल खर्चा ही निकाल पाए मुनाफा नहींं. रामप्रसाद भंसाली बताते हैं, ”तूअर लगाई 3 कुंतल हूई साढ़े 5 हजार के भाव से बेची. फायदा नहींं हूआ. सोयाबीन से 10 हजार रुपये मिले.”

 

रामप्रसाद इस साल तूअर नहीं लगाएंगे सोयाबीन की खेती करेंगे. चिंता की बात यही है, देश में दालों की फसल से किसान किनारा कर रहै है.

सरकार की वजह से सस्ती नहीं हो रही है दाल ? 

अशोक अग्रवाल का कहना है, ”किसानो को पल्स से नहीं सोयाबीन से फायदा हो रहा और पल्स घट रहे है, किसानो को जिससे फायदा होगा वही वो बोएंगे.”

 

जाहीर है दालों का उत्पाद बढाने के लिए हमारी कोई निती ही नहीं है, और यही असली वजह है आज दालों के दाम आसमान छु रहे है. और धीरे धीरे दुसरे देश सोच समझकर हमारी कोई नीति नहीं होने का फायदा उठा रहे है.

दाल में कुछ काला है: जानें दाल की कीमत क्यों बढ़ रही

 

 

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