क्या सेक्युलर शब्द का दुरूपयोग हो रहा है, इसके लिए कौन है जिम्मेदार?

By: | Last Updated: Saturday, 28 November 2015 11:42 AM
Is secular most misused Word in India? Who is responsible?

नई दिल्ली :  देश की राजनीति में सेक्युलर शब्द की बड़ी भूमिका रही है. कांग्रेस यह दावा करती रही है कि उसने ही सेक्युलरिज्म का झंडा उठा कर रखा हुआ है जबकि बीजेपी सेक्युलर नहीं है. इसके जवाब में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने यह कह कर इस बहस को और गर्म कर दिया कि देश में दरअसल सेक्युलर शब्द का दुरूपयोग होता है.

‘सबसे ज्यादा सेक्युलर शब्द का दुरुपयोग, धर्मनिरपेक्ष नहीं पंथ निरपेक्ष हो इस्तेमाल’ 

राजनाथ सिंह ने गुरुवार को लोकसभा में कहा कि जिस शब्द का सबसे ज्यादा दुरूपयोग हुआ है वह शब्द है सेक्लयुर.

 

लोकसभा में बहस का मुद्दा था- ‘संविधान के प्रति प्रतिबद्धता’ पहले संविधान दिवस के मौके पर हो रही इस चर्चा में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया. राजनाथ ने संविधान की प्रस्तावना में लिखे सेक्युलर शब्द के मायने पर सवाल खड़ा किया.

 

राजनाथ ने कहा कि औपचारिक अनुवाद है पंथनिरपेश है धर्मनिरपेक्ष नहीं. भारत का धर्म ही पंथ निरपेक्ष है.

 

राजनाथ चाहते हैं कि सेक्युलर शब्द के लिए धर्मनिरेपेक्ष नहीं पंथ निरपेक्ष शब्द का इस्तेमाल हो जो संविधान की प्रस्तावना में भी है.

 

भारत में सभी राजनीतिक दल धर्म को लेकर राजनीति करते रहे हैं. ऐसे में क्या धर्मनिरपेक्ष की जगह पंथनिरपेक्ष करने से यह राजनीति बंद हो जाएगी?

 

सवाल यह भी है कि क्या वाकई सेक्युलर शब्द का दुरूपयोग हो रहा है और अगर ऐसा हो तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है.

 

संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर शब्द पर डॉ आंबेडकर ने का क्या कहा था ?

 

भारत के संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर शब्द कब और कैसे जुड़ा? बहस इस बात पर भी है कि क्या संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव आंबेडकर सेक्युलर शब्द को भारत के संविधान की प्रस्तावना में शामिल करने के पक्ष में नहीं थे? आखिर क्या है इसकी सच्चाई.

 

26 नवंबर 1949 को भारत का संविधान बनकर तैयार हुआ. उस वक्त संविधान की प्रस्तावना में भारत के मूल चरित्र को बताते हुए सेक्युलर और सोशलिस्ट जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया था.

 

लोकसभा में संविधान पर चर्चा के दौरान राजनाथ सिंह ने कहा, ”सेक्युलर शब्द का प्रयोग बाबा साहेब ने नहीं किया.” इस पर लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, “‘वो डालना चाहते लेकिन उस वक्त नहीं कर पाए.”

 

हालांकि हकीकत ये है कि जब संविधान सभा में संविधान की प्रस्तावना पर बहस चल रही थी तब संविधान सभा के सदस्य के टी शाह ने सेक्युलर, फेडरल और सोशलिस्ट जैसे शब्दों को जोड़ने का प्रस्ताव रखा था. लेकिन ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष डॉ आंबेडकर ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था. डॉ आंबेडकर की दलील थी कि संविधान में पहले ही इन बातों की व्यवस्था है. इन्हें प्रस्तावना में डालना ज़रूरी नहीं. देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है. ऐसे में इस तरह के दायरे बनाना ज़रूरी नहीं.”

 

1950 में संविधान के लागू होने के करीब 26 साल बाद 42वें संशोधन के जरिए संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर और सोशलिस्ट शब्द जोड़ा गया. तब देश में इमरजेंसी लगी थी. उसके बाद से ही यह दोनो शब्द संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा बन गए. अक्सर यह सवाल उठता है कि जब डॉक्टर आंबेडकर ने 1949 में इन शब्दों को जोड़ना जरूरी नहीं समझा तो 1976 में ऐसा क्या हो गया कि इंदिरा गांधी की सरकार ने संविधान संशोधन लाकर सेक्युलर शब्द को भारत के संविधान का हिस्सा बना दिया.

 

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