इशरत जहां: जानें दोनों हलफनामों की बुनियादी बातें और फर्क का पूरा ब्यौरा

Ishrat Jahan: Two affidavits main points and differences

नई दिल्ली: इशरत मामले में केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से गुजरात हाईकोर्ट में पहला हलफनामा 6 अगस्त 2009 को दाखिल किया गया था. ये हलफनामा मंत्रालय के एक अधिकारी आरवीएस मणि ने दाखिल किया, इशरत की मां शमीमा कौसर की उस याचिका के जवाब में, जिसमें इस पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग की गई थी.

हलफनामे में ही इस बात का इशारा किया गया था कि इसमें रखी गई सूचनाएं केंद्रीय खुफिया एजेंसियों से मिली जानकारी के आधार पर डाली गई हैं. हलफनामे में जोर देकर ये कहा गया कि इशरत जहां और उसके साथ मारे गये तीन और लोग लश्कर के ही आतंकी थे. इस दावे के समर्थन में कई तर्क प्रस्तुत किये गये. इसमें ये कहा गया कि केंद्र सरकार को इस बात के पुख्ता सबूत मिले थे कि लश्कर ए तैयबा गुजरात सहित भारत के कई हिस्सों में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देना चाहता है, साथ में कई बड़े नेताओं की हत्या की साजिश भी रच रहा है.

हलफनामे के मुताबिक, लश्कर में ये जिम्मेदारी मुजम्मिल नामक आतंकी को दी गई थी, जिसके नियमित संपर्क में था इशरत का दोस्त जावेद उर्फ प्रणेश पिल्लै. जावेद के बारे में ये भी कहा गया कि साजिदा नामक मुस्लिम युवती से शादी करने के चक्कर में हिंदू से मुस्लिम बने प्रणेश पिल्लै ने दो पासपोर्ट हासिल किये थे- पहला अपने मुस्लिम नाम जावेद से, 1994 में और दूसरा 2003 में अपने हिंदू नाम प्रणेश पिल्लै से.

जावेद ने अपने हिंदू नाम से दूसरा पासपोर्ट तब हासिल किया, जब उसका पहला पासपोर्ट वैध था. हलफनामे में ये सवाल उठाया गया था कि आखिर जब अपने पिता के घर पर रहता नहीं था जावेद, तो फिर केरल के पते पर उसने पासपोर्ट क्यों बनवाया. इसके बारे में खुद हलफनामे में ही तर्क ये दिया गया कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की नजर से बचने के लिए जावेद ने अपने हिंदू नाम से भी पासपोर्ट बनवाया.

जावेद मार्च-अप्रैल 2004 में ओमान जाकर लश्कर के कमांडर मुजम्मिल से मिला था, इसका भी जिक्र है हलफनामे में.

जहां तक इशरत के जावेद और लश्कर कनेक्शन का सवाल है, इसके बारे में हलफनामा ये कहता है कि जावेद ने इशरत को अपने साथ इसलिए रखा था, ताकि देश के तमाम शहरों में जब वो आतंकी गतिविधियों की योजना बनाने या फिर उसे लागू करने के लिए जाए, तो सुरक्षा एजेंसियों को कोई शक न हो और इशरत का साथ रहना उसके लिए कवर का काम करे. पति-पत्नी के तौर पर ही जावेद और इशरत मुठभेड़ से पहले अहमदाबाद, लखनउ और फैजाबाद जिले के इब्राहिमपुर में होटलों में जाकर रुके थे, इसका भी उल्लेख गृह मंत्रालय के हलफनामे में किया गया है.

हलफनामे में इशरत और जावेद की आतंकी पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए इशरत की मां शमीमा कौसर और जावेद के पिता गोपीनाथ पिल्लै की तरफ से दाखिल की गई याचिका में विरोधाभास का जिक्र भी है. मसलन जहां गोपीनाथ अपने बेटे के ट्रेवेल्स कारोबार की बात करते हैं, तो शमीमा जावेद को इत्र का व्यापारी बताती हैं.

हलफनामा ये भी कहता है कि शमीमा कौसर को अपनी बेटी इशरत के कॉलेज जाने और ट्यूशन कराने जैसी एक-एक बात याद है, लेकिन उन्हें ये याद नहीं कि आखिर अगर इशरत सेल्स गर्ल के तौर पर जावेद के लिए काम करती थी, तो उसका ऑफिस कहां था. साथ में हलफनामे में सवाल ये भी खड़ा किया गया कि आखिर इत्र और साबुन का वो कैसा कारोबार था, जिसे लेकर जावेद इशरत को कई बार मुंबई से बाहर, देश के दूसरे हिस्सों और शहरों में लेकर गया था, वो भी कई-कई दिनों के लिए.

इशरत और जावेद को लश्कर का आतंकी ठहराने के बाद ये हलफनामा बड़े विस्तार से जीशान जौहर और अमजद अली के पाकिस्तानी होने और उनके लश्कर से संबंधित होने का ब्यौरा मुहैया कराता है. यही नहीं, हलफनामे में इस बात का भी जिक्र है कि किस तरह से मुठभेड़ के एक महीने बाद लश्कर के मुखपत्र माने जाने वाले गजवा टाइम्स ने इशरत और उसके साथ मारे गये लोगों को मुजाहिदीन करार देते हुए इशरत के शव को बिना पर्दा जमीन पर लिटाये जाने पर एतराज जताया था. इसके करीब तीन साल बाद 2 मई, 2007 को लश्कर के एक और फ्रंट जमात उद दावा की तरफ से जब ये दावा किया गया कि इशरत का लश्कर से कोई संबंध नहीं था और वो इस संबंध में इशरत के परिवार से माफी मांगता है, तो हलफनामे में इसे भी आतंकी संगठनों की रणनीति करार दिया गया. हलफनामे में ये कहा गया कि जावेद के पिता गोपीनाथ पिल्लै ने 18 मई 2007 को सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई जांच की अर्जी दी और उससे पहले इस तरह का जमात उद दावा का बयान न सिर्फ भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की साख को गिराने के लिए किया गया था, बल्कि अदालतों को गुमराह करने के लिए भी. हलफनामे में लिखे गये इन्हीं पहलुओं को गिनाकर इस मामले में सीबीआई जांच की मांग का केंद्र सरकार की तरफ से विरोध किया गया.

हालांकि जब इस हलफनामे का गुजरात की तत्कालीन मोदी सरकार और बीजेपी ने अपने हक में इस्तेमाल करना शुरु कर दिया, तो अपनी ही पार्टी के दबाव में आई केंद्र सरकार को दूसरा हलफनामा दाखिल करना पड़ा. ये हलफनामा आर वी एस मणि के जरिये ही 29 सितंबर, 2009 को दाखिल करवाया गया. इसमें ये कहा गया कि केंद्र सरकार को इस मामले मे सीबीआई जांच से कोई परहेज नहीं है और दूसरा ये कि आतंकियों के बारे में खुफिया सूचना देने का मतलब ये नहीं कि गुजरात पुलिस उसी आधार पर उन्हें मार डाले. गौर करने वाली बात ये है कि हलफनामे में इशरत सहित चारों लोगों की जो आतंकी पृष्ठभूमि दी गई थी, उसका न तो खंडन किया गया और न ही पुष्टि की गई.

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Web Title: Ishrat Jahan: Two affidavits main points and differences
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