मंगल ग्रह पर खारे पानी की ख़ोज, नासा की बड़ी कामयाबी

By: | Last Updated: Thursday, 1 October 2015 2:05 AM
It’s a big achievement for nasa to found water on Mars

नई दिल्ली: अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने मंगल ग्रह पर खारे पानी के मौसमी प्रवाह के पुख्ता सबूत इकट्ठा किए हैं. नासा के वैज्ञानिकों ने बकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके यह जानकारी दी.  पत्रिका ‘नेचर जियोसाइंस’ में प्रकाशित एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने कुछ ढलानों पर गर्मी के मौसम में बनी धारियों का अध्ययन किया, जिसके बारे में पहले माना जाता था कि वे खारे पानी के बहने से बनी होंगी.

 

नासा ने दावा किया है कि मंगल ग्रह पर नमकीन पानी के तरल रूप में होने की पुष्टि की है, पहले पानी के जमे हुए रूप में होने का अनुमान था. नासा के मुताबिक काली धारी की शक्ल में पानी के होने का पता चला. धारियां अप्रैल-मई में बनीं, गर्मी में ये धारियां अच्छे से दिखने लगीं और अगस्त के अंत तक गायब हो गईं. एरिजोना यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान स्कॉलर लुजेंद्र ओझा को पहली बार इस बात के सबूत मिले थे कि मंगल पर लिक्विड फॉर्म में पानी मौजूद है. इस एलान के लिए आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में अटलांटा के जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से जुड़े लुजेंद्र ओझा भी मौजूद थे . युनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना में प्लैनेटरी जियोलॉजी के प्रोफेसर अल्फ्रेड एस.मैकएवेन के मुताबिक, अध्ययन दल ने मंगल ग्रह पर पानीयुक्त अणुओं (परक्लोरेट) की पहचान की है. मैकएवेन  के अनुसार “मंगल ग्रह पर खारे पानी का स्पष्ट तौर पर पता चला है.”

 

पानी के पुख्ता सबूत –जीवन की संभावना !!

नासा ने अपने मुख्यालय में जेम्स वेब ऑडिटोरियम में एक प्रेस कांफ्रेस के दौरान इस खोज का पूरा विवरण भीदिया .लगभग 4.5 अरब साल पहले मंगल ग्रह पर अभी की तुलना में साढ़े छह गुना अधिक पानी और एक स्थूल वायुमंडल था. अधिकांश पानी अंतरिक्ष में गायब हो गया और इसका कारण मंगल ग्रह पर पृथ्वी की तरह लंबे समय तक चुंबकीय क्षेत्र नहीं होना रहा.नासा को प्राप्त मंगल की ताज़ा तस्वीरों में लाल ग्रह पर पानी के सबूत मिले हैं. ये तस्वीरें नासा ने अपने वेबसाइट पर सबके देखने के लिए जारी करीं. तस्वीर के विश्लेषण में सामने आया कि मंगल ग्रह की सतह पर पानी के बहने के निशान हैं और यह पानी अत्यंत खारा है. तरल पानी की मौजूदगी बताती है कि मंगल ग्रह पर जीवन खोजने की संभावना को और पुख़्ता करती हैं.वैज्ञानिकों का मानना है कि तस्वीरों के ज़रिए मंगल ग्रह पर देखी गई गहरी लकीरों को अब तरल पानी के सामयिक बहाव से जोड़कर देखा जा सकता है. उपग्रहों से मिला डाटा दर्शाता है कि चोटियों पर दिखने वाले ये लक्षण नमक की मौजूदगी से जुड़े हैं. मंगल ग्रह पर ऐसा नमक, पानी के जमने और वाष्प बनने के तापमान को भी बदल सकते हैं जिससे पानी ज़्यादा समय तक बह सकता है. मंगल पर पानी जमता तो पृथ्वी के समान ज़ीरो डिग्री सेल्सियस पर ही है, लेकिन कम दबाव के चलते 10 डिग्री सेल्सियस पर ही वाष्पित हो जाता है. पृथ्वी पर पानी 100 डिग्री सेल्सियस पर भाप बनता है. अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा को सैटेलाइट से मिले डाटा से पता चलता है कि चोटियों पर दिखने वाली ये डार्क लाइन्स पानी और नमक के कारण बने हैं. नासा के इस खुलासे से मंगल ग्रह पर जीवन होने की नई उम्मीद जगी है.

 

सॉल्ट पेरोक्लोरेट की वजह

मार्स रिकानाससेंस ऑर्बिटर स्पेसक्राफ्ट को मंगल पर लिक्विड फॉर्म में सॉल्ट पेरोक्लोट होने के सबूत मिले हैं. इनकी वजह से मंगल ग्रह की सतह और ढलानों पर लकीरें बनी हुई हैं. सॉल्ट पेरोक्लोरेट मंगल पर लिक्विड फॉर्म में मौजूद है. इसकी वजह से मंगल ग्रह की सतह और ढलानों पर लकीरें बनी हुई हैं. पेरोक्लोरेट नाम का यह नमक -70 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी पानी को जमने से बचाता है.

 

लुजेंद्र का आकलन सही

मंगल पर पानी मिलने की संभावना इसलिए जोर पकड़ी थी, क्योंकि नासा ने इस अनाउंसमेंट में लुजेंद्र ओझा नाम के पीएचडी स्टूडेंट के शामिल होने की बात कही थी. 2011 में ग्रैजुएट कर चुके 21 वर्षीय लुजेंद्र ने मंगल पर पानी के संभावित लक्षण खोजे हैं. एरिजोना यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान ओझा को ‘संयोगवश’ पहली बार इस बात के सबूत मिले थे कि मंगल पर लिक्विड फॉर्म में पानी मौजूद है. प्लैनेट की सतह की तस्वीरों की स्टडी के बाद उन्हें इस बात के सबूत मिले थे. ओझा ने इस खोज को ‘भाग्यशाली संयोग’ बताते हुए कहा कि शुरुआत में उन्हें इसके बारे में समझ में नहीं आया. मंगल की सतह पर बने गड्ढों की कई साल तक स्टडी के बाद पता चला कि ये बहते पानी के कारण बने हैं.

 

पोल पर बर्फ के सबूत मिले थे 40 साल पहले

मंगल पर पानी के सबूत मिलना कोई नई बात नहीं है. करीब चार दशक पहले इस प्लैनेट के पोल पर बर्फ की खोज की गई थी. इसके अलावा, ग्रह की सतह पर रगड़ के निशान इस ओर इशारा करते हैं कि लाखों साल पहले यहां समुद्र और नदियां रही होंगी. हालांकि, इस ग्रह पर कम ग्रैविटी और वहां के वायुमंडल के आधार पर माना जाता है कि ग्रह पर मौजूद पानी स्पेस में इवैपेरेट (वाष्पित) हो गया होगा. प्लैनेट पर लिक्विड पानी की यह पहली खोज है.

 

भौगोलिक रूप से सक्रिय है मंगल ग्रह

नासा का नया डाटा दर्शाता है कि मंगल ग्रह अभी भी भौगोलिक रूप से सक्रिय है. वैज्ञानिकों का मानना है कि मंगल ग्रह पर देखी गई ग़हरी लकीरों को अब तरल पानी के सामयिक बहाव से जोड़कर देखा जा सकता है. अब मंगल ग्रह पर भविष्य में बस्तियां बसाने की कल्पना अब केवल कथा कहानियों तक सिमट कर नहीं रहेगी क्योंकि मंगल ग्रह की सतह पर पानी तरल अवस्था में देखा गया है जो जीवन के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है. इसके साथ ही ऐसी संभावनाएं बढ़ गयी हैं कि मंगल पर जीवन मिल सकता है.

 

नासा के खगोलीय विज्ञान विभाग के निदेशक जिम ग्रीन ने एक संवाददाता सम्मेलन में बताया, ‘मंगल एक सूखा और बंजर ग्रह नहीं है जैसा कि पहले सोचा जाता था.’ उन्होंने कहा, ‘कुछ निश्चित परिस्थितियों में पानी तरल अवस्था में मंगल पर पाया गया है.’ वैज्ञानिक लंबे समय से यह अनुमान लगाते आ रहे थे कि कभी लाल ग्रह पर जीवन था. नासा ने कहा है कि तरल अवस्था में जल मिलने से यह संभव है कि वहां इस समय जीवन हो .

 

नासा के विज्ञान अभियान निदेशालय के सहायक प्रशासक और अंतरिक्ष वैज्ञानिक जॉन ग्रुंसफेल्ड ने बताया, ‘इसके बारे में सर्वाधिक रोमांचित करने वाली बात यह है कि मंगल के बारे में हमारा प्राचीन नजरिया और मंगल पर जीवन की संभावना, मंगल पर पूर्व में जीवन के बारे में रसायनिक जीवाश्म की खोज के बारे में रही है.’ उन्होंने कहा, ‘मंगल पर तरल अवस्था में जल की मौजूदगी, भले ही यह बेहद खारा पानी हो… यह इस बात की संभावना पैदा करता है कि , यदि मंगल पर जीवन है तो हमें यह बताने के लिए एक रास्ता मिला है कि यह जीवन वहां कैसे बना रहा.’ उन्होंने कहा कि मंगल ग्रह पर भविष्य में और मिशन भेजे जाने की पहले से ही योजना है लेकिन अब इस नयी खोज ने इस सवाल को ठोस आकार दे दिया है कि क्या इस ग्रह पर जीवन है और हम इस सवाल का जवाब दे सकते हैं.’ मंगल पर जल की मौजूदगी से मंगल पर मानव अभियान भेजना आसान हो जाएगा जिसे वर्ष 2030 तक भेजने की नासा की योजना है. ग्रुंसफेल्ड ने कहा, ‘सतह पर जिंदा रहने के लिए वहां संसाधन हैं.’ उन्होंने कहा कि पानी महत्वपूर्ण है लेकिन ग्रह पर अन्य महत्वपूर्ण तत्व भी हैं जैसे कि नाइट्रोजन जिसका इस्तेमाल ग्रीनहाउस में पौधो को उगाने के लिए किया जा सकता है.

 

मंगल पर पानी की मौजूदगी की यह घोषणा ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘द मार्सियन’ के रिलीज होने से पूर्व हुई है. इस फिल्म में मैट डेमोन मंगल ग्रह पर करीब एक महीने बिना भोजन के मरने के लिए छोड़ दिए जाने के बाद खुद को जिंदा रखते हैं. वैज्ञानिकों का लंबे समय से मानना रहा है कि कभी लाल ग्रह पर पानी बहता था और इसी से वहां घाटियां और गहरे दर्रे बने लेकिन तीन अरब साल पहले जलवायु में आए बड़े बदलावों के चलते मंगल का सारा रूप बदल गया.

 

ग्रीन ने कहा, ‘आज हम इस ग्रह के बारे में अपनी समझ को क्रांतिकारी आकार दे रहे हैं. हमारे रोवर्स ने पता लगाया है कि वहां हवा में कहीं अधिक आद्र्रता है.’ इस ग्रह की सतह की खोज में जुटे रोवर्स ने यह भी पाया है कि इसकी मिट्टी पहले लगाए गए अनुमानों से कहीं अधिक नम है. मंगल की सतह पर चार साल पहले ढलानों पर गहरे रंग की रेखाएं देखी गयी थीं. वैज्ञानिकों के पास इसके सबूत नहीं थे लेकिन बाद में पाया गया कि ये रेखाएं गर्मियों में बढ़ जाती थीं और उसके बाद सर्दियां आते आते गायब हो जाती थीं. अब पता चला है कि ये असल में पानी की धाराएं हैं. लेकिन अब इसके सावधानीपूर्वक अध्ययन और विश्लेषण के बाद वैज्ञानिक यह कहने को तैयार हैं कि ये रेखाएं वास्तव में जल धाराएं हैं.कुलमिलाकर नासा द्वारा मंगल पर खारे पानी का पता लगाने की घोषणा कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण है और इससे मंगल ग्रह के विषय में कई तरह की जानकारी इकट्टा करने में मदत मिलेगी .

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