क्या जेएनयू की घटना के बहाने वहां के छात्रों को राष्ट्रविरोधी घोषित करने की कोशिश सही है?

By: | Last Updated: Thursday, 18 February 2016 11:20 AM
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तस्वीरों में आप साफ तौर पर देख सकते हैं कि इसके बाद कन्हैया कुमार की क्या हालत रही!

नई दिल्ली: जेएनयू में हुई घटना के बाद से देशद्रोह का मुद्दा और इसके कानून को लेकर बहस एक बार फिर तेज है. कानून के जानकार कहते हैं कि सरकार की आलोचना देशद्रोह नहीं होती वहीं जानकार ये भी मानते हैं कि अंग्रेजों के वक्त बने इस कानून के सही मायने समझना जरूरी है.

देश को तोड़ने वाले नारे लगाने वालों को देशद्रोही करार दिया जाना कितना सही है. इसे समझने के लिए ये जानना जरूरी है कि भारत के कानून में देशद्रोह की धारा की शुरुआत कब और किन हालातों में हुई.

दरअसल अंग्रेजों ने उनकी हुकूमत के खिलाफ लड़ने वाले भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को जेल में डालने के लिए देशद्रोह का वो कानून बनाया था जिसे आज धारा 124 A के नाम से जाना जाता है.

1898 में मैकॉले पीनल कोड के तहत देशद्रोह का मतलब था ऐसा कोई भी काम जिससे सरकार के खिलाफ असंतोष जाहिर होता हो. लेकिन अंग्रेजों के ही राज में 1942 में इस परिभाषा में बदलाव किया गया जिसके तहत सिर्फ सरकार के खिलाफ असंतोष जाहिर करने को देशद्रोह नहीं माना जा सकता बल्कि उसी स्थिति में इसे देशद्रोह माना जाएगा जब इस असंतोष के साथ हिंसा भड़काने और कानून व्यवस्था को बिगाड़ने की भी अपील की जाए. 1962 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी देशद्रोह की इसी परिभाषा पर सहमति जताई. यानी सिर्फ सरकार की आलोचना या सरकार के खिलाफ घृणा भाव रखना देशद्रोह नहीं है.

जेएनयू में हुई घटना को लेकर जिस तरह की राजनीति हो रही है उस पर भी सवाल उठ रहे हैं. वरिष्ठ पत्रकार स्वामीनाथन अय्यर के मुताबिक गलत नीयत वाले लोग ही देशभक्ति के नाम पर किसी को भी राष्ट्र विरोधी घोषित करने का काम करते हैं. अय्यर के मुताबिक हर उस देश में जहां मुक्त समाज की बात होती है, वहां छात्रों को हर तरह की बात रखने की पूरी आजादी होती है. इसकी मिसाल है अमेरिका के छात्र.

1965 में जब अमेरिका ने वियतनाम के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा था, तब अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के छात्रों और शिक्षकों ने यूनिवर्सिटी कैंपस में ही ऐसे लेक्चर्स की शुरूआत की जिसमें लड़ाई के खिलाफ बातें की जाती थीं. लेकिन उनके इस विरोध को न ही देशद्रोह माना गया और न उन पर कोई कार्रवाई हुई बल्कि यूनिवर्सिटी ने उन्हें उसे जारी रखने की इजाजत दे दी.

1965 से 1973 के बीच पूरे अमेरिका के विश्वविद्यालयों में वियतनाम युद्ध के खिलाफ विरोध प्रदर्शन होने लगे, छात्रों ने इस दौरान अमेरिकी झंडे भी जलाए. लेकिन तब भी किसी पर देशद्रोह का मुकदमा नहीं किया गया.

इसी तरह 1933 में ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ ने एक प्रस्ताव पारित किया कि वो किसी भी हाल में अपने देश या उसके राजा के लिए नहीं लड़ेंगे. इसके बाद ब्रिटेन के दूसरे विश्वविद्यालय के छात्रों ने भी ऐसी ही शपथ ली. इसकी कड़ी प्रतिक्रिया हुई, छात्रों को मूर्ख और कायर तक कहा गया लेकिन तब भी किसी को देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार नहीं किया गया.

इसके उलट चीन, जहां लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं है वहां की सरकार ने 1989 में अपने खिलाफ आवाज उठाने वाले छात्रों के आंदोलन को कुचलने के लिए सड़कों पर सेना के टैंक उतार दिए. यानी साफ है कि जहां भी शासन की लोकतांत्रिक व्यवस्था है वहां छात्रों के इस तरह के आंदोलन होते रहे हैं लेकिन उन्हें देशद्रोह की श्रेणी में नही रखा जाता. ऐसे में ये सवाल उठ रहा कि क्या जेएनयू की घटना के बहाने वहां के छात्रों को राष्ट्रविरोधी घोषित करने की कोशिश सही है?

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