व्यंग्य: शादी का वर

By: | Last Updated: Monday, 22 September 2014 8:44 AM
kamal upadhaya Satire

पुरानी बस्ती में पिछले साल एक युवती का विवाह एक बहुत ही होनहार डॉक्टर से तय हुआ था. इस विवाह को लेकर सभी खुश थे, परन्तु युवती के पिताजी (बाबूजी) परेशान थे. दहेज़ के लिए रकम जुटाने के चक्कर में उनका पसीना खून बनकर बह रहा था. डॉक्टर साहब के पिताजी बेटे के जन्म से लेकर डॉक्टर बनने तक का सारा पैसा इस शादी में वसूल करना चाहते थे. चक्रवृद्धि व्याज लगाकर उन्होंने एक रकम निर्धारित कर ली थी और युवती के पिता को उस रकम का इंतजाम करने को कहा था, बेचारे बाबूजी रकम के चक्कर में जुटे ही थे कि उन्हें एक दिन डॉक्टर साहब के पिताजी का फिर से फ़ोन आया. डॉक्टर साहब के पिताजी ने झटपट उन्हें मिलने के लिए कहा. मिलना पुरानी बस्ती के एक पांच सितारा होटल में निर्धारित हुआ.

 

बाबूजी जानते थे कि होटल का बिल तो उन्हें ही चुकाना था, बाबूजी साहूकार से रुपये उधार लेकर डॉक्टर साहब के पिताजी से मिलने चल दिए. निर्धारित समय पर बाबूजी होटल पहुंच गए. होटल की लॉबी में पहुंचे ही थे कि डॉक्टर साहब के पिताजी ने आवाज लगा दी. बाबूजी हड़बड़ाते घबराते पिताजी के पास पहुंच गए. बाप के लिए दामाद और उसके घर वालों के शब्द भगवान की आज्ञा के समान हैं, कम से कम हमारे बूढ़े और बुजर्गों ने तो हमें यही परम्परा भेंट में दी. इस परम्परा का हमारे शास्त्रों में कोई जिक्र नहीं है. भगवान राम ने तो कभी जनक जी का अपमान नहीं किया, परन्तु हमारे यहाँ तो लड़के वालों का पूरा परिवार ही लड़की वालों की बेइजत्ती में लग जाता है. बाबूजी के पास अपमान सहने के आलावा कोई रास्ता नहीं था.

 

डॉक्टर साहब के पिताजी और बाबूजी साथ में बैठ गए. बाबूजी का दिल तो अंदर से डर के कारण धड़क रहा था. डॉक्टर साहब के पिताजी ने अपने झोले में से एक ब्रॉशर निकाला और बाबूजी के हाथ में रख दिया. बाबूजी ने ब्रॉशर हाथ में तो ले लिया परन्तु उन्हें कुछ समझ में नहीं आया. बाबूजी ने धीमी सी आवाज में कहा जी ये क्या है? डॉक्टर साहब के पिताजी ने कहा आप इसे खोलिए तो सही. बाबूजी ने जैसे ही पन्नो को पलटना चालू किया उनके पैरों तले जमीन धीरे-धीरे खिसकने लगी. दहेज़ की रकम दो गुना से भी ज्यादा बढ़ गई थी. बाबूजी ने टूटे शब्दों में कहा कि जी ये क्या है? इतने पैसे मैं कहा से लेकर आऊंगा. डॉक्टर साहब के पिताजी ने धीरे से मेनू की तरफ देखा और सबसे महंगा शरबत लाने के लिए वेटर से कह दिया, इस शरबत के दाम में तो डॉक्टर साहब के पिताजी के धोती, कुर्ते और गमछे का दो जोड़ा आ जाता.

 

शरबत को धीरे धीरे गटकते हुए डॉक्टर साहब के पिताजी ने ब्रॉशर अपने हाथ में लेते हुए कहा, हमने आपसे पहले जो रकम की मांग की थी वो सिर्फ हमारे बेटे के बचपन से लेकर डॉक्टर बनने तक के खर्च का हिसाब था. भगवान झूट न बुलवाये हमने उसपे सिर्फ 18 प्रतिशत सालाना दर से चक्रवृद्धि ब्याज जोड़ था. परन्तु आप को तो पता है ये सब दहेज़ मांगने की पुरानी तरकीब है और हमारे साले साहब जो एक बिग फोर के साथ काम करते हैं उन्होंने ने बताया की मेरे बेटे का वैल्यूएशन नए तरीके से होना चाहिए. अब हमारा बेटा डॉक्टर है तो उसके लिए हमें ब्रैंड वैल्यूएशन को ध्यान में रखते हुए दहेज़ की रकम 50 फिसद से बढ़ानी पढ़ेगी. सिबिल रिपोर्ट में उसका स्कोर बहुत अधिक है तो 30 फिसद उसके बढ़ गए, हमने सालों से उसपे जो पैसे खर्च करने का रिस्क लिया उसके 30 % बढ़ गए,  आरओई और इन्फ्लेशन को ध्यान में रखते हुए 30% बढ़ गए.

 

बाबूजी चुपचाप डॉक्टर साहब के पिताजी को नमस्कार कर बिल भर के होटल से निकल गये. शादी की तारीख तय हो चुकी थी. शादी तोड़ने से बहुत बदनामी होती और फिर छोटी का विवाह ढूंढना भी मुश्किल हो जाता. बाबूजी ने कोई रास्ता न देख पुरे घर के लिए मिठाई खरीदी और उसमें जहर मिलाकर घर ले गए और उसके बाद की घटना आप अक्सर अखबारों में पढ़ते रहते हैं.

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Web Title: kamal upadhaya Satire
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