पेट्रोल सस्ता करने से क्यों डरती है सरकार?

By: | Last Updated: Friday, 2 January 2015 7:25 AM

नई दिल्ली: पिछले 6 महीने में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत आधे से भी कम हो गई है. जून 2014 में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल के करीब थी और 1 जनवरी 2015 को ये करीब 53 डॉलर हो गई है. इस लिहाज से भारत में पेट्रोल की कीमत अब तक आधी हो जानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. साल 2014 की जुलाई में दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल की कीमत थी करीब 73 रुपए और 1 जनवरी 2015 को ये रही करीब 61 रुपए . यानि पेट्रोल की कीमत सिर्फ 16 फीसदी घटाई गई. ऐसा क्यों? इस पर एक विस्तृत विश्लेषण की जरूरत है.

 

1 जनवरी 2015 को सरकार ने क्या किया?

 

नए साल के पहले दिन मोदी सरकार ने जनता को तोहफा देने की बजाय अपनी झोली भरने का काम किया. वो कैसे? सरकार ने साल के पहले दिन पेट्रोल डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 2 रुपये प्रति लीटर बढ़ा दी. कुल मिलाकर दो महीने में सरकार ने तीसरी बार पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई.  यानि दो महीने के भीतर पौने छह रुपये प्रति लीटर की एक्साइज ड्यूटी बढ़ी. आप सोच रहे होंगे कि अगर एक्साइज ड्यूटी बढ़ी है तो फिर पेट्रोल महंगा होना चाहिए. लेकिन सरकार ने तो पेट्रोल-डीजल के दाम ज्यों के त्यों रखे हैं. आइए समझते हैं आखिर माजरा क्या है?

 

पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी का मतलब है पेट्रोल पर लगने वाला टैक्स. टैक्स यानि सरकार की कमाई. अगर सरकार एक्साइज ड्यूटी के जरिए पैसा न वसूलती तो कच्चे तेल से बचने वाला पैसा सीधा जनता के पास जाता यानि सस्ता पेट्रोल-डीजल मिल जाता. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उदहारण के जरिए समझाएं तो फिलहाल दिल्ली में पेट्रोल 61.33 रुपये का है, अगर सरकार एक्साइज ड्यूटी नहीं वसूलती तो आपकी जेब में हर लीटर पर पौने छह रुपये का फायदा होता और दिल्ली में पेट्रोल 55.58 रुपये का मिलता.

 

डीजल पर भी यही हाल है. दो महीने में एक्साइज ड्यूटी तीन बार बढ़ाने से सरकार को डीजल के हर लीटर पर साढ़े चार रुपये मिलने लगे हैं. अगर सरकार एक्साइज ड्यूटी नहीं बढ़ाती तो डीजल भी 50.51 रुपये की जगह साढ़े चार रुपये सस्ता 46.01 रुपये का मिलता.

 

सरकार को हाल फिलहाल तीन बार बढ़ाई गई एक्साइज ड्यूटी से इस वित्तीय वर्ष करीब 17 हजार करोड़ रुपए अतिरिक्त मिलेंगे.

 

सरकार का कहना है कि एक्साइज ड्यूटी के जरिए वसूली गई इस रकम को वो अपने महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर कार्यक्रमों में खर्च करेगी. इस पैसे से सरकार 15 हजार किलोमीटर की सड़क बनाना चाहती है. सरकार के मुताबिक ऐसा करने से रोजगार बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी.

 

तो फिर दिक्कत कहां है?

 

सरकार का इरादा तो नेक दिखता है. बात ये है कि रोड बनाने के नाम पर सरकार पहले से ही पेट्रोल के जरिए पैसे वसूल रही है. साल 2000 से हर लीटर पेट्रोल पर वसूला जाने वाला (फिलहाल 2रु./लीटर) सेस (एक तरीके का टैक्स) सेंट्रल रोड फंड में जाता है. साल 2000 में वाजपेयी सरकार के दौरान ही सेंट्रल रोड फंड एक्ट अमल में आया था. इस कानून के प्रावधान के मुताबिक पेट्रोल की कीमत के साथ सेस वसूला जा सकता है. इस सेस के पैसे का इस्तेमाल नेशनल हाइवे, स्टेट हाइवे, रेलवे और देश भर की सड़कें बनाने में किया जाता है.

 

सवाल है कि जब पहले से पेट्रोल पर सेस लगाकर सड़कें बनाने के लिए पैसा वसूला जा रहा है तो फिर ये अतिरिक्त एक्साइज ड्यूटी क्यों?  2013-14 की परिवहन मंत्रालय की परफॉर्मेंस रिपोर्ट के मुताबिक 1 नवंबर 2000 से लेकर 31 दिसंबर 2012 तक देश भर में 6859 प्रोजेक्ट के लिए सेंट्रल रोड फंड से 23780 करोड़ रुपए सैंक्शन किए गए हैं.  सरकार ने सेस के जरिए आज तक कितने पैसे उगाहे हैं इसका कोई ताजा आंकड़ा फिलहाल मौजूद नहीं है. लेकिन 2008 में परिवहन राज्यमंत्री रहे के एच मुनियप्पा ने राज्यसभा में बताया था कि साल 2000 से लेकर 2008 तक पेट्रोल और हाईस्पीड डीजल के सेस के जरिए 69268 करोड़ रुपए जमा किए थें. इस हिसाब से अभी ये आंकड़ा 1 लाख करोड़ के पार हो सकता है. ऐसे में साफ है कि काफी बड़ी रकम बेकार पड़ी है. जब पुराना पैसा ही अभी तक इस्तेमाल नहीं किया गया है तो फिर नए एक्साइज ड्यूटी के तहत पैसे उगाहने की क्या जरूरत है. सवाल है कि क्या ये पैसे कहीं डाइवर्ट हुए या बिने इस्तेमाल हुए पड़े हैं, इसकी जांच होनी चाहिए.

 

एक तीर, दो शिकार

 

सरकार पेट्रोल ज्यादा सस्ता नहीं कर रही इसकी दो वजह समझ में आती है. एक आर्थिक और दूसरी राजनीतिक. पहले बात राजनीतिक वजह की. मोदी सरकार ने देश से वादा किया है कि वो महंगाई कम कर देंगे. महंगाई कम करने करने के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमत कम करनी जरूरी है. लेकिन ये सरकार के हाथ में नहीं है. वो इसलिए क्योंकि पेट्रोल-डीजल की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत के आधार पर तय होती है. जब से सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमत को बाजार के हवाले किया है, कीमत तय करना उनके हाथ में नहीं रह गया है. हालांकि तेल कंपनिया अभी भी सरकार से सलाह मशविरा करके ही पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ाती या घटाती है. शायद इसी वजह से सरकार ने पैसा वसूलने के लिए एक्साइज ड्यूटी का सहारा लिया है. सरकार को डर है कि अगर पेट्रोल सस्ता कर दिया गया तो लोगों को सस्ते पेट्रोल-डीजल की आदत लग सकती है. उन्हें पता है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल हमेशा सस्ता नहीं रहेगा. ऐसे में कभी न कभी पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ेगी. अगर कीमत बढ़ाई तो जनता गुस्सा हो सकती है. मोदी सरकार को अब तक ये गुस्सा झेलना नहीं पड़ा है. लेकिन ऐसी नौबत कभी भी आ सकती है. आनेवाले समय में कई चुनाव है. जनता अपना गुस्सा वोट के जरिए दिखा सकती है. मोदी के अच्छे दिन के नारे की हवा निकल सकती है. ऐसे में पेट्रोल-डीजल ज्यादा सस्ता न किया जाए तो ही बेहतर है. हालांकि कच्चे तेल की कीमत लगातार कम होने पर सरकार पर कीमत कम करने का काफी दबाव होगा.

 

सरकार के फैसले की आर्थिक वजह ये है कि एक्साइज ड्यूटी बढ़ाने से सरकार को अपना वित्तीय घाटा कम करने में मदद मिलेगी. अनुमान के मुताबिक पेट्रोल-डीजल पर ताजा एक्साइज ड्यूटी बढ़ाने से सरकार को करीब 17 हजार करोड़ रुपए मिलेंगे. सरकार को ये आमदनी बिना मेहनत के हो रही है, वो बिना महंगाई बढ़ाए हुए. मौजूद महंगाई दर भी निचले स्तर पर रहने से सरकार को ये फैसला लेने में आसानी हुई है. इसके अलावा ये तर्क भी है कि अगर इस पैसे से सड़क बनेगी तो इसमें भी तो देश की जनता की ही भलाई है. पेट्रोल-डीजल की कीमत कम करना ही जनता को फायदा पहुंचाने का एकमात्र तरीका नहीं है.

 

क्या पेट्रोल सस्ता होगा?

 

31 दिसंबर 2014 को इकोनॉमिक टाइम्स की छपी रिपोर्ट के मुताबिक पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि भले ही कच्चे तेल की कीमत में जबरदस्त गिरावट आई हो लेकिन उस अनुपात में पेट्रोल-डीजल की कीमत कम नहीं की जा सकती. उनके मुताबिक भारत के कच्चे तेल के आयात बिल में प्रति बैरल करीब 10 डॉलर का खर्च कम हुआ है लेकिन इसका फायदा रुपए की गिरती कीमत की वजह से खत्म हो गया है. भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 फीसदी कच्चा तेल विदेश से आयात करता है, ऐसे में रुपए के मुकाबले डॉलर की कीमत की बड़ी भूमिका है इसलिए पेट्रोल-डीजल का बहुत सस्ता होना फिलहाल मुश्किल दिखता है.

 

रिपोर्ट के मुताबिक सरकार चाहती है कि कंपनिया अपना प्रॉफिट मार्जिन कम कर पेट्रोल-डीजल सस्ता करें. लेकिन पेट्रोलियम कंपनिया फिलहाल अपना मार्जिन कम नहीं करना चाहती. उनका कहना है कि उन्हें पुरानी कीमत पर माल खरीदने की वजह से करीब 10 हजार करोड़ का घाटा हुआ है जिसे वो पूरा करना चाहती है.

 

फिलहाल सरकार ने रसोई गैस और विमान के तेल की कीमत तो कम कर दी है लेकिन पेट्रोल-डीजल पर वो कशमकश में हैं. देखना है ये कशमकश कब तक कायम रहती है.

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Web Title: Kaushal Lakhotia Analysis on Excise duty on petrol/diesel
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