Kejriwal vs Centre: Supreme Court says lg is the boss of delhiकेजरीवाल को झटका, दिल्ली के बॉस एलजी- सुप्रीम कोर्ट

केजरीवाल को झटका, दिल्ली के बॉस एलजी- सुप्रीम कोर्ट

मामले की सुनवाई मंगलवार को जारी रहेगी. गोपाल सुब्रमण्यम उस दिन भी दलीलें रखेंगे. उनके बाद वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह और राजीव धवन भी दिल्ली सरकार का पक्ष रखेंगे.

By: | Updated: 02 Nov 2017 07:24 PM
Kejriwal vs Centre: Supreme Court says
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने आज दिल्ली बनाम केंद्र अधिकार विवाद पर सुनवाई शुरू की. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में बैठी पांच जजों की बेंच ने माना कि संविधान के मुताबिक उपराज्यपाल ही दिल्ली के प्रशासनिक बॉस हैं. लेकिन उन्हें सरकार की तरफ से भेजी गई फाइलों का निपटारा समय पर करना चाहिए.

दिल्ली सरकार ने दी थी हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती

संविधान पीठ में दिल्ली सरकार की तरफ से दाखिल अपील पर सुनवाई हो रही है. दिल्ली सरकार ने 4 अगस्त 2016 के हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी है. इस फैसले में कोर्ट ने माना था कि दिल्ली एक केंद्र शासित क्षेत्र है. इसलिए, यहां राष्ट्रपति के प्रतिनिधि यानी उपराज्यपाल की मंजूरी से ही फैसले लिए जा सकते हैं.

दिल्ली को केंद्र शासित क्षेत्रों के मुकाबले मिला अलग दर्जा- वकील गोपाल सुब्रमण्यम

आज वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम ने दिल्ली सरकार की तरफ से दलीलों की शुरुआत की. उन्होंने कहा कि दिल्ली भले ही एक पूर्ण राज्य नहीं है, लेकिन उसे दूसरे केंद्र शासित क्षेत्रों के मुकाबले अलग दर्जा दिया गया है. इसके लिए 1991 में संविधान में 69वें संशोधन के जरिए अनुच्छेद 239 AA जोड़ा गया. इसके तहत दिल्ली में विधानसभा का प्रावधान है, जिसे कुछ विषयों को छोड़कर बाकी पर कानून बनाने का अधिकार है.

सुब्रमण्यम ने आगे कहा, "चुने हुए विधायकों से दिल्ली में सरकार का गठन होता है. सरकार विधानसभा के लिए जवाबदेह होती है. हाई कोर्ट के फैसले से न सिर्फ सरकार बल्कि विधानसभा के अधिकार भी बाधित हो रहे हैं."

संसद दिल्ली से जुड़े किसी भी विषय पर कानून बना सकती है

इस पर कोर्ट ने उन्हें याद दिलाया कि अनुच्छेद 246 के तहत संसद को कानून बनाने में ऊंचा दर्जा हासिल है. 239 AA में भी लिखा गया है कि संसद दिल्ली से जुड़े किसी भी विषय पर कानून बना सकती है. सुब्रमण्यम ने कहा, "हम संसद की सर्वोच्चता को चुनौती नहीं दे रहे हैं, लेकिन हाई कोर्ट ने एलजी की शक्तियों की ऐसी व्याख्या की है कि वो संसद और राष्ट्रपति से भी बड़े नज़र आते हैं."

उपराज्यपाल का दर्जा ऊंचा माना गया है- बेंच

बेंच के सदस्य डी वाई चंद्रचूड़ ने उन्हें टोकते हुए कहा, "239AA का खंड 4 कहता है कि मंत्रिमंडल और उपराज्यपाल में किसी विषय पर मतभेद हो तो उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाना चाहिए. लेकिन राष्ट्रपति का निर्णय आने तक उपराज्यपाल का फैसला ही माना जाएगा. साफ़ है कि जिस अनुच्छेद का हवाला आप दे रहे हैं, उसमें भी उपराज्यपाल का दर्जा ऊंचा माना गया है."

सुब्रमण्यम ने कहा, "सिर्फ एक खंड के आधार पर बात करना सही नहीं. पूरे अनुच्छेद को देखना चाहिए. इस अनुच्छेद को संविधान में जोड़ने के पीछे की भावना को देखना चाहिए. आखिर कोई पद कैसे इतना शक्तिशाली हो सकता है कि वो चुनी हुई सरकार के हर फैसले को रोक दे. दिल्ली में एलजी साल भर से ज़्यादा फाइलों को रोक कर रखते हैं. बिना सरकार की जानकारी के अफसरों के साथ बैठक करते हैं. ज़्यादातर नौकरशाह चुनी हुई सरकार की बात को गंभीरता से नहीं लेते."

वरिष्ठ वकील की इस चिंता से सहमति जताते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने टिप्पणी की, "एलजी को एक तय सीमा तक ही फाइलों को रोकना चाहिए. अगर सरकार के किसी फैसले को वो ख़ारिज करना चाहते हैं तो उसके पूरे कारण दर्ज करने चाहिए."

जारी रहेगी मामले की सुनवाई

मामले की सुनवाई मंगलवार को जारी रहेगी. गोपाल सुब्रमण्यम उस दिन भी दलीलें रखेंगे. उनके बाद वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह और राजीव धवन भी दिल्ली सरकार का पक्ष रखेंगे. इसके बाद एलजी और केंद्र सरकार की तरफ से जवाब दिया जाएगा. ऐसे में ये सुनवाई अभी कई और दिनों तक चलने की उम्मीद है.

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