दिल्ली सरकार ने 400 करोड़ के टैंकर घोटाले की जांच के आदेश

By: | Last Updated: Wednesday, 24 June 2015 4:55 AM
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नई दिल्ली: अरविंद केजरीवाल सरकार ने दिल्ली जल बोर्ड में हुए टैंकर घोटाले की जांच शुरू कर दी है. शीला दीक्षित सरकार पर 400 करोड़ रुपये के टैंकर घोटाले का आऱोप है. सूत्रों के मुताबिक 10 दिनों में आंतरिक रिपोर्ट आने के बाद पूरा मामला एसीबी को जांच के लिए सौंपा जा सकता है. दरअसल 2012-13 में जल बोर्ड ने 3 कंपनियों को 385 टैंकर का ठेका दिया था. इस मामले में आरोप है कि जो काम 200 करोड़ में हो सकता था उसके लिए शीला सरकार ने 600 करोड़ रुपये का ठेका दिया था.

 

क्या पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तक पहुंच सकती है जांच की आंच?

 

दिल्ली जल बोर्ड के चेयरमैन मंत्री कपिल मिश्रा ने शीला दीक्षित सरकार के दौरान हुए टैंकरों के टेंडर के विभागीय जांच के आदेश दिए हैं. आरोपों के मुताबिक टैंकरों के टेंडर में लगभग 400 करोड़ की घपलेबाजी हुई. आरोप है कि जो काम मोटे तौर पर 200 करोड़ में हो सकता था उसकी जगह लगभग 600 करोड़ में ठेका दिया गया.

 

जल बोर्ड के उच्च अधिकारियों की पांच सदस्यीय कमेटी को दस दिन में रिपोर्ट देने को कहा गया है. सूत्रों की मानें तो जांच रिपोर्ट आने पर मामला एंटी करप्शन ब्रांच को सौंपा जा सकता है.

 

मामला साल 2012-13 का है जब जल बोर्ड ने 3 कंपनियों को 385 टैंकर किराए पर देने का ठेका दिया. तब बोर्ड की अध्यक्ष मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और उपाध्यक्ष मतीन अहमद थे. NGO सिटिजन फ्रंट फॉर वॉटर डेमोक्रेसी की शिकायत पर ये जांच बिठाई गई है.

 

आरोपों के मुताबिक मार्च 2010 से दिसंबर 2011 के दौरान जल बोर्ड ने किराए के टैंकर के लिए 5 बार टेंडर आमंत्रित किया. चार बार प्रक्रिया को अंतिम दौर में रद्द कर दिया गया. आखिर में दिसंबर 2011 में तीन कंपनियों को 385 टैंकर सप्लाई करने का ठेका दिया गया.

 

लेकिन इन पौने दो साल में ठेका तीन गुना बढ़ गया. 385 टैंकरों में तीन हजार लीटर क्षमता के 130 टैंकर और नौ हजार लीटर के 255 टैंकरों को सप्लाई करने का ठेका तीन कंपनियों को दस साल के लिए दे दिया गया.

 

कौन-कौन सी कंपनियां है शामिल?

सिटी लाइफ लाइन प्रायवेट लिमिटेड

रैमकी इनवाइरो इंजिनियर्स लिमिटेड

वी एस के टेक्नोलॉजीज प्रायवेट लिमिटेड.

दिल्ली में टैंकर घोटाले की जांच शुरु 

क्या गड़बड़ हुई?

पहला तरीका

जुलाई 2010 में एक महीने के लिए तीन हजार लीटर और नौ हजार लीटर के एक टैंकर के लिए जो डील क्रमशः 42, 000 और 50,000 रुपये में हो रही थी उसे दिसम्बर 2011 में 98,000 और 1,30,000 रूपये में किया गया. यहां साफ पता चलता है कि डेढ साल में डील की रकम दुगुनी-तिगुनी हो गई.

 

इसी घपले को एक दूसरे तरीके से भी समझ सकते हैं-

पहचान के हिसाब से जल बोर्ड के टैंकर दो तरह के हैं – ब्लू रंग में रंगे टैंकर और बिना रंगे टैंकर.

बिना रंगे टैंकर विवादित टेंडर वाले हैं.

एकसमान काम करने वाले दोनों टैंकरों पर प्रति किलोमीटर होने वाले खर्च को समझिए –

तीन हजार लीटर क्षमता का ब्लू टैंकर पर रू 20/किलोमीटर

तीन हजार लीटर क्षमता का टेंडर वाला टैंकर पर रू 91/किलोमीटर का खर्च आता है.

नौ हजार लीटर क्षमता वाले ब्लू टैंकर पर प्रति किलोमीटर खर्च रू 30 और टेंडर वाले टैंकर पर प्रति किलोमीटर 121 रूपया खर्च हो रहा है.

पानी पहुंचाने के काम में लगे दोनों तरह के टैंकरों में केवल रंग का फर्क है लेकिन खर्चे का फर्क गड़बड़झाले की ओर इशारा करता है.

 

अब तीसरा तरीका समझिए –

टेंडर की शर्तों के मुताबिक नौ हजार लीटर के एक टैंकर के किराये पर जल बोर्ड करीब 15 लाख रूपए सालाना खर्च कर रहा है. जबकी उसी टैंकर की मौजूदा कीमत भी लगभग 15 लाख ही है.

 

जिन तथ्यों के आधार पर आरोप लगाए गए हैं उससे साफ जाहिर होता है टैंकर के टेंडर में जनता का पैसा पानी की तरह बहाया गया. इसमें किस-किस ने अपना घड़ा भरा इसी की जांच शुरू हो चुकी है.

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