‘कोई दूसरा नहीं’ हिंदी के दिग्गज कवि कुंवर नारायण का 90 साल की उम्र में निधन

‘कोई दूसरा नहीं’ हिंदी के दिग्गज कवि कुंवर नारायण का 90 साल की उम्र में निधन

By: | Updated: 15 Nov 2017 02:28 PM
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नई दिल्ली: हिन्दी के वरिष्ठ कवि और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कुंवर नारायण का आज निधन हो गया. वह 90 वर्ष के थे.

पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि कुंवर नारायण का आज सुबह निधन हुआ. गत चार जुलाई को मस्तिष्काघात के बाद वह कोमा में चले गये थे. उसके कारण उन्हें बीच बीच में काफी समय अस्पताल में भी भर्ती रखा गया था. उनका निधन आज उनके घर पर ही हुआ.

सूत्रों ने बताया कि उनका अंतिम संस्कार आज शाम दिल्ली के लोधी शव दाहगृह में किया जायेगा.

कुंवर नारायण का जन्म 9 सितंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में हुआ. उन्होंने कविता के अलावा कहानी एवं आलोचना विधाओं में लिखा. उनके कविता संग्रह में चक्रव्यूह, परिवेश : हम तुम, आत्मजयी, अपने सामने, कोई दूसरा नहीं, इन दिनों, वाजश्रवा के बहाने, हाशिये का गवाह प्रमुख हैं. अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों में कुंवर नारायण भी शामिल थे.

‘आकारों के आसपास’ नाम से उनका कहानी संग्रह भी आया था. ‘आज और आज से पहले’ उनका आलोचना ग्रन्थ है. उनकी रचनाओं का इतालवी, फ्रेंच, पोलिश सहित विभिन्न विदेशी भाषाओं में किया जा चुका है.

उन्हें हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार, प्रेमचंद पुरस्कार, तुलसी पुरस्कार, केरल का कुमारन अशान पुरस्कार, व्यास सम्मान, श्लाका सम्मान (हिंदी अकादेमी दिल्ली), उ.प्र. हिंदी संस्थान पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, कबीर सम्मान मिल चुका था. साहित्य अकादमी ने उन्हें अपना वृहत्तर सदस्य बनाकर सम्मानित किया था.

उनकी साहित्य सेवा के कारण भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया था.

उनकी एक मशहूर कविता है- अयोध्या, पाठकों के लिए नीचे पेश है

अयोध्या, 1992

हे राम,
जीवन एक कटु यथार्थ है
और तुम एक महाकाव्य !

तुम्हारे बस की नहीं
उस अविवेक पर विजय
जिसके दस बीस नहीं
अब लाखों सर - लाखों हाथ हैं,
और विभीषण भी अब
न जाने किसके साथ है।

इससे बड़ा क्या हो सकता है
हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमट कर
रह गया तुम्हारा साम्राज्य

अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं
योद्धाओं की लंका है,
'मानस' तुम्हारा 'चरित' नहीं
चुनाव का डंका है !

हे राम, कहाँ यह समय
कहाँ तुम्हारा त्रेता युग,
कहाँ तुम मर्यादा पुरुषोत्तम
कहाँ यह नेता-युग !

सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ
किसी पुराण - किसी धर्मग्रंथ में
सकुशल सपत्नीक...
अबके जंगल वो जंगल नहीं
जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक !

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