ललित नारायण मिश्र की हत्या के चारों दोषियों को उम्रकैद की सजा

By: | Last Updated: Thursday, 18 December 2014 10:11 AM
lalit mishra

नई दिल्ली: दिल्ली की एक स्थानीय अदालत ने पूर्व रेल मंत्री ललित नरायण मिश्रा की हत्या के चारों दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है.

इस सज़ा के एलान के साथ ही इस रहस्य से पर्दा उठ गया कि ललित नरायण मिश्र की हत्या किसने और क्यों की. हालांकि, ये रहस्य उठने में 39 साल लग गए.

 

आपको बता दें कि 2 जनवरी 1975 को समस्तीपुर में रेल लाइन का उद्घाटन करने समस्तीपुर गये ललित नरायण मिश्र की बम मारकर हत्या कर दी गई थी.

 

हमले में घायल होने के बाद करीब 12 घंटे तक वो जिंदा रहे और बताया जाता है कि अस्पताल में उचित इलाज नहीं मिलने की वजह से अगले दिन उनकी मौत हो गई.

 

क्या है पूरा मामला?

एलएन मिश्र की हत्या साल 1975 में की गई. कई साल की जांच के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इस केस को 1979 में बिहार से दिल्ली ट्रांसफर कर दिया गया. इस केस की जांच कर रही सीबीआई के मुताबिक प्रतिबंधित आनंद मार्गियों ने उनकी हत्या की. जिसे आज आदलत ने उम्रकैद सी सजा सुनाई है.

 

इस केस में सजा के एलान तक पहुंचने में करीब 170 गवाहों ने अपने बयान दिए. केस में कुल 719 तारीख पड़ी. बिहार की अदालतों की बात छोड़ दें तो सिर्फ दिल्ली की निचली अदालत में ही 22 जजों ने इस मामले की सुनवाई की. आरोप लगता है कि सीबीआई ने इस मामले की ठीक से जांच नहीं की. आरोपों की अंगुलियां तत्कालीन केंद्र सरकार पर भी उठी.

 

एक रुका हुआ फैसला

बिहार के जानेमाने नेता ललित नारायण मिश्र की हत्या गई, पर रहस्य पर से 39 साल तक पर्दा नहीं हट सका. इस हत्या ने कुछ लोगों की राजनीति को आगे बढ़ा दिया तो कई राज उनके साथ दफ़न हो गए. पूर्व रेल मंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता की हत्या आखिर किसने की?

 

क्या हुआ था उस दिन ?

 

अपने ही क्षेत्र समस्तीपुर से मुजफ्फरपुर के लिए ब्रॉड गेज रेल लाईन के लिए गए एल एन बाबू के ऊपर भीड़ में से ही किसी ने बम फेंक दिया. ब्लास्ट के बाद वे करीब 12 घंटे तक जिन्दा थे, दूसरे दिन सुबह में दानापुर रेलवे अस्पताल में अंतिम सांसे लीं.

 

हत्या के बाद सरकार और पुलिस ने क्या किया ?

ललित बाबू की हत्या के बाद बहुत पुलिस जांच हुई और अन्त में इसकी जवाबदेही सीबीआई को सौंपी गई. उसी के बाद उनकी हत्या और सीबीआई की जांच और कोर्ट में उनकी हत्या का मामला मकड़जाल में फंस कर रह गया.

 

हत्या तब हुई जब वे राजनीति के शिखर पर थे

 

ललित बाबू की हत्या उस समय हुई जब वो राजनीति के शिखर पर थे. राजनितिक हल्कों में कहा जाता था कि वे इन्दिरा गांधी के लिए एक जवाबदेही साबित हो रहे थे. इसके अतिरिक्त उन्हें उनकी समाजवादी विचारधारा और देश में रेलवे नेटवर्क बढ़ाने के लिए बहुत लोकप्रियता मिल रही थी. खासकर पिछड़े बिहार में उन्होंने रेलवे एवं अन्य केन्द्रीय योजनाएं भी खूब जोर-शोर से चलाई थीं. इससे बिहार की राजनीति में उनकी अच्छी-खासी पकड़ हो गयी थी और ललित बाबु की सलाह पर इंदिरा जी ने उन दिनों बिहार में कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों को बदलने की झड़ी लगा दी थी.

 

ललित बाबू के राजनीतिक नाराजगी से एक कुशल प्रशासक मुख्यमंत्री केदार पांडे को अपने मुख्यमंत्री पद से इस्तिफा देना परा था. उसके बाद वे अपने चहेते अब्दुल गफूर को मुख्यमंत्री बनाने में सफल हुए. इस क्रम में उन्होंने अपने कई राजनितिक दुश्मन बना लिए थे. कहा जाता है कि इंदिरा गांधी भी उनसे नाराज़ रहने लगी थीं. लोग तो यहां तक कहने लगे थे कि उनकी हत्या दिल्ली सरकार के शह पर एक विदेशी खुफिया एजेंसी ने कराई थी.

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