लालू की ‘नो एंट्री’

By: | Last Updated: Friday, 28 August 2015 4:01 PM

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शुक्रवार को साफ किया कि वो अगले पांच साल में बिहार को कहां देखना चाहते हैं. अगर फिर से वो सत्ता में आए तो क्या उनकी प्राथमिकताएं होंगी और सरकार चलाने का क्या उनका एजेंडा होगा. चुनाव से पहले पार्टियों और गठबंधनो की एक परंपरा रही है घोषणापत्र जारी करने की. नीतीश कुमार जब शुक्रवार को मीडिया के सामने आए तो यही उम्मीद की जा रही थी कि वो अपना घोषणा पत्र जारी करेंगे पर नीतीश लीक से हट कर पेश आए. मीडिया के सामने नीतीश ने सबसे पहले ये साफ किया कि वो कोई घोषणापत्र जारी करने नहीं आए हैं बल्कि उन्होंने कुछ ‘निश्चय’ और संकल्प लिया है,  उसके बारे में बिहार के मतदाताओं को बताने आए हैं. नीतीश कुमार ने जोर देकर कहा कि जो वादे या निश्चय वो कर रहे हैं वो बिल्कुल व्यक्तिगत हैं. इसके बाद नीतीश ने सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 35 फीसदी आरक्षण देने का वादा किया.

 

नीतीश कुमार और अरविंद केजरीवाल के बीच इन दिनों खूब छन रही है. पिछले ही दिनों केजरीवाल पटना आए थे. एक मंच पर नीतीश और केजरीवाल ने एक दूसरे की तारीफ के कसीदे पढ़े थे. नीतीश के वादों या कथित निश्चय पर केजरीवाल की छाप दिखी. जिस तरह दिल्ली के चुनाव में केजरीवाल ने मुफ्त वाई-फाई का वादा किया था उसी तरह नीतीश कुमार ने बिहार के तमाम विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को बिहार की भाषा में कहें तो मंगनी में वाई- फाई देने का वादा किया. पर हम यहां केजरीवाल और नीतीश के बीच के संबंधों की चर्चा नहीं कर रहे हैं.

 

नीतीश कुमार ने जिस मंच से घोषणापत्र जारी किया, जिसे वो निश्चय पत्र बता रहे हैं आखिर उस मंच पर लालू यादव को साथ में क्यों नहीं बिठाया गया? नीतीश ने जो वादे किये उसे उन्होंने व्यक्तिगत क्यों कहा? क्या ये वादे लालू यादव और कांग्रेस के नहीं हैं? क्या जब सरकार बनेगी तो इन वादों को लागू करने की जिम्मेदारी सिर्फ नीतीश की होगी? 

 

दरअसल नीतीश कुमार को पता है कि अगर वो लालू यादव के साथ बैठकर गवर्नेंस की बात करेंगे. सुशासन, विकास और तरक्की की बात करेंगे तो लालू की बात का तो कोई भरोसा नहीं ही करेगा, नीतीश के दावे और वादों की गंभीरता पर भी ग्रहण लग सकता है. सरकार चलाने के मामले में नीतीश कुमार की छवि एक गंभीर नेता की है. जाहिर है लालू के साथ सरकार चलाने की बात करके नीतीश अपनी छवि के साथ कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहते हैं.

 

राजनीति विडंबनाओं का खेल है. लेकिन विडंबना की भी एक सीमा होती है. बिहार के चुनावी समर में लालू प्रसाद यादव के पास वोट है पर गठबंधन का चेहरा नीतीश कुमार हैं. मतलब वोट लालू का और मुख्यमंत्री का चेहरा नीतीश का. लालू के वोट कभी भी नीतीश कुमार के स्वाभाविक वोट नहीं रहे हैं. केजरीवाल और नीतीश एक मंच पर होते हैं पर वहां लालू यादव की नो एंट्री लगी होती है. लालू के जंगल राज पर जब नीतीश से सवाल पूछा जाता है तो वो लालू का कोई बचाव नहीं करते खुद को मोदी की भाषा में कहें तो चंदन कुमार बता बैठते हैं. जाहिर है नीतीश ने घोषणापत्र जारी करते समय साफ कर दिया कि भविष्य में सरकार कैसे चलानी है उस पर लालू से कोई समझौता नहीं हो सकता. इसलिए भविष्य के बिहार के बारे में जब नीतीश अपना एजेंडा रखने के लिए सामने आते हैं तो लालू को पास फटकने नहीं देते हैं. सवाल उठता है का लालू का जो वोटबैंक है वो नीतीश के इस इस्तेमाल करने वाले व्यवहार को आखिर कब तक और कहां तक स्वीकार करता है?

India News से जुड़े हर समाचार के लिए हमे फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस पर फॉलो करें साथ ही हमारा Hindi News App डाउनलोड करें
Web Title: Laloo prasad yadav
Explore Hindi News from politics, Bollywood, sports, education, trending, crime, business, साथ ही साथ और भी दिलचस्प हिंदी समाचार
First Published:

Get the Latest Coupons and Promo codes for 2017