महात्मा गांधी: एक अद्भुत जीवन गाथा

By: | Last Updated: Thursday, 2 October 2014 3:04 AM

“अहिंसा सबसे बड़ा कर्तव्यल है. यदि हम इसका पूरा पालन नहीं कर सकते हैं तो हमें इसकी भावना को अवश्ये समझना चाहिए और जहां तक संभव हो हिंसा से दूर रहकर मानवता का पालन करना चाहिए.”

 

ये बापू के शब्द है. बापू…राष्ट्रपिता महात्मा गांधी. मोहनदास करमचंद गांधी जिन्होंने ना केवल भारत को बल्कि विश्व को शांति, सहिष्णुता और अहिंसा के पथ पर चलने के लिए प्रेरित किया. आज हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 145वीं जयंती है.

 

विश्व को शांति का संदेश देने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था. मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात राज्य के पोरबंदर जिले में हुआ. पिता करमचंद गांधी और माता पुतलीबाई के घर जन्में बालक मोहनदास करमचंद गांधी का परिवार वैष्णवौ संप्रदाय को मानता था. यानी की मोहनदास करमचंद गांधी की परवरिश एक आध्यात्मिक परिवार में हुई. मां पुतलीबाई बहुत ही धार्मिक स्वभाव की महिला थी जिनका असर आगे चलकर बालक मोहनदास करमचंद गांधी के जीवन पर भी पड़ा…हालांकि बचपन में बापू बहुत ही शर्मिले और संकोची स्वभाव के थे.

 

सिर्फ 13 साल की उम्र में महात्मा गांधी का विवाह कस्तूरबा गांधी से हो गया. विवाह के समय दोनों लोग सिर्फ 13 साल के थे. शादी के बाद और पिता करमचंद के देहांत के बाद महात्मा गांधी को कानून की पढ़ाई के लिए लंदन भेजा गया.  हालांकि मां पुतलीबाई बालक मोहनदास करमचंद गांधी के लंदन जाने के निर्णय से खुश नहीं थी. लेकिन मोहनदास के बड़े भाई की इच्छा थी वो लंदन जाकर कानून की पढ़ाई करें. आखिरकार जब महात्मा गांधी ने मां से मांस ना खाने, स्त्रियों से दूर रहने और शराब ना पीने का वादा किया तब जाकर मां ने उन्हें लंदन जाने की इजाजत दी. 4 सितंबर 1888 को मात्र अट्ठारह साल की उम्र में महात्मा गांधी साउथेम्पटन के लिए रवाना हुए. हालांकि लंदन पहुंचने के बाद महात्मा गांधी जी के शुरुआती दिन काफी मुश्किल रहे..  इंग्लैंड में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद गांधी जी फिर राजकोट लौट आए फिर उन्होंने बम्बई जाकर वकालत शुरू करने का फैसला किया. लेकिन बाद में गांधी जी बम्बई से लौट आए और राजकोट में ही वकालत शुरू कर दी.

 

साल 1893 में गांधी जी दादा अब्दुल्ला नामक व्यापारी के विधि सलाहकार के रूप में काम करने के लिए दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर गए. जो उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था. उस समय दक्षिण अफ्रीका में काले भारतीयों और अफ्रीकियों के साथ जातीय भेदभाव किया जाता था. जिसे उन्हें भी झेलना पड़ा. एक दिन डरबन के एक न्यायालय में वहां के एक अधिकारी ने उन्हें अपनी पगड़ी उतारने को कहा. 31 मई साल 1893 को प्रिटोरिया जाने के दौरान एक श्वेत व्यक्ति ने ने गाँधीजी के प्रथम श्रेणी में यात्रा करने को लेकर अपनी नाराजगी जताई एवं उन्हें गाड़ी के अंतिम माल डिब्बे में जाने को कहा. गाँधीजी ने अपने पास प्रथम श्रेणी की टिकट होने की बात कहकर जाने से मना कर दिया, जिसके बाद पीटमेरित्जबर्ग में उन्हें ट्रेन से उतार दिया गया.

 

जिसके बाद गांधी जी ने निश्चय किया कि वे अफ्रीका में रहकर भारतीयों के साथ हो रहे जातीय भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाएंगे. उन्होंने अहिंसात्मक रूप से अपना विरोध जताना शुरू किया जो बाद में सत्याग्रह के नाम से जाना गया. आज भी दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी की मूर्ति स्थापित है.

 

दक्षिण अफ्रीका में क्रांतिकारी बदलाव लाने के बाद जनवरी 1915 में गांधी जी लौट आए. भारत आने के बाद गांधी जी ने एक साल तक पूरे देश का भ्रमण किया और फिर बाद में उन्होंने गुजरात के अहमदाबाद सटे साबरमती नदी के तट पर अपना आश्रम बनाया. जिसका नाम उन्होंने सत्याग्रह आश्रम रखा. साल 1930 में इसी साबरमती आश्रम से दांडी यात्रा निकाली थी.

 

गांधी जी ने इस दौरान गुलाम भारत को महसूस किया. साल 1917 में बिहार के चंपारण जिले से उन्होंने अपना पहला सत्याग्रह शुरू किया. ये सत्याग्रह उन अग्रेजों के खिलाफ था जो यहां के नील बगान मालिकों को परेशान करते थे.

 

लेकिन सही मायनों में साल 1920 में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में गांधी युग की शुरुआत हुई. और  ये शुरुआत असहयोग आंदोलन से हुई. असहयोग आंदोलन का लक्ष्य ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अहिंसक विरोध करके सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत करना था. इसका नेतृत्व महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने किया. भारतीय स्वतंत्रता के लिए गांधी जी ने अपनी कई उपाधियां लौटा दीं. गांधी जी का प्रभाव इतना बढ़ता गया कि लोगों का समूह उनके पीछे बढ़ता ही गया. देशभर के वकीलों ने वकालत छोड़ दी. कॉलेजों के छात्रों ने कॉलेज जाना बंद कर दिया. सरकारी नौकरियां कर रहे कई लोगों ने अपनी नौकरियां छोड़ दीं. इस दौरान गांधी जी ने यंग इंडिया और नवजीवन नामक दो साप्ताहिक समाचार पत्रों के माध्यम से लोगों तक अपनी बात पहुंचानी शुरू की. गांधी जी ने लोगों ने स्वदेशी का प्रयोग करने की अपील की. देशभर में विदेशी कपड़े जलाए गए. गांधी जी ने खादी कपड़ों की शुरुआत की. जिसके बाद गांधी जी ने दांडी यात्रा शुरू की. जिसमें देशभर की महिलाओं ने भी भाग लिया. हालांकि चौरी-चौरा की घटना के बाद गांधीजी को यह आंदोलन वापस लेना पड़ा था.

 

दांडी यात्रा दरअसल नमक सत्याग्रह था. जिसका उद्देश्य भारत में ब्रिटिश नमक कर के खिलाफ अहिंसक विरोध प्रदर्शन करना था. 12 मार्च 1930 को गांधी जी ने दांडी यात्रा की शुरुआत की. जिसके बाद 5 मई 1930 को गांधीजी को गिरफ्तार कर लिया गया. जिसके बाद 26 जनवरी 1931 को उनको रिहा किया गया. इसके बाद 5 मार्च 1931 को बापू और ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच एक समझौता हुआ जिसके बाद उन्हें लंदन के दूसरे गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस प्रतिनिधि के रूप में आने को कहा गया. अंग्रेजों के रवैये से परेशान गांधी जी ने जनवरी 1932 में फिर से सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की.

 

हालांकि इससे पहले गांधी जी ने अपनी आत्मकथा लिखी. साल 1927 में गांधी जी आत्मकथा द स्टोरी ऑफ माय एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रूथ प्रकाशित हुई. तीन सालों के अंदर ही इस किताब की करीब 3 लाख प्रतियां बिक गई. जिसके बाद इस किताब का कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ. गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में हर अपने बारे में हर चीज बड़ी बेबाकी से लिखी. वो गलतियां भी लिखी जो उन्होंने युवावस्था में कीं.

 

साल 1932 में जब सामुदायिक अधिनिर्णय की घोषणा हुई तब महात्मा गांधी जेल में थे. इस अधिनिर्णय के अंतर्गत अल्पसंख्यक वर्गों के लिए एक अलग निर्वाचन क्षेत्र निर्धारित किया गया था. जो कि हिंदू समुदाय को विभाजित करने का प्रयास था. गांधी जी ने इस अधिनिर्णय का विरोध करते हुए 20 सितंबर 1932 को आमरण अनशन पर बैठ गए. जिसके बाद अंग्रेजों ने पूना अधिनियम पारित किया. जिसके अंतर्गत विधानमंडल में अल्पसंख्यक वर्गों को संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत विशेष रूप से आरक्षण दिया गया. 8 मई 1933 को महात्मा गांधी ने हरिजनों के हितलाभ के लिए 21 दिनों के अनशन की घोषणा की. साल 1919 से 1932 तक राष्ट्रहित में निकाले जाने वाले यंग इंडिया नामक साप्ताहिक समाचार पत्र के स्थान पर अब हरिजन समाचार पत्र निकाला जाने लगा. साल 1934 के बाद गांधी जी वर्धा के पास सेवाग्राम में रहने लगे.

 

 

साल 1942 में गांधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो का नारा दिया. लेकिन इसी दौरान उनकी पत्नी कस्तूरबा का 74 साल की आयु में निधन हो गया.  भारत छोड़ो आंदोलन की गिरफ्तारी और साबरमती आश्रम में व्यतीत कठिन जीवन का तनाव ही उनकी बीमारी का प्रमुख कारण बना. कस्तूरबा गांधी का अंतिम संस्कार आगा खान महल के जेल में किया गया.

 

अथक प्रयासों से 15 अगस्त 1947 को भारत को पराधीनता से आजादी मिली. लेकिन आजादी की ये खुशी बंटवारे का नासूर जख्म भी ले आई. देश के दो टुकड़े हुए. भारत और पाकिस्तान बने. मुस्लिमों के लिए पाकिस्तान बना. जिसके बाद देशभर में दंगे शुरू हो गए. गांधी जी के लिए ये सबसे मुश्किल दौर था. देश को आजादी तो मिली लेकिन लोग एक दूसरे को मारने काटने पर उतारू थे. गांधी जी के अथक प्रयासों के बाद देश दंगों का आग से बाहर निकल पाया. लेकिन उसके कुछ महीनों बाद ही गांधी जी पर बम फेंका गया. लेकिन उसके कुछ दिन बाद ही 30 जनवरी 1948 को जब महात्मा गांधी दिल्ली के बिड़ला मंदिर से अपनी संध्या प्रार्थना करके निकल रहे थे तभी नाथूराम गोडसे नाम के व्यक्ति ने उन पर गोलियां चला दीं. नाथूराम गोडसे ने एक के  बाद एक तीन गोलियां चलाईं. गोली लगते ही गांधी जी जमीन पर गिरे और आखिरी शब्द जो उनके मुख से निकला वो था ये राम.

 

देश के लिए यकीन करना मुश्किल था कि कोई बापू को गोली भी मार सकता है. देश में शोक की लहर दौड़ गई. एक युग पुरुष हमारे बीच से जा चुका था. लेकिन सत्य और अहिंसा की उनकी सीख हमेशा हमारे साथ रही. गांधी जी से सिर्फ देश के लोग ही नहीं विदेशी भी खासे प्रभावित थे. संयुक्त राष्ट्र ने गांधी के जन्मदिन 2 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मानाने की घोषणा की. 15 जून 2007 के संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव के अनुसार अंतरराष्ट्रीय अंहिसा दिवस शिक्षा एवं जन जागरुकता के माध्यम से अहिंसा के संदेश को प्रसारित करने का अवसर है.

 

गांधी जो अपने जीवन में सफाई बहुत ज्यादा पसंद थी. लेकिन आज पूरे देश में चारों तरफ गंदगी ही फैली है. अब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांधी जयंती को स्वच्छता दिवस बनाने का निर्णय किया. पीएम नरेंद्र मोदी ने गांधी जी के 150 वीं जयंती तक देश को गंदगी मुक्त करने का बीड़ा उठाया है. और सही मायनों में यही गांधी जी के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी. सिर्फ एक दिन गांधी जयंती मनाने से अच्छा है कि हम उनके बताए रास्ते पर चलें.

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