एबीपी न्यूज स्पेशल: क्या यही वह सोच थी जिसने गोडसे को गांधी का हत्यारा बनाया?

By: | Last Updated: Friday, 30 January 2015 4:12 PM
mahatma gandhi

फ़ाइल फ़ोटो: महात्मा गांधी का हत्या नाथूराम गोडसे

नई दिल्ली: उस शाम गोडसे की बंदूक से निकली गोलियों से दिल्ली के बिड़ला भवन में वक्त ठहर सा गया. इतिहास के पन्नों में एक अध्याय खत्म हो गया. लगभग 6 महीने पहले आजाद हुए भारत ने अपने महात्मा को खो दिया. महात्मा गांधी नहीं रहे. अहिंसा के पुजारी का हिंसक अंत हो गया. अंत करने वाले ने कहा जिस गांधी को देश राष्ट्रपिता कहता है उसे वह देश के बंटवारे का दोषी मानता है, इसीलिए उसने गांधी को मार डाला.

 

गांधी के उस हत्यारे को तो तभी फांसी हो गई, लेकिन गांधी की हत्या के 67 साल बाद भी कुछ ऐसे लोग हैं जो उस हत्यारे को देशभक्त बताते हैं, जो गोडसे की मूर्ति लगाना चाहते हैं, जो गोडसे के नाम पर शौर्य दिवस मनाते हैं.

 

बीजेपी के साक्षी महाराज की गोडसे को देशभक्त कहते हैं. हंगामा होने के बाद बीजेपी के साक्षी महाराज तो अपने बयान से पलट गये लेकिन हिंदू महासभा के लोग अब भी गोडसे के महिमामंडन में लगे हुए हैं. आखिर क्यों ? आखिर यह कौन सी सोच है जिसके लिए गोडसे हत्यारा नहीं बल्कि हीरो है ? इस सोच का गोडसे से क्या संबंध है ? और इसीलिए यह सवाल भी उठता है कि क्या गांधी को मारने वाला सिर्फ गोडसे था ? या फिर गोडसे उस सोच का नाम था जिसने गांधी की हत्या की ?  आखिर कौन था नाथूराम गोडसे ? 

 

घंटों मूर्ति के सामने बैठे रहना, ध्यान लगाना. एक बच्चे के लिए यह सब सामान्य नहीं था. लेकिन रामचंद्र का बचपन ऐसा ही था. 1910 में जन्मा रामचंद्र अपने मां बाप का पहला लड़का था जिसकी मृत्यु नहीं हुई. उसके पहले, परिवार के तीन लड़कों की बचपन में ही मौत हो गयी. तब उसके माता पिता ने अपने इस लड़के को लड़की की तरह पालने का फैसला किया. उनका मानना था कि ऐसा करने से उनके परिवार के लड़कों पर अगर कोई संकट होगा तो वह खत्म हो जाएगा.

 

नाथूराम के बाद उसके तीन भाई और हुए. लेकिन नाथूराम उन सबसे अलग था. शायद इसकी वजह थी उसका बचपन. तुषार गांधी के मुताबिक बचपन के हालात ने ही नाथूराम के अंदर इतना आक्रोश भर दिया था जिसका असर बड़े होने तक बना रहा.

 

वहीं जानेमाने समाजशास्त्री और मनोविशलेषक आशीष नंदी का मानना है कि नाथूराम गोडसे के हत्यारा बनने की एक वजह वह माहौल भी था जिसमें वह पला बढ़ा.

आशीष नंदी बताते हैं कि उनको लगा कि पुरूषत्व जाहिर करना चाहिए. गांधी की हत्या में यह एक फैक्टर था.

 

नाथूराम ने अपनी पढ़ाई लिखाई पुणे में रहकर की. हालांकि स्कूल की पढ़ाई से ज्यादा नाथूराम का मन पौराणिक कथाओं, धर्मग्रंथों और इतिहास की पढ़ाई में लगता था. अंग्रेजी में फेल होने की वजह से वह मैट्रिक पास नहीं कर पाया. इसके बाद कुछ समय के लिए उसने बढ़ई का काम सीखा लेकिन तभी उसके पिता का ट्रांसफर रत्नागिरी में हो गया. यही वह जगह थी जहां से नाथूराम के जीवन का एक नया अध्याय शुरू होने वाला था.

 

विनायक दामोदर सावरकर ने ब्रिटेन में रहकर कानून की पढ़ाई की थी. लेकिन इसी दौरान उन पर ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगा जिसके लिए अंग्रेजों ने उन्हें काले पानी की सजा दी यानी 50 साल के लिए पोर्ट ब्लेयर की सेल्यूलर जेल में रहने की सजा. वहां रहकर सावरकर ने हिंदू धर्म और दर्शन पर काफी कुछ लिखा. हिंदुत्व शब्द को एक विचारधारा के तौर पर बढ़ावा देने वाले सावरकर ही थे. कई सालों तक जेल में रहने के बाद अंग्रेजों ने उन्हें इस वादे पर छोड़ा कि वह राजनीतिक गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे और रत्नागिरी की सीमाओं में रहेंगे. रत्नागिरी में ही 1929 में पहली बार सावरकर से नाथूराम गोडसे की मुलाकात हुई. हिंदुत्व पर सावरकर के विचारों से प्रभावित होकर उसने उन्हें अपना गुरू मान लिया.

 

उस वक्त देश में महात्मा गांधी का जादू था. लाखों लोग गांधी के अहिंसा और सत्याग्रह से जुड़ रहे थे. कहते हैं गोडसे भी कुछ समय के लिए इसका हिस्सा बना, छूआछूत के खिलाफ काम किया लेकिन 20 साल के गोडसे को ज्यादा प्रभावित वह विचार करते थे जो हिंदुत्व की बात करते थे. जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ. 1948 में कोर्ट में बयान देते हुए गोडसे ने खुद कहा कि वह आर एस एस से जुड़ा था. 

 

1932 में डॉक्टर हेडगेवार के भाषण से प्रभावित होकर मैं स्वयंसेवक के तौर पर आरएसएस से जुड़ा. कुछ सालों तक मैं महाराष्ट्र में उसके बौद्धिक कार्यक्रमों से जुड़ा रहा. कुछ समय तक हिंदुओं के उत्थान से जुड़े काम करने के बाद मुझे लगा कि हिंदुओं के न्यायसंगत अधिकारों की रक्षा के लिए मुझे देश की राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना चाहिए. इसीलिए मैं आरएसएस छोड़कर हिंदू महासभा से जुड़ गया.

 

गोडसे और आरएसएस के रिश्तों को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं. आरएसएस हमेशा से गोडसे से अपने संबंधों को नकारता रहा है. गोडसे ने भी अपने बयान में यही कहा कि गांधी की हत्या के वक्त उसका आरएसएस से कोई रिश्ता नहीं था. लेकिन नाथूराम गोडसे के छोटे भाई गोपाल गोडसे ने जेल से रिहा होने के कई सालों बाद 1994 में फ्रंटलाइन मैगजीन को दिए इंटरव्यू में कहा कि गोडसे ने कभी आरएसएस छोड़ी नहीं थी.

 

नाथूराम आरएसएस में बौद्धिक कार्यवाह बन गये थे. उन्होंने अपने बयान में आरएसएस छोड़ने की बात इसलिए कही क्योंकि गांधी की हत्या के बाद गोलवलकर और आरएसएस के लिए परेशानियां बढ़ गयी थीं. लेकिन उन्होंने आरएसएस छोड़ी नहीं थी. 

 

इस बीच गोडसे के पिता रिटायर हो गये और पूरा परिवार महाराष्ट्र के सांगली में रहने लगा. परिवार का खर्चा चलाने के लिए नाथूराम ने दर्जी का काम सीखा और सांगली में अपनी दुकान खोल ली. जब घरवालों ने शादी के लिए कहा तो उसने इंकार कर दिया.

 

1937 में बांबे प्रेसिडेंसी में कांग्रेस की सरकार बनी. इस सरकार ने सावरकर पर लगे प्रतिबंध खत्म कर दिए. जिसके बाद सावरकर ने पूरे महाराष्ट्र यानी बांबे स्टेट, का दौरा करने का फैसला किया. सावरकर जब सांगली पहुंचे तो गोडसे ने ही वहां उनके कार्यक्रमों को आयोजित करने की कमान संभाली. रत्नागिरी में बने रिश्ते सांगली में और मजबूत हुए.

 

सावरकर की विचारधारा से प्रभावित गोडसे औपचारिक तौर पर हिंदू महासभा के साथ जुड़ गया. उसने सांगली छोड़कर सावरकर के साथ दौरे पर जाने का फैसला किया. 1938 में हिंदू महासभा ने हैदराबाद के निजाम और रजाकारों के खिलाफ मार्च निकालने की घोषणा की. तब गोडसे ने इस मार्च के पहले जत्थे का नेतृत्व किया. इसी दौरान उसे गिरफ्तार कर लिया गया और एक साल के लिए जेल भेज दिया गया.

 

इस वक्त सावरकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष बन चुके थे और गोडसे उनका कट्टर समर्थक. 1939 में गोडसे जब हैदराबाद जेल से बाहर आया तो वह भी पूरी तरह मुसलमानों और गांधी के हिंदू-मुस्लिम एकता के सिद्धांत के खिलाफ हो चुका था.

 

जेल से बाहर आने के बाद गोडसे ने अपने परिवार के पास जाने के बजाय पुणे में रहकर हिंदू महासभा का काम संभाल लिया. रत्नागिरी में सावरकर के साथ बिताए वक्त में उसने अंग्रेजी सीखी और अपनी राजनीतिक समझ को एक दिशा दी. अब वक्त था अपने चुने हुए रास्ते पर आगे बढ़ने का. इसी दौरान उसकी मुलाकात एक ऐसे इंसान से हुई जो मरते दम तक उसके साथ रहने वाला था – नारायण दत्तात्रेय आप्टे. अहमदनगर में हिंदू महासभा का काम देख रहा आप्टे, गोडसे से एक साल छोटा और स्वभाव में उससे बिलकुल अलग था.

 

आप्टे का परिवार पुणे में ही रहता था. जहां गोडसे मैट्रिक पास भी नहीं था वहीं आप्टे साइंस ग्रैजुएट था. गोडसे शांत और साधारण तरीके से रहने वाला था तो आप्टे को हर तरह के शौक थे. लेकिन हिंदुत्व को लेकर दोनो के विचार एक जैसे थे. सावरकर उस वक्त हिंदू महासभा को मजबूत संगठन के तौर पर स्थापित करने में लगे थे. मनोहर मलगांवकर ने अपनी किताब The Men Who killed Gandhi में लिखा है कि सावरकर उस वक्त एक ऐसा दल भी बनाना चाहते थे जो उन कामों में लग सके जो एक राजनीतिक पार्टी नहीं कर सकती. 1942 में गोडसे और आप्टे इसी दल का हिस्सा बने जिसका नाम था हिंदू राष्ट्र दल.

 

1942 में गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन की शुरूआत की. जिसके बाद कांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो गयीं. कांग्रेसी नेताओं की गैरमौजूदगी और दूसरे विश्वयुद्ध में ब्रिटेन का समर्थन करने की मुस्लिम लीग की रणनीति से उस दौर में जिन्ना को अंग्रेजों के साथ अच्छे संबंध बनाने का मौका मिल गया.

 

मुस्लिम लीग का बढ़ता प्रभाव, हिंदू महासभा और उनके नेताओं को पसंद नहीं आ रहा था. वह इसके लिए कांग्रेस की कमजोर नीतियों को जिम्मेदार मान रहे थे. हाल ही में द इकनोमिस्ट मैगजीन में छपे एक लेख में लिखा गया है कि सावरकर ने गांधी की आलोचना करते हुए उन्हें कमजोर और कायर तक कह डाला था.

 

गांधी को लेकर सावरकर के विचारों का असर गोडसे पर भी था. इसलिए उसने सावरकर और हिंदू महासभा की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए एक अखबार निकालने का फैसला किया.

 

इस तरह 1944 में शुरूआत हुई ‘अग्रणी’ नाम के उस अखबार की, जिसका संपादक नाथूराम गोडसे बना. गोडसे और आप्टे ने अखबार शुरू करने के लिए सावरकर से 15 हजार रुपये लिए. यही नहीं पेपर पर सावरकर का फोटो भी छापा गया. अखबार निकालने के दौरान गोडसे और आप्टे की नजदीकियां बढ़ती गई. अखबार की भाषा और खबरों की वजह से कई बार उस पर जुर्माना लगाया गया. फिर भी अखबार उग्र तरीके से हिंदूवादी विचारधारा को आगे बढ़ाता रहा. जब सरकार ने ‘अग्रणी’ को बंद करने का आदेश दिया तो गोडसे ने उसका नाम बदलकर ‘हिंदू-राष्ट्र’ कर दिया.

 

महात्मा गांधी के परपोते तुषार गांधी ने अपनी किताब Lets kill Gandhi में लिखा है कि 1944 में ही गोडसे और आप्टे ने पहली बार गांधी पर हमले की कोशिश की. गांधी तब जेल से रिहा होकर पुणे के पास पंचगनी में ठहरे हुए थे. तब गोडसे और आप्टे ने अपने दल के साथियों के साथ वहां प्रदर्शन किया और गांधी के खिलाफ नारेबाजी की.

 

जिस अहिंसा और सत्याग्रह को गांधी का ताकत समझा जाता है. एक ऐसी ताकत जिसके आगे अंग्रेजों को भी झुकना पड़ता था. जिस गांधी की एक आवाज पर पूरा देश उनके साथ खड़ा हो जाता था. वही गांधी कुछ हिंदू संगठनों को अखरने लगे थे. आखिर क्यों ? क्या गांधी का यह सोचना गलत था कि हिंदू और मुसलमानों को मिलकर, एक होकर अंग्रेजों का मुकाबला करना चाहिए ? या फिर गांधी का यह मानना गलत था कि बहुसंख्यक होने के नाते हिंदुओं को बड़ा दिल दिखाना चाहिए? गोडसे जिस विचारधारा का समर्थक था वह विचारधारा गांधी की इसी सोच को मुस्लिम तुष्टिकरण का नाम देती थी. तो क्या यही विचारधारा गांधी की हत्या की वजह बनी ? आखिर गोडसे ने गांधी को क्यों मारा ?

 

गोडसे ने कोर्ट के सामने दिए अपने बयान में गांधी की हत्या की जो वजहें बताईं उनमें प्रमुख थीं. गांधी का मुसलमानों की तरफ नरम रवैया, बंटवारे के लिए गांधी को जिम्मेदार मानना और भारत सरकार पर पाकिस्तान को उसके हिस्से के 55 करोड़ रुपए देने का दबाव बनाना. 

 

तुषार गांधी कहते हैं कि पिछले 50 सालों से आरएसएस और जो उनके हत्यारों की विचारधारा है उन्होंने उनकी हत्या को जस्टिफाई करने के लिए झूठ का प्रचार पुरजोर तरीके से चलाया. बापू के ऊपर कई प्रकार के आक्षेप डालकर उन्होंने उस हत्या को जस्टिफाई करने की चेष्टा की, लेकिन सत्य मिटा नहीं सकते.

 

तुषार गांधी के मुताबिक दो राष्ट्रों की बात जिन्ना के अलावा अगर किसी ने की थी तो वह थे सावरकर. उनके मुताबिक 1937 में अहमदाबाद में हिंदू महासभा का अध्यक्षीय भाषण देते हुए सावरकर ने कहा कि भारत में दरअसल दो देश हैं – एक हिंदू एक मुसलमान.

 

उधर जिन्ना मुसलमानों के लिए अलग देश की जिद पर अड़े हुए थे. इस मांग को मनवाने के लिए 1946 में जिन्ना ने ‘डायरेक्ट एक्शन’ यानी ‘सीधी कार्रवाई’ की बात कही. जिसका नतीजा यह हुआ कि मुस्लिम लीग के समर्थकों ने हिंदुओं को निशाना बनाना शुरू कर दिया. इसका सबसे ज्यादा असर पूर्वी बंगाल के नोआखली में देखा गया.

 

लेकिन हिंदू संगठन जिस गांधी पर मुसलमानों का पक्ष लेने का आरोप लगाते रहे वही गांधी नोआखली में हिंदुओं के खिलाफ हो रही हिंसा को रुकवाने के लिए कई हफ्तों तक वहां रहे. उधर हिंदुओं की मदद के नाम पर हिंदू महासभा और उसके संगठन के लोग भी उस दौर में नोआखली पहुंचने लगे. इन्हीं लोगों में से एक था विष्णु करकरे. करकरे ने नोआखली में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार की खबरें छपवाने के लिए गोडसे और आप्टे से संपर्क किया और तबसे वह तीनों आगे की योजनाओं में भी साथ हो गये. गोडसे और आप्टे इस वक्त तक अखबार चलाने के साथ साथ हथियारों को इकट्ठा करने के काम में भी लग चुके थे. क्योंकि उनकी नजर में हथियारों और हिंसा के बिना हिंदुओं की रक्षा नहीं हो सकती थी.

 

उस वक्त देश के अलग अलग हिस्सों में हिंदू-मुस्लिम दंगे हो रहे थे. इस माहौल में कट्टर हिंदूवादी संगठनों का समर्थन बढ़ने लगा. गोडसे और आप्टे जैसे लोगों को पीछे से मदद देने वालों की संख्या बढ़ रही थी. इसी का नतीजा था कि जिस गोडसे के लिए जुर्मानों की वजह से अपना अखबार चलाना मुश्किल हो रहा था उसने इस वक्त तक पुणे मे अपने अखबार के लिए अलग दफ्तर और प्रिंटिग प्रेस ले लिया.

 

1947, वह साल जब देश को आजादी मिली. लेकिन इस आजादी के साथ ही मिला बंटवारे का जख्म. दंगों का दर्द. मुस्लिम लीग की जिद और अंग्रेजों की चाल ने 1947 में भारत के दो टुकड़े कर दिए. जाहिर है आजादी की लड़ाई लड़ने वाले नेताओं में से कोई भी यह नहीं चाहता था लेकिन गोडसे और उसकी तरह के तमाम कट्टर हिंदू समर्थकों ने इस बंटवारे के लिए गांधी को जिम्मेदार मान लिया.

 

एक तरफ आजादी का जश्न और दूसरी तरफ बंटवारे की वजह से हुए दंगों का दर्द. भारत में पंजाब से लेकर दिल्ली और बंगाल तक दंगे फैले हुए थे. आजादी के दिन यानी 15 अगस्त 1947 को गांधी दिल्ली से दूर कलकत्ता में उपवास पर थे. गांधी ने बार-बार इन दंगों को रोकने की अपील की. शायद वह जानते थे कि बंटवारे का यही अंजाम होगा. इसीलिए मार्च 1947 में गांधी ने कहा था कि अगर कांग्रेस बंटवारे को स्वीकार करना चाहती है तो ऐसा मेरे मृत शरीर पर होगा. जब तक मैं जिंदा हूं, मैं कभी भारत के बंटवारे के लिए तैयार नहीं होऊंगा. लेकिन न गांधी बंटवारे को रोक पाए और न उसके बाद हो रहे दंगों को.

 

तुषार गांधी के मुताबिक आखिरी कुछ सालों में गांधी अकेले पड़ गये थे. उनकी उदासीनता इसलिए भी थी कि जिन्हें उन्होने अपना साथी माना था उन्होंने भी उनसे किनारा कर लिया था. उन दिनों का एक बड़ा व्यथित वक्तव्य था कि एक मुझे अपना शिष्य कहता है दूसरा बेटा कहता है. आज दोनों मेरी सुनते नहीं हैं. ये बहुत ही उदास औऱ निराश इंसान के स्टेटमेंट थे. उन्होंने उस प्रेसेंट और फ्यूचर को देख लिया था, उन्हें लगा कि उसमें उनके लिए कोई जगह रह नहीं गयी थी. 

 

गांधी की हत्या भले ही गोडसे ने 1948 में की लेकिन क्या कांग्रेस ने उसके पहले ही गांधी से किनारा कर लिया था. क्या कांग्रेस के लिए गांधी सिर्फ एक नाम रह गये थे जिसे लेकर वह सत्ता में थी. क्या यही वजह थी कि गांधी बंटवारे का विरोध करते रहे लेकिन कांग्रेस पर इसे न मानने का दबाव नहीं बना पाये.

 

एक तरफ देश में दंगे हो रहे थे तो दूसरी तरफ गोडसे, आप्टे और उनके बाकी साथियों की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. वह जल्द से जल्द किसी ऐसी घटना को अंजाम देना चाहते थे जिससे वह अपने उन साथियों को खुश कर सकें जो उन्हें पैसे और हथियारों की मदद दे रहे थे. उनकी योजनाओं में पाकिस्तान को उसके हिस्सों के हथियार पहुंचाने वाली ट्रेन पर हमला और हैदराबाद के ऑक्ट्रॉय पोस्ट को लूटने जैसी चीजें शामिल थीं. पुणे में हिंदू राष्ट्र अखबार के दफ्तर में ही गोडसे और उसके साथी इकट्ठा होकर योजनाएं बनाया करते थे. उधर दिल्ली में हालात बिगड़ते जा रहे थे.

 

माउंटबेटन से मुलाकात के बाद महात्मा गांधी ने उसी शाम अपनी प्रार्थना सभा में लोगों से दिल्ली में सांप्रदायिक सौहार्द्र बनाने की अपील की. उन्होंने कहा जब तक दिल्ली में हालात नहीं सुधरते वह आमरण अनशन पर बैठेंगे. पुणे में हिंदू राष्ट्र के दफ्तर में मौजूद गोडसे और आप्टे को भी गांधी के अनशन की खबर मिली. तुषार गांधी के मुताबिक उसी दिन उन्होंने अपनी योजना को अंजाम तक पहुंचाने का फैसला किया.

 

नाथूराम गोडसे के मन में क्या चल रहा था यह जल्द ही सबको पता चलने वाला था. लेकिन एक बात तो साफ थी कि वह अपनी योजना बना चुका था. क्योंकि 13 और 14 जनवरी को उसने अपनी दो जीवन बीमा पॉलिसी में से एक में नारायण आप्टे की पत्नी और दूसरी में अपने छोटे भाई गोपाल गोडसे की पत्नी का नाम लिखवा दिया. मतलब साफ था कि वह ऐसा कुछ करने वाला था जिसमें खुद गोडसे, आप्टे और गोपाल गोडसे की जान को खतरा था. 

  

गोडसे ने कोर्ट में दिए अपने बयान में गांधी की हत्या की एक वजह यह भी बताई थी कि गांधी ने पाकिस्तान को 55 करोड़ देने का दबाव बनाया. यह बात सही है कि गांधी, सरकार के उस फैसले से सहमत नहीं थे. यह भी सही है कि गांधी के अनशन के दौरान ही भारत सरकार ने पैसे न देने का अपना फैसला बदला और कैबिनेट ने पाकिस्तान को वह रकम देने का प्रस्ताव मंजूर कर लिया. लेकिन गांधी ने खुद कभी इसे अनशन खत्म करने की शर्तों में शामिल नही किया. इसीलिए सवाल यह भी है कि क्या इस तरह की बातें सिर्फ गांधी की हत्या को सही ठहराने के बहानों के तौर पर कही जा रही थीं.

 

महात्मा गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को हुई. लेकिन उसके पहले 20 जनवरी को भी एक असफल कोशिश हुई. यह कोशिश उसी योजना का अंजाम थी जो गोडसे ने अपने साथियों के साथ बनाई थी. 20 जनवरी को दिल्ली के बिड़ला हाउस में महात्मा की प्रार्थना सभा में बम फेंका गया. पुलिस ने इस आरोप में मदनलाल पाहवा नाम के आदमी को गिरफ्तार किया. वहीं 21 जनवरी को महाराष्ट्र यानी तब के बांबे स्टेट के गृहमंत्री मोरारजी देसाई को यह जानकारी मिल चुकी थी की मदनलाल पाहवा के साथ और भी लोग हैं जो गांधी की हत्या के मकसद से निकले हैं. यानी दिल्ली और मुंबई पुलिस के पास गांधी की हत्या की योजना से जुड़ी अहम जानकारियां थीं फिर भी 10 दिन बाद गोडसे अपने मकसद में कामयाब हो जाता है.

 

तुषार गांधी बताते हैं जो प्रश्न उठते हैं उसमें लगता है कि नाथूराम ने भले ही गोलियां छोड़ी हों लेकिन ऑफिशियल सपोर्ट के बिना वह कामयाब नहीं हो पाता. 

 

तुषार गांधी ने बताया कि बापू की हत्या राजनीतिक हत्याओं में आश्चर्यजनक है. क्योंकि 10 दिन पहले उसी तरह उसी जगह कोशिश हुई. मदनलाल पकड़ा गया वह कहता रहा. वह वापस आयेगा. उसने सारे एक्यूस्ड के बारे में जानकारी दी. उन लोगों के बारे में रिकॉर्ड्स भी थे. फिर भी वह सब 10 दिन बाद पहुंचे औऱ नाथूराम ने बीड़ा उठाया और बापू की हत्या की. इतनी जानकारी होने के बाद पुलिस रोक नही पाई.  

 

यह सवाल अकसर उठता है कि इस मामले में पुलिस की लापरवाही की वजह क्या थी? सरदार पटेल और नेहरू यह कहते रहे कि गांधी ने अपनी सुरक्षा का इंतजाम करने से मना कर दिया था लेकिन क्या इसका मतलब यह था कि इतनी जानकारियों के साथ 10 दिन तक पुलिस केवल छानबीन करती रही और गोडसे अगले हमले की तैयारी करता रहा. इस बीच वह दिल्ली से कानपुर, बंबई, ग्वालियर और फिर दिल्ली के बीच घूमता रहा, पर पुलिस उसे पकड़ नहीं पाई. इसीलिए यह सवाल उठता है कि गांधी की हत्या के जुर्म में जिन लोगों को सजा हुई क्या उनके अलावा और भी लोग थे, जो इसके लिए जिम्मेदार थे.  

तुषार गांधी ने बताया कि कपूर कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक अलवर में 30 जनवरी को 12 बजे पर्चे बांट दिए गये थे कि बापू को मार दिया गया यह कैसे हुआ. बाद में खाली पता चला कि पर्चे अमृतसर में छप कर आये थे.

 

गांधी की हत्या के बाद सरकार ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया हालांकि तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने इस मामले में आरएसएस को क्लीन चिट देते हुए हिंदू महासभा को जिम्मेदार ठहराया था. गांधी की हत्या के जुर्म में गोडसे के अलावा जिन लोगों पर हत्या की साजिश का मुकदमा चला उनमें गोडसे के गुरू, विनायक दामोदर सावरकर का भी नाम था. हालांकि बाद में कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया. इस साजिश में शामिल उसके दूसरे साथी विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा और गोपाल गोडसे को उम्रकैद की सजा हुई. वहीं नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को 15 नवंबर 1949 को फांसी दे दी गई.

 

गांधी पर गोलियां चलाने वाला गोडसे था. कोर्ट में अपने गुनाह को कबूल करने वाला गोडसे था. गांधी की हत्या के जुर्म में फांसी पर चढ़ने वाल गोडसे था. तो फिर वह लोग कौन हैं ? जो आज भी गोडसे की वकालत करते हैं. वह लोग कौन है? जो गोडसे की मूर्ति लगाना चाहते हैं. आखिर वह कौन सी सोच है जो एक हत्यारे को देशभक्त साबित करने में लगी है? क्या यही वह सोच थी जिसने गोडसे को गांधी का हत्यारा बनाया ?

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