व्यक्ति विशेष: कैप्टन कूल की ये अनसुनी कहानी खुद उन्हीं के कोच और दोस्तों की जुबानी

By: | Last Updated: Saturday, 21 March 2015 4:06 PM

ये एक ऐसे सफर की दास्तान है जिसमें जाने- पहचाने रास्तें है तो कुछ अनजाने और अनचाहे मोड़ भी शामिल रहे हैं. इस कहानी का हिस्सा मिट्टी के मैदान भी है और सुविधाओं से लैस चमचमाते स्टेडियम भी हैं. एक छोटे से शहर में एक छोटे से लड़के की हैरान कर देने वाली कामयाबी की ये कहानी करीब 14 साल पहले सिर्फ तीन सौ रुपये से शुरु हुई थी जब मैदान पर वो लड़का अपने हुनर को दांव पर लगाता था लेकिन आज ऐसे चमचमाते मैदानों में उस पर करोड़ों रुपये बरसते हैं. भारतीय क्रिकेट को अपनी बेमिसाल कप्तानी से ऊंचा मुकाम दिलाने वाले कैप्टन महेंद्र सिंह धोनी की ये कहानी जितनी सीधी और सपाट नजर आती है उतनी ही ये पेचीदा और उलझी हुई भी है क्योंकि धोनी की इस दास्तान में जहां किस्मत का अहम  रोल है तो वहीं उनकी मेहनत और हुनरमंदी का बड़ा खेल भी शामिल है.

 

महेंद्र सिंह धोनी ने अभावों से जूझते हुए अपने क्रिकेट करियर को आगे बढ़ाया था. बेतरतीब मैदानों पर कभी धोनी ने देश के लिए क्रिकेट खेलने का सपना संजोया था लेकिन किस्मत ने उन्हें उस मुकाम पर भी पहुंचाया जहां सचिन तेड़ुलकर भी उनकी कप्तानी में क्रिकेट खेले. वो सचिन जिन्हें महेंद्र सिंह धोनी भी मानते रहे हैं क्रिकेट का भगवान. 

 

क्रिकेट के मैदान पर अपने अप्रत्याशित फैसलों से चौकनें वाले टीम इंडिया के कप्तान धोनी का करियर जितना चमकदार रहा है उतना ही शानदार है वनडे में उनकी जीत का रिकॉर्ड.

 

सवाल- क्वार्टर फाइनल में कमाल हो गया तो 29 मार्च को हम फिर आपका मेलबर्न में स्वागत करें तो इस रास्ते में आपको सबसे बड़ा चैलेंज क्या लगता है. महेंद्र सिंह धोनी का जबाब-नहीं चैलेंज तो क्रिकेट ही है क्योंकि आपको अच्छा क्रिकेट खेलना पड़ेगा. अगर आप यहां पर वापस आकर खेलना चाहते हैं और जो नेक्सट गेम है वो सिडनी में है तो उसके अलग चैलेंज रहेंगे और होपफुली हम अपनी जो परफॉरमेंस को और ऊपर लेकर जा सकते हैं एंड देन डेफिनेटली वी कैन कैमबैक और यहां पर हम फाइनल खेल सकते हैं.

 

देश की उम्मीदें आठवें आसमान पर हैं. वर्ल्ड कप के सात मैंचों में लगातार जीत का परचम लहराते हुए टीम इंडिया ने सेमीफाइनल के मैदान में कदम रख दिया है. अब 26 मार्च को ऑस्ट्रेलिया से भिड़ेगा भारत. वर्ल्ड कप में टीम इंडिया जीत की लय पकड़ चुकी है यही वजह है कि टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को भी पूरा यकीन है कि भारत मां के माथे पर ही सजेगा क्रिकेट की दुनिया का सबसे बड़ा ताज.

 

महेंद्र सिंह धोनी ने कहा कि अभी तक हमारी टीम ने ये बहुत अच्छी तरह से किया है जिस भी बल्लेबाज को एक अच्छा स्टार्ट मिला है उसने उसको कनवर्ट किया है तो उससे क्या होता है कि बाकि के जो बैट्समेन है उस पर प्रेशर कम हो जाता है तो आगे भी ये करना होगा हमें और सेम चीज हमनें बालिंग में भी की अगर आप फास्ट बालर का देखें तो ऐसा कुछ नहीं है कि कोई एक फास्ट बालर हर मैच में विकेट ले रहा है आई थिंक तीनों ने मिलकर बहुत अच्छी बालिंग की है और जहां तक स्पिनर की बात की जाए तो विकेट्स की तो आप तौल नहीं सकते कि इतने विकेट इन्हें मिलें पर उन्होंने जिस तरीके से प्रशर मैंटेन किया है जिस कारण से फास्ट बालर को विकेट मिले और मैं समझता हूं कि उनका जो रोल रहा है मीडिस ओवर में वो बहुत क्रुशिएल रहा है.

 

वर्ल्ड कप के सात मैचों में टीम इंडिया की ये जीत इसलिए भी खास है. क्योंकि टीम ने लगातार सात मैंच विपक्षी टीम को ऑलआउट करके जीते हैं. इन सभी मैचों में पहली बार टीम इंडिया का बैंटिंग पावरप्ले में एक भी विकेट नहीं गिरा है और गेंदबाजों ने भी इन सात मैचों में 70 विकेट चटकाएं हैं. टीम इंडिया ने अभी तक वर्ल्ड कप में हर मोर्चे पर बेहतरीन खेल दिखाया है. फील्डिंग, बॉलिंग औऱ बैटिंग हर डिपार्टमेंट में कप्तान धोनी की रणनीति और उनका पावर प्लान टीम इंडिया के काम भी आया है.

 

क्रिकेटर गौतम गंभीर बताते हैं कि कैप्टन सिर्फ प्लान बना सकता है यै फिर स्ट्रेटजी बना सकता है उसका उपयोग करना खिलाड़ियों के हाथ में चाहें वो बॉलर हो ये बैट्समैन हो. आप एक कैप्टन की तरह चाहें जितना प्लान बनाए जितनी मर्जी स्ट्रेटजी बनाए अगर आपके प्लेयर सही  तरह से एक्जिक्यूट नहीं करे तो आपका कोई भी प्लान सफल नहीं हो सकता है. तो कहीं न कहीं ज्यादातर क्रेडिट खिलाड़ियों को जाता है कि किस तरह से उन्होंने प्लान को एक्जिक्यूट किया है. नो डाउट धोनी ने अच्छे प्लान बनाए हैं अच्छी स्ट्रेटजी बनाई हैं लेकिन सबसे ज्यादा क्रेडिट प्लेयर को जाता है क्योंकि वो उन प्लान को एक्जिक्यूट करने में सफल रहें हैं.

 

पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद बताते हैं कि फौज को लड़ाने वाला कप्तान होता है और किस प्रकार कप्तान अपनी फौजों को इस्तेमाल करता है और कैसे लड़ाता है वो उसकी विशेषता होती है और वो विशेषता धोनी की इस विश्वकप में दिखी है. आप पाकिस्तान के मैच से शुरु करें साउथ अफ्रिका के विरुद्ध देखें कई बार हल्के मैंच खेलते है तो आसान हो जाता है लोग बदलाव कर देते हैं टीम के अंदर बैटिंग ऑर्डर चैंज कर देते हैं बॉउलिंग चैंज कर देते हैं लेकिन वो अपने उसी तरीके से लय में लगे रहते हैं जो विनिंग कांबिनेशन था उसको छुआ नहीं उन्होंने और हर व्यक्ति पर उन्होंने अपना विश्वास दिखाया ये एक बात है जो मैं समझता हूं को धोनी को मुकाम तक लेकर आई.

 

क्वार्टर फाइनल में जीत का परचम लहराने के साथ ही कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने कामयाबी का एक और कारनामा अपने नाम कर लिया है. देश को 100 वनडे मैच जिताने वाले धोनी, भारत के पहले और दुनिया के तीसरे कप्तान बन गए हैं. धोनी के अलावा 165 वनडे मैच जीतने वाले ऑस्ट्रेलिया के रिकी पॉन्टिंग और 107 मैच जीतने वाले एलन बॉर्डर का नाम भी कामयाबी की इस लिस्ट में शामिल है.

 

धोनी ने अपने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट करियर में अब तक 261 वनडे मैच खेले हैं और उन्होंने 177 मैचों में कप्तानी की है. उनकी कप्तानी में अब तक टीम इंडिया ने 100 मैच जीते, 62 हारे,  4 मैच टाई हुए और 11 मैच बेनतीजा रहे हैं.

 

टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी बताते हैं कि वनडे में आपका रिकवरी का चांस बहुत ज्यादा होता है  जब एक बायलैटरल सीरीज होता है 5 मैच होते है 2 हारे 3 जीते पर ओवरआल आप अगर देखें तो आपका जो रिकार्ड होता है वो ऊपर नीचे चलता रहता है . मैंने पहली बार जब कप्तानी की थी तब आस्ट्रेलिया के खिलाफ इंडिया में मैच खेला था वो सीरीज हम हार गए थे तो ऊपर नीचे लगा ही होता है. काफी स्ट्रगल भी हमनें किया.

 

खुद कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का कहना है कि टीम इंडिया आज कामयाबी के जिस मुकाम पर खड़ी है उसके लिए उन्हें लंबे स्ट्रगल से गुजरना पड़ा है. क्या है धोनी का ये स्ट्रगल और क्या है उनकी वो रणनीति जिसने महज एक महीने पहले ऑस्ट्रेलिया में बुरी तरह हारने वाली टीम इंडिया को उसी ऑस्ट्रेलिया में वर्ल्ड कप का सबसे बड़ा दावेदार बना दिया है.

वर्ल्ड कप शुरु होने से महज पंद्रह दिन पहले ऑस्ट्रेलिया में टीम इंडिया बुरी तरह हारी थी. ऑस्ट्रेलिया में खेली गई इस वनडे ट्राइ सीरीज में इंग्लैड और ऑस्ट्रेलिया दोनों के ही हाथों टीम इंडिया बुरी तरह से पराजित हुई. टीम के गेंदबाजों के हौसले जहां पस्त पड़े थे वही बैटिंग ऑर्डर भी लड़खड़ा रहा था. 30 जनवरी को पर्थ में इंग्लैंड जैसी टीम से मिली शर्मनाक पराजय के बाद तो भारत के वर्ल्ड कप जीतने की संभावना पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया था. महज एक मैच में उसकी इज्जत इसलिए बच सकी थी क्योंकि ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ये वनडे ड्रा हो गया था. हालात बेहद मुश्किल थे. 15 दिन बाद ही टीम को वर्ल्ड की जंग में उतरना था लेकिन कप्तान धोनी ने इन पंद्रह दिनों में ही जैसे बाजी पलट कर रख दी.

 

क्रिकेटर आशीष नेहरा बताते हैं कि इस विश्वकप से पहले बहुत सारे लोग सवाल कर रहे थे कि हम टेस्ट मैच नहीं जीते हैं ऑस्ट्रेलिया में ट्राई सीरीज में इंग्लैंड जैसी टीम थी तब भी हम फाइनल में नहीं पहुंचे  हैं पर वो मैं हमेशा से कहता रहूंगा कि वो एक अलग टूर्रनामेंट था और वर्ल्ड कप एक अलग टूर्नामेंट है इसमें जिस तरीके से धोनी ने टीम में जोश और जुनून भरा है और उनको पता है कि टीम के सबसे सीनियर प्लेयर है और उन्होंने टीम को जिस तरह से लेकर चले हैं टीम में टैलेंट की कोई कमी नही है. ये सबको पता है दखिए और जिस तरीके से उन्होंने गेम 1 से लेकर आज 7 मैच हम लोग खेल चुके हैं और 7 मैच जीते हैं धोनी रन बनाए या न बनाए उनका बतौर कप्तान बतौर सीनियर खिलाड़ी बहुत बड़ा रोल है.

 

30 जनवरी से लेकर 15 फरवरी के बीच के पंद्रह दिनों में कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने आखिर अपनी टीम को ऐसा कौन सा मंत्र दिया कि जिसने लगातार हारती और बिखरती टीम को एक जिस्म और एक जान में तब्दील कर दिया. वो टीम जिसमें व्यक्तिगत प्रदर्शन अहम मायने रखता था उसमें अब व्यक्तिगत प्रदर्शन से ऊपर उठ कर खिलाड़ी टीम वर्क करते हुए वर्ल्ड कप के सातों मैच में कैसे छा गए.

 

एक महीना पहले ट्राइ सीरीज में इंग्लैड की टीम से दो मैच लगातार हारने और फाइनल की रेस से बाहर होने के बाद धोनी ने कहा था कि वो चाहते हैं कि खिलाड़ी अपने किट बैग और क्रिकेट के बाकी सामान को ताला लगा दें और क्रिकेट से पूरी तरह से ब्रेक ले लें. धोनी के इस बयान ने हर किसी को चौंका कर रख दिया था. क्योंकि फिटनेस की गंभीर समस्या से जूझ रही टीम के लिए धोनी ने दवाई तो बता दी थी लेकिन वो उसकी बीमारी बताना भूल गए थे. वो ये बताना भी भूल गए कि जिन रविंद्र जाडेजा, शिखर धवन और अंबाती रायडू पर वो साल भर से दांव लगाते रहे वो क्यों निराश कर रहे थे. ऑस्ट्रेलियाई दौरे पर टीम इंडिया को दो महीने से ज़्यादा वक्त गुजर चुका था लेकिन उसे एक भी जीत नसीब क्यों नहीं हो सकी थी. ये तमाम सवाल थे और धोनी की आलोचनाएं हो रही थीं लेकिन इनसे बेपरवाह धोनी को यकीन था कि टीम वर्ल्ड कप में बेहतर करेगी. धोनी का कहना था कि टीम जब 15 फरवरी को वर्ल्डकप में पाकिस्तान के साथ भिडेगी तो वो पूरी तरह तैयार होगी.

 

महेंद्र सिंह धोनी ने बताया कि खास बात ये है कि वर्ल्ड कप में कप्तान धोनी की टीम के वहीं खिलाड़ी जबरदस्त प्रदर्शन कर रहे हैं जो करीब एक महीने पहले ट्राइ सीरीज में लगातार हार के बाद पस्त पड़े थे उनकी चारों तरफ से आलोचनाएं हो रही थी और उनके हौसले भी पस्त पड़े थे लेकिन जब धोनी ने अपने खिलाड़ियों को वर्ल्ड कप में जीत के लिए आराम करने का मंत्र दिया तो जैसे उनमें आ गई एक नई जान.

 

वर्ल्ड कप से ठीक पहले भारतीय टीम के अभ्यास मैच शुरु होने वाले थे लेकिन उस वक्त टीम इंडिया एक घायल सेना की तरह नजर आ रही थी खास तौर पर गेंदबाजों की हालत पस्त पड़ी थी. ईशांत शर्मा और भुवनेश्वर कुमार टखने की चोट से परेशान थे तो रविंद्र जाडेजा को कंधे की चोट परेशान कर रही थी और रोहित शर्मा की मांस पेशियों में भी खिंचाव था. ऐसे मुश्किल लम्हों के बीच आस्ट्रेलिया में टीम इंडिया जब आराम कर रही थी तो कप्तान धोनी अपने घायल खिलाड़ियों के साथ बूट कैंप में बिजी थे.

 

खबरों के मुताबिक टीम के बाकी खिलाडियों से दूर धोनी अपने साथ ईशांत शर्मा, मोहित शर्मा और भुवनेश्वर कुमार को बूट कैंप में लेकर गए थे. यहां ऑस्ट्रेलिया में बूट कैंप एक ऐसे कैंप को कहा जाता है जहां आपको बिना किसी फोन या अन्य सुविधाओं के किसी सुनसान जंगल में रखा जाता है. फिर आप को ऐसे काम दिए जाते हैं जिससे ना केवल आप की फिटनेस का इम्तिहान होता है बल्कि एक टीम की तरह आपका प्रदर्शन कैसा होगा इसका अंदाजा भी लगाया जाता है.

 

ये पहला मौका नहीं है जब कोई टीम वर्ल्ड कप से पहले बूट कैंप में शामिल हुई है. ऑस्ट्रेलिया के कोच जॉन ब्यूकानन ऐसे बूट कैंप के लिए मशहूर रहे हैं. दक्षिण अफ्रीका ने भी साल 2003 में ऐसे बूट कैंप का सहारा लिया था मगर वो पहले राउंड से आगे नहीं बढ़ पाई थी लेकिन कप्तान धोनी के इस नए दांव ने उन गेदबाजों में एक नया हौसला भर दिया है जो एक वक्त टीम इंडिया की सबसे कमजोर कडी नजर आ रहे थे.

 

क्रिकेटर गौतम गंभीर ने कहा कि आपके बालर मैच जीताते हैं आपके बैटमेन बिल्कुल सेटअप करते है अल्टीमेटली आपको विपक्षी टीम को आउट करना पड़ता है आप चाहें 330 रन बना लो अगर आपके बालर विरोधी को आउट नही करेंगें तो आप कभी भी मैच नहीं जीतेगें. तो बैटमेन आपके लिए गेम सेट करता है और बालर आपको मैच जीताते हैं तो कहीं न कहीं 5 बालरों ने अच्छा गेंद डाला है टूर्नामेंट में स्पेशली आपके फास्ट बालर ने जिस तरीके से उन्होंने शॉर्टबॉल का यूज किया है और और ऐसा नहीं कि सिर्फ सबकंटिनेंट टीम के विरोध में यूज किया .

 

कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने वर्ल्ड कप से पहले अपने खिलाडियों को आराम करने का जो मंत्र दिया था उस पर अमल वर्ल्ड कप के दौरान भी जारी है. वर्ल्ड कप के शुरुआती मैच में पाकिस्तान और साउथ अफ्रीका को हराने के बाद टीम में आपसी तालमेल को बेहतर बनाने के लिए धोनी ने 26 फरवरी को छुट्टी की मांग की थी. इस दौरान टीम के सदस्यों को होटल से बाहर जाने की इजाजत भी मिली. भीषण गर्मी के बावजूद कप्तान धोनी, विराट कोहली और मोहम्मद शमी के साथ लंच के लिए बाहर भी निकले थे.

वर्ल्ड कप के अभी तक के सफर में भारतीय टीम ने अभ्यास के लिए क्रिकेट के मैदान की जगह समंदर के बीच को भी चुना है. शोर शराबे से दूर टीम इंडिया मारगेरैट नदी के करीब अरेविना विनेयार्ड भी पहुंची थी. पर्थ शहर से 250 किलोमीटर दूर इस बीच पर टीम इंडिया ने जम कर वॉलीबॉल खेला तो वही यहां के लजीज व्यंजनों का लुत्फ भी उठाया था.

 

टीम इंडिया के कैप्टन कूल माने जाने वाले धोनी ने इस तरह वर्ल्ड कप से पहले खिलाडियों के लिए माहौल एक दम कूल बना दिया है. वो वर्ल्डकप के दौरान छुट्टी मिलने पर टीम के खिलाडियों के साथ बाहर भी जाते रहे हैं. साफ है कि कप्तान धोनी खिलाड़ियों के बीच तालमेल बिठाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं और उनके इन्हीं प्रयासों का सकारात्मक असर वर्ल्ड कप के मैदान पर नजर भी आया है.

 

पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद ने बताया कि धोनी के अंदर एक बात बहुत अच्छी है आप किसी और कप्तान को देखें अगर स्थिती ठीक नहीं हो तो विचलित हो जाते हैं और कई बार उनके चेहरे आपको गुस्सा भी दिखता है. लेकिऩ धोनी की बात है कि अगर कोई खिलाड़ी अच्छा नहीं कर रहा है तो या फिर किसी प्रकार की गड़बड़ी फिल्ड में कर दिया हो तो या अपेक्षा के अनुरुप वो काम नहीं किया तो वो निराश कभी नहीं होते हैं. उनकी सबसे बड़ी बात ये है कि वो अपने खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करते रहते हैं चाहे स्थिति कितनी ही खराब क्यों न हो.

 

पूर्व क्रिकेटर मनोज प्रभाकर बताते हैं कि वो फैसले लेते हुए कहीं डगमगाते नहीं हैं बहुत ढृढ़ निश्चयी है और अपनी टीम को हमेशा साथ देतें है अपने टीम के मनोबल को बढ़ाते रहते हैं बेशक अगर उनकी परफॉर्मेंस नहीं है एज ए बैटमैन फिर भी वो एस ए विकेट कीपर पीछे से पूरी टीम को लड़वाए रहते हैं तो ये एक अच्छे कप्तान की खासियत है जो सारे गुण धोनी में पाए जाते हैं.

 

वनडे में हिट, लेकिन टेस्ट में फ्लॉप. पिछले 3 साल से महेंद्र सिंह धोनी पर टेस्ट मैचों में फ्लॉप कप्तानी करने का ठप्पा लगता रहा है लेकिन भारतीय क्रिकेट के इतिहास में उनसे बेहतर वनडे का कोई कप्तान नहीं हुआ है. साल 2005 में पहली बार टीम इंडिया का हिस्सा बने धोनी पिछले 7 साल से टेस्ट,  वनडे और ट्वेंटी – 20 तीनों फॉर्मेट में भारत की कप्तानी कर रहे थे. धोनी ने अपनी कप्तानी में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रिकेट की हर ट्रॉफी जीती है . 2007 में ट्वेंटी-20 वर्ल्ड कप, 2011 में वनडे का विश्व खिताब और एशिया कप समेत आईपीएल और चैम्पियंस लीग में भी धोनी ने अपनी कप्तानी का करिश्मा दिखाया है. उन्होंने वो सब हासिल किया जो एक कप्तान अपने करियर में करना चाहता है. 

 

क्रिकेटर आशीष नेहरा ने बताया कि मैं ये सोचता हूं कि वनडे और टेस्ट मैच की कप्तानी में कुछ थोडा बहुत फर्क देखने को मिलता है पर ओवर आल देखें पीछले 7-8 साल में तो वो काफी अच्छे कप्तान रहें है और उन्होंने ने नए नए खिलाड़ी को ग्रूम भी किया है तो मेरे को नहीं लगता कि और उन पर इतना दबाब है वो एक बहुत अहम बात है कि इतने दवाब के बावजूद वो टीम को हम खराब प्रदर्शन से भी गुजरे हम 8-0 से हम टेस्ट में हारे हैं उसके बाद हम चैंपियन्स लीग जीते फिर इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में हारे और फिर सेमी फाइनल में पहुंचे तो अप्स एंड डाउन महेंद्र सिंद धोनी ने भी देखे अपने करियर में पर मेरे हिसाब से बहुत ही उम्दा कप्तान हैं और खिलाड़ी हैं.

 

धोनी की कप्तानी में साल 2012 तक टीम इंडिया में कई सीनियर और नामी खिलाड़ियों ने खेला है लेकिन पिछले दो-तीन सालों में धोनी की नई और युवा खिलाडियों से सजी टीम ने भी बेहतर प्रदर्शन किया है. धोनी की टीम आज वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल तक भी पहुंच चुकी है और यही वजह है कि वनडे क्रिकेट में एक लीडर, एक क्रिकेटर और एक विकेटकीपर के तौर पर आज उनका कोई सानी नजर नहीं आता है लेकिन इसी के साथ टेस्ट क्रिकेट में उनकी कप्तानी को लेकर प्रश्चचिन्ह भी लगे हैं. टीम पर कंट्रोल और टीम सलेक्शन से लेकर उनकी डिफेंसिव टेक्टिस जैसी बातें उनके खिलाफ जाती रही है बावजूद इसके टीम में एक लंबी प्रक्रिया चला कर धोनी ने खुद को मैदान से कभी आउट नहीं होने दिया है और यही वजह भी है कि वो टीम इंडिया और भारतीय क्रिकेट पर अपनी खूबसूरत छाप छोड़ने में कामयाब हुए हैं.

 

पूर्व क्रिकेटर मनोज प्रभाकर बताते हैं कि धोनी की सबसे बड़ी यूएसपी है कि वो अपनी टीम को नहीं बदलते अगर आप चैन्नई की सुपर किंग्स की बात भी करे तो पिछले 7 साल से 5 अच्छे खिलाड़ी हैं जो बदले नहीं गए हैं अगर आप वनडे टीम की बात करें तो 6 से 7 खिलाड़ी ऐसे हैं जो बदले नहीं हैं 3-4 साल से बेशक जडेजा बहुत अच्छा परफॉर्मेंस नहीं करे मगर एज ए कॉम्पैक्ट प्लेयर जो कहते हैं न एक पैकेज वो जाडेजा को ज्यादा परखते हैं क्योंकि इतने रन वो करता नहीं जितने वो रन बचा देता है और रन आउट ऐसे कर देता है जो कि कनवर्ट कर देते हैं हार को जीत में तो ये जो उनके निर्णय है ये चौंका देने वाले तो जरुर हैं मगर हमेशा टीम की सपोर्ट में हैं .

 

2011 के पिछले वर्ल्ड कप में टीम इंडिया में ऐसे छह सीनियर खिलाड़ी थे जो पहले भी एक – एक वर्ल्ड कप खेल चुके थे लेकिन इस बार टीम में अकेले धोनी हैं जो वर्ल्डकप में पहले भी खेल चुके हैं. ऐसे में कप्तान धोनी पर नई टीम को वर्ल्ड कप में जीत दिलाने का दबाव और ज्यादा बढ गया है.

 

लेकिन मैदान पर विपरीत हालात के बीच दबाव में भी मुस्कुराने वाले कैप्टन कूल महेंद्र सिंह धोनी मानते है कि टीम में एक प्रक्रिया के जरिए बेहतर माहौल बनाया जा सकता है. खिलाडियों में सुधार की एक प्रक्रिया चला कर उनसे बेहतर प्रदर्शन भी करवाया जा सकता है यही नहीं टीम के सदस्यों के बीच बेहतर तालमेल के जरिए उम्दा नतीजें भी हासिल किए जा सकते हैं और यही धोनी की कप्तानी की कामयाबी का सबसे बड़ा राज भी है.

 

महेंद्र सिंह धोनी से सवाल- आपकी 100 जीत हो चुकी है वनडे मैच में आप एपनी जर्नी को एज ए कैप्टन ओवर ए पीरियड ऑफ टाइम कैसे समराइज करेंगे.  धोनी – मैंने पहली बार जब कप्तानी की थी तब आस्ट्रेलिया के खिलाफ इंडिया में मैच खेला था वो सीरीज हम हार गए थे तो ऊपर नीचे लगा ही होता है काफी स्ट्रगल भी हमनें किया. बीच में हमारे पास डेप्थ बालर नहीं थे हमारे पास फास्ट बालर थे वो एक जगह पर बाल नहीं डालते थे जो एक जगह डालने वाले थे वो तेज नहीं थे हमने सब कुछ झेला है. आलरांउडर करते हुए हमें 4-5 साल हो गए लेकिन हम अभी तक आलराउंडर ढूंढ़ रहे हैं हमने बोला कि जो नही है सो नहीं है जो है उसी से हम गुजारा करेंगे सो काफी इंटेरेस्टिंग रहा है. ऊपर नीचे सारी चीजें हमनें देखी है. 2007 में मैं कप्तान नहीं था पर विश्वकप नेक्सट स्टेज के लिए भी क्वालिफाई नहीं किए थे वो बहुत डिप्रेसिंग फेज था . क्रिकेट आपको सबकुछ दिखलाता है . घुमा फिराकर फिर आपको उसी जगह पर लेकर आ जाता है तो उस जगह पर आप ज्यादा रिस्पेक्ट करने लग जाते हैं पिछली बार जब आप वहां पर थे तो आप रिस्पेक्ट करते थे पर दूसरी बार जब समय वहां पर लाता है तो आप बहुत ज्यादा रिस्पेक्ट करने लगते हो.

 

बल्लेबाजी और कप्तानी में एक से बढ कर एक चौंका देने वाले कारनामें करने वाले धोनी को शायद ही कभी क्रिकेट के मैदान पर विचलित देखा गया है. बेहद मुश्किल हालात में भी वो शायद ही कभी तनाव में दिखाई दिए है. सरप्राइज देने में माहिर माही ने टेस्ट कैप उतार कर चौंकाने से पहले वर्ल्ड कप के दौरान अपने फैसलों से भी सबको हैरान कर दिया था. 2007 के वर्ल्ड कप फाइनल मुकाबले में धोनी ने जोगिंदर शर्मा जैसे नए गेंदबाज से आखिरी ओवर कराने का बड़ा रिस्क उठाया था लेकिन धोनी की यही वो खासियतें भी हैं जिन्होनें उन्हें कैप्टन कूल के तौर पर मशहूर कर दिया है.

 

कीर्ति आजाद ने बताया कि मुझे उनके कई निर्णयों पर आश्चर्य भी होता है अंत वो सही साबित होते हैं लेकिन इस विश्वकप में पांचवे गेंदवाज के चयन को लेकर जो उन्होंने अलग अलग एक्सपेरिमेंट किए हैं रैना से गेंद करवाया एक बार रोहित शर्मा से भी करवाया वो मुझे जरुर अंचभे में डालता है. इंडिया में जब विश्वकप हुआ था तब हमनें देखा था कि युवराज और सहवाग आकर गेंद कर दिया करते थे क्योंकि यहां विकेट थोड़ी लो रहती है स्पिन भी करती है घिसी करती है तो वो लोग अगर हॉफ बॉलर न हो तो फुल बॉलर दिखाई देते हैं लेकिन ऑस्ट्रेलिया में पांचवे गेंदबाज का भगवान ने बहुत ही ज्यादा हम लोगों पर रहम किया है कि पांचवे बालर की बहुत ज्यादा आवश्यकता हमें उतनी नहीं पड़ी.

 

टीम इंडिया के गेम चेंजर माने जाने वाले कप्तान धोनी का सफर कामयाबियों से भरा पड़ा है और इन चमकती कामयाबियों के लिए जहां उन्होंने टीम में जबरदस्त बदलाव और नए नए प्रयोग किए हैं तो वही वो अपनी कप्तानी को माहौल और खेल के हिसाब से ढालते भी रहे हैं. और यही वजह है कि कप्तान धोनी जहां मैदान के अंदर और बाहर अपने फैसलों से सबको चौकातें रहें वही अपने अंदर भी तेजी से बदलाव करते चले गए हैं. कैसे एक कप्तान और क्रिकेटर के तौर पर धोनी ने खुद को संवारा और क्रिकेट की दुनिया में एक इतिहास बनाया. सुनिए कैप्टन कूल की ये अनसुनी कहानी खुद उन्ही के दोस्तों की जुबानी. 

 

महेंद्र सिंह धोनी के दोस्त रॉबन सिंह बताते हैं कि उसका नेचर ही ऐसा है. वो किसी की बात सुनने से पहले ही डिसीजन ले लेता है और मुझे नहीं लगता कि इंडियन क्रिकेट में ऐसा पहले किसी ने किया होगा जैसा उसने किया है . एक तरफ से खुशी भी है और एक तरफ से तकलीफ भी हो रहा है कि उसको अभी बाहर नहीं होना चाहिए था. साल में 8-10 टेस्ट होता है वो उठ के खेल सकता है लेकिन जब बात उठने लगा तो उससे पहले ही डिसीजन ले लिया वो बहुत बड़ा बात है.

 

खड़गपुर के क्रिकेट स्टेडियम में करीब चार साल तक महेंद्र सिंह धोनी के साथ क्रिकेट खेलने वाले रणजी खिलाड़ी रॉबिन कुमार बताते हैं कि बल्लेबाजी धोनी के क्रिकेट का शुरु से ही सबसे मजबूत पक्ष रहा है. रॉबिन के मुताबिक धोनी की बैटिंग की टाइमिंग और उनका टेंपरामेंट शुरुवाती दिनों से ही लाजवाब रहा है और यही वो खूबियां भी हैं जिन्होंने धोनी को एक बेहतरीन क्रिकेटर और एक कामयाब कप्तान बनाया है. 

 

महेंद्र सिंह धोनी के दोस्त रॉबिन कुमार बताते हैं कि अभी तो बहुत नॉर्मल हो गया बहुत सिनसेयर हो गया पहले वो ऐसा नहीं था. पहले वो टोटली डिफरेंट था . जब भी स्पिन आता था तो हमारा दूसरा बैट्समैन रेडी हो जाता था बैटिंग करने के लिए कि अब तो वो आउट हो जाएगा. ये मान कर लेकिन इतना चेंजेंस उसने लाया है ये तो इंपॉसिबल बात है किसी अदर पर्सन के लिए वो डेडिकेशन वो कहां से लाता है वो चार साल खेला हमारे साथ. मैं ओपनर था वो भी ओपनिंग करता था. एक दिन मुझे याद है हम इंटर रेल खेलने गए थे नागपुर. ये हाजीपुर रेलवे के अगेनस्ट में 52 बॉल में 162 रन मार दिया था नागपुर रेलवे में. वहीं कह रहा हूं कि उस टाइम वो इतना मारता था लेकिन स्पिन आता था आउट हो जाता था.  लेकिन आज इतना चेंजेंस उसकी बैटिंग में है लोग बैट फिनिशर बोलने लग गए हैं . नीचे जाकर कब खत्म करके आएगा पता नहीं चलता लेकिन पहले वो ऐसा नहीं था. बहुत चेंजेस आए है उसके अंदर.

 

पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में धोनी के दोस्त आज भी उन्हें एक ऐसे पहलवान क्रिकेटर के तौर पर याद करते हैं जिसका बल्ला गेंद को सीधे स्टेडियम के पार पहुंचा देता था. ट्वेटी-ट्वेटी और वनडे जैसे फटाफट क्रिकेट के फॉर्मेट में फौरन फैसले लेने का सबक भी धोनी ने खड़गपुर के इन्हीं मैदानों पर सीखा था और सबसे खास बात ये कि एक कप्तान के तौर पर फ्रंट से लीड करने का जज्बा भी धोनी में यहीं पर खेलते हुए पैदा हुआ था. खड़गपुर के ग्रीन अकादमी क्लब के सचिव प्रदीप सरकार को आज भी वो दिन याद हैं जब धोनी महज तीन सौ रुपये फीस लेकर रेलवे के ग्राउंड पर क्रिकेट मैच खेला करते थे.

 

खडकपुर के ग्रीन अकादमी क्लब के सचिव प्रदीप सरकार बताते हैं कि बीएमआर ग्राउंड है रेलवे ग्राउंड में हमारा ग्रीम अकेदमी का डे नाइट टेनिस टूर्नामेंट होता था . वहीं टूर्नामेंट में धोनी हर साल पार्टीसिपेट करता था . लास्ट जो 2004 के पहले 2003 में टूर्नामेंट हुआ था हमारा वो मैच में धोनी खेला था और धोनी का टीम को खुद चैंपियन भी धोनी कराया था .तो ऐसा भी एक सिचुएशन था कि धोनी विकेटकीपिंग कर रहा था. टाटा के साथ गेम था लास्ट ओवर में आठ रन बाकी था तो सब सोच रहा था कौन बॉल करेगा तो धोनी इतना कॉन्फिडेंट था कि विकेटकीपिंग छोड़कर अपने हाथ से बॉल लेकर वो आठ रन बचाकर अपनी टीम को चैंपियन किया. और टूर्नामेंट में मैन ऑफ द मैच भी धोनी को ही मिला था.

 

खड़गपुर के ट्रैफिक ग्राउंड पर इन दिनों बड़े -बडे ट्रक खड़े होते हैं लेकिन एक वक्त शहर में ये टेनिस बॉल क्रिकेट टूर्नामेंट का सबसे चर्चित मैदान हुआ करता था. खास बात ये है कि अंतर्राष्ट्रीय मैचों में पहली या आखिरी गेंद पर छक्का जड़ने का हुनर भी धोनी ने इसी मैदान पर सीखा था. दरअसल ग्राउंड का ऑफ साइड बेहद छोटा करीब 22 गज का था. इसीलिए इस ग्राउंड पर नियम था कि ऑफ साइड पर बल्लेबाज को छक्का या चौका मारने पर भी सिर्फ दो ही रन मिलेगें. यानी छक्का औऱ चौका सिर्फ लेग साइड पर मारा जा सकता था. यही वजह थी कि इस मैदान पर गेंदबाज रन बचाने के लिए गेंद को ऑफ स्टंप पर ही ज्यादा डालते थे. ऐसे हालात में धोनी ने इस ग्राउंड पर छक्का और चौका लगाने के लिए हैलीकॉप्टर शॉट इजाद किया जिसने आगे चल कर उनके क्रिकेट करियर में धूम मचा दी.

 

ग्रीन अकादमी क्लब के सचिव प्रदीप सरकार बताते हैं कि लास्ट 2003 में डे नाइट में खेला फाइनल में टेनिस में मैन ऑफ द मैच भी हुआ था. वही टाइम में फाइनल में एक बंगाल का प्लेयर भी आया था..हम लोग का यहा पे कपिल  देव भी आया. बहुत प्लेयर सेलेब्रिटी यहां आया है तो धोनी जब लास्ट खेला है तो बंगाल का प्लेयर शिवसागर सिंह आया था ये छोटा स्टोरी है तो स्टेज में शिवसागर सिंह बैठा था धोनी खेल रहा था. मैं धोनी का परिचित था तो मैं बोला चलो धोनी शिवसागर से मिल लो तो वो इतना कॉन्फिडेंट था कि बोला रुकिये कोकन दा वो आएगा नीचे आकर वो हमसे मिलेगा हां वो बात सही हुआ शिवसागर उसको देखा तो स्टेज से उतर कर धोनी से हाथ मिलाया तो आज वो धोनी इतना आगे गया हम लोगों के लिए गर्व है.

 

पूर्व कप्तान बिशन सिंह बेदी ने बताया कि सेल्फ कान्फीडेंस भी जो था बुहत उम्दा सेल्फ कान्फीडेंश था. अगर आप सोचे छोटे से शहर रांची से आया बच्चा. और जब करियर शुरु किया था तो रेलवे में टिकट कलेक्टर था और कितनी जल्दी इसने अपने आप को संभाला और दृढ़ इरादे के साथ सिर्फ अपने आप को नहीं संभाला, जिस टीम में खेला है उस टीम को इकट्टा रखा है. और ये दाद देनी पडेगी.

 

खड़गपुर शहर के छोटे से मैदान से लेकर वर्ल्ड कप के ऊंचे आसमान तक महेंद्र सिंह धोनी ने बेहद कम वक्त में कामयाबी की लंबी छलांग लगाई है. उनकी कप्तानी में जहां सचिन तेंडुलकर, सौरभ गांगुली और राहुल द्रविड़ जैसे टीम इंडिया के पूर्व कप्तानों ने खेला है वहीं उन्होंने देश को दो फार्मेट में विश्व कप का खिताब भी दिलाया है और धोनी की ऐसी चमत्कारी कामयाबी के पीछे छिपी है तीन डी के फॉर्मेले की एक कहानी. वो कहानी भी सुनिए खुद धोनी के कोच की जुबानी.

 

महेंद्र सिंह धोनी के कोच सुब्रता बनर्जी बताते हैं कि उसका जो सबसे बड़ा स्ट्रेंथ है वो तीन चीज में बड़ा ध्यान देता है . औऱ ये हर एंगल में जरूरी होता है . डिसिप्लिन, डेडिकेशन और डिटरमिनेशन. 3 D उनके अंदर 100 परसेंट है.  इसलिए उसके लिए डेस्टिनेशन में प्रॉब्लम नहीं आएगा ऑटोमेटेकली वहां पर पहुंचेगा. ये तीनों उसके अंदर पूरा है . और हम अब बोल रहे हैं आपको कि यही विकेट में फास्ट विकेट में जो अभी खेल नहीं पा रहा है वहीं धोनी को आप लोग पहचान नहीं पाएगें वर्ल्डकप में ये मेरा विश्वास है और आप लोग देख  लीजिएगा ये होना ही है.

 

धोनी के दोस्त सत्यप्रकाश कृष्ण बताते हैं कि बहुत बड़े बड़े महारथी लोग हैं जो इंडिया टीम को सेलेक्ट करते हैं या माही को जिसने सेलेक्ट किया है  कैप्टनशिप के लिए सोच समझ कर ही किया होगा . मतलब ये है कि सचिन तेंडुलकर धोनी के अंडर खेल रहे हैं ये मैं बोल रहा था कि बड़ा बात नहीं है लेकिन सचिन तेंडुलकर को कैसे हैंडेल करता होगा ये बहुत बड़ी बात है सिर्फ सचिन ही नहीं सौरव गांगुली..राहुल दविड़…लक्ष्मण..सहवाग..युवराज..जहीर जो कि एक टाइम था जब धोनी उनके आस-पास ही नहीं था तो इन बड़े बड़े खिलाड़ियों को धोनी कैसे हैंडेल करता होगा ये बहुत बड़ी बात है . ग्रेटनेस है उसका.

 

अपने लिये नये रास्ते बनाने वाले. एक सौ बीस करोड़ की आबादी की उम्मीदों को अपने साथ ढोने वाले और कोई नहीं बल्कि महेन्द्र सिंह धोनी ही हैं. और इस खड़गपुर स्टेशन पर खड़े होकर उन्हीं की बात की जा रही है. जी हां महेन्द्र सिंह धोनी का एक पड़ाव ये ये प्लैटफार्म भी था ये शहर भी था . टीम इंडिया के कप्तान धोनी को पहली सरकारी नौकरी यहीं मिली थी. मार्च 2001 में महेन्द्र सिंह धोनी ने बतौर टिकट कलेक्टर इसी खड़गपुर स्टेशन पर काम शुरु किया  था.

 

बाइस साल के धोनी जब रेलवे की नौकरी करने खड़गपुर आए तो क्रिकेट के मैदान के उनके साथी रांची में ही छूट गए थे. लेकिन धोनी की फितरत और स्टेशन पर टिकट कलेक्टरी की नौकरी में कोई मेल ना बन सका. कहां सीधी पटरी पर भागने वाली ट्रेन और कहां रपटिली उछाल मारती गेंद को काबू करने वाले धोनी. यही वजह थी की खड़गपुर में धोनी ने क्रिकेट की अपनी एक नई दुनिया बसा ली थी. साउथ ईस्टर्न रेलवे के कोच सुब्रता बनर्जी बताते है कि क्रिकेट को लेकर धोनी की दीवानगी ने उन्हें भी चौंका कर रख दिया था. 

 

महेंद्र सिंह धोनी के कोच सुब्रता बनर्जी बताते हैं कि इंटर रेलवे में पहला दो मैच में रन नहीं किया. एक में 8 औऱ एक में 13 मैं बोला ये क्या कर रहे हो तुम. तुम इंडिया खेलने का सपना देखते हो और वनडे ही उसका सपना था नॉट टेस्ट. तो उसी समय में मैं बोला कि तुम क्या कर रहे हो . तुम्हारा सब पफॉर्मेंस कोई न कोई देख रहा है तो बोला क्या करूं मैं टीम का कुछ नहीं होने वाला टीम अच्छा नहीं है. मैं कहा तुम अपना परफॉर्मेंस करो . तो हमको बोला कि ठीक है नेक्स्ट डे देख लीजिए आप. दूसरे दिन हाजीपुर रेलवे के साथ खेला था उसी के दोस्त लोग थे . जो परफॉर्मेंस किये धोनी वो 62 बॉल में 130 कुछ रन किया हम लोग मैच जीत गया. वेरी नेक्स्ट मैच में 119 हम लोग मैच जीत गया . थर्ड मैच में 93 मतलब तीनो धमाकेदार इनिंग्स खेला वो तो उस समय मुझे लगा कि ये तो कोई समान्य प्लेयर नहीं है.

 

2001 से 2003 तक धोनी में रहे लेकिन उनसे जुड़ी बेशुमार बातें कही सुनी जाती हैं. ये है खड़गपुर का रेलवे मैदान. धोनी को सफलता मिलने से सालों पहले एक बात यहां हमेशा के लिये कायम हो गयी थी. वो ये कि माही जैसा अनुशासित खिलाड़ी इस मैदान पर पहले कभी नहीं आया. यकीन न हो तो साउथ इस्टर्न रेलवे के कोच सुब्रत कुमार बनर्जी से पूछिये .

 

सुब्रत कुमार बनर्जी बताते है कि महेन्द्र सिंह धोनी के जिस अनुशासन के चर्चे आज भी खड़गपुर में होते हैं उसकी नींव झारखंड के शहर रांची में पड़ी थी जहां 7 जुलाई 1981 को महेन्द्र सिंह धोनी का जन्म हुआ था. रांची का ये वो जवाहर विद्यालय मंदिर स्कूल है जहां महेंद्र सिंह धोनी ने स्कूल की पढ़ाई की है और इसी स्कूल में सबसे पहले धोनी ने क्रिकेट का बल्ला भी थामा था.

 

स्कूल के दिनों में हर हाल में जीतने का सबक सीखने वाले धोनी आज भी अपना वो सबक भूले नहीं हैं हांलाकि क्रिकेट का बल्ला थामने से पहले वो फुटबॉल और बैडमिंटन ज्यादा खेलते थे. लेकिन साल 1992 में जब धोनी छटवीं क्लास में पढ़ रहे थे उन दिनों उनके स्कूल को एक विकेट कीपर की जरुरत थी लिहाजा उन्हें विकेट के पीछे खड़ा होने का मौका मिला. ये मौका धोनी के लिए महज एक संयोग भर था जो आज हिंदोस्तान के लिए एक सुखद सुयोग बन गया है.

 

क्रिकेटर आशीष नेहरा बताते हैं कि जो विकेट के पीछे उन्होंने कैच पकड़ी है 2 अहम मुकाबले में क्वार्टर फाइनल मुकाबले में तो धोनी अगर रन बनाते है तो उससे अच्छी कोई बात ही नहीं जिस नंबर पर वो बल्लेवाजी करते है वो बहुत ही मुश्किल नंबर है उन्होंने बहुत सारे रन बनाए है भारत के लिए कभी बना पाते हैं कभी नहीं बना पाते हैं तो कभी बारी लेट आती है पर मेरे लिए जो सबसे अहम है वो उनकी कप्तान की भुमिका है. पूरे टीम को साथ लेकर चलने का जो बोझ है वो बखूबी निबा रहे हैं .

 

टीम इंडिया के कैप्टन कूल महेंद्र सिंह धोनी कभी विकेटकीपिंग से तो कभी अपनी कप्तानी से अचंभित करते रहे हैं. धोनी एक ऐसे कप्तान है जो टीम को फ्रंट से लीड करते हैं. वो बेहद दृढनिश्चयी है और कभी अपने फैसले से डगमगाते नजर नहीं आए है. अपनी टीम का मनोबल बढाने वाले धोनी टीम के लिए हरदम लड़ मरने को तैयार रहते है. धोनी की ये वो खूबियां हैं जिन्होंने उन्हें देश ही नहीं क्रिकेट की दुनिया का एक बेहतरीन कप्तान बना दिया है और ये उनकी कप्तानी का ही कारनामा है कि टीम इंडिया आज वर्ल्ड कप में इस मुकाम पर खड़ी है. 

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