‘म’ से मांझी, ‘म’ से मुहब्बत- मांझी ‘द माउंटेन मैन’

By: | Last Updated: Thursday, 20 August 2015 10:18 AM

इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर

हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मजाक

– साहिर लुधियानवी

लेकिन मुगल बादशाह शाहजहां के इस मजाक पर इक गरीब मजदूर की मुहब्बत भारी पड़ गई . शाहजहां ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि बिना दौलत का सहारा लिए बिहार का एक मजदूर खुद के दम पर मुहब्बत की इक ऐसी इबारत लिख देगा. जिसकी खूबसूरती महज आंखों में नहीं बल्कि सीधे दिल में समा जाएगी. भले ही ताजमहल की सुंदरता दुनिया भर में मशहूर हो- मगर जिस मुहब्बत की दमक मांझी के पसीने की बूंद से बने और घाटियों के बीच छेनी और हथौड़ियों की गूंज से सजे रास्ते पर नजर आती है…वो भला अमीर शाहजहां के प्यार में कहां.

 

हमने, आपने-सबने ये कहावत सुनी होगी कि प्रकृति के सामने किसकी चलती है. जब भी कहीं कोई आंधी- तूफान, बाढ़ या लू जैसे हालात सामने आते हैं तो हर किसी की जुबान पर ये वाक्य उछलता नजर आता है- लेकिन तमाम सुख-सुविधा से महरूम कोई शख्स प्रकृति की कृति पहाड़ के सामने ताल ठोंक कर खड़ा हो जाए. कहे कि तुम्हारे सीने को चीर कर रास्ता बनाऊंगा तो उस जज्बे को क्या आप किसी सैनिक की तरह सैल्यूट नहीं करेंगे. लेकिन जरा ठहरिए. यहां मामला जज्बे का नहीं. जज्बात का है…मुहब्बत का है…वो मुहब्बत जिसने पत्थरों का कलेजा चीर कर एक ऐसी राह बना दी. जिसे दुनिया बस देखती रह गई . ये महज इक कहानी नहीं है…इक समूची जिंदगानी है…दशरथ मांझी…दृढ़ संकल्प का दूसरा नाम. लेकिन अदना-सा इंसान..इंसान…जिसने सिर्फ छेनी और हथौड़े से पाषाण ही नहीं भगवान को भी चुनौती दे डाली.

 

बिहार के गया जिले के अमेठी गांव से शहर तक पहाड़ियों पर घूमकर जो रास्ता  80 किलोमीटर का था- उसे मांझी ने 2 किलोमीटर की दूरी में तब्दील कर दिया . 27 फुट उंचाई के पहाड को अपने छेनी-हथौड़े और अटूट आत्मबल की कटार से काटकर 360 फुट लंबा (करीब 110 मीटर),  25 फुट गहरा (करीब 7.6 मीटर) और 30 फुट चौड़ा ( करीब 9.1 मीटर) रास्ता बना डाला- लेकिन ये अजूबा यूं ही नहीं हुआ- पूरे 22 साल…यानी 264 महीने यानी 8030 दिन…यानी 1 लाख 92 हजार 720 घंटे….एक ही मंजिल पर नजर….मांझी ने न दिन देखा- ना रात देखी…ना कड़कती धूप देखी…ना पेड़ों की छांव…मांझी को दिखता था तो बस अपना गांव…वो गांव जिसके लिए मांझी को ना पूस का जाड़ा देखना गंवारा था…ना सावन-भादो की बरसात…तोड़कर रख देनेवाले संघर्षों के बीच भी दशरथ मांझी के लिए साल के बारहों महीने फागुन थे. दरअसल उनके जीवन का एक ही रंग था- फाल्गुनी देवी…जिसे वो प्यार से फगुनिया कहते थे. बस फगुनिया की प्रीत की डोर के सहारे अपने गांव की किस्मत बदलने की जिद थी. लेकिन जिंदगी का द्वंद्व देखिए…जिस गांव के लिए वो 22 साल तक अकेले सुनसान बियाबान में जहां गर्मी के दिनों में पारा 50 डिग्री को पार कर जाता था…जुटे रहे…उसी गांव के लोग मांझी को सनकी…पागल..कहकर मजाक उड़ाते थे…तमाशा बनाते थे…अक्सर मांझी को मजदूरी करने की नसीहत देते थे…लेकिन बतौर गालिब…देखने हम भी गए थे लेकिन तमाशा ना हुआ… जब रास्ता तैयार हो गया तो मांझी के माखौल का माहौल बनानेवालों की आंखें चौंधियां गईं. दूर-दराज और देश के कोने-कोने से लोग देखने आने लगे…कि ये क्या हो गया…गहलौर से वजीरगंज की 60 किलोमीटर की दूरी 10 किलोमीटर रह गई …बच्चों का स्कूल जो 9.5 किलोमीटर था 2.5 किलोमीटर रहे गया…किसी को अस्पताल पहुंचना होता था…तो लोग सूरज उगने के साथ निकलते थे..डूबने के साथ लौटते थे….मगर अब महज आधे घंटे में गांव से शहर के अस्पताल तक पहुंचा जा सकता था . बताया जाता है कि जो रास्ता मांझी ने तैयार किया- आज उस रास्ते के मुसाफिर 70 गांव के लोग हैं .

 

लेकिन इस रास्ते के तैयार होने की कहानी के पीछे मांझी की जिंदगी में तोड़कर रख देनेवाला मोड़ छिपा है. दर्द की वो धुन छिपी है जिसके बाद उनके सिर पर पहाड़ को उखाड़ फेंकने की धुन सवार हो गई . साल 1959 में जब मांझी की हमसफर फाल्गुनी देवी मांझी के लिए कलेवा(खाना) लेकर जा रही थी तो उसकी मौत हो गई…तमाम कोशिशों के बावजूद फाल्गुनी को वक्त पर इलाज मुहैया नहीं कराया जा सका. वजह थी नजदीकी शहर से 70 किलोमीटर की दूरी..पहाड़ियों के रास्ते इतनी दूरी तय करके ही अस्पताल पहुंचा जा सकता था . केवल अत्री और वजीरगंज ब्लॉक के बीच की दूरी ही 55 किलोमीटर थी…इस दूरी ने मांझी की मुहब्बत को उससे हमेशा-हमेशा के लिए दूर कर दिया था . ये दूरी मांझी को पल-पल कचोटती थी या यूं कहें कि प्रेम से भरे मांझी को इस दूरी से दुश्मनी हो गई थी . वैसे तो इस हादसे के बाद मांझी की जिंदगी की नाव मंझधार फंस चुकी थी…लेकिन जो लोग रुक जाते हैं…उनमें से नहीं थे मांझी . फाल्गुनी की मौत के कुछ महीनों बाद ही साल 1960 में उन्होंने अपने दम पर पहाड़ को तोड़कर रास्ता बनाने का संकल्प लिया.

 

दशरथ मांझी की कामयाबी का रास्ता जब जमाने को नजर आया तो इलाके के लोग दशरथ मांझी को दशरथ बाबा कहकर पुकारने लगे . दशरथ मांझी ने एक बार कहा था कि मेरे काम की पहली प्रेरणा है पत्नी के प्रति प्यार…उस प्यार ने ही पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाने की जिद जगाई . इसके साथ ही हजारों लोग रोज बिना किसी परेशानी के रास्ते से शहर जा सकेंगे- ये सोचकर मुझे बेहद खुशी होती थी . ये सब विचार करके ही मैं ये काम पूरा कर सका . कहा जाता है कि सरकारी सहायता सरकारी कर्मचारियों और पंचायत के लोगों के जरिए हड़पे जाने की शिकायत करने वो एक बार प्रधानमंत्री से मिलने की हसरत लिए दिल्ली पैदल ही आ गए थे- अलग बात है कि उनकी मुलाकात प्रधानमंत्री से ना हो सकी . रेलवे ट्रैक से होते हुए पैदल ही मांझी ने गहलौर से दिल्ली की 1395 किलोमीटर की दूरी तय की थी. इस दौरान मांझी ने सभी स्टेशन मास्टरों के दस्तखत भी लिए थे . संत कबीर को मानने वाले मांझी ज्यादातर खराब हो चुके टायरों का जूता पहनते थे . पुराने जूट के झोले से बने जैकेट भी उनके पहनावे का अहम हिस्सा था . अपने पहाड़ काटने के दिनों में जब वो बीमार पड़ जाते थे तो पहाड़ियों के आसपास उग आए जड़ी-बूटियों को खाकर ही अपनी सेहत ठीक करते थे . कद काठी से छोटे मगर मजबूत इरादों के माउंटेन मैन जोरदार ठहाकों के लिए भी जाने जाते थे . स्थानीय लोग बताते हैं कि अक्सर मजाक-मजाक में बड़ी बातें कह जाना उनका स्वभाव था. जून, 2007 में जब दशरथ मांझी गहलौर घाटी से अमेठी तक तीन किलोमीटर सड़क बनाने की मांग लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दरबार में आए थे तो नीतीश कुमार ने अपनी कुर्सी पर मांझी को बिठा दिया- इसके बाद मांझी ने सीएम की कुर्सी पर बैठकर ही संवाददाताओं से बातचीत की .

 

मांझी ने जो रास्ता बनाया वो अब दशरथ मांझी पथ के नाम से जाना जाता है . राज्य सरकार ने मांझी को करजनी गांव में पांच एकड़ का एक प्लॉट भी दिया था- जिसे मांझी ने हॉस्पीटल बनाने के लिए दान कर दिया . धीरे-धीरे बढ़ती उम्र ने मांझी के शरीर को कमजोर कर दिया था और वो कैंसर के शिकार हो गए थे. 17 अगस्त, 2007 को दिल्ली के एम्स हॉस्पीटल में उन्होंने दम तोड़ दिया . नीतीश कुमार के निर्देश पर राजकीय सम्मान के साथ दशरथ मांझी का अंतिम संस्कार किया गया . ये हकीकत अपनी जगह है कि मांझी को सही वक्त पर मुकम्मल इलाज मुहैया नहीं कराया जा सका.

 

राज्य सरकार ने उस हॉस्पीटल का नाम भी मांझी के नाम पर ही रखा है . मांझी के परिवार में अब उनका इकलौता विक्लांग बेटा भागीरथ है- जो स्कूल में रसोइए का काम करके अपना गुजर-बसर करता है. घर के नाम पर इंदिरा आवास योजना के तहत उसे एक छोटा सा घर मिला हुआ है . उनकी पोती लक्ष्मी देवी को शिकायत है कि सभी लोगों ने उनके दादा के नाम को भुनाने की कोशिश की- लेकिन किसी ने उसके बेहतर भविष्य के बारे में नहीं सोचा.

 

कुछ महीनों पहले जीतन राम मांझी ने दशरथ मांझी को भारत रत्न देने की मांग की थी- वहीं पप्पू यादव ने भी दशरथ मांझी को एक लाख रुपये की मदद की और हर महीने दस हजार रुपये देने का भरोसा दिया. अब बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने भी दशरथ मांझी के बेटे भागीरथ को पटना मिलने के लिए बुलाया है. सत्यमेव जयते शो के दौरान आमिर खान ने भी कहा था कि दशरथ मांझी के योगदान को वो शाहजहां से काफी ज्यादा आंकते हैं- केतन मेहता की फिल्म- मांझी- द माउंटेन मैन भी शुक्रवार को रिलीज हो रही है- मगर जिस टीस की खातिर 22 साल तक दशरथ मांझी ने दिन-रात एक करके पहाड़ को तोड़कर रास्ता बना दिया- वो टीस दशरथ मांझी के परिवार को आज भी सालती रहती है… पिछले साल अप्रैल महीने में दशरथ मांझी के इकलौते बटे भागीरथ की पत्नी बसंती की मौत इस वजह से हो गई कि इलाज कराने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे . आज एक तरफ देश भर में मांझी की गाथा गाई जा रही है- बिहार की सभी राजनीतिक पार्टियां दशरथ मांझी के नाम को भुनाने में जुटी हुई है- वहीं माझी की बेटी लौंगी देवी इस चिंता में पिसी जा रही है कि कैसे वो अपने परिवार के 12 भूख से तड़पते नाती-पोतों की परवरिश करेगी .

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Web Title: Manjhi – The Mountain Man
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