MBA की फीस भरने के लिए संघर्ष कर रही है कचरा बीनने वाले की बेटी

By: | Last Updated: Monday, 3 February 2014 1:56 PM
MBA की फीस भरने के लिए संघर्ष कर रही है कचरा बीनने वाले की बेटी

मुंबई: एक कचरा बीनने वाले परिवार की सबसे छोटी बेटी 22 वर्षीय सविता ढोके उच्च शिक्षा हासिल करने कि लिए जी-तोड़ मेहनत कर रही है. सविता एक ऐसी नौकरी की तलाश में है, जिससे वो अपनी कॉलेज फीस की अंतिम किश्त के 25,000 रुपये भर सके.

 

मिड डे के मुताबिक दो बड़ी बहनों और तीन भाइयों वाले गरीब परिवार में सबसे छोटी सविता की परवरिश मुंबई के खार इलाके में हुई. बांद्रा के खैमागर म्यूनिसिपल कारपोरेशन के स्कूल से सविता ने 2006 में एसएससी परीक्षा 62 प्रतिशत अंकों के साथ पास की. उसके इस शानदार प्रदर्शन से पूरे परिवार का सिर गर्व से ऊंचा हो गया. पढ़ाई के प्रति सविता की लगन को देखते हुए उसके माता-पिता ने उससे कूड़ा बीनने के काम से हटाकर पढ़ाई आगे जारी रखने की अनुमति दे दी. लेकिन इस शर्त पर कि पढ़ाई का खर्च उसे ही उठाना होगा.

 

उत्साह में भरी सविता ने खार के ही अनियोग जूनियर कॉलेज में एडमीशन लिया और एचएस सी परीक्षा 70 फीसदी अंकों के साथ पास कर के सबको चौंका दिया. इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए पैसे जुटाने के लिए उसने एक साल का गैप लिया. इस दौरान सविता ने एक पिज्जा आउटलेट पर नौकरी कर ली, जहां से उसे हर महीने 4500 रुपये की पगार मिलती थी. इस पैसे को बचाकर उसने एलएन डिग्री कॉलेज से 57 प्रतिशत अंकों के साथ कंप्यूटर एप्लीकेशन में डिग्री हासिल की. 

 

उसकी सारी जमापूंजी खर्च हो चुकी थी, लेकिन आगे उच्च शिक्षा हासिल करने की ललक कम नहीं हुई. सविता ने अब एमबीए करने की ठानी. सविता के इस ख्वाब को पूरा करने में मदद के लिए पूरा परिवार एकजुट हो गया. उसके पिता दरवाजे-दरवाजे जाकर पुराने कपड़े खरीदने लगे, जबकि उसकी मां कांदिवली में कूड़ा बीनने में और भी मेहनत करने लगीं. लेकिन इतनी जद्दोजहद के बावजूद ये परिवार हर दिन केवल 120 रुपये ही कमा पाता था. ऐसे में सविता की बड़ी बहन ने एक अस्पताल में नौकरानी की नौकरी कर ली. जबकि दूसरी बहन विधवा है और उसके अपने दो बच्चे भी हैं. बहन के बच्चों की देखभाल करने के लिए सविता उनके साथ रहने लगी.

 

जहां एक ओर दोनों बड़ी बहनें अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सकीं थीं, वहीं सविता अपने भाइयों के लिए प्रेरणा बन गई. सविता के एक भाई ने हाल ही में ग्रेजुएशन पूरा किया है, जबकि दूसरा भाई एचएससी में है और वो पूरे गर्व से बताता है कि 9 वीं की अपनी पूरी क्लास में सबसे छोटा वही है. अपनी यहां तक की पढ़ाई का पूरा श्रेय सविता अपने माता-पिता को देती है.

 

सविता बताती है कि जब कंप्यूटर साइंस में बैचलर डिग्री लेने के बाद उसने एमबीए करने का फैसला लिया तो कॉलेज ने भी उसकी मदद की. कॉलेज ने उसे एससी कोटे के तहत आरक्षण दे दिया और एमबीए के लिए केवल आधी फीस यानि 50,000 रुपये भरने को कहा. सविता ने बताया कि फर्स्ट इयर में किसी तरह मैंने 25000 रुपये की पहली किश्त तो भर दी, लेकिन अभी मुझे सेकेंड इयर के लिए अपनी दूसरी किश्त के 25000 रुपये भरने बाकी हैं. 

 

अपनी एमबीए की फीस को लेकर सविता बेहद परेशान है, क्योंकि फीस भरने में अब बस दो महीने ही बचे हैं. अगर सविता दूसरी किश्त के 25000 रुपये नहीं जमा कर सकी तो वो सेकेंड इयर की परीक्षा में नहीं बैठ सकेगी. सविता कहती है, “ मेरा कॉलेज बेहद उत्साहवर्धक है, वो छात्रों को इंटर्नशिप करने की इजाजत देते हैं. मैं भी 3-4 जगह इंटरव्यू दे चुकी हूं और इंटरव्यू के दौरान अपना फैमिली बैंकग्राउंड जरा भी नहीं छिपाती. मुझे अपने माता-पिता और उनके काम पर गर्व है. मुझे नहीं लगता कि अपना फैमिली बैकग्राउंड जाहिर करने से जॉब मिलने में किसी तरह का कोई रुकावट आएगी.”

 

सविता की मां लीला ढोके अपनी इस होनहार बेटी को पूरे परिवार के लिए प्रेरणास्त्रोत बताती है, पढ़ाई के प्रति जिसकी लगन ने पूरे घर का माहौल ही बदल दिया. अब बच्चे कचरा बीनने या ऐसा कोई छोटा-मोटा काम करने के बजाय पढ़कर इज्जत की नौकरी करना चाहते हैं. लीला ने कहा, “ हम खुद भी अनपढ़ हैं. 25 साल से मैं और मेरा पति कूड़ा बीनने का काम कर रहे हैं. लेकिन हमें खुशी है कि मेरी छोटी बेटी आगे पढ़ने के लिए कितनी ज्यादा मेहनत कर रही है. मेरे बेटों में भी अब पढ़ने का उत्साह है. मुझे पूरा भरोसा है कि वो आने वाले कल में अपनी जिंदगी बदलने में कामयाब रहेगी.”

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