मोदी, महाराष्ट्र और अफज़ल खान!

By: | Last Updated: Saturday, 11 October 2014 5:26 PM

नई दिल्ली : महाराष्ट्र और हरियाणा में चुनावी संग्राम छिड़ा है. तमाम राजनीतिक दल आमने – सामने मुकाबले में है. कोई आरोपों के तीर चला रहा हैं तो कोई शिवाजी की तलवार. इस चुनावी संग्राम में अपनों और परायों का भेद खत्म हो चुका है. कल तक दोस्ती का दम भरने वाले राजनीतिक दल चुनावी सभाओं में पूर्व सहयोगियों पर आरोपों के बम बरसा रहे हैं.

 

महाराष्ट्र और हरियाणा का ये चुनावी संग्राम अब अपने अंजाम की तरफ तेजी से बढ़ रहा है इसीलिए राजनीतिक दलों की सेनाएं जहां अपना आखिरी जोर लगा रही हैं वहीं इनके सेनापति मैदान में कस कर ताल ठोंक रहे हैं.  महाराष्ट्र में यूं तो चुनावी मुकाबला पांच कोणीय नजर आ रहा है लेकिन यहां असली मुकाबला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनाम चौकड़ी के बीच हो रहा है. इसीलिए कांग्रेस, एनसीपी, शिवसेना औऱ एमएनएस के नेता नरेंद्र मोदी पर तीखे हमले बोल रहे हैं. महाराष्ट्र के स्टार प्रचारक सवाल पूछ रहे हैं कि नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री है या फिर गुजरात के औऱ ये वह सवाल है जिसने महाराष्ट्र के चुनावी संग्राम को और ज्यादा दिलचस्प बना दिया है.

 

महाराष्ट्र के इस महासंग्राम में बीजेपी को जहां मोदी लहर की आस है तो वही शिवसेना के पास बाला साहब ठाकरे की विरासत का ताज है लेकिन चुनावी बिसात पर शह और मात के इस खेल में सबसे ज्यादा दांव पर लगी नरेंद्र मोदी की ही साख है. उद्वव ठाकरे पूछ रहे हैं कि हवा है तो रैलियां क्यों कर रहे हैं. दरअसल महाराष्ट्र चुनाव में बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को अपना चेहरा बनाया है इसीलिए उनके प्रचार को लेकर विरोधियों में हडकंप मचा है. खास बात ये है कि इस चुनावी जंग में कभी बीजेपी की दोस्त रही शिवसेना ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सबसे गहरा वार कर रही है.

 

2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बडे तरफदार रहे शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की नजरों में आखिर क्यों नरेंद्र मोदी बन गए हैं अफजल खान?

 

राज ठाकरे ने कहा था – नरेन्द्र मोदी जी की पहली रैली जब महाराष्ट्र मे हुई तो उन्होंने कहा कि अगर आज गोपीनाथ मुण्डे होते तो मुझे महाराष्ट्र में प्रचार करने की जरुरत नही होती. इसका मतलब उन्होने ही उनकी जो लीडरशिप है उनकी औकात निकाली कि तुम्हारा चेहरा दिखा के मुझे वोट नही मिल सकता मुझे ही आना पड़ेगा. यानि लोकसभा के लिए भी वही थे और विधानसभा में भी उन्ही का चेहरा दिखा रहे है. महाराष्ट्र के जो बीजेपी के नेता है उनका चेहरा दिखाकर तो वोट मिलने वाला है नहीं क्योकि चेहरा है ही नही उनके पास.

 

लोकसभा चुनाव में शिवसेना – बीजेपी गठबंधन के इस शानदार प्रदर्शन से ये बात साफ थी कि महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में भी ये गठबंधन आराम से जीत कर राज्य की सत्ता में आ जाएगा. लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर बीजेपी – शिवसेना का 25 साल पुराना ये गठबंधन चुनाव से पहले ही टूट गया. और इस तरह बीजेपी के लिए महाराष्ट्र में जीती हुई बाजी एक मुश्किल मुकाबले में फंस गई. और यही वजह है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका के दौरे से वापस लौटे तो उन्होंने सीधे महाराष्ट्र के चुनावी संग्राम में मोर्चा संभाल लिया .

 

दरअसल शिवसेना के खिलाफ कुछ ना बोलने के पीछे मोदी की रणनीति साफ है वो शिवसेना के साथ चुनाव बाद जररुत पड़ने पर गठजोड़ का विकल्प खुला रखना चाहते है वहीं दूसरी तरफ एनसीपी और कांग्रेस पर जोरदार हमला बोल कर सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ गुस्से को बीजेपी के लिए कैश कराना चाहते हैं. इसीलिए पूरे प्रचार के दौरान उनके निशाने पर एनसीपी और कांग्रेस ही रहे हैं.

 

महाराष्ट्र के इस चुनावी समर में सत्ताधारी पक्ष पर हमले की मोदी नीति साफ है लेकिन इस मोदी नीति के उलट शिवसेना ने नरेंद्र मोदी औऱ बीजेपी पर ही हमले तेज कर दिए है. जहां शिवसेना के निशाने पर सत्ताधारी कांग्रेस और एनसीपी होना चाहिए थी वहां उद्धव ठाकरे नरेंद्र मोदी और बीजेपी पर ही निशाना साध रहे हैं और इस तरह महाराष्ट्र की ये चुनावी जंग अब एक बहुकोणीय संघर्ष में तब्दील हो चुकी है.

 

राजनीतिक विश्लेषक अशोक वानखेड़े बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी महाराष्ट्र में शिवसेना से गठबंधन टूटा उसके बाद वह चुनाव उनके लिए भी वह चुनाव उतना मुश्किल हो गया है जितना कांग्रेस और NCP के लिए क्योंकि सवाल सिर्फ ज्यादा सीटों का नहीं है, सवाल सम्पूर्ण बहुमत का है और महाराष्ट्र जैसा सयुंक्त, जो अलग-अलग भागो को जोड़ कर बनाया गया है तो इसलिए पूरा महाराष्ट्र अलग-अलग राजनीतिक पार्टी में बट चुका है. ऐसे में आपको सम्पूर्ण मजोरिटी लाना मुश्किल हो रहा है.

 

महाराष्ट्र में 15 अक्टूबर को मतदान होना है लेकिन अपने अमेरिका दौरे से वापस आने के बाद से ही प्रधानमंत्री मोदी महाराष्ट्र में ताबड-तोड़ चुनावी रैलियां कर रहे हैं. वो रैलियों में कांग्रेस और एनसीपी पर तो सीधा हमला बोल रहे हैं लेकिन शिवसेना को लेकर उनकी जुबान खामोश है बावजूद इसके वो खुद शिवसेना के सीधे निशाने पर हैं.

 

दरअसल महाराष्ट्र के इस चुनावी दंगल का हिसाब – किताब कुछ ऐसा है कि जब से बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव में मोर्चा संभाला है वो महाराष्ट्र की बड़ी पार्टियों, कांग्रेस, एनसीपी, शिवसेना और एमएनएस के निशाने पर आ गए हैं. महाराष्ट्र में नरेंद्र मोदी पर ये हमला चौतरफा हो रहा है लेकिन मोदी अकेले इन हमलों का जवाब देने के लिए मैदान में डटे हुए है.

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महाराष्ट्र बीजेपी के लिए इन दिनों मसीहा बन चुके हैं. क्योंकि महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में बीजेपी पूरी तरह से नरेंद्र मोदी के करिश्में पर ही उम्मीद लगाए बैठी है. खुद नरेंद्र मोदी के लिए भी ये चुनाव बेहद खास बन चुके है क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद ये चुनाव नरेंद्र मोदी के लिए भी पहली बड़ी परीक्षा हैं.

 

राजनीतिक विश्लेषक कंचन गुप्ता कहते हैं कि अगर हम सिर्फ इसको भाजपा के एंगल से देखे भाजपा के लिए ये बहुत जरुरी है ये दो चुनाव जीतना और इससे जो संगठन पर असर होगा उनके जो वर्कर हैं उनके जो मेंबर हैं. उनमें जो सेल्फ कॉन्फीडेंस आएगी वो आगे जाकर पार्टी के लिए संगठन के लिए ये काम देगा. संगठन को नए तरीके से सजाया जा रहा है. नए लोग लाए गए हैं. नए पदाधिकारी लाए गए हैं लेकिन अगर वर्कर में जो मोराल है वो ना हो तो फिर आप जितनी भी नए पदाधिकारी ले आए संगठन आगे नहीं बनने वाला है. ये सब देखते हुए मुझे लगता है कि नरेंद्र मोदी के लिए ये चुनाव जीतना एक परीक्षा तो है ही लेकिन जरुरी भी है.

 

बीजेपी ने अपनी ब्रांड पॉलिटिक्स के चलते ही नरेंद्र मोदी को महाराष्ट्र के चुनाव मैदान में उतारा है औऱ यही वजह है कि बीजेपी का पूरा चुनाव प्रचार नरेंद्र मोदी के इर्द – गिर्द ही घूम रहा है. मोदी मैजिक के भरोसे ही बीजेपी ने महाराष्ट्र में 50 से ज्यादा ऐसे नेताओं को भी टिकट दिए हैं जो पहले दूसरी पार्टियों से जुड़े थे. यानी मोदी के नाम पर महाराष्ट्र में बीजेपी मांग रही है वोट. यही वजह है कि विरोधी दल ही नहीं मोदी के पूर्व समर्थक भी उन पर अब सामने से वार कर रहे हैं. लोकसभा चुनाव के वक्त नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का समर्थन करने वाले एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे महाराष्ट्र के चुनावी मैदान में मोदी पर सबसे ज्यादा और तीखे हमले बोल रहे हैं. 

 

राज ठाकरे ने आरोप लगाते हुए कहा कि देश को देखना चाहिए कि यह क्या चल रहा है यहां पर, वहां पाकिस्तान हमला कर रहा है  और प्रधानमंत्री महाराष्ट्र और हरियाणा में दिन में चार-चार, पांच-पांच सभाएं ले रहे हैं इलेक्शन के लिए कितना खर्चा किया यह सवाल हमसे पूछे जाते है और ये जब कैंपेन के लिए आते है तो सरकारी खर्चे से आते है, गवर्नमेंट का प्लेन यूज कर रहे है वो खर्चा कहां दिखाएगे. तो पार्टी के लीडर कैंपेन कर रहे है या प्रधानमंत्री कैंपेन कर रहे है अगर  पार्टी के लिए कैंपेन कर रहे है तो पार्टी के लीडर बनकर कैंपेन करनी चाहिए और उन्हे ये सब सुविधा नहीं मिलनी चाहिए.

 

महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव में जहां बीजेपी मोदी लहर पर सवार होकर बहुमत के लिए जरुरी 145 सीटों के मिशन पर निकली है वहीं बीजेपी की पूर्व सहयोगी शिवसेना उसके इस मिशन पर लगाम लगाने के लिए एडी चोटी का जोर लगा रही है. लेकिन महाराष्ट्र में इस बार चुनाव की डगर इतनी आसान भी नहीं है. राज्य के उलझे हुए चुनावी गणित पर भी हम डालेंगे नजर लेकिन उससे पहले आपको बताते है कि क्यों चुनाव में एकला चलो की नीति पर कदम आगे बढ़ा रही है बीजेपी और उसके तारणहार.

 

कंचन गुप्ता बताते हैं कि अगर आप महाराष्ट्र और हरियाणा में जीतते हैं तो उससे अगले जो चुनाव आएंगे उसके लिए एक टैंपो बन जाता है.  दूसरा है राज्यसभा में आगे जाकर जो चुनाव होंगे उसमें आप अपने उम्मीदवार को ले आ सकते हैं. इसकी जरुरत इसलिए है क्योंकि लोकसभा में बीजेपी के पास अपना बहुमत है. लेकिन राज्यसभा में नही है. कुछ ऐसे बिल हो सकते हैं जो पास करवाने में दिक्कत आए और इसलिए राज्यसभा में अपना बहुमत होना जरुरी है.

 

राजनीतिक विश्लेषक शेष नारायण सिंह कहते हैं कि महाराष्ट्र में बीजेपी- शिवसेना का 25 साल पुराना गठबंधन टूट चुका है वहीं हरियाणा में हरियाणा जनहित कांग्रेस से भी बीजेपी ने चुनाव से पहले ही अपना पल्ला झाड़ लिया है. लोकसभा चुनाव की जीत के बाद अब इन दोनों राज्यों में बहुमत की आस लगाए बैठी बीजेपी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ही लगाया है अपना सबसे बड़ा दांव. लेकिन इस चुनावी माहौल में हालात कुछ ऐसे बन गए हैं कि शिवसेना, एमएनएस, एनसीपी और कांग्रेस जैसी पार्टियां एक दूसरे पर वार करने की बजाए नरेंद्र मोदी पर कर रही है चारों तरफ से तेज प्रहार.

  

नब्बे के दशक में शिवसेना के कांग्रेस विरोध औऱ हिंदुत्व के मुद्दे ने बीजेपी को महाराष्ट्र में उसके करीब ला दिया था. इसके बाद से ही ब्राह्मण और बनियों की पार्टी मानी जाने वाली बीजेपी का राज्य के मराठा, कुनबी, ओबीसी जैसे दूसरे वर्गो में जनाधार बढ़ना भी शुरु हुआ और यही वजह थी कि 2014 के लोकसभा चुनाव तक राज्य में शिवसेना औऱ बीजेपी का गठबंधन कायम रहा.

 

अशोक वानखेडे बताते हैं कि महाराष्ट्र में ब्राह्मण और बनिया ये दो कम्यूनिटी को आम आदमी राजनीति में समर्थन नहीं देता है. ये महाराष्ट्र का राजनीतिक इतिहास रहा है. बीजेपी में जो वर्तमान नेतृत्व है वो सब ब्राह्मण हैं. एक ओबीसी जो उनके पास एक बड़ा चेहरा था गोपी नाथ मुण्डे उनकी मृत्यु हो चुकी है. ऐसे में महाराष्ट्र के पास ऐसा कोई बड़ा नेता नहीं है जिनके भरोसे बीजेपी शिवसेना से लोहा ले.  इसीलिए प्रधानमंत्री का वहां होना ये बहुत बड़ी आवश्यकता है आज महाराष्ट्र  बीजेपी के लिए. नरेंद्र मोदी खुद ओबीसी हैं इसलिए ओबीसी को अपील करते हैं, अच्छी मराठी बोल लेते है, भाषण अच्छा देते हैं और उन्होंने जो एक गवर्नेंस का एजेंडा दिया और उसको जो महाराष्ट्र ने लोकसभा में समर्थन दिया तो बीजेपी को लगता है कि शायद विधानसभा में भी वही स्तिथि मतदाता अपनाएंगें. और मोदी जी के नाम पर समर्थन लेंगे. इसलिए नरेंद्र मोदी की नितान्त आवश्कता बीजेपी को महाराष्ट्र में पड़ रही है.

 

महाराष्ट्र के मौजूदा चुनावों में बीजेपी – शिवसेना गठबंधन टूट चुका है लेकिन इस अलगाव के बाद जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महाराष्ट्र की इस महाभारत में उतरे तो उन्होंने शिवसेना के खिलाफ हथियार उठाने से ही इंकार कर दिया.   

 

मौजूदा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने भले ही शिवसेना के खिलाफ एक तरफा संघर्ष विराम घोषित कर रखा है लेकिन गठबंधन टूटने के बाद से शिवसेना लगातार नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर निशाना साध रही है और यही वजह है कि चुनाव प्रचार की शुरुआत में नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोलने से परहेज करने वाले शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने चुनाव प्रचार के दौरान सीधे नरेंद्र मोदी को ही अपने निशाने पर ले रखा है.

 

महाराष्ट्र चुनाव के दौरान उद्धव ठाकरे का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ये सबसे तीखा हमला है और इसी के साथ महाराष्ट्र की मौजूदा चुनावी राजनीति में शिवाजी औऱ अफजल खान का किस्सा भी फिर से जिंदा हो गया है. कल तक बीजेपी की दोस्त रही शिवसेना अब बीजेपी की चुनावी रणनीति को ‘अफजल खान’ की नीति बता रही है और नरेंद्र मोदी को ‘अफजल खान’ की उपमा के सहारे वो बीजेपी की घेरबंदी के लिए नया जाल बिछा रही है.

 

शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा कि बीजेपी से अलगाव के बाद अब शिवसेना के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी की चुनाव रणनीति अफजल खान की तरह हो गई है. आखिर ये अफजल खान कौन है जिसके नाम का उद्धव ठाकरे नरेंद्र मोदी के लिए एक उपमा के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं. दरअसल अफजल खान इतिहास का एक ऐसा किरदार है जो मराठा राजा छत्रपति शिवाजी की दास्तान में एक खलनायक के तौर पर दर्ज है. महाराष्ट्र में मौजूदा छत्रपति शिवाजी महाराज शिवसेना की राजनीति का सबसे बड़ा आधार रहे हैं. यहीं नहीं महाराष्ट्र की मराठा राजनीति में भी शिवाजी एक बड़ा प्रतीक हैं वहीं अफजल खान को खलनायक माना जाता है. और यही वजह है कि इन चुनावों में छत्रपति शिवाजी को लेकर भी नरेंद्र मोदी और उद्धव ठाकरे में जबरदस्त घमासान मचा हुआ है.

 

 

करीब 350 साल पहले जब दिल्ली में मुगल बादशाह औरंगजेब की हुकूमत थी. उस वक्त मुगल साम्राज्य की सीमाएं नीचे दक्षिण भारत तक फैल चुकी थी. लेकिन इसी दौर में दक्षिण भारत के दक्कन  इलाके में बीजापुर की इस्लामी सल्तनत भी कायम थी जिसकी मुगलों के साथ अक्सर लड़ाई होती थी. सत्रहवी सदी के मध्य का ये वो दौर था जब बीजापुर पर आदिलशाही बादशाहों की हुकूमत थी और बीजापुर का ही एक बेहतरीन योद्धा था अफजल खान.  बीजापुर सल्तनत की तरफ से अफजल खान ने मुगलों के खिलाफ कई जंगें लड़ी थी वो युद्ध में हर तरह की रणनीति अपनाने में माहिर माना जाता था.

 

बिजापुर की आदिलशाही हुकुमत में एक कमिर थे और बिजापुर और आदिलशाह की मुगलों से लड़ाई थी. उसने बहुत यद्धों में काम किया था. इनका नाम अबदुल्लाह भटारी था, अफजल खान ने इनको आदिलशाह प्रथम ने टाइटल दिया था और ये इनके बारे में थोड़ी सी बात पता थी कि ये जरा हर काम में सिर्फ उससे नहीं बल्कि जैसा युद्ध में होता है कि तरह कि पॉलिसी अपनाए जाए वो करते थे ऐसे आदमी थे.

 

सत्रहवी शताब्दी के मध्य में दक्कन के इलाके में बीजापुर, गोलकुंडा और अहमदनगर तीन मुस्लिम सल्तनतें थी. इस इलाके में एक बडी फौजी ताकत मराठों की भी थी. इन तीनों सल्तनतों की मुगल बादशाह औऱंगजेब से लड़ाई होती थी लेकिन आपस में भी इनकी जंग होती रहती थी. सन 1659 में जब बीजापुर के सुल्तान और मराठों के बीच लड़ाई  हुई तो सुल्तान आदिलशाह द्वितीय की मां ने मराठों को काबू करने के लिए अपने कमांडर अफजल खान को भेजा.

 

आदिलशाह और उन लोगों में झगड़ा था इसके साथ ही मराठों से भी झगड़ा चल रहा था क्योंकि मराठे उनकी जमीन, टीलें और बीवी ले जाते थे. तो आदिलशाह द्वितीय के जमाने में उनकी मां ने ये कोशिश कि किसी तरह से शिवाजी पर कब्जा पाया जाए तो उन्होने अफजल खां से कहा (जो उनके बहुत ही नोबल थे) तुम शिवाजी के खिलाफ जाओ. इस काम के लिए  दस हजार की घोड़ों वाली सेना भी दी गई. उसी वक्त उन्हे ये ख्याल हुआ कि पैदल लड़ाई करने वाले वो 60 हजार से ज्यादा हैं. ऐसे में दस हजार कैवलवी से साठ हजार का नहीं हो सकता. तो कहा कि कोई और ट्रिक लगाओ.

 

इतिहासकारों के मुताबिक बीजापुर सल्तनत के कमांडर अफजल खान ने अपने एक दूत के जरिए शिवाजी महाराज को मिलने का संदेश भेजा और फिर दोनों की महाराष्ट्र के प्रतापगढ इलाके तय-शुदा जगह पर मुलाकात भी हुई लेकिन उसके बाद वहां लिखी गई धोखे और फरेब की एक खतरनाक और खूनी साजिश. 

 

इतिहासकार शीरिन मुसवी के मुताबिक दोनो तरफ से एक तरह से साजिश थी. तो जाहिर है कि शिवाजी पॉजिशन मे आए थे तो तलवार वगैराह तो ला नहीं सकते थे. तो उन्होंने एक बांक (जो हाथ में पहनते है )वो पहना था दो अंगुठियों से अन्दर तक कर लिया था और अन्दर कवच पहना था कपड़ो के नीचे. अफजल खां ने दिखाने के लिए एक तलवार छोड़ी थी लेकिन उन्होंने एक (डागर) अपने हाथ मे छुपाई हुई थी. जब शिवाजी बहुत दुबले पतले थे. तो जैसे ही यह पहुंचे तो उन्होंने बढ़ के गले लगाया. गले लगाने के बजाय अफजल खान ने उसे कस के पकड़ा और जो डेगर थी उसे घूसेड़ेने की कोशिश की तो डेगर उनके लग नहीं सकती थी. क्योंकि शिवाजी ने नीचे कवच पहना हुआ था तो उन्होंने पलटकर उन पर अपने कवच से हमला कर दिया .

 

अन्दर सिर्फ चार ही लोग थे दो इनके दो उनके कोई ज्यादा लोग नही थे, तो शिवाजी वहां से निकलकर भागे और वह गिरे पड़े वहीं अन्दर. जब यह वहां से निकलकर भागे तो फिर उसके बाद शम्भा जी कागजी जो थे उन्होंने अफजल खां का सर काटा और शिवाजी को जाकर दे दिया. शिवाजी ने उसी वक्त जो उनकी गन थी, उसे दागा. आदिलशाह, अफजल खां ने भी अपने ट्रूप्स लगा रखे थे कि अगर वो शिवाजी को मार लेंगे तो जो उनके साथी है उनको मार लेंगे तो उनका उल्टा हो गया, उन्होंने इन पर हमला कर दिया खूब लूटमार की पूरे हाथी, सोना सब कुछ उनके हाथ लगा और चल दिए.

 

शिवाजी और अफजल खान की फौज के बीच ये युद्ध महाराष्ट्र में सतारा जिले के प्रतापगढ में लड़ गया था. प्रतापगढ की इस जंग में मराठा फौज ने आदिलशाही फौज को बुरी तरह से हरा दिया था. यही वजह है कि भारतीय इतिहास में शिवाजी, अफजल खान से हुई इस मुलाकात में विजेता की तरह दर्ज है लेकिन फारसी में लिखी अपनी टिप्पणियों में खाफी खां ने विश्वासघात का आरोप शिवाजी पर लगाया है.

 

इतिहासकार बताते हैं कि देखिए लड़ाई में तो यही होता है. मुगलों ने भी यही काम किया, मुगलों के खिलाफ भी यही काम किया गया कि आप बुलाईए किसी को और उसके बाद उसे पकड़ने कि कोशिश कीजिए. वैसे तो अफजल खां बहुत बहादुर औऱ अच्छा लड़ने वाले थे लेकिन जब मौका मिल जाए जहां पर वो ये देखें कि इससे काम नही चलेगा तो ये भी करते थे मतलब धोखाबाजी भी करते थे. शिवाजी ने भी कमी नही छोड़ी वह पूरी तरह जानते थे तो उन्हे आना नही चाहिए था.

 

इतिहासकारों के मुताबिक प्रतापगढ की इस जीत के बाद शिवाजी महाराज मराठी अस्मिता का एक प्रतीक बन गए थे. आदिलशाही सल्तनत से टकराने के बाद उन्होने मुगलों की सेना से भी जंगे लड़ी और बाद में अलग मराठा राज्य की स्थापना की. लेकिन सैकड़ो साल बाद शिवाजी और अफजल खान की ये दास्तान एक बार फिर महाराष्ट्र के चुनावी माहौल में गूंज रही है क्योंकि इस कहानी में धोखे और फरेब की एक मिसाल छिपी है. भारत में अगर किसी की तुलना अफजल खान से की जाए तो उसका मतलब होता है. वो आदमी कहता कुछ है लेकिन उसके दिल में कुछ और होता है और अफजल खान की उपमा देकर यही चुनावी तीर शिवसेना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर चला रही है. शिवसेना इसी बहाने महाराष्ट्र की अस्मिता का सवाल भी उठा रही है उधर बीजेपी इन आरोपों को महज चुनावी बुखार बता रही है.

 

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने जब से टीम मोदी के चुनाव अभियान की तुलना अफजल खान की सेना से की है इन दोनों पार्टियों के मेल मिलाप की उम्मीद भी क्षीण हो गई हैं. 15 अक्टूबर को होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले ये बीजेपी पर शिवसेना का सबसे बड़ा हमला था. उधर कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठबंधन टूटने के बाद महाराष्ट्र में अब मुकाबला पांच कोणीय हो चुका हैं. लेकिन खास बात ये है कि शिवसेना ही नहीं बल्कि कांग्रेस, एनसीपी और एमएनएस को मोदी एक आंख नहीं भा रहे यही वजह है कि इन सभी के निशाने पर है नरेंद्र मोदी.

 

महाराष्ट्र में गठबंधन फिलहाल अतीत की बात हो चुके हैं और इसीलिए यहां चुनावी जंग इस बार बेहद दिलचस्प हो चुकी है क्योकि विधानसभा तक पहुंचने की अग्नि परीक्षा से अब सभी दलों को अकेले ही गुजरना है. खास बात ये है कि महाराष्ट्र की चारों बड़ी पार्टियों का अपने अपने खास क्षेत्रों में ही मजबूत जनाधार है लेकिन पूरे राज्य में किसी भी पार्टी का संगठन मजबूत नहीं है इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी ये चुनौती बड़ी है.

 

 

महाराष्ट्र का विदर्भ इलाका जिसमें नागपुर और अमरावती के ग्यारह जिले शामिल है यहां 2009 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सबसे ज्यादा 24 सीटें मिली थी जबकि बीजेपी को 19 सीटें. महाराष्ट्र का मुंबई रीजन जिसमें मुंबई शहर, उपनगरीय इलाके औऱ ठाणे शामिल है यहां बीजेपी और शिवसेना का संगठन मजबूत रहा है पिछले चुनाव में दोनों पार्टियों ने यहां से 9 -9 सीटें जीती थी. पुणे और उसके आस पास के पांच जिलों वाला पश्चिमी महाराष्ट्र एनसीपी का गढ रहा है. जहां 2009 में उसने 20 सीटें जीती थी.

 

इसी तरह नासिक और उसके आस पास के पांच जिलों वाले उत्तरी महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी मजबूत रही है. महाराष्ट्र के आठ जिलों वाले मराठवाड़ा इलाके में भी कांग्रेस और एनसीपी को पिछले चुनाव में 18 और 12 सीटें मिली थी. लेकिन महाराष्ट्र के कोकण रीजन में शिवसेना और एनसीपी का दबदबा रहा है. पिछले चुनाव में यहां एनसीपी ने पांच सीटें जीती थी.लेकिन पिछला चुनाव दो गठबंधनों ने लड़ा था जबकि इस बार राज्य में ये चुनावी लड़ाई राजनीतिक दल अकेले ही लड़ रहे हैं. और सबसे ज्यादा नजरें बीजेपी पर टिकी है क्योंकि महाराष्ट्र में फिलहाल उसका सबसे बड़ा चेहरा बने हुए हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

 

महाराष्ट्र चुनाव में नरेंद्र मोदी की मौजूदगी ने कांग्रेस, शिवसेना, एनसीपी और एमएनएस जैसी पार्टियों के खेमे में हड़कंप मचा दिया है. महाराष्ट्र के चुनावी चक्रव्यूह में शिवसेना बीजेपी को अफजल खान बता कर घेर रही है लेकिन उसकी शिवाजी की सेना बीजेपी की बढ़त को रोकने में नाकाम नजर आ रही है क्योंकि तमाम सर्वे भी महाराष्ठ्र में बीजेपी की बढ़त की संभावनाएं जता रहे हैं.

 

एबीपी न्यूज नीलसन के सर्वे के मुताबिक भी महाराष्ट्र में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरती नजर आ रही है. लेकिन वो बहुमत के आकंडे से दूर रह जाएगी. सर्वे में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को विधानसभा की 288 सीटों में से 120 सीटें मिलने की संभवानाए जताई गई है. जबकि शिवसेना 67 सीटों पर ही सिमटती नजर आ रही है.  लेकिन महाराष्ट्र का ये चुनाव इसलिए भी खास है क्योंकि लोकसभा चुनाव के बाद ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली बड़ी परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है. हाल ही में गुजरात, बिहार, यूपी और राजस्थान के उप चुनाव में बीजेपी ज्यादातर सीटें हार गई थी और ये भी एक बडी वजह है कि महाराष्ट्र और हरियाणा का मौजूदा चुनाव मोदी लहर के लिए अग्नि परीक्षा माना जा रहा हैं.

 

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यूपी के 7000 से ज्यादा किसानों को मिला कर्जमाफी का प्रमाणपत्र

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में गुरुवार को 7574 किसानों को कर्जमाफी का प्रमाणपत्र दिया गया. इसके बाद 5...

सेना की ताकत बढ़ाएंगे छह अपाचे लड़ाकू हेलीकॉप्टर, सरकार ने दी खरीदने की मंजूरी
सेना की ताकत बढ़ाएंगे छह अपाचे लड़ाकू हेलीकॉप्टर, सरकार ने दी खरीदने की...

नई दिल्ली: रक्षा मंत्रालय ने गुरुवार को एक बड़ा फैसला लिया. मंत्रालय ने भारतीय सेना के लिए...

क्या है अमेरिकी राजदूत के हिंदू धर्म परिवर्तन कराने का वायरल सच?
क्या है अमेरिकी राजदूत के हिंदू धर्म परिवर्तन कराने का वायरल सच?

नई दिल्लीः सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से एक विदेशी महिला की चर्चा चल रही है.  वायरल वीडियों...

भागलपुर घोटाला: सीएम नीतीश कुमार ने दिए CBI जांच के आदेश
भागलपुर घोटाला: सीएम नीतीश कुमार ने दिए CBI जांच के आदेश

पटना/भागलपुर: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भागलपुर जिला में सरकारी खाते से पैसे की अवैध...

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