गुजरात एंटी टेरर बिल पर सालों से क्यों था इतना विवाद ?

By: | Last Updated: Thursday, 24 September 2015 5:07 PM

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गुजरात कंट्रोल ऑफ टेररिज्म एंड ऑर्गेनाइज्ड क्राइम यानी गुजकोटोक बिल 2015 को हरी झंडी दे दी है और इसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया है. ऐसे में अब इस बिल को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलना महज औपचारिकता भर है. सामान्यतया ऐसे मामलों में गृह मंत्रालय की अनुशंसा के आधार पर ही राष्ट्रपति अपनी स्वीकृति देते हैं. जाहिर है, राष्ट्रपति की औपचारिक मंजूरी के साथ ही ये बिल कानून की शक्ल अख्तियार कर लेगा और ऐसे में पिछले डेढ़ दशक से इसे लेकर चल रही वैधानिक प्रक्रिया पर पूर्ण विराम लग जाएगा.

 

हालांकि कानून बनने के साथ ही इसे लेकर विवाद खत्म हो जाएगा, इसके आसार कम ही है. बिल को गृह मंत्रालय की स्वीकृति मिलने के साथ ही विपक्षी दलों ने मोदी सरकार पर हमला बोल दिया है, ये कहते हुए कि अगर ये कानून बन जाता है, तो ये कुछ वैसा ही भयावह होगा, जैसा एक समय टाडा या फिर पोटा हुआ करता था. लेकिन इससे उलट गुजरात सरकार स्वाभाविक तौर पर खुशी का अनुभव कर रही है. राज्य सरकार के प्रवक्ता व स्वास्थ्य मंत्री नीतिन पटेल जहां इसे जल्दी लागू होता हुआ देख रहे हैं, वही श्रम व रोजगार मंत्री विजय रुपाणी का कहना है कि कांग्रेस ने भले ही वोट बैंक की राजनीति के तहत यूपीए शासन काल में इसे स्वीकृत नहीं होने दिया, लेकिन आतंकवाद से निबटने के लिए जरूरी गुजकोटोक का रास्ता अब साफ हो गया है.

 

सवाल उठता है कि इस बिल को लेकर पिछले डेढ़ दशक से इतना विवाद क्यों है. विवाद की शुरुआत वर्ष 2001 में ही हो गई थी, जब बतौर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल के पहले ही वर्ष में, 26 दिसंबर 2001 को गुजरात कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम यानी गुजकोक के नाम से एक विधेयक का मसौदा तैयार कर केंद्र की तत्कालीन वाजपेयी सरकार को स्वीकृति के लिए भेजा था. गौरतलब है कि देश की संसद पर 13 दिसंबर 2001 को हुए हमले के दो हफ्ते के अंदर इस विधेयक का मसौदा तैयार कर केंद्र को भेजा गया था. तर्क ये दिया गया था कि देश में जिस तरह से संगठित अपराध बढ़ रहे हैं और माफिया व आतंकवादी संगठनों की मिलीभगत से अपराध हो रहे हैं, ऐसे में उन पर नियंत्रण के लिए विशेष कानून की जरूरत है. खुद तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से ये भी कहा गया कि जब प्रिवेंशन ऑफ़ टेररिज़्म आर्डिनेंस यानी पोटो अस्तित्व में था, उसी वक्त केंद्र की तरफ से इस तरह का एक ड्राफ्ट राज्यों को भेजा गया था और उसी के आधार पर गुजकोक बिल का ड्राफ्ट तैयार किया गया है.

 

हालांकि केंद्र ने सीधे-सीधे उस वक्त गुजकोक बिल के ड्राफ्ट को मंजूरी नहीं दी. दरअसल इसके पीछे एक वजह महाराष्ट्र में इसी लाइन पर 1999 में अस्तित्व में आए महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ आर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट यानी मकोका को मुंबई हाईकोर्ट में मिली चुनौती रही. मुंबई हाईकोर्ट ने मकोका के दो प्रावधानों में तब्दीली का आदेश दिया. उसी हिसाब से केंद्र ने भी गुजरात सरकार को प्रस्तावित बिल के ड्राफ्ट में संशोधन करने को कहा.

 

इसके बाद दिसंबर 2002 में हुए चुनावों के बाद नरेंद्र मोदी ने दूसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री का पद संभाला. इससे पहले 24 सितंबर 2002 को गुजरात की राजधानी गांधीनगर के अक्षरधाम मंदिर पर आतंकी हमला हो चुका था, जिसमें 29 लोगों की जान गई थी, जबकि तीन जवान शहीद हुए थे. ऐसे में 25 फरवरी 2003 को शुरु हुए गुजरात विधानसभा के बजट सत्र की शुरुआत के वक्त राज्यपाल सुंदरसिंह भंडारी ने अपने अभिभाषण में ही इस बात का जिक्र कर दिया कि गोधरा कांड के आरोपियों के खिलाफ पोटा और पासा लगाने वाली राज्य सरकार अब संगठित अपराध से निबटने के लिए गुजकोक बिल ला रही है, जिसके लिए केंद्र की अनुमति भी मिल चुकी है. इस घोषणा के मुताबिक ही 17 मार्च 2003 को मुख्यमंत्री मोदी ने गुजकोक बिल को गुजरात विधानसभा में पारित कराया. हालांकि तत्कालीन राज्यपाल सुंदरसिंह भंडारी ने इसे सीधे मंजूरी देने की जगह केंद्र सरकार को राष्ट्रपति की अनुमति के लिए भेजा, क्योंकि इस विधेयक के कई हिस्से केद्रीय कानूनों, मसलन इविडेंस एक्ट, सीआरपीसी और आईपीसी की धाराओं से अलग थे और ऐसे में इसके लिए केंद्र की सहमति और राष्ट्रपति की अनुमति जरूरी थी.

 

इस विधेयक पर विचार करने के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने 8 मार्च 2004 को इसे वापस गुजरात सरकार को भेज दिया. राष्ट्रपति की तरफ से ये कहा गया कि विधेयक में कुछ संशोधन आवश्यक हैं. राष्ट्रपति के सुझावों के मुताबिक, गुजरात सरकार ने इस बिल में इंटरसेप्शन के प्रावधान को हटाते हुए 2 जून 2004 को संशोधित बिल को विधानसभा में पारित कराया और 16 जून 2004 को इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए केंद्र सरकार को भेज दिया. लेकिन तब तक केंद्र में सरकार बदल चुकी थी. अटलबिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली एनडीए की सरकार सत्ता से बाहर हो चुकी थी और मनमोहन सिंह की अगुआई में यूपीए की सरकार दिल्ली में जम चुकी थी. यूपीए सरकार ने सत्ता में आते ही प्रिवेंशन ऑफ टेररिज्म एक्ट यानी पोटा को खत्म किया, जिसे 2002 में तत्कालीन एनडीए सरकार ने पास कराया था और जिसे हटाने की मांग अल्पसंख्यक समुदाय के साथ ही मानवाधिकार संगठन कर रहे थे. ऐसे में यूपीए सरकार गुजकोक को मंजूरी देती, इसका सवाल उठता नहीं था. केंद्र में गृह मंत्री के तौर पर लालकृष्ण आडवाणी की जगह शिवराज पाटिल ने जगह ले ली थी. पाटिल गांधी परिवार के करीबी थे, इसलिए लातूर से लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद गृह मंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद उन्हें दिया गया. सोनिया और नरेंद्र मोदी के बीच तक तक जुबानी जंग भी तेज हो चुकी थी, 2004 के लोकसभा चुनावों में जहां मोदी ने सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा उठाया था, वही राहुल को जर्सी गाय का बछड़ा तक कह दिया था. ऐसे में सवाल ही नहीं उठता था कि केंद्र की यूपीए सरकार गुजकोक को स्वीकृति देती.

 

इस बदले सियासी समीकरण और केंद्र व राज्य सरकार के बीच की तल्खी के कारण गुजकोक बिल केंद्र के पास लंबित पड़ा रहा. इस दौरान केंद्र की यूपीए सरकार और गुजरात की तत्कालीन मोदी सरकार के बीच राजनीतिक कुश्ती तेज हुई. मोदी ने आरोप लगाया कि यूपीए सरकार जानबूझकर गुजकोक बिल को स्वीकृति नहीं दे रही है, ताकि गुजरात आतंकी घटनाओं को रोक पाने में असहाय बना रहे. मोदी का तर्क ये था कि अगर गुजकोक जैसा ही कानून, महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट यानी मकोका कांग्रेस और एनसीपी की संयुक्त सरकार के दौर में महाराष्ट्र में बना रह सकता है और मकोका को ही देश की राजधानी दिल्ली में भी एक फरवरी 2002 से लगातार लागू रखा जा सकता है, तो फिर गुजरात को गुजकोक से क्यों वंचित किया जा रहा है. इसके सामने यूपीए सरकार का तर्क ये रहा कि टाडा और पोटा जैसे कानून होने के बावजूद देश में आतंकी घटनाएं हुईं, ऐसे में कड़े कानून ही ऐसे अपराध को रोक सकते हैं, जरूरी नहीं. ऐसे में मोदी और बीजेपी की तरफ से तर्क ये पेश किया गया कि इस तरह के अपराध भले पूरी तरह से रोके न जा सकें, लेकिन अपराध घटित होने की हालत में अपराधियों को कड़ी सजा तो दी ही जा सकती है.

 

मोदी सरकार और यूपीए सरकार के बीच की इस लड़ाई के बीच देश में कुछ बड़ी आतंकी वारदातें हुई. मसलन 11 जुलाई 2006 को महज 11 मिनट के अंदर मुंबई में सात धमाके हुए जिसमें 209 लोगों की जान गई और सात सौ से भी अधिक लोग घायल हुए. इस घटना के तीन दिन बाद ही मोदी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर गुजकोक को राष्ट्रपति की मंजूरी दिलाने की मांग की. मोदी ने ये कहा कि जिस तरह की बड़ी आतंकी वारदात मुंबई में हुई है, वैसे में गुजरात के लिए भी खतरा काफी बड़ा है, क्योंकि न सिर्फ गुजरात की छह सौ किलोमीटर लंबी सीमा पाकिस्तान से मिलती है, बल्कि समुद्री किनारा भी सोलह सौ किलोमीटर लंबा है, जिसके जरिये घुसपैठ कर आतंकी वारदात पाकिस्तान की तरफ से हो सकती है. खुद पत्र लिखने से पहले मोदी ने सीमावर्ती इलाके कच्छ के तत्कालीन सांसद पुष्पदान गढ़वी से भी तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल को पत्र लिखवाया. लेकिन बात बनी नहीं.

 

इसके बाद गुजरात में 2007 में विधानसभा चुनाव हुए. मोदी ने दूसरी बार अपनी अगुआई में बीजेपी को जीत दिलाई. चुनाव प्रचार के दौरान भी मोदी ने गुजकोक को मुद्दा जोर शोर से उठाया था और केंद्र की यूपीए सरकार पर आरोप लगाया कि वो जानबूझकर गुजरात को कमजोर करने के लिए गुजकोक बिल को अपने पास लंबित रखे हुए है.

 

इस मामले में एक बड़ा टर्न 2008 में आया. 26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में सीरियल ब्लास्ट हुए. शाम के वक्त हुए कुल इक्कीस बम धमाकों में 56 लोगों की जान गई, जबकि 200 से ज्यादा लोग घायल हुए. घायलों को देखने के लिए मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी का भी अहमदाबाद आना हुआ. इसके बाद मोदी सरकार ने एक बार फिर से गुजकोक के लिए दबाव बनाना शुरु किया. मोदी सरकार का तर्क ये रहा कि स्मगलिंग रोकने के लिए मूल तौर पर बनाया गया अनलॉफुल एक्टिविटिज प्रिवेंशन एक्ट भले ही सुधार के बाद अनलॉफुल एक्टिविटिज प्रिवेंशन अमेंडमेंट एक्ट यानी यूएपीए की शक्ल अख्तियार कर चुका हो, लेकिन न तो ये पोटा जैसे कानून का विकल्प बन पाया है और न ही इससे आतंकी गतिविधियां रुक सकती हैं या फिर अपराधियों को सजा दिलाई जा सकती है. मोदी ने और दबाव बनाने के लिए आप्रवासी भारतीयों को भी इससे जोड़ना शुरु कर दिया. 31 अगस्त 2008 को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये अमेरिका के एडिसन शहर में वर्ल्ड गुजराती कांफ्रेंस के लिए जुटे हजारों लोगों को मोदी ने आह्वान किया कि अगले महीने जब मनमोहन सिंह बतौर प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र आमसभा की बैठक को संबोधित करने के लिए न्यूयॉर्क पहुंचे, तो उन पर गुजकोक को स्वीकृति दिलाने के लिए दबाव बनाया जाए. यही नहीं, केंद्र पर दबाव बनाने के लिए ही गुजरात विधानसभा में भी तत्कालीन गृह राज्य मंत्री के तौर पर अमित शाह ने 26 सितंबर 2008 को एक प्रस्ताव पारित कराया, जिसमें राष्ट्रपति से गुजकोक को तत्काल स्वीकृति देने की अपील की गई. अमित शाह ने आरोप लगाया कि वोट बैंक की राजनीति के तहत ही यूपीए सरकार ने 2004 में पोटा कानून को वापस लिया था और इसी चक्कर में वो गुजकोक बिल को स्वीकृति नहीं दिला रही है.

 

अहमदाबाद पर हुए आतंकी हमले के ठीक चार महीने बाद देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर भी आतंकी हमला हुआ. पाकिस्तानी हमलावरों ने 26 नवंबर 2008 को समुद्री मार्ग से मुंबई में प्रवेश करते हुए होटल ताजमहल सहित शहर के कई प्रमुख इमारतों पर हमला बोला. इस हमले में 164 लोगों की जान गई और तीन सौ से भी अधिक लोग घायल हुए. इस घटना के बाद आतंकी घटनाओं को रोकने के लिए कड़े कानून की मांग ने जोर पकड़ा और केंद्र की यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी भी दबाव में आई. इसी सिलसिले में तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल को तीस नवंबर 2008 को इस्तीफा देना पड़ा और उनकी जगह नये गृह मंत्री पी चिदंबरम बने. गौरतलब है कि मुंबई हमले के कुछ दिन पहले ही शिवराज पाटिल ने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को ये सिफारिश की थी कि केंद्रीय कानून यूएपीए से मेल न खाने और पोटा के कई प्रावधानों को समेटने वाले गुजकोक बिल को स्वीकृति न दी जाए और इसे गुजरात सरकार को जरूरी संशोधन करने के लिए वापस भेज दिया जाए.

 

लेकिन मुंबई हमलों के बाद दबाव में आई यूपीए सरकार ने राष्ट्रपति भवन से गुजकोक वाली फाइल जनवरी 2009 में वापस मंगा ली, ये कहते हुए कि बदली हुई परिस्थितियों में इस पर नये सिरे से विचार करने की जरूरत है. हालांकि फरवरी में सरकार ने फिर पलटी मारी और राष्ट्रपति को ये कह दिया कि बिल वापस गुजरात सरकार को भेज दिया जाए. लेकिन तब राष्ट्रपति ने मार्च में ये कहते हुए फाइल वापस गृह मंत्रालय को भेज दी कि सरकार ये साफ तौर पर लिखकर दे कि गुजकोक बिल के बारे में उसके विचार क्या हैं.

 

ऐसे में मामला कुछ महीनों तक और लटका रहा और आखिरकार जून 2009 में केंद्रीय कैबिनेट ने राष्ट्रपति को ये सिफारिश कर दी कि गुजकोक बिल में कुछ सुधार करने के लिए इसे वापस गुजरात सरकार को भेज दिया जाए. जो प्रमुख सुधार सुझाए गए, उसमें से एक ये भी था कि पुलिस अधिकारी के सामने दिये गये बयान को कोर्ट में सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता है, इस प्रावधान को हटा दिया जाए.

 

लेकिन गुजरात सरकार ने अपने रुख में कोई बदलाव नहीं किया. अगले ही महीने यानी 28 जुलाई 2009 को राज्य विधानसभा में इस बिल को गृह राज्य मंत्री के तौर पर अमित शाह ने फिर से पेश किया और इसे दोबारा पारित करा दिया गया, कांग्रेस के विरोध के बावजूद. हालांकि इस दफा इस विधेयक में आतंकवादी और आतंक शब्द भी जोड़ दिया गया. दरअसल कांग्रेस इससे पहले ये कह रही थी कि जब इस बिल में आतंकवाद जैसा शब्द तक नहीं है, तो फिर भला इससे आतंकवाद से निबटने में मदद कैसे मिलेगी. इसके सामने बीजेपी और मोदी सरकार का तर्क ये रहा कि इससे पहले जब 2004 में मोदी सरकार ने गुजकोक विधेयक को पास कराया था, तो उस वक्त पोटा जैसा कानून अस्तित्व में था, जो खास तौर पर आतंकी गतिविधियों से निबटने के लिए था. राज्य सरकार के मुताबिक उस वक्त गुजकोक को सिर्फ संगठित अपराध को रोकने के लिए बनाया गया था, लेकिन जब पोटा जैसे कानून को यूपीए सरकार सत्ता में आने के बाद खत्म कर चुकी है, तो गुजकोक में आतंकी और आतंकवादी गतिविधियों की व्याख्या करने की आवश्यकता आ पड़ी है, ताकि आतंकवादी गतिविधियों को रोकने वाला एक सख्त कानून सामने हो. इस बार भी मोदी सरकार ने ये कहकर यूपीए सरकार पर हमला किया कि जब मकोका जैसा कानून महाराष्ट्र और दिल्ली में लागू रह सकता है, तो फिर भला पांच साल से केंद्र सरकार गुजकोक को क्यों रोककर बैठी है, जो मकोका जैसा ही है.

 

गुजकोक को तीसरी दफा केंद्र सरकार के पास गुजरात सरकार ने जुलाई 2009 में भेजा, लेकिन हालात जस के तस रहे. केंद्र सरकार का कहना रहा कि गुजकोक में वो प्रावधान अब भी बरकरार हैं, जिसे हटाने के लिए कहा गया था. उधर मोदी सरकार की तरफ से दबाव दिया जाता रहा. पांच साल तक हालात वैसे ही बने रहे. आखिरकार 2014 लोकसभा चुनावों के बाद दिल्ली में सत्ता परिवर्तन हुआ और मोदी देश के प्रधानमंत्री बने. केंद्र में खुद मोदी सरकार की अगुआई कर रहे थे, तो गुजरात में उनकी सियासी उत्तराधिकारी आनंदीबेन पटेल सरकार चला रही थीं. ऐसे में गुजकोक को लेकर गतिविधि फिर से तेज हुई. पुराना बिल तो राष्ट्रपति के पास लंबित पड़ा रहा, लेकिन गुजरात सरकार ने 31 मार्च 2015 को नये सिरे से इस बिल को राज्य विधानसभा में पास कराया. इस बार गुजकोक बिल का नाम बदलकर गुजकोटोक हो गया. गुजकोटोक मतलब गुजरात कंट्रोल ऑफ टेररिज़्म एंड ऑर्गेनाइज्ड क्राइम. इस बिल में इंटरसेप्शन से हासिल हुए सबूत को इस्तेमाल करने का प्रावधान तो रखा ही गया, साथ में ये प्रावधान कर दिया गया कि एसपी या उससे उपर के अधिकारी के सामने दिया गया आरोपी का बयान अदालत में सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता है.

 

चार महीने के अंदर इस बिल पर केंद्र सरकार के अंदर चर्चा हो गई और 28 जुलाई 2015 को केंद्र सरकार के सूचना और प्रसारण विभाग ने राज्य सरकार से ये स्पष्टीकरण मांगा कि क्या इंटरसेप्शन संबंधी प्रावधान केंद्र के आईटी एक्ट या पोस्ट एंड टेलीग्राफ एक्ट को बाइपास तो नहीं करता. राज्य सरकार ने अगले ही दिन अपने जवाब में ये कहा कि इंटरसेप्शन संबंधी प्रावधान, जो गुजकोटोक की धारा 14 का हिस्सा है, वो केंद्रीय कानूनों के समन्वय के साथ ही चलने वाला है.

 

इसके बाद अगले दो महीने में ही विधि व न्याय मंत्रालय और अंत में गृह मंत्रालय ने भी अपनी स्वीकृति गुजकोटोक को दे दी. इसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने की औपचारिकता भर शेष है. जाहिर है, इस गुजकोटोक के कानूनी जामा पहन लेने के बाद इसके तहत पकड़े गये आरोपियों के मामले में सीआरपीसी के 90 दिनों के प्रावधान से दोगुना, यानी 180 दिनों में चार्जशीट करने की आजादी पुलिस के पास होगी. इसके अलावा पुलिस आरोपी के खिलाफ वायर, इलेक्ट्रॉनिक इंटरसेप्शन या फिर मौखिक बातचीत को भी सबूत के तौर पर पेश कर सकती है. एसपी या उससे उपर के अधिकारी के सामने दिये गये आरोपी के बयान को भी सबूत के तौर पर अदालत में पेश किया जा सकता है. गुजकोटोक में मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष अदालतों का भी प्रावधान रखा गया है.

 

जाहिर है, गुजकोटोक के इन प्रावधानों को जहां गुजरात सरकार आतंकी गतिविधियों से निबटने के लिए कारगर हथियार के तौर पर देखते आई है, वही विपक्षी दल और मानवाधिकार संगठन इसे दहशत फैलाने वाला प्रावधान, जिसका बेजा इस्तेमाल होने की आशंका उनके मन में है. यही तर्क इस बिल को लेकर पिछले चौदह वर्षों से दिये जा रहे हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि चौथी बार पास ये विधेयक अब आखिरकार कानून बनने के अंतिम पड़ाव पर आ चुका है, वो भी उस प्रधानमंत्री के कार्यकाल में, जिसने खुद तीन बार बतौर मुख्यमंत्री इस बिल को केंद्र के पास मंजूरी के लिए भेजा.

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Web Title: Modi Government clears Gujarat anti-terror bill
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