मोदी जी! नीतीश जी! मैं वोट देने क्यों जाऊं?

By: | Last Updated: Friday, 2 October 2015 11:52 AM
Modi ji! Nitish ji! why should i vote

फोटोग्राफर- सुधांशु केसरवानी

नई दिल्ली: ये बिहार के खगड़िया जिले के लल्लन हैं, जो दिल्ली में रिक्शा चलाते हैं. इनके परिवार में पत्नी सहित 6 बच्चे हैं, जिसमें 4 बेटियां जिनमें अभी दो की शादी करनी बाक़ी है.

 

इनसे साथ सफ़र करते हुए जब मैंने पूछा कि आप बिहार विधानसभा चुनाव में वोट देने जा रहे हैं तो पलट कर रूठे हुए अंदाज में पूछ  दिये कि मैं वोट देने क्यों जाऊं? 

 

मैं 15 साल से यहां रिक्शा चला रहा हूं. आजतक कोई भी नेता, वह चाहे किसी भी पार्टी का हो हमारी सुध लेने नहीं आया.

 

लल्लन अपने ही अंदाज़ में कहते हैं  ‘सगरी नेतवा हमनी से वोट मांगे आवे लें चुनाव के बाद पांच साल तक कउनो फेर देखाई ना देलें. ओह लोग के ऐसे कउनो मतलब नइखे कि हमनी मरत तानी की जियतानी’

 

ये दर्द सिर्फ़ लल्लन का ही नहीं उनके जैसे लाखों हैं इस उम्मीद में काम किए जा रहे हैं कि कब उनकी ज़िंदगी लल्लन से लल्लनटॉप हो जाएगी.

 

मैं आज बात सिर्फ़ निचले तबक़े वालों की बात करूंगा जो पलायन कर के बिहार से रोज़ी-रोटी के की तलाश में दिल्ली, नोएडा, पंजाब और देश के अन्य राज्यों रिक्शा चलाने से लेकर, मज़दूरी और वो तमाम मेंहनत का काम करते हैं जिससे उनके परिवार का जैसे-तैसे गुज़ारा मात्र हो पाता है.

 

कहते हैं हर एक वोट ज़रूरी होता है और इनकी संख्या इतनी ज़्यादा है कि इनके वोट देने से ना सिर्फ वोट प्रतिशत बढ़ेगा बल्कि कई विधानसभा क्षेत्रों के नतीजे भी बदल सकते हैं.

मुश्क़िल से महीने 5-6 हजार रूपए कमाने वाले लगभग हर दूसरे मज़दूर का कहना है कि आख़िर मैं अपने कम से कम हजार रूपए खर्च कर के वोट देने क्यों जाऊं?

 

मज़दूरी का काम करने वाले रमई कहते हैं हम कोई शौक़ से यहां नहीं काम कर रहे हैं, लालू के राज मे हम यहां काम करने चले आए. हम तो हालात के मारे हैं. बच्चों की पढ़ाई पूरी हो जाए तो हम भी गंगा नहा लेंगे. हमको हमारे शहर, गांव में रोज़गार मिला होता तो हम यहां क्यों आते.

 

बच्चे देश का भविष्य होते हैं. क्या इस तस्वीर को देख कर लगता है कि देश का भविष्य सही दिशा में जा रहा है. ये आरा जिले की फातिमा हैं जो अपने पति के साथ साथ ही मज़दूरी काम करती हैं.

 

फातिमा बताती हैं कि वह पहले दूसरों के खेत में काम करती थीं लेकिन जब उससे उनका जीवन यापन नहीं हो पाया तो पति के साथ दिल्ली मजदूरी करने चली आईं. फातिमा का एक ही सपना है वह अपने बच्चों को पढ़ा लिखा सकें ताकि उन्हें मज़दूरी ना करनी पड़े.

 

वोट देने के सवाल पर बच्चों की तरफ देखते हुए कहती हैं, हम वोट देने जाएंगे तो हमारे बच्चों का क्या होगा, एक दिन काम ना मिले तो दो वक़्त का खाना नसीब नहीं होता. ऐसें हम अगर वोट देने गए तो इनका क्या होगा. कौन खिलाएगा इनको खाना?

 

बिहार चुनाव में सभी पार्टियों की दुकानें सज चुकी हैं, सभी पार्टियां सपने बेंचने में लगी हैं. जो सत्ता में हैं वो भी और जो विपक्ष में हैं वो भी. लेकिन क्या कोई पार्टी है जो इनके सपनों को पूरा कर सके.

 

दुकानें सज चुकी हैं तो वादों का पुलिंदा भी तैयार होगा. देखना होगा कि कौन सी  पार्टी है जो इनके लिए वादे करेगी, इन पलायन कर के आए लोगों के लिए घोषणा करे. रोज़गार देने के वादे तो हर सरकार करती है और आंकड़े भी पेश करती हैं लेकिन ज़मीनी स्तर पर हक़ीकत कुछ और ही नज़र आती है.

बिहार में पलायन की समस्या बंगाल के विभाजन के बाद से ही चली आ रही है. आज़ादी के बाद कई सरकारें बनी और विकास को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित किया और नीतीश कुमार भी अपने राज्य में विकास की बयार बहने की बात लगातार तमाम मंचो पर करते आए हैं. लेकिन इन बिहारी मजदूरों को देख कर विकास के सारे वादे खोखले लगते हैं. सवाल राज्य के सिपेहसलार नीतीश कुमार से है कि क्या इसे कहते हैं विकास ?

 

बीजेपी अपने सबसे धारदार नेता के दम पर बिहार चुनाव के मैदान में है. आज की रैली में भी नरेंद्र मोदी ने विरोधियों पर जम कर निशाना साधा और लोगों से जम कर वोट देने की अपील की लेकिन क्या आप बताएंगे कि ये लोग वोट देने के क्यों जाएं? केंद्र में सरकार बने 16 महीने से ज्यादा हो गए तब से आज तक इनकी हालत में कोई सुधरा नहीं हुआ. ये लोग आज भी अच्छे दिन का इंतजार कर रहे हैं.

 

पेट के भूगोल में सिमटी ज़िंदगी रोज़ जंग लड़ रही है. सियासी समझदारी दिखाने के लिए वक़्त कहां है.. इन्हें वायदों की घुट्टी पीते-पीते सालों हो गए हैं. अब सियासी बयान और भाषण इन्हें महज मदारी के खेल और जादूगर का झांसा लगता है.. नाउम्मीदी की सफ़र की शुरूआत तो उसी दिन से हो गई थी जिस दिन इन्होंने बिहार छोड़ा….

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