आज मोदी सरकार पहला और पूरा आम बजट, जेटली के पिटारे से आम आदमी को है 'अच्छे दिन' की उम्मीद

By: | Last Updated: Saturday, 28 February 2015 12:59 AM

नई दिल्ली: अच्छे दिन आने का वादा कर सत्ता में आई राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के आम बजट 2015-16 से लोग ‘अच्छे दिन’ की उम्मीद कर रहे हैं. वित्त मंत्री अरुण जेटली आज आम बजट पेश करेंगे.

 

फेडरेशन ऑफ चेम्बर ऑफ कार्मस एंड इंडस्ट्रीज के संयुक्त अध्यक्ष आर.एस. गोस्वामी कहते हैं कि उन्हें उम्मीद है कि जेटली द्वारा पेश किए जाने वाले बजट में कर प्रक्रिया के सरलीकरण का प्रावधान जरूर होगा. कारोबारी कर अदा करता है और देना चाहता है, लेकिन कर की जटिलताएं उसे परेशान कर देती हैं.

 

गोस्वामी कहते हैं कि मल्टीपल टैक्स प्रक्रिया ने कारोबारियों की मुसीबतें बढ़ा दी हैं. वह अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार को याद करते हुए कहते हैं कि तब एक आवेदन मात्र भरने से कर देने की प्रक्रिया पूरी हो जाती थी, लेकिन अब स्थितियां अलग हैं. कई-कई आवेदन भरने पड़ते हैं. उन कारोबारियों के लिए तो ज्यादा ही समस्या है जो एक से ज्यादा कारोबार करते हैं. उद्योग जगत को उम्मीद है कि सरकार कर का सरलीकरण करेगी.

 

एसबीआई ऑफीसर्स एसोसिएशन, भोपाल के क्षेत्र-3 के सचिव वीरेंद्र श्रीवास्तव कहते हैं कि कर्मचारी चाहता है कि कर की छूट में वृद्धि हो. इतना ही नहीं, हर किसी के लिए मकान बनाना एक सपना होता है, उसके लिए वह बैंक से कर्ज लेता है, उम्मीद है कि यह सरकार आवास ऋण की ब्याज दर में कमी लाएगी.

 

दौलतराम इंडस्ट्रीज के प्रमुख उद्योगपति सी.पी. शर्मा का कहना है कि सत्ता में आई मोदी सरकार ने जो भी दृष्टिकोण पेश किए हैं, घोषणाएं की हैं, उनको अमल में लाने का वक्त आ गया है. लिहाजा, मंदी का दौर खत्म करने के प्रयास होने चाहिए, साथ ही ब्याज दर में कमी आवश्यक है.

 

गृहिणी गीता देवी कहती हैं कि उन्होंने बीजेपी को वोट इसलिए दिया था, क्योंकि उन्हें उम्मीद है कि यह सरकार महंगाई पर काबू पाएगी और उनकी रसोई आसानी से चल पाएगी. वह कहती हैं कि पेट्रोल-डीजल के साथ रसोई गैस के दाम कम हुए हैं, लेकिन उस अनुपात में नहीं, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कम हुए हैं.

 

उन्हें उम्मीद है कि सरकार के बजट में रसोई के सामान के दाम में कमी आएगी. साथ ही उनके सौंदर्य प्रसाधन सहित अन्य सामानों पर लगने वाले करों में कमी आने की उम्मीद है.

 

अर्थव्यवस्था में सुधारों को जारी रख पाएंगे जेटली?

आर्थिक सर्वेक्षण 2014-15 में बड़े सुधारवादी कदमों की वजह से शनिवार को पेश किए जाने वाले आम बजट से उम्मीदें बढ़ गई हैं. इस बजट को दहाई अंकों की विकास दर हासिल कराने वाली नीतियां देने में मोदी सरकार की गंभीरता की परीक्षा के रूप में भी देखा जा रहा है.

 

नई सरकार अपना पहला पूर्णकालिक बजट पेश करने जा रही है. ऐसा प्रतीत होता है कि देश अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां सुधारों की व्यापक गुंजाइश है.

 

यह वित्त मंत्री अरुण जेटली का दूसरा आम बजट होगा. उन्होंने लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की भारी जीत के बाद साल के मध्य में अपना पहला बजट पेश किया था.

 

जेटली ने 10 जुलाई, 2014 को अपने बजट भाषण में कहा था, “इस बजट में मैं जिन कदमों का ऐलान करूंगा. वह वृहद् आर्थिक स्थिरता के साथ देश की विकास दर को सात से आठ प्रतिशत तक पहुंचाने और अगले तीन से चार सालों में इससे ऊपर ले जाने की यात्रा की सिर्फ शुरुआत भर होगी.”

 

उन्होंने हालांकि यह भी कहा था कि सरकार गठन के सिर्फ 45 दिनों के भीतर पेश किए गए पहले बजट में बहुत कुछ करने की उम्मीद करना भी उचित नहीं होगा.

 

पहले की भांति, वित्त मंत्री ने वित्तीय अनुशासन और प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष करों पर सब्सिडी छूट और रियायत जैसे विषयों पर कॉर्पोरेट क्षेत्र से लेकर व्यक्तिगत करदाताओं तक विभिन्न पक्षों से सुझाव मांगे हैं.

 

इस बजट में पूरा ध्यान इस बात पर होगा कि क्या सरकार वित्तीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.1 प्रतिशत के बजटीय लक्ष्य को बनाए रखने में सफल होती है.

 

14वें वित्त आयोग द्वारा केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ा कर 10 प्रतिशत करने के फैसले से भी सरकार पर अतिरिक्त भार पड़ा है. इस फैसले के बाद सरकार राज्यों को 348,000 करोड़ रुपये और 2015-16 में 526,000 करोड़ रुपये का भुगतान करेगी.

 

देश की अर्थव्यवस्थआ पर सरकार का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड यानी आर्थिक समीक्षा, आम बजट से एक दिन पहले संसद में पेश की गई. इस रपट में 2015-16 के दौरान देश की विकास दर आठ प्रतिशत से अधिक रहने का अनुमान लगाया गया है और सही नीतियों और सुधारों के साथ देश की आर्थिक विकास दर दहाई अंक के स्तर तक भी पहुंच सकती है.

 

शनिवार को पेश आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि देश आर्थिक विकास दर के लिए वित्तीय अनुशासन के साथ ही सरकारी निवेश में अल्पकालिक वृद्धि को संतुलित कर सकता है.

 

सर्वेक्षण के मुताबिक, मध्यावधि में वित्तीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के तीन प्रतिशत के लक्ष्य को अवश्य पूरा करना होगा.

 

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