मुंबई हमले का मास्टर माइंड देखता था पोर्न!

By: | Last Updated: Monday, 22 December 2014 3:42 PM
mumbai attack

नई दिल्ली: मुंबई हमले ‘‘खुफियागीरी के इतिहास में सबसे गंभीर चूकों में से एक’’ के परिणाम के चलते हुए जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन और भारतीय गुप्तचर एजेंसियां भारत की वित्तीय राजधानी पर हमले को टालने के लिए अपने हाईटेक निगरानी तंत्र द्वारा जुटाई गयी जानकारी को एक साथ रखने में नाकाम रहीं .

 

भारत, अमेरिकी, ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों को थी 26/11 हमलों की जानकारी: न्यू यॉर्क टाइम्स  (यहां पढ़ें मुंबई हमला क्यों नहीं रोक पाए?)

 

तीन देशों की खुफिया एजेंसियां अपने हाईटेक निगरानी और अन्य उपकरणों द्वारा जुटाई गइ सभी जानकारी को एकसाथ रखने में नाकाम रहीं, जिनसे आतंकी हमले को रोका जा सकता था, जो इतना भयावह था कि इसे अक्सर भारत का 9..11 कहा जाता है .’’

 

जरार शाह की भूमिका को लेकर पहली बार इतना बड़ा खुलासा भले ही अब हुआ हो लेकिन मुंबई हमले की साजिश को अंजाम देने से लेकर पोर्न वेबसाइटों का एडिक्ट होने तक की हर करतूत ब्रिटेन और भारत की खुफिया एजेंसियों को थी. जरार शाह तकनीक का माहिर था और उसने तकनीक को लश्कर के लिए हथियार में बदल दिया था.

 

2008 के मुंबई हमले से पहले भारतीय और पश्चिमी एजेंसियों को मुंबई पर हमले की साजिश की भनक लगनी शुरू हो गई थी. जाड़े का मौसम शुरू होते होते ताज होटल को निशाना बनाए जाने की खबर भी अमेरिकी एजेंसियों ने जून से नवंबर के महीने के बीच भारत को देनी शुरू कर दी थी लेकिन ये खबर जरार शाह की जासूसी से नहीं मिली थी.

अमेरिकी एजेंसियों ने ब्रिटेन के जासूसों को भी हमले के बारे में आगाह कर दिया था और ब्रिटेन ने लश्कर के आतंकियों की डिजिटल दुनिया में सेंध लगाने में कामयाबी हासिल कर ली. यहीं से जरार शाह आ गया खुफिया एजेंसियों के निशाने पर.

 

दरअसल लश्कर के लिए इंटरनेट को हथियार में बदलने वाले जरार शाह की कहानी यहीं से शुरू होती है.

 

जरार शाह ने न्यूजर्सी की कंपनी से इंटरनेट पर संपर्क किया. उसने खुद एक भारतीय कारोबारी के तौर पर पेश किया . जरार शाह ने कंपनी को अपना नाम खड़क सिंह बताया. जरार शाह ने ये भी कहा कि वो मुंबई का रहने वाला है. इसके बाद उसने एक VOIP फोन खरीदने की पेशकश की. जरार को VOIP फोन चाहिए था क्योंकि ये इंटरनेट के जरिए काम करता है.

 

जरार ने जो वीओआईपी जिसे आप आसान शब्दों में इंटरनेट फोन भी कह सकते हैं इसलिए लिया था कि उसे पाकिस्तान के कंट्रोल रूम और मुंबई में हमला करने वाले आतंकियों के बीच बातचीत करवानी थी. इस फोन का फायदा ये था कि पाकिस्तान और मुंबई के बीच होने वाली बातचीत खुफिया एजेंसियों को ऑस्ट्रिया और न्यूजर्सी के बीच होती दिखाई देती थीं.

 

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक जरार शाह ने टूटी फूटी अंग्रेजी में लिखा कि मैं पहली बार VOIP फोन नहीं खरीद रहा हूं. मैं ये सर्विस दो साल से इस्तेमाल कर रहा हूं.

जरार शाह ने साल 2008 के सितंबर महीने से ही इंटरनेट फोन, इंटरनेट सिक्योरिटी और अपनी बातचीत को छिपाने के तरीके ढूंढ़ने शुरू कर दिए थे.

 

जरार शाह ने अपने लैपटॉप पर कमजोर इंटरनेट सिक्योरिटी वाले इलाके, ब्राउजिंग हिस्ट्री को छिपाने वाली वेबसाइट्स और भारत-अमेरिका के साझा नौसैकिन अभ्यास के बारे में सर्च किया था. यही नहीं मुंबई के आस पास का मौसम, छोटे युद्द और भारत पर हुए पुराने आतंकी हमलों के बारे में भी जानकारी हासिल की थी.

 

मुंबई हमले में एक मात्र जीवित बचे आतंकी कसाब ने भी बताया था कि जरार शाह ने ही गूगल अर्थ पर उसे और उसके साथियों को मुंबई में हमले के ठिकानों का पता बताया था. जरार को खुद पर जरूरत से ज्यादा भरोसा था. शायद यही वजह थी कि उसने मुंबई के तयशुदा ठिकाने के अलावा

 

पंजाब. कश्मीर, दिल्ली, अफगानिस्तान. जैसी जगहों पर भी इंटरनेट पर सर्च किया था.

 

जरूरत से ज्यादा भरोसा ही उसे तीन तीन देशों की खुफिया एजेंसियों की निगाह में ले आया था. दरअसल आतंकी हमले को अंजाम देने के लिए जरूरी जानकारी जुटाने के बीच वह पोर्न देखने का वक्त भी निकाल लेता था. दूसरी वजह थी कि न्यूजर्सी की कंपनी ने जब उससे कॉल डीटेल मांगे उसने कंपनी को टाल दिया.

 

मुंबई पर भयावह हमले से ठीक पहले जरार शाह 24 नवंबर को पाकिस्तान के कराची पहुंच चुका था जहां उसने लश्कर के लिए कंट्रोल रूम तैयार किया. उसी कंट्रोल रूम से जरार शाह और लश्कर के दूसरे आकाओं ने मुंबई में हमला करने वाले 10 आतंकियों की टीम को हर पल निर्देश दिए थे.

 

25 नवंबर को उसके VOIP फोन को कराची के कंट्रोलरूम में चेक किया गया था लेकिन जरार इससे भी ज्यादा तेजी से काम कर रहा था. हमले की जिम्मेदारी का ईमेल भी जरार ने ही लिखा और ई मेल किया था. यही नहीं इंटरनेट पर हमले की खबरें, ताज, ओबरॉय और चाबाड हाउस की तस्वीरें भी देखी और हमले जुड़ी हर खबर खुद पढ़ी और अपने आकाओं को भी सुनाई.

 

ये वो जानकारियां थीं जिन्हें तीन तीन देशों की खुफिया एंजेंसियां लगातार जुटा रही थीं लेकिन ये जानकारियां कभी एक दूसरे से जोड़कर नहीं देखी गईं. अगर इन टुकड़ों को जोड़ लिया गया होता तो हमले की तस्वीर 166 जाने निगलने से पहले ही साफ हो जाती और शायद इतनी जानें बच जातीं.

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