दर्दनाक सच: हमें इंसाफ नहीं चाहिए?

By: | Last Updated: Saturday, 12 March 2016 4:34 PM
muzaffarnagar: Truth of riots?

नई दिल्ली: मुज़फ्फरनगर में दंगे हुए लेकिन दंगे किसी ने नहीं करवाए थे. ये हम नहीं बल्कि दंगों की जांच रिपोर्ट कह रही है. दंगे क्यों हुए ? विष्णु सहाय आयोग की जांच रिपोर्ट के बाद भी सवाल जस का तस है. दंगों में रेप, हत्या और लूटपाट करने वाले दनादन छूटते जा रहे है. न तो उनके खिलाफ कोई गवाही देता है, और ना ही सबूत मिल पा रहे है. दंगा पीड़ितों ने भी अब इस लाचारी को अपनी तकदीर मान लिया है.

पहले बच्चे की हत्या, फिर बेघर होना और उसके बाद कई महीनों तक कोर्ट कचहरी के चक्कर. सरोजो ने अब इस कानूनी लड़ाई से तौबा कर ली है. आस मोहम्मद उनका सबसे छोटा बेटा था और सबसे लाडला भी.

दंगे के बाद ये परिवार मुज़फ्फरनगर से आ कर शामली ज़िले में बस गया है. लेकिन घर की बेटी रूखसाना के लिए तो जैसे ज़िंदगी ठहर सी गयी है. आखिर आस मोहम्मद के सबसे करीब वही थी. भाई के लिए ही उसने सिलाई का काम सीखा था. नए कपडे पहनने का आस को बड़ा शौक था. लेकिन आज वही रूखसाना कहती है भाई की ह्त्या कैसे हुई, उसे पता नहीं.

क्या किसी ने इस परिवार को धमकाया है. क्या इन्हें जान का खतरा महसूस होता है या फिर कोई और डर है. कोई दंगों के बारे में बात करना नहीं चाहता. बहुत कुरेदने भी सब खामोश रहे. आस की ह्त्या के मामले में सभी दस आरोपी बरी हो गए.

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दंगे के दौरान जितनी भी हत्या, रेप, मारपीट और आगजनी की घटनाएं हुईं उनकी जांच के लिए अखिलेश सरकार ने एक एसआईटी बना दी थी.

दंगे के दौरान कुल 567 मुक़दमे दर्ज किये गए थे लेकिन आधे से ज्यादा झूठे निकले. कुछ मामले ऐसे थे जिनमे एक ही घटना की कई FIR लिखी गई थी. जांच के दौरान एसआईटी ने सिर्फ 183 मुक़दमों को सही पाया इनमे से 178 मामले अभी अब कोर्ट में हैं .

एसआईटी को बागपत, मुज़फ्फरनगर, मेरठ, शामली और सहारनपुर में दंगों से जुड़े मामलों की जांच दी गयी थी. अब तक पांच मुकदमों में अदालत फैसला सूना चुकी है. इन सभी मामलों में आरोपी छूट गए.

बागपत के नाज़िम तो अब अपने बेटे शोएब की ह्त्या के बारे में बात तक नहीं करना चाहते. न जाने कौन सा डर समाया है उनके मन में. कोई है जो नाज़िम को हर बार सच कहने से रोक देता है. नाजिम ने हमें अपने दिल का दर्द तो सुनाया लेकिन कैमरे पर बोलने से मुकर गए.

शोएब की हत्या के मामले में सभी दस गवाह मुकर गए. यहां तक की जिस कमरुद्दीन ने हत्या का मुकदमा लिखवाया था, वो भी कोर्ट में पलट गए.

नाज़िम को मुआवजे में सरकारी नौकरी मिल गई है. वो अपना गांव छोड़ कर परिवार समेत बागपत शहर में ही बस गए है. बेटे की ह्त्या को बीता हुआ कल समझकर अब ज़िंदगी को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.

मुज़फ्फरनगर और उसके आस पास दंगों में इतनी हत्याएं हुई, सैंकड़ों घर जलाये गए , हज़ारों घर ऊजड़ गए. लेकिन ऐसा करने वालों को अब सजा नहीं हो पा रही है. आखिर क्यों गवाह और सबूत नहीं मिल पा रहे हैं?

दंगों के दौरान गैंग रेप के सात मुक़दमे हुए थे . जांच में एक केस झूठा निकला. सभी मामले मुज़फ्फरनगर ज़िले के फुगाना इलाके के हैं . इसी साल 21 जनवरी को रेप के एक केस में मुज़फ्फरनगर कोर्ट ने फैसला सुनाया . और सभी बारह आरोपी बरी हो गए . और तो और पीड़ित महिला का पति भी कोर्ट में अपने बयान से मुकर गया.

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि ना तो सबूत मिल रहे है, और ना ही गवाह. कही कोई साजिश तो नहीं . मुक़दमा लिखाने वाले लोग भी अब बयान बदलने लगे है . ये सब उन्ही मामलों में हुआ, जिसमे आरोपी हिन्दू और पीड़ित मुस्लिम है . आखिर ये कैसा इन्साफ है. मुजफ्फरनगर के ये दंगा पीड़ित अब सब भूल जाना चाहते हैं. इनके सीने में दंगे का दर्द दबा हुआ है लेकिन अब इन्हें इंसाफ नहीं चाहिए. मुज़फ्फरनगर में दंगे क्यों हुए ? विष्णु सहाय आयोग की जांच रिपोर्ट के बाद भी सवाल जस का तस है. साल भर बाद यूपी में विधान सभा चुनाव है. और फिर दंगे के दाग के बहाने माहौल गरमाने की तैयारी है. मुज़फ्फर का मतलब विजयी होता है लेकिन यहां तो बस हार ही हार है.

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Web Title: muzaffarnagar: Truth of riots?
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