म्यामांर ऑपरेशन को नहीं दिया जाएगा कोई नाम!

By: | Last Updated: Wednesday, 10 June 2015 2:00 PM
Myanmar Operation

नई दिल्ली: म्यामांर में सेना के द्मवारा किए गए इस ऑपरेशन का कोई नाम नहीं दिया गया क्योंकि ये ऑपरेशन कभी भी सेना की फाइलों में दर्ज नहीं किया जायेगा. इसकी वजह ये है कि सेना और भारत सरकार आधिकारिक तौर पर ये मानती है कि ये ऑपरेशन भारत-म्यांमार सीमा पर हुआ है जबकि हकीकत ये है कि सेना ने म्यांमार की सीमा में अंदर जाकर ऑपरेशन किया है.

 

आपको बता दें कि सेना ने हमला करने के बाद कैंप को आग लगा दी. ये कैंप 500-700 वर्ग मीटर में फैले थे. ये कैंप सीमा से करीब 8-10 किलोमीटर की दूरी पर थे और दोनों कैंपों की दूरी भी करीब 10 किलोमीटर थी.

 

केवल इतना ही नहीं भारतीय सेना ने म्यांमार की सीमा में घुसकर उग्रवादियों के जिन कैंप पर हमला किया था उनके बारे में सेना को पहले से जानकारी थी. लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है कि सेना की स्पेशल-फोर्स ने इस तरह दूसरे देश की धरती में जाकर उग्रवादियों को मार गिराया. इस तरह के ऑपरेशन के लिए ही स्पेशल-फोर्सज यानि पैरा कमांडोज को तैयार किया गया है.

 

सेना के सूत्रों ने एबीपी न्यूज को जानकारी दी है कि स्पेशल फोर्सज की दो छोटी यूनिट ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया. एक यूनिट में 10-15 कमांडो थे. ये सभी कमांडो इंफाल स्थित सेना की हवाईपट्टी से उड़े थे.

 

रात के अंधेरे में करीब 3 बजे सेना के एएलएच हेलीकॉप्टर ने कमांडोज को भारत-म्यांमार सीमा पर उतार दिया. इसके बाद कमांडो पैदल म्यांमार की सीमा में दाखिल हुए. म्यांमार के ओंजिया  (Onzia) इलाके में दो कैंप थे. इन कैंप पर दो अलग-अलग टीम पहुंची. कैंप को को दूर से ही देखने के बाद कमांडो रेंगते हुए वहां तक पहुंचे.

 

मणिपुर और नागालैंड की सीमा जो म्यांमार से लगती है वहां पहाड़ियां और घने जंगल हैं. अंतर्राष्ट्रीय सीमा होने के बावजूद इस बॉर्डर पर कोई फैंसिग नहीं है (जैसा कि पाकिस्तान और बांग्लादेश सीमा पर है) भारतीत सीमा पर असम राईफल्स तैनात है जबकि म्यांमार की तरफ (म्यांमार) सेना तैनात होती है. लेकिन सीमा पर उनकी तैनाती बहुत कम है.

 

सुबह होने से पहले यानि करीब 4 बजे (हलके उजाले में) कमांडोज ने एक साथ दोनों कैंप पर एक साथ हमला बोल दिया. इस हमले में 15-20 उग्रवादी ढेर हो गए जबकि 10-15 बुरी तरह घायल हो गए.

 

पैरा कमांडो स्पेशल एसाल्ट राइफल, नाइट विजन डिवाइस और हैंड ग्रैनेड से लैस थे. कमांडो ने कैंप के करीब पहले तो हैंड गैनेड फेंके ताकि कैंप के अंदर सो रहे उग्रवादी बार निकल आएं. जैसे ही उग्रवादी हथियार लेकर बाहर निकले सेना के कमांडो ने फायरिंग कर दी. उग्रवादियो ने भी फायरिंग की लेकिन सेना का कोई कमांडो हताहत नहीं हुआ. मेन ऑपरेशन 45 मिनट में खत्म हो गया और कमांडो जिस  तरह म्यांमार में दाखिल हुए थे उसी तरह वापस लौट गए.

 

कहा तो ये भी जा रहा है कि म्यांमांर सेना की एक बॉर्डर चौकी भी वहां से करीब ही थी. लेकिन इससे पहले की कोई संभल पाता, भारतीय सेना अपनी काम करके वहां से निकल चुकी थी.बाद में सेना के डीजीएमओ और विदेश मंत्रालय ने म्यांमार की सरकार को इस ऑपरेशन की जानकारी दे दी.

 

इन कैंप की रेकी पहले से ही सेना ने अपने यूएवी के द्वारा कर ली थी. साथ ही ह्यूमनईंट (Human Intelligene) का भी सहारा लिया गया. यूएवी की तस्वीरें और इंटेलीजेंस की मदद से कमांडो ने हमला किया.

 

सूत्रों के मुताबिक, सेना को इन कैंप की जानकारी बहुत पहले से थी. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और एनएसए अजीत डोभाल से हरी झंडी मिलने के बाद सेना ने इस ऑपरेशन की तैयारी कर ली. और कल इन दोनों कैंपस पर हमला कर दिया.

 

स्पेशल फोर्स नार्थ-ईस्ट में कई जगह तैनात रहती है लेकिन इनके बेस (ठिकाने) गुप्त रखे जाते हैं. ये बहुत ही swift action लेती है.

 

म्यांमार की तरफ भी घने जंगल हैं. इन्ही घने जंगलों में उग्रवादियों के कैंप चलते हैं. नागालैंड से सटी सीमा पर  नागा उग्रवादियों  के कैंप हैं जबकि मणिपुर सीमा पर यूएनएलएफ के कैंप हैं. लेकिन  जबसे नागा, उल्फा, यूएनएलएफ और मैती नें हाथ मिलाकर एक Umbrella Group, यूएनएलएफडब्लूएसईए (United National Liberation Front of West of South-East Asia) का गठन किया है ये सभी एक दूसरे के कैंपों में आते जाते रहते हैं. इन्ही के कैंप ओंजिया में चल रहे थे.

 

इस UNLFWSEA ग्रुप को उल्फा चीफ परेश बरूआ और एसएसएन (के) का मुखिया खापलांग चला रहे हैं. वर्ष 2004-2005 में भारत म्यांमार सीमा पर उग्रवादियों के खिलाफ ऐसा ही ऑपरेशन किया गया था. लेकिन उस वक्त दोनों देशों की सेनाओं ने अपनी अपनी सीमाओं पर ही उग्रवादियों के कैंप पर हमला किया था.

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Web Title: Myanmar Operation
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