बुक रिव्यू: जब सालों तक अपनी बेटी को अपना नहीं सके नसीरूद्दीन शाह

By: | Last Updated: Saturday, 20 September 2014 2:14 PM
Naseeruddin Shah released his autobiography And then one day

हिंदी सिनेमा के कलाकारों में आत्मकथा लिखने का चलन बहुत कम है. जो कुछ प्रयास हुए भी हैं वो भी देव आनंद की आत्मकथा की तरह अपनी तारीफ़ और आधे सच से भरे पड़े हैं. आत्ममुग्धता में मग्न फिल्मस्टार्स ज़्यादातर अपनी कमज़ोरियों या हार के बारे में ईमानदारी से लिखने का साहस नहीं जुटा पाते. लेकिन नसीरुद्दीन शाह ने इन सब धारणाओं को ग़लत साबित किया है.

 

हाल ही में नसीर की आत्मकथा ‘एंड देन वन डे’ (और फिर एक दिन) रिलीज़ हुई है और पिछले कुछ इसे पढ़ने के बाद पहला ख़याल यही आया कि अपनी ज़िंदगी की गलतियों और रिश्तों को ना समझ पाने की अपनी नाकामी के बारे में नसीर ने कितने खुले दिल और ईमानदारी से लिखा है कि कई पन्ने आपकी आंखें नम कर जाते हैं.

 

किस तरह मेरठ के छोटे से क़स्बे सरधाना से निकल कर वो नैनीताल और अजमेर के कैथलिक स्कूल पहुंचते हैं. फिर कैसे रंगमंच और अभिनय का जुनून उन्हें मुंबई तक ले जाता है. बीच में कुछ पगडंडियां उन्हें अलीगढ़ यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और फ़िल्म और टेलीविज़न संस्थान पुणे भी ले जाती हैं जहां नसीर ने अपने अभिनय की बारीकियां सीखीं.

 

लेकिन किताब का सबसे जज़्बाती हिस्सा वो है जहां नसीर अपने पिता के साथ अपने रिश्ते की बात करते हैं. पिता उनके एक्टिंग करियर के खिलाफ़ थे और इस वजह से दोनों में बातचीत तक बंद हो गई थी. जब पिता की मौत हुई तो नसीर किसी तरह जल्द मुंबई से सरधाना पहुंचे लेकिन तब तक पिता का अंतिम संस्कार हो चुका था. नसीर बताते हैं कि पिता की कब्र की मिट्टी हाथ में लेकर उन्हें अहसास हुआ कि उनके जीते-जागते पिता अब मिट्टी बन चुके हैं. नसीर लिखते हैं कि उस दिन वो फूटफूटकर रोए और पहली बार अपने पिता से दिल खोलकर बातें की. जब पिता ज़िंदा थे तब ऐसा कभी नहीं हो सका था.

 

उन्होंने पिता को बताया कि किस तरह फिल्मों में उनका करियर चल निकला है. किस तरह वो ज़िंदगी भर उनसे प्यार करते रहे और उन्हें बता तक नहीं पाए. उन्हें लग रहा था जैसे उनके पिता उनकी हर एक बात सुन रहे हैं और मौत के बाद ही सही आखिरकार दोनों में सुलह हो गई हो. जिस भावुकता से नसीर ने उन लम्हों को बयां किया है ऐसा महसूस होता है मानो कोई फिल्म या मंच पर नाटक चल रहा है और किरदार ज़िंदा आपके सामने खड़े हो गए हैं. नसीर के अभिनय के सब क़ायल हैं लेकिन उनका लेखन भी उतना ही असरदार है.

 

इस किताब में नसीर ने अपनी ज़िंदगी के उस पहलू पर भी खुलकर बात की है जो शायद कम ही लोग जानते थे. दरअसल 20 साल की उम्र में अलीगढ़ विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए नसीर को एक पाकिस्तानी लड़की परवीन से इश्क़ हो गया था. परवीन नसीर से क़रीब 15 साल बड़ी थीं. दोनों ने शादी कर ली. दोनों की एक बेटी भी हुई जिसका नाम हीबा है.

 

नसीर लिखते हैं, “जब मुझे पता चला कि मेरी एक बेटी हुई है तो मुझे बड़ा झटका लगा. मेरे दिमाग़ में ये धारणा बैठ चुकी थी कि असली मर्द के सिर्फ़ बेटे होते हैं. मेरे दोस्त अब मेरा मज़ाक उड़ाएंगे.” ऐसी बात स्वीकार करना आसान नहीं है लेकिन उस उम्र में अपनी ख़राब सोच को नसीर खुले दिल से बयान करते हैं. वो बड़ी ईमानदारी से बताते हैं कि उस वक़्त वो अभिनय में करियर बनाने के जुनून में सालों तक अपनी बेटी को अपनाने से पूरी तरह बचते रहे. उनकी बेटी को जब उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी तो नसीर उसके साथ नहीं थे.

 

किस तरह वो एक पिता के रूप में पूरी तरह नाकाम रहे. अपनी किताब में वो लिखते हैं, ‘‘मुझे नहीं मालूम मुझे कैसे देखा जाएगा, अगर मैं यह कहूंगा कि मैंने अपनी बच्ची हीबा के लिए लंबे समय तक कुछ भी महसूस नहीं किया, लेकिन यह ज़रूरी है कि मैं आज इस बात को स्वीकार करूं. वो कहीं नहीं थी, ऐसे जैसे उसका अस्तित्व ही नहीं था.’’

 

निजी रिश्तों के जज़्बाती खुलासों के साथ रंगमंच और फिल्मों में उनके क़रीबी लोगों का दिलचस्प ज़िक्र भी है. इब्राहीमअल्काज़ी, गिरीश कर्नाड, श्याम बेनेगल, शबाना आज़मी और ख़ासकर ओमपुरी जैसे नाम और उनसे जुड़े क़िस्से आपको उस दौर में ले जाते हैं जब समानांतर सिनेमा ने समाज में अपनी अलग पहचान बनाई थी.

 

316 पन्नों की ये आत्मकथा ना सिर्फ़ एक बेमिसाल अभिनेता के सफ़र की दास्तान है बल्कि सिनेमा के दौर को भी बड़े सशक्त ढंग से जीवंत कर देती है. हिंदी सिनेमा के अंदर की उटापटक, प्रतिस्पर्धा और त्रिदेव जैसी मसाला फिल्मो में काम करने की नसीर की कोशिश, ये सब कुछ बड़ी ईमानदारी से इन शब्दों में उभर कर आता है. ये किताब उस मोड़ पर आकर ख़त्म होती है जब नसीर के फिल्मी करियर की शुरआत हुई है मगर तब तक लेखक नसीरुद्दीन शाह आपको अपने जादू में बांध चुके होते हैं. फिल्मी दुनिया को उनकी आंखों से देखने का ये एक खूबसूरत मौक़ा है. 

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Web Title: Naseeruddin Shah released his autobiography And then one day
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