विवादों में गडकरी ही क्यों फंसते हैं?

By: | Last Updated: Monday, 28 July 2014 4:26 PM
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नई दिल्ली : बीजेपी में नितिन गडकरी का पद और कद दोनों ही बहुत बड़ा है. गडकरी संगठन चलाने के लिए जाने जाते हैं. गडकरी ने पार्टी में बड़ी से बड़ी जिम्मेदारी संभाली लेकिन विवादों ने भी कभी गडकरी का साथ नहीं छोड़ा.

 

गडकरी का मतलब होता है किले की रक्षा करने वाला. नितिन गडकरी राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा तब बने जब 2010 में उन्हें बीजेपी अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी गई थी. लेकिन बीजेपी अध्यक्ष बनने से लेकर गडकरी के कुर्सी छोड़ने तक कई विवादों ने गडकरी का दामन पकड़े ऱखा.

 

गडकरी को एक मजबूत सेनापति की तरह राजनीति में बीजेपी के कमजोर पड़े किले की रक्षा का जिम्मा सौंपा गया था. साल 2009 के लोकसभा चुनाव में मिली हार से पस्त बीजेपी के उत्थान के लिए गडकरी को नागपुर से दिल्ली एक संजीवनी बूटी की तरह लाया गया था.

 

वजह थी तेज और तुरंत काम करने की उनकी शैली. साफ स्वच्छ छवि और संगठन चलाने का कौशल. बीजेपी अध्यक्ष बनने से पहले महाराष्ट्र में पीडब्लयूडी मंत्री और महाराष्ट्र बीजेपी के साथ-साथ आरएसएस से जुड़े एक जमीनी नेता की पहचान थी नितिन गडकरी की.

 

नागपुर में एक साधारण परिवार से आने वाले नितिन गडकरी ने आम कार्यकर्ता से बीजेपी अध्यक्ष तक का सफर तय किया. एलएलबी की डिग्री और मैनेजमेंट में डिप्लोमा होल्डर गडकरी 1995 से 1999 तक महाराष्ट्र सरकार में पीडब्ल्यूडी मंत्री रहे.

 

आरएसएस के दखल के बाद दिसंबर 2009 में राजनाथ सिंह के कुर्सी छोड़ने के बाद नितिन गडकरी बीजेपी अध्यक्ष बने. नितिन गडकरी की जड़े आरएसएस से जुड़ी हुई हैं. वो बचपन से ही आरएसएस की शाखाओं में जाया करते थे. यहां तक कि गडकरी की मां भी जनसंघ कार्यकर्ता थीं.

 

गडकरी तमाम घोटालों पर तत्कालीन यूपीए सरकार को घेर रहे थे.. विधानसभा चुनावों में पार्टी को जीत दिला रहे थे. गडकरी आरएसएस और बीजेपी के बीच कड़ी काम कर रहे थे और यही वजह थी कि बीजेपी ने अपने संविधान में बदलाव करते हुए गडकरी के फिर से अध्यक्ष बनने का रास्ता भी साफ कर दिया था.

 

लेकिन इस बीच गडकरी के नाम के साथ तमाम विवाद भी जुड़ते चले गए. जिसने सेनापति गडकरी के साथ-साथ बीजेपी के किले को भी कमजोर करना शुरू कर दिया था.

 

पहला- सिंचाई घोटाला

 

अरविंद केजरीवाल ने गडकरी की कंपनी पर सिंचाई घोटाले को ना उठाने और सरकार से अपनी कंपनियों के फायदा उठाने के आरोप लगा दिए.

 

दूसरा- गडकरी की कंपनियों पर छापे

 

गडकरी की पूर्ति ग्रुप की कंपनियां जांच के घेरे में आईं और कंपनियों पर आयकर विभाग के छापे पड़ने शुरू हो गए. हर तरफ से घिरते जा रहे गडकरी पर बीजेपी अध्यक्ष की कुर्सी छोड़ने का दबाव बनना शुरू हो गया था.

 

 

नितिन गडकरी को बीजेपी अध्यक्ष की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी हालांकि पूर्ति ग्रुप मामले में आयकर विभाग से नितिन गडकरी को क्लीन चिट मिल गई थी.

 

तीसरा- संचेती विवाद में नाम

 

अजय संचेती बीजेपी के राज्यसभा सांसद हैं और बड़े उद्योगपति. पहली बार संचेती को लेकर नितिन गडकरी तब चर्चा में आए थे जब पार्टी के दूसरे नेताओं को दरकिनार कर अजय संचेती का नाम राज्यसभा के लिए प्रस्तावित किया गया.

 

दूसरी बार जब संचेती का नाम मुंबई के आदर्श सोसायटी घोटाले में आया तब भी गडकरी पर निशाना साधा गया. और तीसरी बार महाराष्ट्र के सिंचाई घोटाले में संचेती का नाम आने के साथ ही गडकरी पर भी छींटे पड़े.

 

इतना ही नहीं कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने अजय संचेती को कोयला ब्लॉक आवंटन किए जाने में गडकरी की कथित भूमिका पर सवाल उठाए थे. इन आरोपों को खारिज करते हुए गडकरी ने दिग्विजय पर ना सिर्फ मानहानि का केस किया था. बल्कि कांग्रेस को ये चुनौती दी थी कि चाहे तो 1947 से अब तक कोल ब्लॉक आवंटन की जांच करा लें.

 

बीजेपी के किले को मजबूत करने आए गडकरी तमाम विवादों में घिर चुके थे. बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में गडकरी ने एक गीत भी गुनगुनाया था जो बतौर बीजेपी अध्यक्ष तीन साल में बदली गडकरी की कहानी पर सटीक बैठ रहा था.

 

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