नीतीश का डीएनए विज्ञापन, बिहार के 'DNA' की कीमत तुम क्या जानों जुमला बाबू?

By: | Last Updated: Sunday, 9 August 2015 2:50 AM

नई दिल्ली: बिहार का चुनावी पारा बढ़ता जा रहा है. आरोप-प्रत्यारोप के साथ ही अब ताने भी दिए जा रहे हैं. नीतीश कुमार ने डीएनए विवाद को बिहार के अस्मिता से जोड़ दिया है.

नीतीश कुमार ने मोदी के डीएनए वाले शब्द को उसी तरीके से चुनावी मुद्दा बना लिया है जैसे नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनाव में चाय वाले को बनाया था. मोदी ने पूरी चुनावी रैली में खुद को एक चाय वाले की तरह प्रमोट किया और अंत में भारी बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बने. नीतीश कुमार ने भी मोदी की आज गया में होने वाली गया की रैली से पहले रेडियो के लिए विज्ञापन जारी किए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कहा कि बिहार का डीएनए तुम क्या जानों जुमला बाबू?

 

बिहार के इतिहास को बताते हुए इस विज्ञापन में हर जगह डीएनए शब्द का इस्तेमाल किया गया है.

 

मोदी को चाय वाला  कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर ने कहा था. अब उसी सिद्धांत पर चलते हुए नीतीश कुमार ने डीएनए को अपना चुनावी मुद्दा बना लिया है.

 

यहां सुने पूरा विज्ञापन –

बिहार के डीएनए की कीमत तुम क्या जानों जुमला बाबू? 

 

”बिहार का डीएनए लेकर आर्यभट्ट ने दुनिया को गणित के सिद्धांत दिए. इसी बिहार का डीएन लेकर बाबू राजेन्द्र प्रसाद स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति बन गए. इस बिहार का डीएनए लेकर रामधारी सिंह दिनकर राष्ट्रकवि बन गए. बिहार के डीएनए की कीमत तुम क्या जानों जुमला बाबू. और इस बार बिहार के डीएनए ने मन बना लिया है कि झांसे में न आएंगे. नीतीश को जीताएंगे.”

 

यहां सुनें दूसरा विज्ञापन

बिहार के डीएनए की कीमत तुम क्या जानों जुमला बाबू? 2

 

‘इसी बिहार का डीएनए लेकर चाणक्य ने पूरी दुनियां को अर्थशास्त्र दिया. इसी बिहार का डीएनए लेकर जयप्रकाश नारायण लोकनायक बने. इसी बिहार का डीएनए लेकर भिखारी ठाकूर ने विदेशिया की रचना कर दी. बिहार के डीएनए की कीमत तुम क्या जानों जुमला बाबू. और इस बार बिहार के डीएन ने मन बना लिया है कि झांसे में न आएंगे. नीतीश को जीताएंगे.”

 

यहां पढ़ें मोदी का वो  बयान जिस पर मचा है बवाल

रैली में पीएम मोदी ने बोला था कि एक बार मैं पटना आया था. मेरी पार्टी की कार्यसमिति की मीटिंग थी और यहां के मुख्यमंत्री ने हमको खाने पर बुलाया था. अब हमारी थाली उन्होंने छीन ली. भोजन पर बुला कर के कभी कोई थाली छीन लेता है क्या? ये लालू जी कह रहे हैं, मैं आज जहर पी रहा हूं, मैंने तो उस दिन भी जहर पीया था और तब मेरे मन को जरा चोट पहुंची थी. क्या राजनीति में इतनी छुआछूत?

 

सार्वजनिक जीवन के ये संस्कार कि टेबल पर परोसी हुई थाली खींच लेना, मेरे मन को बड़ी चोट पहुंची थी, मैंने कभी बोला नहीं न ही मैंने कभी मन में इसका मलाल रखा, चलो ठीक है भाई लेकिन जब जीतन राम मांझी पर जुल्म हुआ तो मैं बेचैन हो गया. मुझे लगा कि अरे मोदी की क्या औकाद है, उसकी तो थाली खींच ली, एक चाय वाले के बेटे की थाली खींच लें, एक गरीब के बेटे की थाली खींच लें लेकिन एक महादलित की तो सारी की सारी पूँजी ले ली, सारा पुण्य खींच कर के ले लिया.

 

भाईयों और बहनों, तब मुझे लगा कि शायद डीए नए में ही कुछ गड़बड़ है क्योंकि लोकतंत्र का डीएनए ऐसा नहीं होता है. लोकतंत्र का डीएनए अपने विरोधियों को भी आदर और सत्कार देने का होता है लेकिन इन्होंने जो लोकतंत्र सीखा और चलाया है, उसमें जॉर्ज फ़र्नान्डिस का क्या हुआ? इसी धरती से जुड़े थे, उनके साथ क्या किया गया? सुशील मोदी जो कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे उनके साथ क्या किया? ये सारे नेता जो कभी न कभी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले, उनके साथ क्या किया? क्या आप अब भी लोकतंत्र के इस डीएनए को नहीं समझ पाएंगे क्या? क्या ऐसे लोगों को माफ़ करेंगे क्या?

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Web Title: nitish kumar
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