प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोले नीतीश- मांझी को मुख्यमत्री बनाना मेरी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल

By: | Last Updated: Saturday, 22 August 2015 2:35 PM
nitish kumar comment on Jeetan Ram Manjhi

बिहार में चुनाव होने वाले हैं. लोगों की निगाहें हैं, चुनाव से पहले का नीतीश कुमार का पहला बड़ा इंटरव्यू.

 

सवाल दिबांग- क्या आप को लगता है कि आप ये चुनाव जीत पाएंगे ?

जवाब नीतीश- क्यों नहीं जरुर जीतेंगे.

दिबांग- नीतीश जी ये जो चुनौती है राजनीति की ये कितनी राजनैतिक है और कितनी व्यक्तिगत?

जवाब नीतीश- हम लोगों की तरफ से जो भी लड़ाई है वो राजनैतिक है. दूसरी तरफ से राजनैतिक भी है, उनके लिए जीवन-मरन का प्रश्न भी है इसलिए यह व्यक्तिगत भी एक स्टिक दिखता है. इसलिए वो बड़े-बड़े दांव खेल रहे हैं तो उसमें जो मैं देखता हूं कि भारतीय जनता पार्टी के लोग और उनकी देखा-देखी उनके सहयोगी गण भी जिस भाषा का प्रयोग करते हैं. उससे पता चलता है कि उनकी तरफ से व्यक्तिगत हमले की भी कोशिश होती रहती है लेकिन हम लोगों की तरफ से ये पूरे तौर पर राजनैतिक है. हम लोगों ने हाल में कोई व्यक्तिगत हमला नहीं किया है

 

दिबांग- जिस तेवर में हाल में आप बोल रहे हैं. वो एक बदले हुए नीतीश कुमार हैं. ऐसे नीतीश कुमार हैं जो मोदी पर हमला करते हैं. आपको नहीं लगता कि आप की जो पॉलिटिक्स है वो भी व्यक्तिगत है? व्यक्ति नरेंद्र मोदी नीतीश कुमार को पसंद आते हैं या ना पसंद आते हैं.

 

जवाब नीतीश- भारतीय जनता पार्टी की तरफ से चुनाव के लिए किसी को सामने लाया नहीं गया है. गठबंधन का नेता कौन है वो तो रख नहीं रहे हैं सामने, हर अवसर पर वो अपने सबसे बड़े नेता, कह सकते हैं कि बीजेपी के पास जो सबसे बड़ा अस्त्र बीजेपी के पास है उसी का प्रयोग करते हैं. रैली करना, वहां जाकर मीटिंग करना. आप लोगों ने देखा होगा कि एक सरकारी कार्यक्रम को किस तरह से राजनैतिक कार्यक्रम में तब्दील कर दिया गया. और पार्टी का कार्यक्रम करते हैं तो उसमें तो बोलने का अंदाज, तेवर, शब्दों का चयन और हाव-भाव इन सब चीज को देखिए तो बिल्कुल व्यक्तिगत रुप से एक आक्रोश झलकता है. लेकिन मेरी तरफ से जो बात कही जा रही है वो सिर्फ मेरी तरफ से नहीं वो पूरे बिहार के तरफ से है. वो बार-बार अटैक करते हैं बिहार सरकार के काम पर, ये बताते हैं कि दस साल में कुछ नहीं हुआ. व्यक्तिगत अटैक भी करते हैं और सरकार पर भी तो मेरा तो ये फर्ज है कि अगर कोई कुछ कहे तो उसका उत्तर तो होना चाहिए और मैं तो हमेशा तथ्यों के आधार पर जवाब देता हूं.

 

दिबांग- आपने लालू यादव से अब हाथ मिला लिया, पहले आप लालू यादव के बारे में क्या क्या बोलते थे?

 

जवाब नीतीश- ठीक है लालू यादव की जो राजनीति थी उसके खिलाफ थे. हम लोग तो सब जनता दल में थे, जेपी आंदोलन से निकले हैं, जनता पार्टी में थे. बाद में जनता पार्टी का बिखराव हुआ, लोकदल में थे, फिर जनता दल में थे. वीपी सिंह हम लोगों के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. कन्टेक्स के बिना आप कह दीजिएगा तब तो ये विचित्र बात है तब तो इसका काउंटर कुछ और ढंग से देना पड़ेगा कि बीजेपी के लोग मेरे बारे में क्या बोलते थे और आज क्या बोल रहे हैं? जब तक हमारे साथ थे, मेरे बारे में क्या बोलते थे आज क्या बोल रहे हैं? उस समय जो हमारा पॉलिटिकल स्टैंड था उसके हिसाब से था. आज जब हमने बीजेपी से अलग होने का फैसला लिया और वो सिद्धांत के आधार पर हुए.

 

हमें इस बात पर यकीन नहीं रहा कि जो वादे बीजेपी के नेतृत्व द्वारा किया कि विवादित मुद्दों से अलग रहना और अलग रहे लेकिन अब जो बीजेपी अवतार में आयी है. अब फिर से अपने पुराने रूप में, पुराने तेवर में जाएगी. कट्टरपंथी विचारधारा को और बढ़ाएगी. तो हम लोगों ने अलग होने का फैसला किया. और जब अलग हुए तब यह भी हमने कह दिया कि हो सकता है कि हमें सफलता ना मिले लेकिन सवाल सफलता और विफलता का नहीं है. सवाल है कि जिन चीजों के प्रति हमारा विश्वास है, जो हमारा कमिटमेंट है उसके आधार पर चलेंगे.

 

दिबांग- पर नीतीश जी ये विरोधाभास की पराकाष्ठा नहीं है कि आप जिसको विकास विरोधी बताते रहे, जंगलराज तो लोगों ने कहा आप तो आतंकराज बताते रहे, अराजकता बताते रहे, आप उसी के बगल में खड़े हो गए. क्या आप को ये डर था हार का, क्या आप को डर था अकेले पड़ने का असली वजह क्या है उसकी ?

 

जवाब नीतीश- पूरे देश की मानसिकता आप नहीं देख रहे हैं. इस देश में लोकतंत्र रहना चाहिए या नहीं. एक आदमी को जनता ने वोट कर दिया, मात्र 31 प्रतिशत वोट पर ये मैसिव मैंडेट मिल गया बीजेपी को और ये मैसिव मैंडेट मिला तो मतलब क्या है कि बाकि लोगों को घर बैठ जाना चाहिए. एक बार किसी को वोट मिल गया और वो दिल्ली की गद्दी पर आएं और जो चाहे वो करते रहें. क्या उनके विपक्ष में किसी को खड़ा नहीं होना चाहिए. हम लोगों की कोशिश है कि आज जो केंद्र की सत्ता में हैं उनके खिलाफ जितनी पार्टियां हैं उसमें अधिकतर गोलबंदी हो लोगों की और हम लोग इस धारा पर चल रहे हैं. संभव है कि कई मुद्दों पर हमारा मतभेद रहे और मतभेद अगर नहीं होते तो 1994 में हम जनता दल से अलग होकर समता पार्टी क्यों बनाते. लेकिन आज जो राजनैतिक परिस्थिति उत्पन्न हुई उससे देश के सामने एक जबरजस्त संकट आया. अगर हम लोग कल क्या आपने कहा, उन्होंने आपके बारे में क्या कहा, फिर मिल कैसे गए. इसी चीज के उलझन में पड़े रहेंगे तो शायद कोई सशक्त विपक्ष का निर्माण नहीं हो पाएगा. मुझको तो ऐसा लगता है कि ये सवाल जानबूझ कर उठाया जाता है कि कालांतर में बीजेपी के खिलाफ को सशक्त गोलबंदी ना हो सके. मैं इसलिए इस नतीजे पर पहुंचने को बाध्य हो रहा हूं कि ऐसा क्यों है कि मैंने  और लालू जी ने जो एक दूसरे पर आक्षेप किया, उस दौर में जब हम एक दूसरे पर अगल थे. उसी को क्यों हाइलाइट किया जाता है,इसको क्यों नहीं हाइलाइट करते कि कल बीजेपी ने क्या कहा था.

 

एक उदाहरण मैं देना चाहूंगा. आज जिस प्रकार से बीजेपी के लोग कर रहे हैं कि थाली खींच लिया, कल कह रहे हैं कि चेक लौटा दिया. ये कब की घटना है,12 जून 2010 की कोई घटना है और उसके बाद आता है विधानसभा का चुनाव. जो बीजेपी इन दोनों घटनाओं के बाद जेडीयू के साथ चुनाव लड़ती है और मेरे घोषित नेतृत्व में लड़ती है, उस समय सब ठीक था.

 

दिबांग- आप तो उनके साथ रहे हैं आप को तो मालूम है उनका रंग-ढंग तो इसमें आप को आश्चर्य होता है तो इस पर मुझे आश्चर्य होगा.

नीतीश- कनक्लूड करने दीजिए कि 2010 के बिहार के विधानसभा के चुनाव में मेरे बारे में जो इनके तमाम नेता हैं क्या बोलते थे और आज क्या बोल रहे हैं.

दिबांग- जब उनसे सवाल होंगे तब इस पर जरुर चर्चा होगी.

नीतीश- ये कांट्रडिक्शन सब जगह है इसको एकसाथ सामने रखिए तब लोग फैसला कर लेंगे.

 

सवाल अरविंद- आप इस समय सबसे मुश्किल लड़ाई लड़ रहे हैं और इस लड़ाई में जो तीन ताकतें हैं उभरी हैं तेजी से मंडल, कमंडल और बाजार तो इसमें से आपके पास और लालू के पास सिर्फ मंडल का हथियार है मोदी के साथ मंडल, कमंडल और बाजार का हथियार है तो इस स्थिति में आप कैसे लड़ेंगे?

 

जवाब नीतीश- हम तो लड़ रहे हैं ये तो आपकी व्याख्या है कि मंडल, कमंडल और बाजार. आपके हिसाब से वो है हम उसके बारे में कुछ नहीं कहना चाहते हैं. लेकिन देश बहुत आगे बढ़ा है और एक चीज जान लीजिए कि समस्या यह है कि राजनीति में जो नई परिस्थितियां उत्पन्न हो रही है और जो नए ट्रेंड डेवलप होते चले जा रहे हैं और उसको हम दरकिनार करके पुरानी चीजों पर ही व्याख्या करते हैं. आप लोग भी करते हैं और यही काम पॉलिटिकल पार्टी में भी चलती रहती है लेकिन आप गौर से देखेंगे तो प्रत्येक चुनाव में एक अलग चीज उभर कर आती है. और एक वाक्य में कहें तो लैंग्वेज ही नहीं ग्रामर ही बदल रहा है. हर एक चुनाव का ग्रामर अलग हो जा रहा है.

 

अरविंद- दलित वोट टूटा, ओबीसी टूट रहा है ये तो बहुत साफ दिख रहा है, अब बाजार का असर है या क्या लेकिन उस लेवल के बस में क्या किसी के बस में नहीं है. उन्होंने ओबीसी खेमें को तोड़ लिया. पैसे की ताकत से मुकाबला करना आपको पॉसिबल लग रहा है ?

 

नीतीश- अरे बिल्कुल पॉसिबल है इसीलिए तो मैं कह रहा था कि आप तो उन्हीं चीजों में उलझे हुए हैं. जबकि बिहार का चुनाव तो बिल्कुल नए ढंग का चुनाव होगा. बिहार के चुनाव से तय होगा कि लोकतंत्र रहेगा या मिटेगा. एक बड़ी चीज तय होने वाली है और आप उलझ गए हैं जाति और जातिय समूहों में, बाजार का पैसा, मंडल, कमंडल इसमें उलझे हुए हैं. हम लोगों को मालूम है कि इनकी ताकत क्या है.

 

उनके पास ताकत है, सत्ता में हैं कुछ भी कह सकते हैं, घोषणा कर सकते हैं. उनमें एक धार्मिक उन्माद पैदा करने की उनमें शक्ति है और समाज जो विभाजन करने की जो शक्ति है. जिस तरह से उन्होंने लोगों को जातियों में बांटना शुरु किया. मेरा बीजेपी के साथ मतभेद में एक प्रश्न भी था हमने समाज में जात से अलग जमात खड़ी करना शुरु किया चाहे अति पिछड़ों का हो, महादलित का हों इस प्रकार से जो जमात बन रही थी और उसी समय बीजेपी जातियों में बांट कर, उनेक कुछ आइकॉन को चुनकर उनके इर्द-गिर्द जातिय सम्मेलन कर रही थी जैसा पहले हुआ करता था, मैंने इस पर ऐतराज भी जताया था. हम जिस प्रकार से लोगों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं इनको वो नापसंद है. इनको फायदा करेगा लोगों के बीच में झगड़ा, लोगों के बीच मतभेद तो ये सब कुछ करने की कोशिश कर रहे हैं, ये मुझे मालूम है.

 

अगर बिहार में 15 महीने में तक यात्रा तो छोड़ दीजिए बिहार के बारे में कुछ नहीं सोचा गया और ऐसा नहीं है कि राज्य सरकार की तरफ से हर बार ज्ञापन देना, इस पर हमने खुद मिलकर इस बारे में बात की.

 

लेकिन हम तो कोई दावा नहीं कर रहे कि उनका ये प्रयास बेकार है, हम उस तर्क में नहीं जाना चाहते हैं लेकिन मुझको ये भरोसा है कि बिहार में जो काम हुआ है पिछले 10 वर्षों में, जिसको भी वो झुठला रहे हैं तो ऐसी परिस्थिति में लोगों ने जो देखा है और झेला है वो सिर्फ बाजार की ताकत, कुछ जातियों के बीच झगड़ा और धार्मिक आधार पर पोलराइजेशन. हम देख रहे हैं वहां.

 

एक चीज मैं बता देता हूं आप लोगों को भी मालूम ही होगा कि बिहार में कोई बड़ा सांप्रदायिक दंगा नहीं करा सकते चूंकि हम लोग बहुत अलर्ट हैं. समाजिक और प्रशासनिक दो स्तर पर अलर्ट हैं. हम देख रहे हैं कि ट्रेंड है कि वो छोट-मोटे झगड़े कराते हैं. अब वो यहां पर चले गए हैं कि चलो एक गांव का झगड़ा दो-तीन गांवों पर असर करेगा, 2-3 हजार का वोट एक विधानसभा के क्षेत्र में मैटर करत है तो चलो 2-3 हजार वोट को ही इस लाइन पर पोलराइज कर दूं. एक-एक चीज हम लोग देख रहे हैं.

 

और ये भी चीज देख रहे हैं कि कोई एक जाति है तो उसके सामने ये बता देना कि देखो उसको तो पूरा सम्मान नहीं मिल रहा है. दूसरी तरफ जाना कि उसको सम्मान नहीं मिल रहा है. तो ये सब करके वो कन्फ्यूजन करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन जो सबसे बड़ी बात है कि उनको जो लोकसभा के चुनाव में जो जबरजस्त समर्थन मिला, हर तबके का समर्थन मिल गया. अब लेकिन उनको कुछ हासिल हुआ नहीं, कुछ दिखा नहीं इसलिए उनकी बातों का वो असर नहीं है कि वो इन चीजों के माध्यम से गोलबंद कर लेंगे. और हम लोग भी आपको स्पष्ट करना चाहते हैं कि हम लोग मास पार्टी हैं तो हम लोग एक मैसेज के आधार पर, मास कांटेक्ट के आधार पर अपनी बात रखते रहे हैं.

 

आज ही नहीं ये सिलसिला आजादी के पहले है. कई जगहों पर जो ये जनता पार्टी रही, नॉन भाजपा या नॉन आरएसएस वो ऑर्गनाइज तरीके से एक नहीं रहे और इसका फायदा बीजेपी को मिला है. लेकिन इस बार हम लोगों ने भी संपर्क को इस तरह से केंद्रित किया है जनसंपर्क के काम को. इस बार सिर्फ मैसेज नहीं जबरदस्त जनसंपर्क के आधार पर काम कर रहे हैं.

 

सवाल दिबांग- जो आप कह रहे थे कि लोकतंत्र का गला ये दबा रहे हैं वही बात लालू जी कह रहे हैं.

जवाब नीतीश- इस तरह की क्लिपिंग आप दो ही लाए हैं, हम ही आप को पचास भेज देंगे. ये पूरा का पूरा एक्सरसाइज मीनिंगलेस है मैं कह रहा हूं.

दिबांग- इसका मीनिंग इसलिए है कि इस व्यक्ति के साथ आप खड़े हुए हैं और यही आप के सहयोगी हैं. तीखी बातें आप ने भी कि इन्होंने भी की. कैसे विश्वास करें कि आगे एकसाथ मिलकर चलेंगे. 

नीतीश- क्यों नहीं विश्वास करेंगे. विश्वास इसलिए करेंगे जो आज की परिस्थिति है कि लोग एक-एक बात को समझ रहे हैं. मौका तो दे दिया देश में और जब मौका दे दिया तो जितने वादे किए वो सब वादे पूरे हो गए. हर गरीब आदमी को 15 से 20 लाख रुपए यूं ही मिल गए, सौ दिन के अंदर सारा पैसा आ गया. किसानों को लागत पर पचास प्रतिशत जोड़ कर लागत पर न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल गया, तीन बार घोषित हो गया. बेरोजगारों को बड़ी संख्या में रोजगार मिल गया.

 

जो एक-एक चीज कही गई है और जिसके आधार पर लोग आकृष्ट हुए थे, तो वो लोगों के सामने है ना. तो बहुत सारे लोग जिन्होंने वोट दे दिया, अब वो अफसोस कर रहे हैं. अब उन्हें चाहिए सब लोग गोलबंद हो क्योंकि अलग-अलग लड़ेंगे तो लोगों में गलतफहमी होगी. तो जो हम लोग गोलबंद हुए हैं. अपनी पुरानी तमाम बातों को जो एक दूसरे पर कही गई है, बावजूद इसलिए इकट्ठा हुए हैं कि पूरी मजबूती आ सके. उनके विरोध में कई खेमें लोगों के बीच जाएंगे अपनी-अपनी बात कहेंगे. तो वोट का बिरखराव ना हो इसलिए हम एक हुए हैं.

 

सवाल संगीता तिवारी- मेरा सीधा सा सवाल है कि लालू यादव आपके लिए एसेट हैं या लायबिलिटि ? 15 साल के उनके और राबड़ी देवी के राज का आप आंकलन कैसे करते हैं? 

जवाब नीतीश- आज वो विषय ही नहीं है. 15 साल के शासनकाल के बाद बिहार में बदलाव आया, हम लोग आए, आज पूरी स्थिति बदल गई है. एक आदमी 15 साल पहले का सोच ही नहीं रहा, ये बहस तो मीडिया में ही है. और मीडिया के माध्यम से ही ये कहने की कोशिश हो रही है, इसमें कोई दम नहीं है. बिहार में बीजेपी से अलग जितने वोट हैं उनमें आपस में बिखराव न हो उसको रोकने के लिए एक सशक्त आधार बनाने के लिए ताकि लोगों को लगे कि यह विकल्प है. और यह विकल्प बिहार से शुरु होकर देश भर में यह ट्रेंड होगा. ये कोई मामूली ट्रेंड नहीं है. आप लोग इसके कॉन्ट्रडिक्शन को उभार रहे हैं. ये हम जानते नहीं है या लालू जी नहीं जानते. और एसेड और लायबिलिटि की बात कर रही हैं. सवाल उसका है ही नहीं. इन सब बातों के बावजूद हम सब गोलबंद हुए हैं. देश स्तर पर एक सशक्त विपक्ष तैयार हों मैं मानता हूं.

 

अच्छा आप लोग आज मुझसे सवाल पूछ रहे हैं, हमको ये बताइए कि जेपी ने जब जनता पार्टी का गठन किया तब तो लोग मोर्चा बनाने को तैयार थे. और मोर्चा का प्रयोग गुजरात में इमरजेंसी के पहले सफल भी हुआ था, जनता मोर्चा. बावजूद इसके जेपी ने कहा कि एक दल बनना चाहिए. कौन-कौन लोग शामिल थे कांग्रेस भी थी, सोशलिस्ट भी थी, जनसंघ भी थी. अब आप जरा बताइए कि वो जो कांट्रडिक्शन था. हम लोगों के बीच तो कोई आइडियोलॉजिकल कांट्रोडिक्शन नहीं है. हम लोगों के बीच में काम करने के नजरिए का है.

 

अगर आप 25 साल पीछे ले जा रहे हैं तो ये सवाल आना ही चाहिए कि तो आप 40 साल पहले क्यों नहीं ले जाते हैं. जेपी ने एक ऐसी जनता पार्टी बनवाई और जिसको 4 राज्य को छोड़ करके देश में एक सीट कांग्रेस को नहीं मिली.

 

संगीता- नीतीश जी आप को 10 साल पीछे इसलिए ले गए क्योंकि एकबार आप लोग दोनों साथ में हैं और इसलिए कि बिहार के लोगों को ये जानना जरुरी है कि आप उस शासनकाल को किस तरह से देखते हैं क्योंकि आप अगर वापस सत्ता में आते हैं तो वापस मिलकर सरकार चलाएंगे?

 

नीतीश- ये लोग जानते नहीं हैं क्या सारे लोग जानते हैं कोई नया थोड़े ना जानेंगे. हमको भी जानते हैं और लालू जी को जानते हैं. लेकिन आप बताइए कि आज वहां पर हमारी सरकार है. इस सरकार को आरजेडी का भी सपोर्ट है, कांग्रेस पार्टी का सपोर्ट है, सीपीआई का सपोर्ट है, एक इंडिपेंडेंट का भी सपोर्ट है. जो हमारा बहुमत है वो तो सब लोगों को मिलाकर है. सब मिलकर चला रहे हैं तो जरा बताइए ना कि पिछले 8 महीने में ऐसा कौन सा काम हुआ है जो आप को कि यह सुशासन की स्पीरिट के खिलाफ है, कहिए ना, यूं ही एक भय पैदा करना और अभी तो 8 महीने में कोई इक्जांपल दीजिए ना. कौन सा डेवलपमेंट का काम रुक गया, फुल स्पीड में काम चल रहा है. कौन सा ऐसा इशू है जिसको हमें रिजॉल्ब करना चाहिए, जिसको हम नहीं कर रहे हैं. कहां किसी प्रकार की दिक्कत आ रही है. और जब सब लोगों ने मिलजुल कर ये तय कर लिया कि हमें महागठबंधन को काम करने का मौका जनता देगी तो किसके नेतृत्व में काम होगा. कहां कोई कन्फ्यूजन है. और पिछले 8 महीने में कोई ऐसा काम हुआ हो जिससे गुडगवर्नेंस के ऊपर बड़ा भारी क्वेश्चन मार्क लग गया हो.

 

 

नीतीश- ये तो क्लीयर हो गया ना कि बीजेपी के लोग पॉलिटिकल डीएनए बोलते हैं. कहीं पॉलिटिकल शब्द था?

दिबांग- पर उनका आशय पॉलिटिकल ही था.

नीतीश- वाह साहब! उनके लिए आशय ढूढ़ेंगे और हमारे लिए शब्द पर व्याख्या करेंगे. ये तो लेवल प्लेइंग फील्ड नहीं हुआ. ये तो एडवांटेज देना हुआ. अब आप बताइए ये जो सुना दिया आपने इसमें क्या चीज था. इसी पर तो हम पूछ रहे हैं कि जून 2010 की घटना के बाद 2010 का विधानसभा का चुनाव हुआ. आप ने सुनाया थाली की बात. सहरसा में उन्होंने चेक लौटाने की बात कही. अब आप बताइए इसके बाद बीजेपी मेरे लीडरशिप में चुनाव लड़ी, कैसी पार्टी है, कैसा स्वभाव है, कैसा मिजाज है.

 

दिबांग- उन्होंने कहा कि मुझे कमरे में बुला लेते चांटा मार लेते, मुझे समझा देते, मैं मान जाता.

नीतीश- ये भाषा हो सकती है. उन्होंने कहा तो आप उनके लिए व्याख्या कीजिए ना. कहीं सुना है क्या कि कहीं किसी को हमने चांटा मारा या कभी कोई सोच भी सकता है क्या, राजनीति में कहीं कोई सोच भी सकता है क्या, ये भाषा संतुलित है. ये भाषा तो इस बात का परिचायक है कि सामने वाले के प्रति मन में इतना भयंकर कंटेंप्ट है. मेरे मन में तो कुछ नहीं है, मैं तो जाता हूं एयरपोर्ट पर स्वागत करता हूं. हंसकर स्वागत करता हूं. चूंकि मैं मानता हूं कि ये सब चीजें राजनैतिक है.

 

सवाल विरेंद्र कपूर- शिष्टाचार अगर निभाते तो आप ने जब खाने पर बुलाया था तो खाना उनको खिलाते, चेक उन्होंने भेजा था फ्लड रीलिफ के लिए तो लेते. शिष्टाचार की कमी आप में थी और वो आपका जिक्र कर रहे थे. और जब वो डीएनए की बात करते हैं तो आपके व्यक्तिगत डीएनए की बात करते हैं. बड़ा साफ है उसमें क्योंकि थाली छिनी वो बिहार ने नहीं छीनी.

 

अब आप डीके बरुआ की तरह इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा की तरह आप नीतीश इज बिहार और बिहार इज नीतीश आप उस पर आ गए हैं. उनके कहने का मतलब है कि आप लोगों का यूज करके डंप कर देते हैं. अब आप को जरुरत पड़ी तो लालू के साथ आ गए और आप ने कहा कि मैं वो सांप है और मैं चंदन हूं तो कहीं ना कहीं आपकी भाषा में कांट्रडिक्शन है. आपने खाने पर बुला कह कहा कि अगर वो आएंगे तो नहीं करुंगा. इतना ही था तो आपने 2002 में इस्तीफा क्यों नहीं दिया.

 

जवाब नीतीश- एक बात मैं आप को साफ बता दूं कि जो भोज कैंसिल हुआ है वो बीजेपी का निर्णय था. इस चीज के लिए तो आप वहां बैठे थे नहीं. हमने अभी असेंबली में भी इस बात का जिक्र किया ये उन लोगों ने छोड़ा, हमारी तो पूरी तैयारी हो गई थी. और वो मेरा नहीं था जेडीयू की तरफ से था. वो भोज बिहार के मुख्यमंत्री या बिहार सरकार की तरफ से नहीं था.

 

और दूसरी बात 5 करोड़ के चेक की. मैंने पहले ही कह दिया जब वो पटना गए अपनी पार्टी के नेशनल एक्जक्यूटिव के मीटिंग में आप ने विज्ञापन देखा, याद है आप को, आप को याद नहीं होगा. उन्होंन 5 करोड़ रुपया 2008 में भेजा था और 2010 में विज्ञापन निकालते हैं कि गुजरात ने विपत्ति के समय में बिहार की सबसे ज्यादा मदद की. किसी भी राज्य में अगर आपदा आती है तो दूसरे राज्य से मदद जाती है, कोसी आपदा में 5 करोड़ उन्होंने भेजा, उससे भी ज्यादा राशि अन्य राज्यों ने भेजी सीएम रीलीफ फंड में. लेकिन उनका यह कहना कि जो मदद करता है वो उसका विज्ञापन नहीं छपवाता.

 

आज तक इतिहास में ऐसा नहीं हुआ कि किसी राज्य में आपदा वाले राज्य के मुख्यमंत्री राहत कोस में राशि भेजी हो तो उसका विज्ञापन नहीं छपवाता. ये कौन सी भारतीय संस्कृति के अनुकूल है. देने वाला कभी कहता है. इस बात की मुझे तकलीफ हुई कि भई यहां तो हजारों करोड़ रुपए कोसी आपदा में खर्च हुए. जहां तक सीएम रीलीफ फंड है कल ही मैंने दिखाया कि 50 करोड़ आए इनके 5 करोड़ लौटाने के बाद भी.

 

इसी पर मैंने कहा कि ये घटना कब की है 2010 की घटना है. उसके बाद विधानसभा का चुनाव ये लोग मेरे लीडरशिप में लड़ा, जेडीयू के साथ लड़े क्यों लड़े? आप उस समय चुनाव लड़ लिए और उस चीज को आप भूल गए और आज उस चीज को इन्वोक कर रहे हैं. आखिर आपके इरादे क्या हैं. 2002 की घटना गुजरात की थी, हम लोग तो अटल जी के नेतृत्व में थे. अटल जी ने कहा था कि राजधर्म का पालन करना चाहिए. अब उनकी पार्टी में जो भी हो श्रद्धेय अटल जी की बात कितनी चली या नहीं चली. लेकिन हमारा एलाइंस अटल जी के नेतृत्व वाला था. अटल जी का उसमें दोष नहीं है अटल जी ने तो उसमें सुझाव भी दिया था.

 

लेकिन अटल जी के बाद दूसरी लीडरशिप जो अब लाने की कोशिश हो रही है. तो यही तो कारण था कि हम लोगों को लगा कि बीजेपी अब नए स्वरुप में फिर से आ रही है, इसमें अपने को एडजस्ट करना संभव नहीं है वैचारिक रुप से, व्यक्तिगत एडजस्टमेंट की बात नहीं है.

 

विरेंद्र कपूर-  आपको नहीं लगता कि आपका जो गैंबल था वो गलत हो गया, आप ने ये सोचा कि मैं एनडीए की तरफ से विरोध करुंगा और आडवानी जी अंदर से करेंगे और मोदी जी को रोक लेंगे.

 

नीतीश- आडवानी जी की हम बड़ी इज्जत करते हैं लेकिन आडवानी जी भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं. बड़ी अच्छी संस्कृति का परिचय बीजेपी में दिया ही जा रहा है. 2 आदमी से 86 आदमी पर पहुंचाने वाले आदमी, जिनके नेतृत्व में, जिनके संगठन क्षमता से हुआ और आगे बढ़ते-बढ़ते कहां तक पहुंचे लोग. और आज आडवानी जी की क्या स्थिति है बीजेपी में किसी से छुपा नहीं है. सीधी बात है कि अब जब लग गया हम लोगों की पूरी पार्टी को कि हम लोग वैचारिक रुप से वहां एडजस्ट नहीं कर सकते हैं. 2002 में अलग नहीं हुए क्योंकि अटल जी का नेतृत्व था. अब तो कोई छतरी थी नहीं वैसे नेतृत्व की इसलिए हम लोगों ने तय किया कि अलग हों. और गैंबल नहीं था. भई वैचारिक रुप से कोई निर्णय लिया जाता है तो उसको जुआ थोड़ी ही कहते हैं.

 

सवाल विनोद शर्मा- आप ने कहा था कि बिहार से डीएनए सैंपल भेजे जाएंगे तो नीतीश जी क्या आपने अपना और लालू का डीएएनए सैपंल पीएम को भेजा है. और दूसरा इसी से लगा हुआ सवाल है आपने पीएम के भाषण के बाद ये कहा कि जिस तरह से उन्होंने वो स्पेशल पैकेज का ऐलान किया वो एक निलामी जैसा अनाउंसमेंट था तो इन दोनों के चलते मुझे ये लगता है कि आपका एक मेजर कैंपेन प्वाइंट बिहार की अस्मिता है और वो डेमोक्रेसी का आपका जो प्लैंक है उसके  साथ कैसे जुड़ता है.

 

जवाव नीतीश- मेरा डीएनए तो खराब उन्होंने घोषित ही कर दिया तो इसकी तो पूरी रिपोर्ट उनके पास है. ये तो बिहार भर के लोग अपना डीएनए सैंपल भेज रहे हैं कि आप डीएनए जांच करा लीजिए. जिसका डीएनए आपने खराब कहा है उसके साथ ये मेल खाता है या नहीं खाता. सबसे बड़ी बात है कि आखिरकार देश के सर्वोच्च राजनैतिक पद पर बैठ कर, देखिए राजनैतिक विरोध होगा लेकिन मुझको ये बताइए कि अगर दूसरे मुल्क के व्यक्ति द्वारा अगर हमारे प्रधानमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति पर अगर कोई आक्षेप हो तो क्या हम पार्टिजन व्यवहार करेंगे. हमें खुद को खराब लगेगा. तो उन्होंने वहां जा कर जिस तरह से मेरे बारे में इस तरह की टिप्पणी की तो ये जो कैंपेन है कि कृपा करके शब्द वापस लेलें, ये विनम्रतापूर्वक आग्रह है. शब्द वापसी का ये अभियान है.

 

क्या आप इस बात को अप्रूव करते हैं कि देश का प्रधानमंत्री जाकर किसी राज्य के मुख्यमंत्री के बारे में ऐसी टिप्पणी करे और वो बड़ा सराहनीय है. लोगों ने इसे अपने आप बिहार की अस्मिता के साथ जोड़ा है. मैं 7 दिन तक ज्यादा कुछ नहीं बोल रहा था. चारो तरफ से बात उठने लगी, बात आने लगी की नहीं ये बिहार की अस्मिता पर चोट की गई है. ये तो बिहार और बिहारियों का अपमान है. तो लोग इससे अपने आप को लोग जोड़ते हैं कि इस तरह की टिप्पणी नहीं होनी चाहिए. तो इतना आग्रह किया कि शब्द वापस ले लीजिए कृपा करके.

 

विनोद शर्मा- ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री ने आप को सिंगल आउट नहीं किया है, अभी दुबई में जाकर बताया कि उन्होंने मालदीव में पानी पहुंचाया था, नेपाल में मदद पहुंचाई थी, शेख हसीना की मदद की है. तो शायद उनके व्यवहार में ऐसा, आपको तो सिंगल आउट नहीं किया.

 

नीतीश- यह तो भारतीय संस्कृति में है ही नहीं और सच पूछिए कि मानवीय संस्कृति के प्रतिकूल है कि आप अगर मदद करते हैं और उसका बखाना करते हैं. और नेपाल में बिहार की तरफ से जो कुछ हुआ वो सबको मालूम है,कभी कोई कहने गया है क्या. हम लोगों की तो यह ड्यूटी है ना. आखिर भारत में कोई विपत्ति आती है तो दूसरे देश मदद ऑफर करते हैं या नहीं,हम लें या ना लें ये दूसरी बात है. यह बोलना किसी भी तरह से मानवीय मूल्यों के और राजनैतिक दृष्टिकोण से भी यह मुनासिब नहीं है. इससे देश को अंततोगत्वा नुकसान ही होना है.

 

दिबांग- ये जो थाली खींचने वाली बात है आज आप कह रहे हैं कि थाली उन्होंने खुद वापस कर दी?

नीतीश- ये तो हमने उस समय ही कर दिया था और असेंबली में भी इस बात का जिक्र करके बता दिया था. ये तो एकतरफा प्रचार करते-करते ये बात कह गए.

 

दिबांग- क्या कहा बीजेपी के नेता वो भोज नहीं चाहते थे?

नीतीश- अरे जिस तरह से उन्होंने बिहार के सेंटीमेंट को चोट पहुंचाने वाली बात कही थी उसपर मैंने अपनी पीड़ा व्यक्त कर दी. तो ये बात उन लोगों के मन में लगने लगी धीरे-धीरे और शाम होते-होते उन्होंने कह दिया कि छोड़ दीजिए. पूरे दिन में भोज पर प्रश्नवाचक चिन्ह आ गया. क्योंकि मेरे मन भी ये पीड़ा थी कि यह नहीं कहना चाहिए था. भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल है. देने वाला बोलता नहीं है.

 

दिबांग- तो फिर बीजेपी संदेश आया कि भोज नहीं होगा.

नीतीश- हां बीजेपी के लोकल नेताओं ने कहा कि छोड़ दीजिए. हमारा तो सबकुछ तैयार था. हम तो एक साधारण सा सवाल पूछते हैं कि इतने दुखी थे तो उन्हें रिश्ता तोड़ना चाहिए था ना. अगर उनको लगता है कि मेरे इस एक्शन से उनको ठेस पहुंची थी तो साथ चुनाव नहीं लड़ना चाहिए था. हमने तो उन लोगों को कह दिया था कि जहां मुख्यमंत्री का आवास होता है वहां से राजभवन का रास्ता एक-ढेढ़ मिनट का है. मैंने कह दिया था कि भई बता दीजिए एक मिनट का रास्ता है, हम जाकर त्यागपत्र सुपुर्द कर देता हूं. तो वो रहे भी, बाकि समय वो सरकार भी रही, गठबंधन भी रहा, लीडरशिप भी वही रहा, चुनाव भी लड़े, जबरदस्त सफलता भी मिली, तो कौन सा मुद्दा रहा ये.

 

आज इस मुद्दे को इन्वोक करना, यह इस बात को दर्शाता है कि किसी चीज का मन में गाठ बांधकर वक्त का इंतेजार करते हैं. और समय बीतने के बाद करते हैं.

 

सवाल संकर्षण ठाकुर- भयंकर सी कटुता आप के और प्रधानमंत्री जी के बीच हो गई है और बिहार में रोज रिस रही है वो. सुबह में आप लोग हाथ मिलाते हैं और दोपहर-शाम होते-होते बुरा ना मानिएगा, गाली गलौज शुरु हो जाती है. आप भाजपा के साथ करीब 17 साल रहे, अगर आपका विरोध वैचारिक है तो किन-किन बिंदुओं पर है, कि किन बिंदुओं पर नरेंद्र मोदी से भाजपा को अलग छोड़कर मतभेद है जरा स्पेसिफाई करें.

 

जवाब नीतीश- ये तो बीजेपी की आज की स्थिति को देखकर ही उसका उत्तर मिल जाता है. उनके हालात क्या है आप जरा देख तो लीजिए, कोई लोकतंत्र बचा है क्या वहां. अब कोई पार्टी का साथी या सहयोगी है? फॉलोवर बन गए हैं सब तो वह तो एक अलग प्रश्न है.

 

आपने जो कुछ भी कहा, आप बताइए हम गर्मजोशी से स्वागत करते हैं, सरकारी समारोह में भी रहते हैं, प्रेम से हम अपनी बात कहते हैं. दूसरे प्रोग्राम में भी मैं जाता हूं जहां मैं डायस पर होता हूं, बोलने का अवसर नहीं मिलता, वहां भी मैं जाता हूं. मैं इस देश का कृषि मंत्री भी रह चुका हूं, इस नाते आईसीआर का प्रेसीडेंट भी रहा हूं और आईसीआर का फंक्शन है. 5 मिनट मेरे बोलने का वक्त नहीं है, मैंने तो कुछ नहीं कहा, हम तो मीटिंग में रहे.

 

विदा कर दिया मुज्जफरपुर गए. पहल किसकी तरफ से हुई. और मुज्जफरपुर में वो जितनी बात बोल गए. अगर उन बातों का उत्तर न दिया जाए तो फिर आप क्या कहते, तब तो जो बात बोल रहे हैं वो सही है. अगर हम उत्तर देते हैं तो गाली डैस उसमें गलौज जोड़ देते हैं. एक तरफा गाली है, गाली के बाद गलौज नहीं है ये. आज जो बिहार में लोगों ने जिम्मेदारी दी है इस नाते यह तो मेरा कर्तव्य बनता है कि मैं फैक्ट्स को लोगों के सामने रख दूं. तो मैंने तो कोई ऐसी बात नहीं कही है. हम तो पूरा आदर सम्मान करते हैं. पटना के बाहर कल एक सरकारी समारोह था जहां मुझे नहीं जाना था, मैं जान रहा था कि ये शिलान्यास कोई मायने नहीं रखता है, बहुत सारी चीजों का एलाइंनमेंट तय नहीं है और आप शिलान्यास करने की बात करते हैं. बहुत अच्छा करिए. मैं ऐसे किसी फंक्शन का पार्ट नहीं बनूंगा. और वहां जाकर कहूं तो लोगों को लगेगा कि ये अशिष्टता है. मैं कुछ भी करूं लेकिन अशिष्टता नहीं कर सकता चाहे मेरे ऊपर जितना भी चार्ज लगाइए.

 

अब बताइए सरकारी मंच से क्या-क्या कहा गया. राज्य की सरकार केंद्र की सरकार के सामने अपनी बात रखती है क्या उसको भीख मांगना कहते हैं, याचना कहते हैं. ये तो ड्यूटी है हमारी. कोई भी केंद्र की सरकार में रहेगा और हम अगर राज्य की सरकार में रहेंगे तो केंद्र के सामने अपनी बात रखेंगे ही. ये याचना है, ये तो हक की बात है लेकिन जिस अंदाज में कहा गया जैसे लगता है कि जानबूझ कर वो सारी बातें कही गई. अब आप बताइए कि इस तरह की बात होती है फिर आप पब्लिक मीटिंग करते हैं अपने पार्टी का. अगर फैक्ट को हम लोगों के सामने नहीं रखेंगे तो क्या हम अपनी ड्यूटी को निभाते हुए पाए जाएंगे. तो मेरी तरफ से कोई तीखापन नहीं है. मैं प्रधानमंत्री पद और ऑफिस का सम्मान करता हूं.

 

कल की जो मीटिंग थी उस मीटिंग के बाद धन्यवाद ज्ञापन में क्या कहा गया. केंद्रीय राज्य मंत्री राजीव प्रताप रूडी ने कहा कि प्रधानमंत्री जी ने इतना दे दिया, अब आपको भी देना है कम से कम 10 करोड़ वोट ऐसा कुछ बोला उन्होंने. तो हमने कहा कि भई बोली लग रही है क्या. हमको याचक कह रहे हैं और खुद कह रहे हैं. 50 हजार करोड़, 60 हजार करोड़, 70 हजार करोड़, 80 हजार करोड़, 90 हजार करोड़ जरा बताइए ये कोई तरीका है. तो मैं विनम्र प्रार्थना करुंगा कि हम लोगों का कोई योगदान नहीं है. मैं तो केवल आईना दिखा देता हूं, जो कि मेरा कर्तव्य है. ये तथाकथित पैकेज-पैकेज हो रहा था तो ये पुरानी चीजों की रिपैकजिंग है, कुछ भी नया नहीं है, कुछ भी बजट का प्रॉविजन नहीं है. प्रोजेक्ट का शिलान्यास होता है, एलाइन्मेंट तक तय नहीं रहता है. तब आप उसको क्या कहेंगे. इन बातों को बता देना, तथ्य को सामने रख देना तो यह तो हमारी ड्यूटी है.

 

दिबांग- इस पर तो आपकी लाइन है नीतीश जी कि याचना नहीं, अब रण होगा.

नीतीश- अरे भाई लोकतंत्र में जो चुनावी रण होता है वो तो होता ही रहता है. अगर युद्ध है तो युद्ध के भी कुछ नियम होते हैं, युद्ध के जो नियम है अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसका भी तो उलंघन हो रहा है.

 

सवाल कंचन गुप्ता- चुनावी मौसम में मोदी पैसों की बारिश कर रहें है लेकिन ये बताएं अगर आप जीत के आते हैं तो इस पैसे का सदुपयोग हो कैसे इसका हिसाब रखेंगे, पहले भी पैसे मिले है लेकिन सुदपयोग नहीं हुआ था. मैं खुद बिहार से हूं और ये पहली बार नही है कि बिहार को स्पेशल फंड दिया जा रहा है लेकिन ग्राउंड पर आजतक उसका कोई असर दिखा नहीं.

जवाब नीतीश- सबसे पहले मन से इस भ्रम को हटा दीजिए कि बिहार में कभी पैसे का सदुपयोग नहीं हुआ है. मैं आप को बता दूं कि एनडीए सरकार का मैं अंग था,जो कहा गया कि अटल जी की सरकार ने 10 हजार करोड़ का फंड दिया वो फैक्चुअली सही नहीं है. एक हजार करोड़ पंचवर्षिय योजना के तहत बिहार के बटवारा होने के बाद बिहार को विशेष सहायता दी गई. इसके लिए प्रोजेक्ट आईडेंटीफाई किए गए. कुछ स्टेट हाईवे बनाने के लिए, इस्ट गंडक नहर के जिर्णोद्धार के लिए,पावर सेक्टर में,बरौनी,कांटी बंद थे उनके रिनोवेशन के काम के लिए पैसा दिया गया.

 

साथ-साथ यह भी तय हो गया था उस समय कि ये सारे काम प्रोजेक्ट के लिए पैसा मार्क किया गया था. और ये तय किया गया कि सेंट्रल एजेंसी के माध्यम से होगा. और उसका चयन सेंट्रल गवर्नमेंट करेगी, प्लानिंग कमीशन करेगा. हमने उसी वक्त इसका विरोध किया था कि भाई ये ठीक नहीं है कि आप अगर किसी राज्य को सहायता देते हैं तो उस राज्य के हवाले करना चाहिए, उनकी ड्यूटी है कि किस तरह से उसका इंप्लीमेंट करते हैं. ये सेंट्रल गवर्नमेंट ने अपने ऊपर जिम्मेदारी इम्पीलीमेंटेशन की थी. जब हमारी सरकार बन गई तो हमने देखा कि इतने दिनों में किसी सेंट्रल इजेंसी ने कुछ भी नहीं किया. तब हमने इस सवाल को उठाया कि ये तो गलत बात है. तो फिर डिप्टी चेयरमैन थे अहलुवालिया साहब उनके चैंबर में मीटिंग हुई,उसी समय उनको कहा गया कि या तो काम शुरु कीजिए या तो इसको टर्मिनेट किया जाए. स्टेट गवर्नमेंट के जिम्मे था ही नहीं.

 

और अब की बार उसमें है या एक बार उसको देख तो लीजिए. नेशनल हाईवे के बारे में घोषणा कर रहे हैं, जिसके बारे में मैं बार-बार कह रहा हूं कि कोई एलाइंनमेंट ही तय नहीं है. और कुछ का शिलान्यास भी हो रहा है. सबसे बड़ी चीज है कि जो ये चीजें घोषित कर रहे हैं,वो क्या है कब मिलेगा. हां नेशनल हाईवे के बारे में एक बात सब के दिमाग में दर्ज होनी चाहिए कि हम लोगों ने नेशनल हाईवे के खराब स्थिति के मद्देनजर वो पैसा नहीं दे रहे थे,उसके मेंटेनेंस का तो राज्य सरकार ने अपनी तरफ से लगभग 1 हजार करोड़ रु लगा कर नेशनल हाईवे को ठीक किया. और वो पैसा अब तक नहीं मिला. तो हमने कहा भाई आप लोग वो पैसा तो दिलवाईए.

 

कंचन गुप्ता- तो जो बिहार के बारे मे ये परसेप्सन है कि पैसे का सदुपयोग नहीं होता है ये पूरी तरह से गलत है.

नीतीश- मैं आप को आमंत्रित करता हूं कि आप किसी एक सेक्टर में जाकर स्टडी कर लीजिए. बड़बोलापन मेरे स्वभाव में नहीं है, मैं आप से विनम्र निवेदन करता हूं कि आप आ कर देख लीजिए. और अभी बिहार से यूनिवर्सिटी से, डिफरेंट फैकल्टी के लोग लॉ एंड आर्डर में, हेल्थ सेक्टर में, एजूकेशन में, वुमेन इंपारमेंट, ह्यूमन डेवलपमेंट में सब में अध्ययन खुद कर रहे हैं. देश के बाहर की कई यूनिवर्सिटी के लोगों ने बिहार के बारे में अध्ययन किया है. एक बार देख लें. शायद ये राय आप की बदल जाए.

 

सवाल दिबांग- क्या आप को लगता है कि आप की जो रणनीति है उसमें कुछ नयापन भी है. यानि आप सोशल मीडिया में बहुत दिखाई दे रहे हैं. ट्वीटर पर आप लगातार ट्वीट करते रहते हैं. ट्वीटर की और सोशल मीडिया की हवा को आप ब्लोअर की हवा बता चुके हैं. क्या ये जो प्रशांत किशोर आए हैं वो है, क्या ये जिस तरह का प्रचार मोदी करते थे गुजरात में रहकर, क्या ये उसकी कॉपी नहीं है. उससे कहां तक अलग है.

 

जवाब नीतीश कुमार- ये तो अब हम लोगों की मजबूरी हो गई है. क्योंकि देश की सरकार तो ट्वीटर गवर्नमेंट है. हमने तो कहा यूनियन ट्वीटर गवर्नमेंट है. ये अपनी बात ट्वीट करते हैं, दूसरों का मैसेज लेते हैं.

मांझी को मुख्यमंत्री बनाना मेरी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल: प्रेस कॉन्फ्रेंस में नीतीश 

अब मान लीजिए कि सामने वाला अंग्रेजी जानता है तो अंग्रेजी में ही चिट्ठी भेजिएगा ना. तो अगर वो ट्वीट की ही भाषा जानते हैं वही समझते हैं तो हमें भी ट्वीट करना पड़ेगा, ये हमने बिहार के हित में किया. ये कोई मेरा व्यक्तिगत नहीं है. जो हम ट्वीट कर रहे हैं वो बिहार के इंट्रेस्ट में कर रहे हैं. क्योंकि ट्वीट नहीं करेंगे तो वो जानेगें नहीं तो कुछ भी बोलते रहिए वो सुनेंगे ही नहीं. हम तो परिस्थिति बता रहे हैं. जब वो आने वाले थे तो ट्वीट किया गया था. तब उन्होंने उसको संज्ञान में लिया. तो मतलब ट्वीट को ही संज्ञान में लिया जाता है, इसलिए ट्वीट किया. एक चीज बता दें आपको इसके पहले भी ब्लॉग पर थे और कई महत्वपूर्ण बातें हमने ब्लॉग पर ही बताई थी. जैसे लोगों के मन में रहता था कि ये लड़कियों के लिए साइकिल योजना कैसे आई. तो हमने ब्लॉग लिखकर ही बताया कि लड़कियों के लिए साइकिल योजना कैसे शुरु हुई.

 

ट्वीटर पर हमने देखा कि लोग सवाल पूछ रहे थे तो हम तो बैठे हुए थे और हमको लगा कि आप इतनी जल्दी कमरे में हैं और लोग पूछ रहे हैं और आप उसका उत्तर दे रहे हैं और तुरंत लोगों के बीच में जा रहा है. तो हम को लगा कि ये एक ऐसा माध्यम है, ऐसा रास्ता है.

 

सवाल उर्मिलेश- आप ने कहा कि मैक्सिमम गोलबंदी की जानी चाहिए, किसी भी चुनाव में पॉलिटिकल स्टैटजी का बहुत महत्व होता है. अगर दोनो गठबंधनों को देखा जाए तो बीजेपी ने अपने गठबंधन में ज्यादा लचीलापन और पूरी ताकत इकट्ठा की है लेकिन 100-100 सीटें आप दोनों ने ली 40 सीटें कांग्रेस को दी हालांकि कांग्रेस के बड़े नेता हैं वो मानते थे 25 तक मिल जाए तो बहुत अच्छा है, और इसके बाद आप का जो दूसरा सेक्यूलर सहयोगी है एनसीपी वो भाग रहा है और लेफ्ट भी आप से बिल्कुल अलग है, तीनों पार्टियां अलग चुनाव लड़ रही हैं. मोदी जी के गठबंधन के तुलना में आप के गठबंधन की इस विफलता पर आप की क्या राय है ?

 

जवाब नीतीश कुमार- लेफ्ट की जहां तक बात है. लेफ्ट ने गठबंधन से पहले ही निर्णय कर लिया था कि लेफ्ट की जितनी पार्टियां वो मिलकर एकसाथ चुनाव लड़ेंगी. हमने तो लोकसभा चुनाव के बाद अपनी राय बताई थी और लोकसभा चुनाव में सीपीआई के साथ ही मेरा तालमेल था. लेकिन यह फैसला लेफ्ट ने लिया और इसका ऐलान भी कर दिया. रही बात आप ने एनसीपी की तो हम लोगों ने अपनी तरफ से एनसीपी को नहीं छोड़ा.

 

उनके लिए सीटें निर्धारित थी लेकिन उन्होंने छोड़ने का फैसला किया और जिस तरह के बयान उनकी तरफ से और जिस तरह से ऐलान कर दिया गया एनसीपी के एक बड़े नेता के द्वारा कि भाई हम महागठबंधन में नहीं रहेंगे.

 

उर्मिलेश- कांग्रेस को जरुरत से ज्यादा सीटें नहीं मिली हैं.

नीतीश- नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है.

दिबांग- आप ने कांग्रेस को 40 सीटें दे दी क्या सही है?

नीतीश- हां बिल्कुल. क्यों क्या गलत है उसमें? हम लोग तो चाहते हैं कि ब्राड एलाइंस है तो सब कुछ एक ब्राड माइंट सेट के साथ करना चाहिए. सीटों के बारे में अगर बहुत सोचने लगेंगे तब तो कभी कोई गठबंधन हो ही नहीं पाएगा. हम लोग काफी ज्यादा सीट लड़ते थे, लालू जी काफी ज्यादा सीट लड़ते थे.

 

सवाल प्रकाश कुमार- नीतीश जी इस चुनाव दो मुद्दा खूब हावी है. पहला विकास का और दूसरा लालू-नीतीश की जोड़ी का. सवाल ये है कि लालू यादव के साथ जाने की आपकी कौन सी ऐसी मजबूरी हुई कि चारा घोटाला में जिस व्यक्ति को सजायाफ्ता घोषित कर दिया गया है. किसी भी सजायाफ्ता के साथ आप खड़ा होना स्वीकार नहीं करते हैं. आपकी छवि को धक्का लगता है तो ऐसे में आप अपनी इमेज से कॉप्रोमाइज कर रहे हैं. क्या कभी आप सोचते हैं कि ये एक बहुत बुरा कदम हो सकता है.

 

जवाब नीतीश- ये कोई मेरा व्यक्तिगत प्रश्न नहीं है. जैसा मैंने पहले बताया कि भारतीय जनता पार्टी कि जो राजनीति चल रही है, उसके विकल्प और विरोध में कोई मजबूत राजनैतिक ताकत खड़ी होगी या नहीं और चूंकि आज बिहार में चुनाव है. बिहार राजनैतिक दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण है. तो बिहार में एक तरफ लोग वोट करेंगें लेकिन इस चुनाव पर देश भर के लोगों की निगाह टिकी हुई है.

 

एक बीजेपी के पक्ष में सोचने वाले लोग हैं और एक बीजेपी से अलग सोचने वाले. वो सेंटिमेंट ब्राडर यूनिटी का है तो इसमें व्यक्तिगत लाइक या डिसलाइक का प्रश्न ही नहीं है. कमोबेश मैंने जो बिहार के लोगों का माइंड पढ़ा है, उनकी जो सोच चल रही है वो हमने देखा है. बहुत से लोग हैं जो कहते हैं कि साहब हमने दिल्ली के चुनाव में हमने बीजेपी को दे दिया लेकिन राज्य में हम आप के साथ हैं. बिहार में लोग पत्र लिखते हैं और जो पत्र आते हैं, उससे हम असेसमेंट करें तो दोनो बात आती है. लेकिन हमने देखा कि ज्यादातर लोग यही लिखते हैं कि बड़ी एकता होनी चाहिए. और जो लोगों के बीच हम जाते हैं. तो मुझको जो हिंट मिलता है वो ऐसा ही मिलता है. और बिहार के बाहर के लोगों में कोई नहीं कहता है कि आप को अकेले जाना चाहिए.

 

सवाल नीरजा चौधरी- आप कह रहे हैं कि इसका नेशनल इंपैक्ट होगा तो बीजेपी जीतती है तो क्या नेशनल इंपैक्ट होगा और आप जीतते हैं तो क्या इंपैक्ट होगा? और कई लोग कहते हैं कि फिर आप ऑपोजिशन फोर्सेस के सिंबल बन जाएंगे. क्या आप इसमें विश्वास रखते हैं ?

 

जवाब नीतीश कुमार- हम इतनी दूर तो नहीं सोचते लेकिन 15 महीने में कोई काम नहीं हुआ है. सिर्फ बोलने का दौर चल रहा है. किसी चीज का कोई इंप्लीमेंटेशन नहीं हो रहा है. रोज नई बात या पुरानी बातों को नए तेवर में. यही हम लोग देख रहे हैं, कुछ हो नहीं रहा है. इकॉनमी में भी कोई बूस्ट नहीं आया है. ऐसी परिस्थिति में लोगों को लगा कि सशक्त विपक्ष बनना चाहिए और वह धीरे-धीरे एक विकल्प का आधार बनेगा. लोकतंत्र में जनता जिस दिन वोट देती है उसी समय उसके दिमाग में विकल्प भी रहना चाहिए. बिहार में हम लोग जीतते हैं तो वो धारा जो सशक्त विपक्ष चाहती है, वो मजबूती महसूस करेंगे.

 

सवाल विजया पुष्करना- आप बिहार में विकास पुरुष माने जाते हैं, क्या बिहार में सिर्फ विकास के मुद्दे पर चुनाव जीते जा सकते हैं. क्या कहना है आपका?

 

जवाब नीतीश- हम तो डेवलपमेंट के ही मुद्दे पर चल रहे हैं. हमने तो साफ कहा है कि एक तरफ बीजेपी समाज में विभाजन का काम कर रही है, एक तनाव उत्पन्न करने की कोशिश करती रहती है. अब तो बीजेपी ने फार्मली कह दिया कि 10 साल में कुछ काम नहीं हुआ, अभी तक हमको बिमारु की ही श्रेणी में रख रहे हैं. मध्य प्रदेश,राजस्थान को निकाल दिया और हमको वहीं रखे हुए हैं. तो अब तो और ज्यादा चुनौतीपुर्ण है कि जो काम हुआ है लोगों के सामने बताना.

 

विजया- उस काम के बावजूद आप को लालू जी की जरूरत पड़ गई.

नीतीश- नहीं नहीं वो तो राजनैतिक तौर पर लोग इसकी आवश्यकता महसूस कर रहे हैं. अगर अलग-अलग लोग वोट देंगे तो बट जाएगा, अगर एक जगह लोग होंगे तो लोगों को अपना दिमाग बनाने में सहुलियत होगी.

 

भाई विकास का क्या मतलब है आप किसी भी सेक्टर में देख लीजिए तब कहिएगा. हमारे यहां रुटीन इम्यूनाइजेशन 18 परसेंट था, आज हम 78 परसेंट पर हैं. बिहार का उन्मूलन होगा. बिहार को लेकर दुनिया भर में लोगों के मन में संका थी. और ये कर के दिखाया. 12.5 परसेंट बच्चे स्कूलों के बाहर थे, वो इंप्रूव हुआ. अभी तो हम शिक्षा के क्षेत्र में बुनियाद को ठीक कर रहे हैं. हम तो चाहते हैं डिबेट हो लेकिन एक इंडिकेटर पर, उस पर सबको रखिए.

 

सवाल राजलक्षी- आप जब पहले सीएम बने थे तो बिहार में भूमि सुधार लाना चाहते थे. तो ठंडे बस्ते में क्यों दब गया और आगे की क्या रणनीति है. और आर्थिक तौर पर आप की जो पॉलिसी है वो कांग्रेस और बीजेपी से हट कर नहीं आ रही है.

 

जवाब नीतीश- हमने विकास के साथ ह्यूमन डेवलपमेंट पर भी जोर दिया है, इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भी जोर दिया है और हर सेक्टर में ग्रोथ है. हम प्रत्येक भाषण में इस बात का जिक्र करते हैं. सिर्फ जीएसडीपी का ग्रोथ, ग्रोथ का इंडिकेटर नहीं है. सेंट्रल गवर्नमेंट का बीपीएल का देख लीजिए जो यही लोग तय करते हैं. कुछ तो बदला नहीं है और उसी इंडिकेटर पर बाकि सब राज्यों को इवल्यूवेट कर लीजिए.

 

एक्सपेंशन भी हो रहा है, लोगों के छोटे-मोटे रोजगार थे तो उसको लोग बढ़ा रहे हैं. लोगों के हाथ में दो पैसा आ रहा है. हमारे ग्रोथ के साथ-साथ एक स्ट्रांग बेस तैयार होता जा रहा है.

 

अगर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिल जाए तो बिग टिकट इंवेसमेंट हो जाती. अगर विशेष राज्य का दर्जा मिल जाए तो टैंक्सों में छूट मिल जाएगी. और निवेशक पूंजी लगाएंगे, वरना आज कौन जाएगा बिहार में पूंजी लगाने. जहां पहले से लगा हुआ है वहीं लोग जाते हैं. नई जगह पर जाने के लिए तो कुछ बुनियाद चाहिए. हमारी इंड्रस्टियल प्रमोशन पॉलिसी इतनी अच्छी है कि फूड प्रोसेसिंग और कई सेक्टर में, कन्जूमर आइटम में लोग वहां लगा रहे हैं. पैसा लगा रहे हैं और अपने को एक्सपेंड भी कर रहे हैं. हमारे यहां जितनी सुगर इंड्रस्टीज चल रही थी, सब ने एक्सपेंड किया.

 

रही बात भूमि सुधार की तो उस पर पूरा काम कर रहे हैं. सबसे बड़ी चीज है हमारे यहां सर्वे और सेटलमेंट बहुत पुराना है. हम फ्रेश सर्वे और सेटलमेंट करा रहे हैं, ये होगा तभी सारी स्थिति उभर कर सामने आएगी. और उसके बाद उसकी चक बंदी होगी. जब तक रिकॉर्ड अपडेट नहीं होगें. कहीं कहीं ग्रेट ग्रैंडफादर के नाम से जमीन चली आ रही है. और उस ग्रेट ग्रैंडफादर की 25 संतानें हैं, वो 25 टुकड़े में जाएगी. भूमि सुधार की बुनियादी जरुरत है कि फ्रेश सर्वे और सेटलमेंट हो जो कि चल रहा है.

 

सवाल नीलाभ मिश्रा- कोबरापोस्ट के स्टिंग में रणवीर सेना की मददगार के रूप में बीजेपी के बड़े नेता के नाम आए हैं जिसमें पूर्व एक प्रधानमंत्री भी शामिल थे. क्या सरकार इस मामले पर कोई कार्रवाई करेगी आपके मुख्यमंत्री रहते हुए रणवीर सेना के लोग छूटे थे और आपके कैबिनेट इन नामों में से शामिल थे. वो क्या आपकी सरकार इस स्टिंग के छींटे से बच सकती है?

 

जवाब नीतीश- देखिए हमने देखा नहीं है, सुना है. उपलब्ध हुआ तो हम जरुर देख लेंगे. लेकिन कहीं से भी कोई ऐसा मसला बनता है जिसपर लीगल एक्शन की जरुरत है तो फिर वो तो ड्यूटी है एडमिस्ट्रेशन का, पुलिस का. वो ड्यूटी अपना निभाएगें. आपने जज साहब का नाम लिया ये सही है कि उनका काम बंद हुआ मेरे समय में लेकिन काम बंद होने का निर्णय मेरे पूर्व राष्ट्रपति शासन के दौरान हो चुका था. हमने कोई निर्णय नहीं लिया. कई साल से काम चल रहा था और उस समय ये सवाल आया था,हम लोगों के हाथ में कोई रिपोर्ट नहीं आयी थी. मैंने देखा नहीं लेकिन इसके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करूंगा.

 

मैं इस चर्चा के बाद ही डीजीपी और होम सेकेट्री को कहूंगा कि सारी बातों को देख लीजिए. और जो भी तथ्य होगें और एक्शन जरुरी होगा तो हम तो यही कहते हैं कि एक्शन की जरुरत पर कोई पाबंदी नहीं है. राष्ट्रपति शासनकाल के दौरान ये फैसला हो चुका था. अब आप समझ लीजिए कि कोई क्लोजर रिपोर्ट हो जाए और दस दिन के बाद आप सामने आ जाएं तो वही बात है.

 

सवाल दिबांग- नीतीश जी इस चुनाव में दो नए चेहरे आपके राज्य में दिखाई देंगे एक असदुद्दीन ओवैसी, दूसरा अरविंद केजरीवाल. आप इन दोनों को कैसे आंकते हैं?

 

जवाब नीतीश- देखिए अरविंद केजरीवाल जी की बात दूसरी है और जिनका नाम आप ने लिया ओवैसी जी की बात दूसरी है. अपने यहां लोकतंत्र में हर पार्टी को चुनाव के बारे में फैसला करने का अधिकार है कि चुनाव लड़े या नहीं लड़े. हम किसी रूप में नहीं आकते. केजरीवाल जी से मेरे बहुत अच्छे संबंध हैं.

 

आज जो दिल्ली में राज्य सरकार को केंद्र सरकार की तरफ से परेशान किया जा रहा है कि उसको कोई अधिकार ना रहे. इतना बड़ा मैंडेट देती है जनता और इतने बड़े पैमाने पर लोग चुनाव प्रचार करते हैं. जो सरकार बनती है उसको आप काम करने नहीं दें और कदम-कदम पर बाधा डालें तो वो बात ठीक नहीं है. रही बात बिहार में क्या फैसला होगा मेरी इस विषय पर कोई चर्चा नहीं हुई है.

 

ओवैसी जी की बात कि तो भाई वो जिस पार्टी के हैं, उस पार्टी को फैसला करना है. इसमें हम लोगों को क्या करना है, उनको जो उचित लगेगा वो अपना करेंगे. हम इन चीजों के बारे में नहीं सोचते हैं, बस अपना काम बहुत ही फोकस ढंग से करते हैं.

दिबांग- क्या आप उनसे गठबंधन करेंगे.

नीतीश- नहीं, कोई प्रस्ताव ही नहीं है. आप गठबंधन क्या एक मिनट में इस प्रेसकान्फ्रेंस में करा दीजिएगा.

दिबांग- क्या शत्रुघ्न सिन्हा को या उनकी पत्नी को टिकट देने की बात है.

नीतीश- हम शत्रुघ्न सिन्हा जी की इज्जत करते हैं. बिहार में उनकी बहुत इज्जत है, वो बिहार का गौरव हैं. एक बड़े और अच्छे कलाकार के रूप में उनकी प्रतिष्ठा है. जिस पार्टी में रहें उनका फैसला है.

 

रैपीड फायर राउंड(पांच सवाल)

 

पहला सवाल

दिबांग- मुख्यमंत्री के तौर पर आप लालू यादव के शासनकाल को सफल मानते हैं या असफल?

नीतीश- ये तो कोई प्रश्न ही नहीं है. उसके बाद तो राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनी और उसके बाद बिहार के लोगों ने मुझको चुना. और इस बीच में एक-दो बार राष्ट्रपति शासन भी लगा.

 

दिबांग- ये दौर ऐसा है कि आप को दो में से एक चुनना है. क्या आप एक चुनना चाहेंगे या छोड़ना चाहेगे.

नीतीश- इस सवाल का उत्तर मेरी तरफ से उस दौर में दिया हुआ है. आज के दौर में अप्रासंगिक प्रश्न है ये.

दिबांग- उस दौर में आप ने इसको असफल माना था.

नीतीश- कहा तो आज के दौर में अप्रासंगिक है. ये सवाल झगड़ा लगाने के लिए है.

 

दूसरा सवाल

दिबांग- आपको खाने में क्या पसंद है, अप्पम या लिट्टी चोखा?

नीतीश- हमें तो दोनो पसंद है लेकिन सबसे ज्यादा हम अप्पम खाने के लिए जाते हैं. लीट्टी चोखा भी हम लोगों को बहुत प्रिय है. लेकिन दक्षिण भारतीय खाना भी मुझे अच्छा लगता है.

 

तीसरा सवाल

दिबांग- राजनैतिक जीवन में सबसे बड़ी भूल आप किसको मानते हैं. बीजेपी के साथ तालमेल करना या जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाना.

नीतीश- जो दूसरा प्रश्न आपने कहा इसके लिए तो बड़ी माफी मांग चुके हैं. वो सबसे बड़ी मुझसे गलती हुई. नहीं तो इनको पहले जानता कौन था. और बनाते ही बीजेपी के साथ ताल-मेल हो गया अंदर-अंदर कि हटाना पड़ा. मैंने तो शपथ ग्रहण करते ही मांफी भी मांगी इस बात पर.

 

चौथा सवाल

दिबांग- आप के खिलाफ बहुत कुछ कहा गया नीतीश जी. दो बयान मैं आपको बता रहा हूं. दिग्विजय सिंह ने अप्रैल 2013 में कहा कि रामविलास पासवान ने 2002 के बाद इस्तीफा दे दिया और आप ने इस्तीफा नहीं दिया.

दूसरा बयान लालू यादव का बयान मई 2013 में कहा कि नीतीश कुमार तो कम्यूनल फोर्सेस के तोता हैं इनमें से आप को ज्यादा आहत किस बयान ने किया.

 

नीतीश- हम किसी से आहत नहीं है क्योंकि हम जानते हैं कि बयान देने के लिए ही ये सब बोला जाता है. इस पर हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया. आहत तो डीएनए वाले बयान से हैं.

 

पांचवां सवाल

दिबांग- आज बिहार की आर्थिक बदहाली के लिए कौन जिम्मेदार है? आपके वर्तमान सहयोगी या आप के पुराने सहयोगी?

नीतीश- आर्थिक बदहाली में बिहार नहीं है. बिहार प्रगति कर रहा है. लेकिन राष्ट्रीय औसत के नीचे हैं. तो राष्ट्रीय औसत और उससे आगे जाने के लिए इसे विशेष राज्य का दर्जा चाहिए. इसके लिए किसी सहयोगी कि जिम्मेदारी नहीं है ये वस्तुस्थिति है. बिहार को आगे बढ़ने के लिए मेरी समझ से विशेष राज्य का दर्जा मिलना चाहिए. और अभी कहिएगा तो आज की सरकार है तो उसकी जिम्मेदारी है उसको आज के तारीख में करना चाहिए.

 

प्रेस कांफ्रेंस में इतना ही अगले हफ्ते होंगे एक और खास मेहमान तब तक देखते और पढ़ते रहिए एबीपी न्यूज.

 

India News से जुड़े हर समाचार के लिए हमे फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस पर फॉलो करें साथ ही हमारा Hindi News App डाउनलोड करें
Web Title: nitish kumar comment on Jeetan Ram Manjhi
Explore Hindi News from politics, Bollywood, sports, education, trending, crime, business, साथ ही साथ और भी दिलचस्प हिंदी समाचार
First Published:

Related Stories

पटना/भागलपुर: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भागलपुर जिला में सरकारी खाते से पैसे की अवैध...

हिजबुल मुजाहिदीन को विदेशी आतंकी संगठन करार देना अमेरिका का नाजायज कदम: पाकिस्तान
हिजबुल मुजाहिदीन को विदेशी आतंकी संगठन करार देना अमेरिका का नाजायज कदम:...

इस्लामाबाद: आतंकी सैयद सलाहुद्दीन को इंटरनेशनल आतंकी घोषित करने के बाद अमेरिका ने कश्मीर में...

डोकलाम के बाद उत्तराखंड के बाराहोती बॉर्डर पर चीन की अकड़, चरवाहों के टेंट फाड़े
डोकलाम के बाद उत्तराखंड के बाराहोती बॉर्डर पर चीन की अकड़, चरवाहों के टेंट...

नई दिल्ली: डोकलाम विवाद पर भारत और चीन के बीच तनातनी जगजाहिर है. इस बीच उत्तराखंड के बाराहोती...

एबीपी न्यूज पर दिनभर की बड़ी खबरें
एबीपी न्यूज पर दिनभर की बड़ी खबरें

1. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मिशन 2019 की तैयारियां शुरू कर दी हैं और आज इसको लेकर...

20 महीने पहले ही 2019 के लिए अमित शाह ने रचा 'चक्रव्यूह', 360+ सीटें जीतने का लक्ष्य
20 महीने पहले ही 2019 के लिए अमित शाह ने रचा 'चक्रव्यूह', 360+ सीटें जीतने का लक्ष्य

नई दिल्ली: मिशन-2019 को लेकर बीजेपी में अभी से बैठकों का दौर शुरू हो गया है. बीजेपी के राष्ट्रीय...

अगर लाउडस्पीकर पर बैन लगना है तो सभी धार्मिक जगहों पर लगे: सीएम योगी
अगर लाउडस्पीकर पर बैन लगना है तो सभी धार्मिक जगहों पर लगे: सीएम योगी

लखनऊ: कांवड़ यात्रा के दौरान संगीत के शोर को लेकर हुई शिकायतों पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ...

मालेगांव ब्लास्ट मामला: सुप्रीम कोर्ट ने श्रीकांत पुरोहित की ज़मानत याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा
मालेगांव ब्लास्ट मामला: सुप्रीम कोर्ट ने श्रीकांत पुरोहित की ज़मानत याचिका...

नई दिल्ली: 2008 मालेगांव ब्लास्ट के आरोपी प्रसाद श्रीकांत पुरोहित की ज़मानत याचिका पर सुप्रीम...

'आयरन लेडी' इरोम शर्मिला ने ब्रिटिश नागरिक डेसमंड कॉटिन्हो से रचाई शादी
'आयरन लेडी' इरोम शर्मिला ने ब्रिटिश नागरिक डेसमंड कॉटिन्हो से रचाई शादी

नई दिल्ली: नागरिक अधिकार कार्यकर्ता इरोम शार्मिला और उनके लंबे समय से साथी रहे ब्रिटिश नागरिक...

अब तक 113: मुंबई एनकाउंटर स्पेशलिस्ट प्रदीप शर्मा खाकी में लौटे
अब तक 113: मुंबई एनकाउंटर स्पेशलिस्ट प्रदीप शर्मा खाकी में लौटे

 मुंबई: मुंबई पुलिस के मशहूर एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पुलिस अधिकारी प्रदीप शर्मा को महाराष्ट्र...

RSS ने तब तक तिरंगे को नहीं अपनाया, जब तक सत्ता नहीं मिली: राहुल गांधी
RSS ने तब तक तिरंगे को नहीं अपनाया, जब तक सत्ता नहीं मिली: राहुल गांधी

आरएसएस की देशभक्ति पर कड़ा हमला करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि इस संगठन ने तब तक तिरंगे को नहीं...

Get the Latest Coupons and Promo codes for 2017